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प्रेम और दैहिक स्पर्श से बड़ा कोई सुख नहीं

प्रेम यह एक ऐसा शब्द है जो चिर प्राचीन मगर चिर नवीन भी है। यह जादुई आकर्षण से अपनी तरफ खींचता है। प्रेम की परिभाषा और व्याख्या के अनेक रूप हैं और दैहिक सुख को माना जाता है वासना

वैसे तो प्रेम के अनेक रूप होते हैं, लेकिन यहाँ हम बात कर रहे हैं स्त्री और पुरुष के बीच होने वाले प्रेम की। कहते हैं कि प्रेम दो आत्माओं का मिलन है और जहाँ दैहिक आकर्षण होता है वहां कभी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। अगर यह बात सही है तो फिर मिलनका अर्थ क्या है?

आत्मा का आत्मा या शरीर का शरीर से मिलन में क्या फर्क है?

वास्तव में देखा जाए तो दैहिक मिलन भी प्रेम का ही एक रूप है। जिस तरह शरीर और मन दो अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बिल्कुल उसी तरह प्रेम और उसमें होने वाला दैहिक स्पर्श भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धर्मशास्त्र और मनोविज्ञान के अनुसार ‘काम’ एक प्रकार की ऊर्जा है जिसका सीधा सम्बन्ध इन्द्रियों और शरीर से होता है और यही ऊर्जा जब प्रेम का रूप लेती है तो दैहिक आनंद का सृजन होता है। सभी की इच्छा होती है कि कोई उससे प्रेम करे। आखिर प्रेम क्या है?

क्या प्रेम सिर्फ दिमाग की उपज है? 

वास्तव में प्रेम या भोग की भावनाएँ दिमाग से ही निकलती हैं और इन्द्रियों के माध्यम से शरीर व आत्मा को इसकी अनुभूति कराती हैं।  ओशो की माने तो प्रेम जो कुछ भी हो, उसे शब्दों में कहने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि वह कोई विचार नहीं है। प्रेम तो अनुभूति है। उसमें डूबा जा सकता है पर उसे जाना नहीं जा सकता। प्रेम पर विचार मत करो। विचार को छोड़ो और फिर जगत को देखो। उस शांति में जो अनुभव करोगे वही प्रेम है। मनोविज्ञानियों की माने तो प्रेम कुछ और नहीं मात्र आकर्षण है जो अपोजिट जेंडर के प्रति सदैव आकर्षित करता है, लेकिन इसमें भी सभी मनोविज्ञानी एक मत नहीं हैं।

चार्ल्स रुथ का मानना है कि किशोर अवस्था में प्रवेश करते ही जिस तरह लड़के और लड़कियां एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं उसका कारण सिर्फ अपोजिट जेंडर नहीं है, बल्कि किशोर अवस्था में आने के साथ ही सेक्स हार्मोंस का संचार (Infusion of sex hormones) उनकी इन्द्रियों और शरीर में तेजी से होने लगता है। यही कारण है कि जहाँ लड़कियां खुद को सुन्दर और आकर्षक बनाने में जुटी रहती हैं वहीं लड़के अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करने में लगे रहते हैं। लड़के और लड़कियां सज-धज इसीलिए करते हैं कि कोई उनकी ओर भी आकर्षित हो। सेक्स के प्रति उनकी जिज्ञासा भी इसी उम्र में जागती है। तभी तो उन्हें काल्पनिक कहानियाँ और फिल्मों के हीरो-हीरोइन अच्छे लगते हैं। उनके व्यहवार में परिवर्तन आ जाता है।

वह ऐसा क्यों करते हैं?

कारण सीधा सा है क्योंकि यह भी एक तरह से यौन इच्छा का संचार है।  अगर बात आकर्षण की करें तो हर किसी का प्रयास होता है कि सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो। इसी आकर्षण से उपजता है प्रेम और इसी प्रेम का परिणाम है दैहिक सुख। इसके लिए इन्सान कुछ न कुछ ऐसा करने को तत्पर रहता है जिस पर सबका ध्यान जाए। यह मनोवृत्ति है जिससे लड़के और लड़कियां भी अछूते नहीं। यही बात प्रेम करने वालों पर भी लागू होती है। जब तक दोनों के बीच आकर्षण रहेगा तब तक प्रेम भी रहेगा। आकर्षण खत्म होते ही प्रेम उड़न छू। फिर प्रेम कैसा?

आकर्षण प्रेम संबंधों को प्रगाढ़ करता है।

प्रेम संबंधों के बीच पनपे यौन सम्बन्ध को वासना का नाम देना अनुचित ही होगा। जब दो जने स्वेच्छा से अपने शारीरिक और आत्मिक सुख व आनंद की प्राप्ति के लिए एकाकार होते हैं तो वह अनुचित कैसे हो सकता है, लेकिन हमारी सामाजिक धारणाएं इसे अनुचित और नाजायज़ मानती हैं।

हाँ, प्रेम संबंधों के अतिरिक्त मात्र दैहिक सुख के लिए बनाये जाने वाले सम्बन्ध को जरूर वासनापूर्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।

निशांत मिश्रा

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