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फासिज्म मुकम्मल है और परिंदों को भी चहचहाने की इजाजत नहीं हैं!

कल हमसे अपने डाक्साहब मांधाता सिंह ने पूछा कि आप अमुक लेखक को जानते हैं जिनकी सैकड़ों किताबें छपी हैं और वे अनेक भाषाओं के विद्वान हैं। हमने पूछा कि उनने लिखा क्या है।
जाहिर सी बात है कि विद्वता की पांत में हम कहीं नहीं हैं और न भद्रलोक संस्कृति के सौंदर्यबोध और भाषाशास्त्र और अनुशासन से मुझे कोई लेना देना है।
विद्वान चाहे कितना महान कोई हो, कोई खुदा भी हो बेइंतहा ताकतवर, साहिबेकिताब भी हों बेमिसाल या फिर कोई नोबेलिया हों, हमें उनसे कोई मतलब तबतक नहीं है जबतक न कि वे टकरा रहे हों वक्त से और वक्त के हकीकत से और न वे कोई हरकत कर रहे हों इंसानियत और कायनात की बेहतरी के लिए।
हमारे एक आदरणीय साथी जो रोजाना भड़ास बांचते हैं। आज भड़ास बंद होने से बेहद दुःखी थे। हमने उनसे रात दस बजे के करीब कहा कि यशवंत को फोन लगाओ।
वे बोले कि वो कहीं दारु पीकर पड़ा होगा और उससे बात हम क्या करें। फिर थोड़ी देर बाद उनने अभिषेक के एक आलेख पर मंतव्य किया कि ये कौन हैं और क्या उलट पुलट लिखता है।
खून फिर वहीं चंडाल खून है, उबल ही जाता है। हमारे दोस्तों और दुश्मनों का खासतौर पर मालूम है कि हमें किस तरह उकसाया जा सकता है। हमारे पूर्वज भी गर्म खून के शिकार होते रहे हैं क्योंकि जहरीले सांपों के ठंडे खून की तरह हमारा खून शीतलपेय नहीं है।
कल रात फिर उबल गया खून। लेकिन हालात ने हमें सिखा दिया है कि खून जब उबाला मारे हैं तो प्रवचन कर दिया करें। कह सकते हैं हैं कि यह प्रवचन का रचनाकौशल और सौंदर्यबोध दोनों हैं।
पहले तो हमने कहा कि यह समझ लो अच्छी तरह कि दिल्ली में फिलहाल हमारे कलेजे के चार टुकड़े हैं। अमलेंदु, यशवंत, रेयाज और अभिषेक तो इन पर टिप्पणी करने से पहले दो बार सोच जरूर लें।
फिर हमने पूछा कि मीडिया में माई का लाल कौन है वह जो मीडिया में मालिकान और संपादक जो पत्रकारों और गैरपत्रकारों का खून चूसे हैं रोज रोज, सबको चिथड़ा-चिथड़ा बना देते हैं, उसके खिलाफ एक लफ्ज भी लिखें या बोलें।
भड़ास के मंच पर मीडिया का कोई सच नहीं छुपा है और इसके लिए वीरेनदा को भी गर्व था यशवंत पर और हमें भी उससे मुहब्बत है।
कोई सात्विक हो, शाकाहारी हो, धार्मिक हो और दारु भी न पीता हो और वह बलात्कार भी करें। हत्या करें या न करें , हत्याओं की साजिश करें, अपने साथियों के हक-हकूक मारे तो उनसे बेहतर हैं दारुकुट्टा।
शरतचंद्र सोनागाछी में रहते थे और दरअसल वे ही थे आवारा मसीहा देवदास आत्मध्वंस के। लेकिन आप बता दें कि स्त्री की वेदना, स्त्री के अंतर्मन को शरत से बेहतर किसी स्त्री ने भी अगर लिखा हो और वह भी सामंती पितृसत्ता के खिलाफ हर हालत में स्त्री का पक्ष लेते हुए।
फिल्मकार ऋत्विक घटक शराब पीकर धुत पड़े रहते थे, लेकिन उनसे बड़ा फिल्मकार इस महादेश में कोई दूसरा हो तो बताइये।
उसीतरह बेलगाम थे सआदत हसन मंटो, उनसे बेहतर अफसाना लिखने वाला कोई हुआ तो बताइये।
अभिषेक श्रीवास्तव बेरोजगार है लेकिन वही अकेला पत्रकार है जो जिदाबान बीजमंत्र की तरह जापते हुए नियामागिरी के लड़ाकू आदिवासियों की नब्ज टटोलकर आया है और उसी ने मराठवाडा़ा के दुष्काल को संबोधित किया है और वही देश भर में दौड़ रहा है हर मसले के पीछे और हर मुद्दे पर बेखौफ स्टैंड ले रहा है। हमें तो ऐसे पत्रकार हजारों हजार चाहिए मुकम्मल फासीवाद के खिलाफ।
