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प्रिय अर्णब गोस्वामी, क्या हाशिमपुरा 1984 और मुज़फ्फरनगर दंगे थे और गुजरात में दंगे नहीं थे ?

आप दुर्भावना से प्रेरित हैं, अर्णब गोस्वामी – खुला पत्र
 प्रिय अर्णब गोस्वामी,
 हालांकि आप सर्वसक्षम और सर्वशक्तिमान टीवी पत्रकार-सम्पादक और प्रस्तोता हैं, लेकिन फिर भी मैं नाचीज़ आपके हाल के ही एक बुलेटिन को देखने के बाद आप से कुछ सवाल और आपके कुछ सवालों के जवाब देने की हिमाकत कर रहा हूं। मैं जानता हूं कि आप इसके बदले में इतनी ज़ोर से चीख सकते हैं कि मेरी समझ और सोच की शक्ति ही खत्म हो जाए। आप साबित कर सकते हैं कि मैं देशद्रोही हूं और मुझे इस देश में रहने का अधिकार नहीं है। लेकिन प्रिय अर्णब, 15 अप्रैल, 2015 के अपने न्यूज़ऑर डिबेट में आप ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड़ के खिलाफ जिस तरह से बहस की, उसमें आप न केवल एक पार्टी के तौर पर नज़र आए, बल्कि आप ने लगभग वही (कु)तर्क दिए, जो कि अमूमन दक्षिणपंथी राजनेता दिया करते हैं।
आप ने कार्यक्रम की शुरुआत ही यह कहते हुए की, कि कार्यक्रम में पैनल के तीस्ता का साथ देने वालों की अधिक संख्या होने के कारण तीस्ता का पक्ष मज़बूत था और इस के साथ के और वाक्यों में आपने ये साबित करने की कोशिश की, कि तीस्ता सेतलवाड़, राजनैतिक रूप से कांग्रेस के लिए काम कर रही हैं। अर्णब, क्या इसी सवाल के साथ, ये सवाल नहीं खड़ा होता कि अगर केंद्र सरकार का लगातार निशाना. तीस्ता है तो ऐसा बोलने के कारण आप भी किसी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं? लेकिन अर्णब आप इस बात पर आहत हो जाएंगे, हालांकि आप को ऐसा हक़ नहीं है। एक पत्रकार के तौर पर आप से अपेक्षा की जाती है कि चूंकि आप आहत करते रहते हैं, इसलिए आपको आहत होने का अधिकार नहीं है।
आप अमूमन अपने शो में कहते हैं कि आपकी ईमानदारी और निष्पक्षता को चुनौती न दी जाए, अर्णब इस पत्र में ऐसा कर रहा हूं, क्योंकि अमूमन आप ख़ुद हर रोज़ अपनी ही निष्पक्षता को चुनौती देते हैं। आश्चर्य की बात है कि एक ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकार को हर रोज़ इस बारे में एलान करने की क्या ज़रूरत है? लेकिन चूंकि इस बारे में आगे बात की जा सकती है, इसलिए कार्यक्रम पर बात करते हैं। अर्णब आप ने कार्यक्रम की शुरुआत तीस्ता पर गुजरात सरकार और पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों से की, जिनके बारे में दुनिया जानती है कि वो तीस्ता से राजनैतिक प्रतिशोध के कारण लगाए जा रहे हैं। लेकिन अर्णब आप इतने भोले हैं कि आप शोभा डे के खिलाफ शिवसेना के प्रदर्शन को देश का मुद्दा मानते हैं, जबकि तीस्ता का मामला आपके लिए गुजरात सरकार की न्यायप्रियता का सुबूत है। आप ने एक दावा किया कि इन आरोपों को वह ही सच नहीं मानेगा, जो अंधा होगा। अर्णब, आप बिना जांच, अदालती कार्रवाई और फैसले के यह कैसे कह सकते हैं?
