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फासीवाद का असली चेहरा सिर्फ केसरिया नहीं है।

धर्मनिरपेक्षता के रंग बिरंगे चेहरे बेनकाब
फासीवाद का असली चेहरा- केसरिया, कारपोरेट शत प्रतिशत हिंदुत्व में बाकी धर्म अनुयायियों के खात्मे का एजेंडा है, हमले इसीलिए।
फासीवाद का असली चेहरा- अबाध पूंजी के हितों में अमेरिका अब भारत पर न आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और न परमाणु प्रतिबंध। अभी अभी रक्षा बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुला है। अभी अभी बीमा बाजार खुला है। खुदरा कारोबार भी अलीबाबाओं के हवाले हैं।
इसलिए हिंदुत्व के एजेंडे को न अमेरिका का डर है और न वैटिकन का।
अब यह भी देखिये कि अमेरिका और बाकी ईसाई दुनिया, जिनका इजराइल से जितना चोली दामन का साथ है, उतना ही मजबूत टांका है ग्लोबल हिंदुत्व के साथ।
हस्तक्षेप में कल लिखे अपने आलेख, अस्मिता और भावना के आधार पर संगठन बनाना आसान, लेकिन बाबा साहेब इसके खिलाफ थे,
( http://www.hastakshep.com/oldintervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2015/03/17/%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA ), के संदर्भ में मैंने आज खुद आनंद तेलतुंबड़े को यह आलेख लिखने से पहले फोन कियाऔर उनसे निवेदन किया कि उनको उद्धृत करने में कहीं गलती हो गयी या उनके कहे का आशय निकालनेमें हमारे विश्लेषण अगर उनके विचारों के विपरीत है, तो तुरंत स्पष्टीकरण भेजेंताकि हम तथ्यों मे अगर कोई गलती हो तो तुरंत उसमें सुधार करेंक्योंकि अब हम यह बहस और तेज करने वाले हैं।
आनंद ने साफ साफ कहा कि किसी स्पष्टीकरण की कोई जरुरत नहीं है। मुक्त बाजारी तिलिस्म की दीवारें तोड़ने की जितनी जरुरत है , अस्मिताओं की आत्मघाती राजनीति से बहुजनों को निकालकर जनता के राष्ट्रीय मोर्चे की गोलबंदी उतनी ही जरुरी है। उन्होंने वायदा किया है कि वे इस सिलसिले में सिलसिलेवार लिखेंगे।
  अब इसे भी समझना गलतफहमियों को दूर करने के लिए बेहद जरुरी है कि फासीवाद का असली चेहरा सिर्फ केसरिया नहीं है।
 सबसे पहले इस खबर पर गौर कीजिये, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण द्वारा अरविंद केजरीवाल से मिलने का समय मांगे जाने के एक दिन बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक ने आज जबाव में ‘जल्द मिलने’ की बात कही है। दोनों नेताओं की तरफ से सोमवार सुबह केजरीवाल को एक एसएमएस भेजा गया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री के बंगलुरू से लौटने के कुछ घंटों के बाद, दोनों विरोधी गुटों के बीच सुलह के एक और प्रयास के तहत केजरीवाल गुट के वरिष्ठ नेताओं ने सोमवार देर रात यादव से मुलाकात की और कई विवादित मुद्दों पर बातचीत की. दोनों गुटों ने विचार-विमर्श को सकारात्मक बताया है।
 अर्थात सही मायने में जनमोर्चा बने या न बने, बहुजनों का वर्गीय ध्रूवीकरण हो या न हो, उससे निपटने की रणनीति में कोई कसर बाकी नहीं है।
 मतभेदों के जरिये आंतरिक लोकतंत्र के ईमानदार करतब के तहत संघ परिवार के विकल्प बतौर आप बिखर भी नहीं रहा है।
 यह ऐतिहासिक सच है कि करंट स्टेटस चाहे संघ परिवार की राजनीति को हिंदुत्व का वारिस बतौर पेश कर रही है। लेकिन तथाकथित हिंदुत्व के पुनरूत्थान से पहले आजादी से पहले और आजादी के बाद दुनियाभर में हिंदुओं के प्रतिनिधित्व का दावेदार कांग्रेस रही है। भारत विॆभाजन के दो राष्ट्र सिद्धांत के तहत जो सत्ता हस्तातंरण हुआ, उसकी बुनियाद हिंदुओं की पार्टी बतौर साम्राज्यवादियों की कांग्रेस को मान्ता है। संघ परिवार को नहीं।

