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फासीवाद हारा नहीं है अभी आगे फिर मंडल बनाम कमंडल महाभारत है

 ऋत्विक घटक की बगावत, उनका सामाजिक यथार्थ और उनकी फिल्म सुवर्णरेखा!

Subarnarekha – Bengali Full Movie – Ritwik Ghatak’s Film – Abhi Bhattacharya | Madhabi Mukhopadhya

ऋत्विक घटक ने ब्राह्मण गिरोह के उन्हीं चेहरों को तभी बेनकाब कर दिया था, यही उनका अपराध है। यही भारत विभाजन की त्रासदी है जो दलितों, पिछड़ों, आदिवसियों और भारतीय स्त्री की त्रासदी है जो बागदी बउ की कथा जितनी है, जितनी सीता की त्रासदी, उतनी ही लाल नील विभाजित भारतीयजनता की आत्मकथा भी है।
फासीवाद हारा नहीं है अभी और न जश्न का मौका है। आगे फिर मंडल बनाम कमंडल महाभारत है। फिर फिर भारत विभाजन है।
प्रकृति, सभ्यता और मनुष्यता की खातिर निर्णायक लड़ाई है और इसीलिए लाल नील जनता की एकता अनिवार्य है। ऋत्विक अनिवार्य।

Subarna Rekha, Blasphemy against ideology by Ritwik Ghatak, the Golden Line and the Ati Dalit Bagdi Bou and death of Sita in a brothel!
ऋत्विक घटक ने ब्राह्मण गिरोह के उन्हीं चेहरो को तभी बेनकाब कर दिया था, यही उनका अपराध है। यही भारत विभाजन की त्रासदी है जो दलितों, पिछड़ों, आदिवसियों और भारतीय स्त्री की त्रासदी है जो बागदी बउ की कथा जितनी है, जितनी सीता की त्रासदी, उतनी ही लाल नील विभाजित भारतीय जनता की आत्मकथा भी है।
फासीवाद हारा नहीं है अभी और न जश्न का मौका है। आगे फिर मंडल बनाम कमंडल महाभारत है। फिर फिर भारत विभाजन है।
प्रकृति, सभ्यता और मनुष्यता की खातिर निर्णायक लड़ाई है और इसीलिए लाल नील जनता की एकता अनिवार्य है। ऋत्विक अनिवार्य।
इसीलिए कोमल गांधार के बाद सुवर्ण रेखा पर मेरा आज का यह प्रवचन। जो देखें सुनें, उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो और टूटें गुलामी की जंजीरें, टूटें कैदगाहों, कब्रो की दीवारें। जय हो।
यह त्रासदी भारत विभाजन की है,  जो जारी है। यह कथा मनुस्मृति राज की है।
यह कथा अति दलित बाग्दी बउ की है, जिसके बेटे अभिराम से सुवर्णरेखा किनारे पली बढ़ी ब्राह्मण कन्या सीता का प्रेम हुआ और उसे अपनी जान से ज्यादा प्यार करने वाले ब्राह्मण भाई ने इस रिश्ते को ठुकराकर उसका विवाह अन्यत्र कर देने का आत्मघाती फैसला किया।
उस भाई ईश्वर और बहन सीता, विभाजन पीड़ित अनाथ भाई बहन के रिश्ते की यह त्रासदी है जो अछूत प्रेमी के साथ भाई का घर छोड़कर कोलकाता की गंदी बस्ती में घर बसाती तो है पर वह घर बस ड्राइवर बने प्रेमी पति की एक दुर्घटना में उसकी बस से कुचलकर एक लड़की के मारे जाने की वजह से गुस्साई जनता के हाथों हत्या हो जाने के बाद उजड़ जाता है।
शरणार्थी अछूत को व्याही ब्राह्मण कन्या सीता को जिंदा रहने के लिए यौनक्रम का विकल्प अपनाना होता है।
चकले में दाखिले के बाद सीता का पहला खरीददार उसका सगा भाई,  वह बहन से जुदा शोकसंतप्त अकेला सगा भाई शराबी निकलता है तो वह आत्महत्या कर लेती है।
यह ब्राह्मण कन्या सीता और अति दलित स्त्री, जिसको शरणार्थी बस्ती में उसी तरह जगह नहीं मिलती जैसे पूर्वी बंगाल से आये करोड़ों दलितों और अति दलितों को नहीं मिली, शरणार्थी आंदोलन और कामरेड बिरादरी ने उनका सामाजिक बहस्कार ही नहीं किया,  उन्हें बंगाल के इतिहास भूगोल से निस्कासित निर्वासित कर दिया।
उनसे मातृभाषा छीन ली। छीन लिया आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व,  जिनका पुनर्वास दरअसल अभी तक हुआ नहीं है और केसरिया सत्ता ने उनकी जमीन और नागरिकता छीनने का चाकचौबंद इतजाम कर दिया।
कोमल गांधार में इप्टा पर राजनैतिक नेतृत्व के खिलाफ ऋत्विक की बगावत के बाद ही उन्हें पार्टी और इप्टा से निष्कासित कर दिया तो सुवर्णरेखा के दलित विमर्श को उनका धर्मांतरण जैसा अपराध मान लिया गया जैसे कि वे विचाराधारा के धर्मविरोधी जिहादी करार दिये गये।
यह त्रासदी ऋत्विक की जितनी है, उससे कम हमारी नहीं है।
यह त्रासदी भारत के सर्वहारा वर्ग, मेहनतकश आम जनता और बहुजनसमाज का भी है, जिनके वर्गीय ध्रूवीकरण के लिए जाति व्यव्स्था को खत्म करने के बजाय मनुस्मृति शासन के तहत सत्ता में भागेदारी ही बहुजन समाज की तरह भारतीय वामपंथ की विचारधारा हो गयी।
इसीलिए न सर्वहारा, मेहनतकशों, किसानों की दुनिया में, और न बदलाव और प्रतिरोध की लड़ाई में उनकी कोई भूमिका बन पायी है और भारत में सत्ता की राजनीति में भी वह हाशिये पर है।
इसीलिए बंगाल और केरल में में भी केसरियाकरण का सिलसिला है। वामपंथ असहाय विकलांग है।
वामपंथ के विश्वासघात की वजह से ही बदलाव के लड़ाके माओवादी हैं तो बहुजन समाज, बहुसंख्य जनता केसरिया बजरंगी फौजे हैं।
यह अपराध फसीवाद का जितना है, वामपंथी नेतृत्व के ब्राह्मण गिरोह का उससे कुछ भी कम नहीं है।
बिहार में मजहबी सियासत बेशक हार गयी। लेकिन सियासती मजहब हारा नहीं है। क्योंकि जाति न सिर्फ अटूट है, पिछड़ों के ओबीसी महागठबंधन से मंडल कमंडल गृहयुद्ध अब घनघोर हैं।
हिंदुत्व के दुश्मन विदेशी ताकतें नहीं हैं और न गैरमजहब के लोग हैं। हिंदू समाज लाखों धड़ों में बंटा हुआ है और उस बंटवारे को रोज रोज हर चुनाव में नये नये जाति समीकरण से हिंदुत्व के नाम तेज किया जा रहा है। दंगा फसाद कयामती फिजां के इस सियासती मजहब को समझने के लिए, आत्मध्वंस को समझने के लिए ऋत्विक घटक की भारत विभाजन पर बनी तीनों फिल्में अवश्य देखनी चाहिए।
हम कोमल गांधार का विश्लेषण कर चुके हैं। यह फिल्म समीक्षा नहीं है। फिल्म के जरिये समामाजिक यथार्थ की चीरफाड़ है, जो ऋत्विक घटक हमें सिखा गये हैं, जो सामाजिक यथार्थ का उनका व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र है।
KOMAL GANDHAR!Forget not Ritwik ,  his musicality,  melodrama, sound design to understand Partition!