रेयाज़-उल-हक़ का भाषा पर इतना दखल है और इतिहास में दाखिले की खातिर उसकी तनिको दलचस्पी है ही नहीं। दुनियाभर में जो कुछ जनता के हक हकूक बहाली के लिए लिखा जा रहा है, तुरतफुरत वह उसे हिंदी में अनूदित कर रहा है। कितने लोग हैं इतने समर्पित।
अभिषेक, अमलेंदु या रेयाज, तीनों यशवंत की तरह पीने के लिए बदनाम भी नहीं हैं। उनका साथ आप कितना देते हैं, बताइये।
हम सारे लोग कमपोर्ट जोन के परिंदे हैं और दरअसल हमारी उड़ान पर कोई रोक भी नहीं है और शौकिया हम बगावत कर रहे हैं लेकिन ये लोग अपना समूचा वजूद दांव पर लगा रहे हैं।
हम अमलेंदु उपाध्याय की क्या तारीफ करें और शायद अब तारीफ करने का हक भी नहीं हैं हमें।
मैं अपने तमाम नजदीकी मित्रों से, देश भर में अपने लोगों से और जिन संगठनों को जनपक्षधर मानता रहा हूं, उनसे हस्तक्षेप को जारी रखने के लिए न्यूनतम मदद करने की लगातार गुहार लगाता रहा हूं और लगता है कि इन तमाम लोगों और संगठनों की नजर में हमारी हैसियत दो कौड़ी की भी नहीं है कि वे सिरे से अनसुना कर रहे हैं। या वे हमारे काम को जात पांत के समीकरण से तौल रहे हैं।
मोहल्ला लाइव कब से बंद पड़ा है। अपडेट होता नहीं है।
रविवार बंद है।
बहुजन इंडिया अपडेट होता नहीं है।
अब भड़ास भी न जाने कब शुरु हो पायेगा।
अमलेंदु फिर भी बिना किसी की मदद के हस्तक्षेप ताने जा रहा है बेखौफ और वह खुद बेरोजगार है। हम उसकी कोई मदद करने की हालत में नहीं हैं और रोज सुबह सवेरे उसे हांके जा रहे हैं बेशर्म।
हममें से कोई सोचता ही नहीं कि हस्तक्षेप के अलावा उसे घर भी चलाना होता है।
प्रिंट से, साहित्य संस्कृति से भाषाओं-बोलियों से, माध्यमों और विधाओं से बेदखल हम लावारिश लोग हैं जो बेहद तन्हाई में हैं और हम एक दूसरे हाथ थाम कर मजबूती से साथ खड़े भी नहीं है और जनता को भेड़धंसान बनाकर धर्मोन्मादी कायाकल्प हो रहा है मुल्क का। यह मुकम्मल फासावीद है, जिसमें चिड़िया को चहचहाने की इजाजत भी नहीं है। हम भी आत्मध्वंस पर तुले हैं देवदास मोड में।
निजी गम, निजी तकलीफों से निजात कभी मिलती नहीं है। उनमें उलझते ही जाना है। गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ से गौतम बने तो इसीलिए कि दुःख रोग शोक ताप का नाम ही जीवन है।
यह उनकी वैज्ञानिक सोच थी कि उन्होंने इस पर खास गौर किया कि दुःख रोग शोक ताप हैं तो उनकी वजह भी होगी।
उनने फिर सोच लिया कि दुःख रोग शोक ताप का निवारण भी होना चाहिए। इसके जवाब में उनने अपने मोक्ष, अपनी मुक्ति का रास्ता नहीं निकाला। सत्य, अहिंसा, प्रेम और समानता का संकल्प लिया।
हम गौतम बुद्ध को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं उनकी मूर्ति बनाकर, लेकिन उनके अधूरे संकल्पों को पूरा करने की सोचते भी नहीं है। हम भारत को बौद्धमय बनाना चाहते हैं और न पंचशील से हमारा कोई नाता है और न हम अपने को बौद्धमय बना पाये।
हमने लड़ाई अभी शुरु भी नहीं की है, और हार मानकर हाथ पांव छोड़ दिये। डूब रहे हैं तो तैरने की कोशिश भी तो करनी चाहिए।
पलाश विश्वास

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