हिंदुत्व के उस पुनरूत्थान के लिए जो सिखों का नरसंहार हुआ, उसमें भी हाथ कांग्रेस के ही रंगे हुए हैं।
 जिस बाबरी विध्वंस के बाद संघ परिवार सत्ता की दावेदार बनकर उभरने लगा नवउदारवादी मुक्तबाजारी कारपोरेट राज के शुभारंभ से, उसके पीछे भी गौर से देखें तो फिर वहीं कांग्रेस का काला हाथ है। राम मंदिर का ताला खोलकार रामरथ का दिगिविजयी रास्ता तैयार किया कांग्रेस ने फासीवादी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के जरिए अबाध पूंजी के लिए।
 सिख जनसंहार के तुरंत बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनावों में राजीव गांधी के सुपर तकनीक अवतार से डिजिटल देश बनाने का जो सिलसिला हुआ, दृश्य माध्यम के विस्तार के साथ, सूचना प्राद्योगिकी की पैत्रोदा भूमिका के तहत जो डिजिटल देश बनाने का मेकिंग इन अमेरिका आज फूल ब्लूम केसरिया कमल है, उस ऐतिहासिक संक्रमण काल में संघ परिवार ने सत्ता का विसर्जन करते हुए राजीव गांधी की कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन किया था।
 फिर हरित क्रांति की महारानी बतौर जिन इंदिरा गांधी ने कृषि के सफाये की परिकल्पना शुरु की और हिंदुत्व राष्ट्रवाद को बांग्लादेश विजयमाध्यमे हकीकत में बदला, उनके एकात्म हिंदुत्व में भी तत्कालीन आरएसएस प्रधान बालासाहेब देवरस को पूर्ण समर्थन था। इमरजेंसी में संघ पर प्रतिबंध से जो रिश्ते खत्म हुए, समझा गया, राजीव जमाने में उसका नया नवउदारवादी कायाकल्प हो गया।
 यह भी ऐतिहासिक सच है कि बाबरी विध्वंस के वक्त यूपी में भाजपा के कल्याण सिंह की सरकार थी तो केंद्र में कांग्रेस की नरसिंहराव की सरकार थीं। जिसे भारत में नवउदारवादी कायाकल्प और मुक्तबाजार की बुनियाद बनाने का श्रेय है और उस सरकार में वित्तमंत्री विश्वबैंक ने तय किये।
तब केंद्र और राज्य सरकार ने, कांग्रेस और संघपरिवार ने मिलकर भारत को मुक्त बाजार में तब्दील करने के इस निर्णायक फासीवादी आपरेशन को अंजाम दिया, जिसकी परिणति आज की यह केसरिया कारपोरेट डाउकैमिक्लस मनसैंटोराज है।
मनसैंटो राज की शुरुआत भी कांग्रेस ने किया है तो डाउ कैमिकल्स की आत्मा भोपाल गैस त्रासदी के वक्त भी केंद्र में कांग्रेसी हिंदुत्व का राजकाज चल रहा था।
भोपाल गैस त्रासदी के गुनाहगारों को बचाने में भी कांग्रेस की सबसे बड़ी भूमिका रही है।
आप थोड़ा सा इन तथ्यों की जांच परख कर लें और तथ्य इससे भिन्न हों तो इसकी जानकारी हमें देकर दुरुस्त जरुर करें। इस बीच कुछ जरुरी बातें कर ली जायें।
ताजा स्टेटस यह है कि तीसरे मोर्चे की राजनीति अब सिरे से बेनकाब हो गयी है।
सामाजिक बदलाव और परिवर्तन के बहाने मुक्तिकामी बहुजन सर्वहारा जनता की ठगी के अपराध का खुलासा भी हो गया है।
गौतम बुद्ध, बाबासाहेब और बहुजन पुरखों के हजारों साल के आंदोलन की समूची विरासत को मसीहाई और धनवसूली का एटीएम बना देने का खुलासा
भी हो गया।
अब भी न जागे बहुजन तो कब फिर जागेंगे बहुजन, कोई बता दें।
सच यह भी है कि धर्मनिरपेक्षता भी अब कारपोरेट केसरिया गीता महोत्सव की समरसता है।
धर्मनिरपेक्षता को गंगा में डालकर उसका धर्मांतरण कर दिया है धर्मनिरपेक्षता के मसीहा संप्रदाय ने, जिनका जनसंहारी राजकाज में वध्य जनता की नियतिबद्ध परिणति से कुछ लेना देना नहीं है।
आपको याद होगा कि पंद्रह लाख टका के सूट और अमेरिकी धर्म स्वतंत्रता का क्या अजब गजब तमाशा हुआ भारत के गणतंत्र महोत्सव के दौरान और उसके तुरंत बाद कैसे मुक्त बाजारी घोड़ों और सांढ़ों का अश्वमेध अभियान का सिलिसला तेज होता गया और संसदीय सहमति की नौटंकी बजरिये कैसे कैसे एक के बाद एक सुधार कार्यक्रम लागू होने लगे।