हम अछूत रवींद्र के दलित विमर्श पर बात कर चुके हैं। उनके व्रात्य मंत्रहीन जातिहार रवींद्रसंगीत के सामाजिक यथार्थ और सरहदों के आर पार उसके मार्फत स्त्री मुक्ति की भी हम चर्चा कर चुके हैं। रवींद्र के दलित विमर्श की जैसे कोई चर्चा नहीं हुई है वैसे ही ऋत्विक घटक के दलित विमर्श पर हमारा ध्यान नहीं गया।
মন্ত্রহীণ, ব্রাত্য, জাতিহারা রবীন্দ্র, রবীন্দ্র সঙ্গীত! Tagore liberated Woman in Music!

नवारुण दा ने हर्बर्ट, फैताड़ु बोम्बाचाक और कांगाल मालसाट उपन्यासों के जरिये अंधाधुंध शहरीकरण के मुक्त बाजार में रोजी रोटी से बेदखल इन अछूतों के महानगरों में अंडर क्लास सर्वहारा में तब्दील होने की कथा बांचकर ऋत्विक की दृष्टि की निरंतरता बनाये रखी है। लेकिन इन चीजों को समझने की हमारी दृष्टि अभी बनी नहीं है क्योंकि हम जाति अंध है।
Why do I quote Nabarun Bhattacharya so often? এই মৃত্যু উপত্যকা আমার দেশ নয়!

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