आप ने इस नए मामले में फोर्ड फाउंडेशन की फंडिंग को अभिव्यक्ति की आज़ादी, सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक हिंसा के ऊपर रख दिया और ये साबित करने की कोशिश की, कि फोर्ड फाउंडेशन की फंडिंग से तीस्ता सेतलवाड़ देश और गुजरात की बदनामी कर रही हैं। अर्णब, क्या हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई देश की बदनामी है और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा देश का सम्मान? क्या अदालत में न्याय के लिए देश के सबसे शक्तिशाली शख्स के खिलाफ संघर्ष करना, देश की बदनामी है और देश तथा राज्य की सरकार द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा और विद्वेष की भावना को बढ़ावा देना, देश का सम्मान? क्या देश में सरकार द्वारा मानवाधिकारों की अवहेलना करने पर, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर न्याय की मांग उठाना देश की बदनामी है और गुजरात, हाशिमपुरा, 1984 के सभी दंगों में न्याय का कभी न मिलना देश का सम्मान? अर्णब गोस्वामी, अगर देश की किसी भी समस्या पर किसी भी ऐसे मंच पर बात करना, जो कि अंतर्राष्ट्रीय हो, देश से धोखा है, तो आप तो यह हर रोज़ करते हैं क्योंकि आपके कार्यक्रम देश की तमाम समस्याओं की आलोचना करते हैं, जो दुनिया भर में देखे जाते हैं। अपनी विश्व भर की दर्शक संख्या पर आप को गर्व भी है, फिर किसी सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा ऐसा करना, देशद्रोह कैसे हो सकता है? इसके बाद भी अर्णब, फोर्ड फाउंडेशन की फंडिंग को देशद्रोह से कैसे जोड़ा जा सकता है? अगर इसकी जगह कोई और मदद होती, तब भी यही किया जाता और क्या तब यह देशभक्ति होता?
अर्णब, ये सिर्फ एक हिस्सा है, इसके बाद आप ने कहा कि इस फंडिंग का किसी राजनैतिक दल या सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में इस्तेमाल, फंड्स का दुरुपयोग है। अर्णब, यह आप कैसे तय करेंगे कि अगर किसी राज्य या केंद्र में कोई सरकार अन्यायपूर्ण ढंग से धार्मिक पक्षपात के रास्ते पर है, तो उसके खिलाफ बात करना फंड्स का दुरुपयोग है? आप ने कहा, कि चूंकि तीस्ता एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, इसलिए उनको राजनेता या राजनैतिक दलों के खिलाफ किसी तरह की बात नहीं करनी चाहिए। अर्णब, मैं हैरान हूं कि मैं कैसे आप को अब तक, पढ़ा-लिखा और समझदार शख्स समझता रहा? आप ने तो संभवतः राजनीति और समाजशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत ही नहीं पढ़े, जो साफ करते हैं कि समाज और राजनीति अलग-अलग नहीं बल्कि इनमें अटूट अंतर्सम्बंध है। ऐसे में किसी सामाजिक कार्यकर्ता के लिए ऐसी परिस्थिति में सरकार या राजनैतिक दल या फिर सम्पूर्ण राजनीति के खिलाफ आवाज़ उठानी ज़रूरी है, जब वे अपने कर्तव्य की अवहेलना कर के, निजी हितों के लिए समाज और जन के ढांचे, अस्मिता, सुरक्षा एवम् अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ करें। पत्रकार की भी यही ज़िम्मेदारी है और इस नाते ही आप राजनेताओं से सवाल कर पाते हैं। यदि आपका कथन, “आप सामाजिक कार्यकर्ता हैं या राजनेता?” को तार्किक मान लें, तो फिर आप जब राजनीति जनित समस्याओं के बारे में बात करते हैं तो क्या वह राजनीति है?
अर्णब, आपका एक और आरोप था कि तीस्ता एनजीओ के धन से गुजरात सरकार (जो कि पार्टी विशेष की सरकार है) के खिलाफ प्रचार कर रही हैं, इसको आपने देश की छवि से खिलवाड़ करने की संज्ञा दे दी। आपके मुताबिक इस से विदेशों में देश की छवि खराब होती है। तो फिर क्या यह माना जाए कि आप गुजरात सरकार और भाजपा को देश मानते हैं? क्या किसी राज्य की भ्रष्ट और साम्प्रदायिक सरकार के खिलाफ बोलना और न्याय न मिलने पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों की सहायता लेना, देशद्रोह है? इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों और क़ानूनों की कोई ज़रूरत ही नहीं है। इस हिसाब से बांग्लादेश में भारतीय हस्तक्षेप भी ग़लत था और पाकिस्तानी हिंदुओं को भी अपनी आवाज़ अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रखने का कोई हक़ नहीं, जिनके लिए आप भी पत्रकारीय मुहिम चला चुके हैं। अर्णब, अंतर्राष्ट्रीय मंच, दुनिया भर में मानवाधिकार की रक्षा के लिए हैं और अगर किसी बात को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर रखने से देश की छवि धूमिल होती है, तो आप तो यह रोज़ अपने कार्यक्रम में करते हैं?