अब यह भी देखिये कि अमेरिका और बाकी ईसाई दुनिया, जिनका इजराइल से जितना चोली दामन का साथ है, उतना ही मजबूत टांका है ग्लोबल हिंदुत्व के साथ।
इसलिए हिंदुत्व के एजेंडे को न अमेरिका का डर है और न वैटिकन का।
अमेरिका में तो सत्ता अमेरिकियों के बजाय या जायनी तत्वों की है या फिर ग्लोबल हिंदुत्व की। ग्लोबल हिंदुत्व की वही बरखा बहार भारत में डाउ कैमिकल्स और मनसैंटो की सत्ता है।
गुजरात नरसंहार, सिख संहार और बाबरी विध्वंस के लिए रेड कारपेट बिछाते हुए सिरे से अबाध पूंजी और दुनिया की सबसे बड़ी इमर्जिंग मार्केट को अमरिकी उपनिवेश बनाने के लिए मानवता के विरुद्ध युद्ध अपराधों को क्लीन चिट देने वाली अमेरिका सहित समूची ईसाई दुनिया भारत में गिरजाघरों पर हो रहे हमलों के सिलसिले में धर्म की स्वतंत्रता का राग अब अलापने लगी है।
हमारे ईसाई मित्रों, स्वजनों को हम साफ कर देना चाहते हैं कि हमारा मकसद कतई इन हमलों को न्यायोचित ठहराने का नहीं है, लेकिन इन हमलों के जिम्मेदार हिंदू साम्राज्यवाद के विजयरथ के सारथी जो लोग हैं, हम उनकी भूमिका की बात कर रहे हैं।
हमारे पुराने सहकर्मी कवि अरविंद चतुर्वेद के पहले कवितासंग्रह का शीर्षक इस सिलसिले में बेहद मौजू हैः चेहरे खुली किताब।
हम इन हमलों के खिलाफ सिर्फ ईसाइयों की नहीं, समूची भारतीय जनता की गोलबंदी के पक्षधर हैं। क्योंकि यह मामला जितना ईसाइयों के खिलाफ है, उससे कतई कम नहीं है भारतीय जनता के खिलाफ।
भारत में सिखों का संहार हुआ। ईसाई दुनिया और और उसके सबसे बड़ी हुकूमत पवित्रतम वैटिकन में सन्नाटा छाया रहा।
ईसाई सत्ता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका सिख संहार के वास्तविक अपराधियों का बचाव करता रहा।
बाबरी विध्वंस हुआ भारत में तो इसे इजराइल की नजरिया से यरूशलम पर कब्जे का ड्रेस रिहर्सल बना दिया गया और भारतीय राजनीति और राजनय दोनों इस्लाम और इस्लामी दुनिया के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के आतंक के विरुद्ध युद्ध में पारमाणविक पार्टनर बन गये।
गुजरात नरसंहार में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ और उस दौरान मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र भाई मोदी को प्रधानमंत्रित्व के सबसे बड़े दावेदार के रुप में उभरते न उभरते उन्हें सारे आरोपों से मुक्त कर दिया उऩका वीसा रोके रहे अमेरिका ने और अब वे अमेरिकी राष्ट्रपति के निजी मित्र हैं, जिनसे ओबामा गाहे बगाहे मन की बातें करते रहते हैं और ओबामा उन्हीं के कर कमलों में भारत के मुक्तबाजारी कायाकल्प की बागडोर सौंपे हुए हैं।
यह पृष्ठभूमि है, भारत में ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमलों की, कृपया इस पर गौर करें।
इस बीच इजराइल और अमेरिका के इस्लाम और इस्लाम के विरुद्ध सत्तर दशक के अंत से अब तक जो लगातार युद्ध , गहयुद्ध और गणतंतर वसंत है, भारत में हिंदुत्व के संपूर्ण पुनरूत्थान से पहले, बाबरी विध्वंस से पहले और संघ परिवार के केंद्र की सत्ता पर पहले दखल से पहले कांग्रेसी हिंदुत्व के भारत ने भरपूर सहयोग दिया।
हमारा कहना यह है कि अमेरिका इस इमर्जिंग मार्केट को कब्जा करने की नीयत से हिंदू साम्राज्यवाद का साझेदार बनकर भारत को जो मुक्त बाजार बनाता रहा है खाड़ी युद्ध और सोवियत विघटन के डाबल धमाके से, वह बूमरैंग हो रहा है।
यह ईसाई दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है कि उसने फिर एक हिटलर पैदा कर दिया है, जो उसे बख्शने वाला नहीं है। भारत में वह शुरुआत हो चुकी है।
भारत में सिखों, मुसलमानों, बौद्धों, गैर नस्ली नगरिकों, बहुजनों, जिन्हें जबरन हिंदू बनाया जा रहा है, आदिवासियों और शरणार्थियों के मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन पर अगर अमेरिका और वैटिकन खामोश हैं तो ईसाइयों पर हो रहे हमले से हिंदू साम्राज्यवाद को रोकने की कोई राह बचती नहीं है।
फासीवाद से दुनिया में जो कहर बरपा , उसका इतिहास भी देखना जरुरी है।
जैसे तालिबान को लाल होती दुनिया के रंग बदलने के लिए पाला पोसा अमेरिका ने और ओसामा बिन लादेन जैसे भस्मासुर पैदा किया अमेरिका ने, कम्युनिस्ट विरोधी पश्चिम ने कम्युनिस्टों के सफाये के लिए तबतक हिटलर और मुसोलिनी को खुल्ला खेल खेलने दिया, यहूदियों का नरसंहार होने दिया, जबतक न जर्मनी का दावानल उनके घरों को जलाने लगा और हिटलर ने औचक स्टालिन से समझौता कर लिया।
स्टालिन को भी इस समझौते की कीमत भारी चुकानी पडी, जब हिटलर की सेनाएं मास्को की ओर कूच करने लगीं। सोवियत शीत ने हिटलर का दम निकाल दिया, वरना क्राति को तो तभी बाट लगनी थी।
फासीवाद के उभार में पूरब पश्चिम का समान योगदान है।
अब भारत में भी हूबहू वही हो रहा है।
एकच हिटलर बोल रहा है, जिसकी पीठ पर अमेरिका और इजराइल सवार है।
मुक्तबाजारी हितों के लिए अमेरिका, इजराइल और उनके सहयोगी फासीवादी हिंदू साम्राज्यवाद को महाशक्ति बनाने लगी है।
इजराइल को इसका अहसास नहीं होगा क्योंकि इस्लाम के खिलाफ हिंदुत्व की जिहाद में उसे अपनी ही जीत दीख रही है और भारत में इतने यहूदी और यहूदी धर्म स्थल भी नहीं है, जिनपर हिंदुत्व के विजयपताका लहराने की गुंजाइश है।
भारतीय जनता के चौतरफा सर्वनाश के लिए चाकचौबंद इंतजाम बतौर फासीवाद के जिस महाबलि को जनमा है अमेरिकी कोख ने, संजोग से ईसाइयों और गिरजाघरों पर वही हमला कर रहा है। यह निर्मम कटु सत्य है।
बयानों से कुछ नहीं होने वाला।
अबाध पूंजी के हितों में अमेरिका अब भारत पर न आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है और न परमाणु प्रतिबंध। अभी अभी रक्षा बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खुला है। अभी अभी बीमा बाजार खुला है। खुदरा कारोबार भी अलीबाबाओं के हवाले हैं।
सबसे बड़ा कटु सत्य यह है कि अमेरिका कंपनियों के हितों के मुताबिक फासीवाद की यह बहार है और भारत में हिंदू साम्राज्यवादी फासीवादी अशवमेध अमेरिकी हितों के ही मुताबिक है। इसलिए अमेरिका उसपर अंकुश लगायेगा नहीं।
जैसे हमले सिखों और मुसलमानों, बहुजनों और आदिवासियों, अनार्य नस्लों पर लगातार होते रहे हैं, संजोग वश शत प्रतिशत हिंदुत्व के एजेंडे और 2021 तक भारत को ईसाईमुक्त इस्लाम मुक्त बनाने के संघ परिवार के महती एजेंडे के तहत वैसे ही हमले अब ईसाइयों और गिरजाघरों पर हो रहे हैं।
इससे भी कटु सत्य यह है कि भारत के ईसाइयों और गिरजाघरों की सुरक्षा के लिए बयान और राजनय की रस्म अदायगी के अलावा न अमेरिका कुछ करने जा रहा है और न वैटिकन। आखिरकार भारत के ईसाई काले हैं, जिनकी परवाह पश्चिम को नहीं है।
अमेरिका राष्ट्रपति बाराक ओबामा के धर्म स्वतंत्रता के महान उद्गार और राणाघाट के जघन्य बलात्कार कांड पर महामान्य पोप के बयान से हिंदू साम्राज्यवाद के अश्वमेधी आक्रमण रुकेंगे नहीं।
उन्हें यह समझना चाहिेए कि भारत में मुसलमान और सिख अगर हमलों के शिकार होंगे तो न ईसाई सुरक्षित होंगे और न गिरजाघर। शत प्रतिशत हिंदुत्व में बाकी धर्म अनुयायियों के खात्मा का एजेंडा है, हमले इसीलिए। 

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