आपका एक और सवाल था कि तीस्ता गुजरात दंगों में ही काम क्यों कर रही हैं? वो हाशिमपुरा और 1984 में काम क्यों नहीं कर रही थी। सबसे पहले आपको इसका एक तथ्यगत जवाब दे दें। वह यह है कि 1984 और 1987 में जब यह दंगे हुए, तब तीस्ता सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक पत्रकार थी। एक पत्रकार के तौर पर उनको संस्थान से जो ज़िम्मेदारी दी गई, वो उनको निभा रही थी और उनके एक पत्रकार के रूप में पेशेवर जीवन को ले कर, उनके सम्पादकों और साथियों से पता किया जा सकता है। लेकिन आप कहेंगे कि इसकी लड़ाई बाद में लड़ी जा सकती थी, तो अर्णब तीस्ता ने गुजरात दंगों के दौरान जब अपना काम शुरु किया तो उसके पहले से वह अपने स्तर पर एक लड़ाई लड़ रही थी, जो कि शिक्षा को साम्प्रदायिकता से मुक्त कराने की थी। उनके सामने जब गुजरात में जनसंहार हुआ, तो उन्होंने उस मामले में शक्तिशाली राज्य सरकार और उसके कारपोरेट के साथ नेक्सस के खिलाफ एक लड़ाई शुरु की। इसमें इस तरह के सवाल न केवल बेमानी हैं, बल्कि यह उसी तरह के सवाल हैं, जैसे सवाल बीजेपी और विहिप के नेता उठाते रहे हैं। 1984 और 1987 की लड़ाई भी सामाजिक कार्यकर्ता लड़ रहे हैं और लड़ते रहेंगे, लेकिन क्या उन से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वो सारी लड़ाईयां एक साथ लड़ें? चलिए इसका भी प्रति प्रश्न आप से पूछ रहा हूं…क्या एक टीवी एंकर के तौर पर आप सारी ख़बरों पर एक ही साथ बहस कर लेते हैं? आप ने पिछले 5 साल में कितनी बार हाशिमपुरा पर बहस की? आप ने सिख दंगों को लेकर कितनी बार कैम्पेन चलाया? क्या जब आप कश्मीर में हिंसा का सवाल उठाते हैं, तो बाकी देश में होने वाली हिंसा पर बात करते हैं? क्या जब आप कॉमनवेल्थ में भ्रष्टाचार का मामला लगातार मुहिम की तरह चला रहे थे, इस पर आप से यह सवाल पूछा जाना चाहिए था कि आप ने ताबूत या रेल या तार घोटाले पर मुहिम क्यों नहीं चलाई? और सबसे अहम सवाल कि जब आप मुज़्ज़फरनगर दंगों पर मुहिम चला कर, उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी को उसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो कि एक तरह से ठीक भी है, तो उसी वक्त गुजरात दंगों के लिए बीजेपी सरकार की ज़िम्मेदारी तय क्यों नहीं करते? अर्णब, हम जानते हैं कि इस का आप क्या जवाब देंगे, वो जवाब सही भी है…तो फिर आप का सवाल ग़लत ही है न…
अब रही बात सरकार या जांच एजेंसियो का सहयोग न करने की, तो तीस्ता के संगठन ने लगातार जांच एजेंसियों का विधिसम्मत सहयोग किया है। उनको अभी तक इस जांच के लिए सीजेपी और खोज की ओर से 20,354 दस्तावेज उपलब्ध करवाए गए हैं। आप इसको सहयोग न करना कहते हैं? ६ अप्रैल से ८ अप्रैल और फिर ९-११ अप्रैल तक एफसीआरए की निगरानी में चार वरिष्ठ अधिकारियों ने तीस्ता के संगठनों सीजेपी और खोज के तमाम दस्तावेजों तथा खातों की जांच की। इस मौके पर तीस्ता सीतलवाड और जावेद आनंद मौजूद रहे और जांच में पूरा सहयोग किया। लेकिन चूंकि गुजरात सरकार द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर यह कहा गया था कि सबरंग ट्रस्ट और सीटिजनस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) विदेशी मुद्रा नियमन कानून (एफसीआरए) का उल्लंघन कर रहे हैं तथा देश की छवि दुनिया में खराब कर रहे हैं, इसलिए आप भी मानते हैं कि ऐसा है? अर्णब गुजरात सरकार की छवि, देश की छवि नहीं है…ठीक वैसे ही जैसे कि दिल्ली गैंगरेप के मामले में आप के ही मुताबिक, बलात्कारियों की छवि, देश के मर्द की छवि नहीं है। हालांकि मैं आपको बता दूं यह जांच संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने कर ली है और वे संस्था द्वारा मुहैया कराए दस्तावेजों से संतुष्ट है।
लेकिन आप पूरे कार्यक्रम में कहते रहे कि यह तथ्य है और इन्हें न देखने वाले अंधे हैं। अर्णब, तथ्य क्या हैं? क्या किसी राज्य की सरकार, जो कि नेताओं द्वारा ही चलाई जा रही हो, जहां पत्रकार भी ठीक से काम न कर पा रहे हों, उसके द्वारा केंद्र सरकार से की गई शिकायत, तथ्य मान ली जाएगी? क्या किसी विदेशी संगठन से आर्थिक मदद अगर नियमों के तहत और सरकार की सूचना में ली जाए, तो वह ग़लत है? इस हिसाब से तो मीडिया में विदेशी निवेश और ज़्यादा ग़लत हुई, क्योंकि विदेश नीति पर इससे असर पड़ सकता है। आप के पास जो तथ्य हैं, वो दरअसल गुजरात सरकार द्वारा तीस्ता पर लगाए गए आरोप हैं, जो तब तक तथ्य नहीं बन सकते हैं, जब तक उन्हें सच सिद्ध न कर दिया जाए।
आपको यह भी बता दूं कि तीस्ता सेतलवाड़ एवम् जावेद आनंद द्वारा जांच एजेंसियों ही नहीं, माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने भी 3,85,00,896 रुपए का पूरा हिसाब, साक्ष्यों समेत रखा जा चुका है। यह वह धनराशि है, जिसकी हेरफेर का आरोप गुजरात पुलिस ने तीस्ता एवम् उनके संगठन पर लगाया है। क्या आप ने यह कागज़ देखे हैं, यह खाते पढ़े हैं, इनकी जानकारी आप के पास है? अगर यह नहीं है अर्णब, तो फिर आप एक हाथ में गुजरात सरकार और पुलिस का आरोपों का पुलिंदा लेकर, दूसरे हाथ से उंगली उठा कर, निष्पक्षता और न्याय के मूलभूत सिद्धांत की अवहेलना कर रहे हैं। आप दोनों ओर के तथ्यों का न तो मिलान कर रहे हैं और जनता के सामने एक पक्ष के तथ्यों और साक्ष्यों को पूरी तरह से गायब करने की बेईमानी कर रहे हैं…जी अर्णब, इसे पत्रकारिता के सिद्धांतो से बेईमानी ही कहते हैं। आप अपने कार्यक्रम में चिल्ला कर कहते हैं, कि आप की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है, लेकिन अर्णब हम वाकई अंधे तो नहीं हैं कि ऊपर की सारी बातों की उपेक्षा कर दें…
आप ने अपने हाथ में एक कागज़ पूरे कार्यक्रम के दौरान लहराया और कहते रहे, ”मेरे पास साक्ष्य हैं…” अर्णब, अगर वह साक्ष्य थे और इतने पुख्ता थे, तो पूरे कार्यक्रम के दौरान आप ने उनको जनता के सामने रखा क्यों नहीं? क्या गुजरात सरकार, जो जगज़ाहिर तौर पर तीस्ता के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है, उसके आरोप आपको तथ्य लगते हैं, तो माफ कीजिए, आप पत्रकार नहीं राजनेता हैं। आपके कार्यक्रम में एक पक्ष में आप ख़ुद भी होते हैं और अपने तर्क के खिलाफ जाने वाले किसी भी पैनलिस्ट को आप ठीक वैसे ही बोलने का मौका नहीं देते हैं, जैसे कि आप अपने न्यूज़रूम में अपने मातहतों के साथ करते हैं। आप ने इस कार्यक्रम में गुजरात सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर बात नहीं की, आप ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2012 और हाल ही में फरवरी, 2015 में तीस्ता के खिलाफ दुर्भावना से प्रेरित हो कर काम करने के लिए, गुजरात सरकार को फटकार लगाए जाने पर कोई डिबेट नहीं किया, आप ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसानो की आत्महत्या के मामले में गुजरात सरकार को नोटिस जारी करने पर भी कार्यक्रम नहीं किया…तो क्या अर्णब यह न माना जाए कि आपके कार्यक्रम एक पार्टी विशेष की राजनीति का समर्थन करते हैं?
अर्णब आप को समझना होगा कि मात्र चीख कर अपनी बात कहने से आपकी बात सच नहीं हो जाती…आप के शिगूफे सच नहीं बन जाते और आपकी गंभीरता साबित नहीं होती है। बहरों को सुनाने के लिए शोर की ज़रूरत होती है, लेकिन अधिक शोर से सामान्य आदमी बहरा भी हो सकता है…अर्णब, आप चीख पर अपने कार्यक्रम में आए पैनलिस्ट पर दबाव बना सकते हैं, लेकिन आप ही बताएं कि क्या आप निष्पक्ष हैं? जिस प्रकार आप राहुल गांधी के खिलाफ कैम्पेन करते हैं, क्या उसी तीखेपन से नरेंद्र मोदी के खिलाफ कैम्पेन कर सकते हैं? क्या हाशिमपुरा, 1984 और मुज़फ्फरनगर दंगे थे और गुजरात में दंगे नहीं थे? क्या भ्रष्ट व्यवस्था और साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ आवाज़ उठाना किसी सामाजिक कार्यकर्ता का काम नहीं है? क्या वाकई आप सरोकारी पत्रकारिता कर रहे हैं, या फिर आपका एजेंडा कुछ और है? जी अर्णब, चूंकि आप इस पर स्पष्टीकरण मांगेगे, इसलिए साफ कह रहा हूं कि आपका एजेंडा कुछ और है और आप तीस्ता सेतलवाड़ के खिलाफ किसी प्रकार की दुर्भावना से प्रेरित हो कर काम कर रहे हैं।
अर्णब, आप की उम्र अभी बहुत नहीं हुई है, इस तरह से आवेश और आक्रोश में आप अपनी सेहत खराब कर लेंगे। आपको छुट्टियों की ज़रूरत है। कुछ दिन अवकाश लीजिए, किसी शांत जगह घूम कर आइए…सुबह जल्दी जागिए और स्कूल जाते नन्हे-मुन्ने बच्चों को देख कर मुस्कुराइए…आपको बहुत राहत मिलेगी…और हां, छुट्टी का सदुपयोग कीजिए…कुछ अच्छी किताबें पढ़िए…दर्शन और समाजशास्त्र पढ़िए…दिमाग को भी राहत मिलेगी और आपके ज्ञान और संयम की कमी भी पूरी हो जाएगी। इस सलाह को एक शुभचिंता के तौर पर लीजिएगा। आप एक बेहतर पत्रकार बन सकते हैं और इसके लिए आप के चैनल का नम्बर वन होना ज़रूरी नहीं है, आपका चीखना ज़रूरी नहीं है…ज़रूरी सिर्फ यह है कि शांति, विनम्रता, धैर्य और ज्ञान से काम लिया जाए…इनकी कमी अकेले में आप को भी अखरती होगी।
और भी लिखना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास भी समय कम है…आशा करता हूं कि इस ज़्यादा लिखे को आप और भी ज़्यादा समझें

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