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फिजी में बसे भारतीयों का जीवन संघर्ष और सांस्कृतिक पहचान है ‘अधूरा सपना’

फिल्‍म ‘अधूरा सपना’ के आधार पर फिजी में बसे भारतीय डायस्‍पोरा के लोगों पर रूपाली अलोने ने किया शोध

Rupali Alone researches people of Indian Diaspora settled in Fiji based on film ‘Adhura Sapna’

हिंदी विश्‍वविद्यालय के डायस्‍पोरा अध्‍ययन विभाग में हुआ अहम शोध

Important research done in Department of Diaspora Studies of Hindi University

वर्धा 12 जुलाई। प्रवासियों के संघर्ष को वैश्विक बनाने में सिनेमा ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विस्थापित लोगों की सांस्कृतिक पहचान को नया आयाम देने में डायस्पोरिक सिनेमा (Diasporic cinema) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज डायस्पोरिक सिनेमा हर जगह छाया हुआ है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्पाद भी है।

फिजी फिल्म ‘अधूरा सपना’ में भारतीय डायस्पोरा का प्रतिचित्रण दिखाया गया है।

‘अधूरा सपना’ फिजी में बसे भारतीयों का जीवन संघर्ष और सांस्कृतिक पहचान के लिए की गई जदोजहद की कहानी है। इस फिल्‍म पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के डायस्‍पोरा विभाग की शोधार्थी रूपाली अलोने ने एम.फिल. के पाठ्यक्रम के तहत विभाग के अध्‍यक्ष डॉ. राजीव रंजन राय के मार्गदर्शन में अहम शोध किया है। इस शोध के माध्‍यम से फिजी में बरसों से बसे भारतीय लोगों के जीवन संघर्ष और सांस्‍कृतिक पहचान को उजागर किया है।

शोध के माध्‍यम से उन्‍होंने पाया कि इस फिल्‍म के निर्देशक विमल रेड्डी ने बड़े ही सहज भाव से भारतीय तथा फिजियन मूल के लोगों में उत्पन्न हो रहे तनाव और संघर्ष को प्रस्तुत करने की कोशिश की है। फिजी के निर्माण में दोनों मूल के लोगों की भूमिका को भी बखूबी चित्रित करने का प्रयास किया गया है। अपना समाज, देश और रिश्ते छोड़ने बाद एक अजनबी जगह और अनजान लोगों के बीच अपने आप को स्थापित ही नहीं करना बल्कि फिजी को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में भारतीयों की भूमिका को फिल्म के माध्यम से दिखाने की एक ईमानदार कोशिश की गई है। निराशा और सामाजिक, आर्थिक संघर्ष की स्थिति में एक इंडो- फिजियन संस्कृति किस तरह पल्लवित, पोषित होती है, अधूरा सपना इसका एक शानदार उदाहरण प्रस्तुत करता है।

 फिल्म ‘अधूरा सपना’ फिजी के भारतीय समुदाय के सामूहिक सम्प्रेषण एवं अभिव्यक्ति का एक सशक्त वृतांत प्रस्तुत करती है। फिल्म ‘अधूरा सपना’ (2007) विमल रेड्डी द्वारा निर्देशित की गई है और पटकथा रेमंड सी. पिल्लै की है। इस फिल्म में 1970 से 1976 तक की स्थिति को अभिव्यक्त किया गया है। फिल्म में कथानक शंभु, मिन्ला, जोना, मौसी, चाची और जलील भूमिका निभा रहे हैं। इस में भोजपुरी हिंदी, फिजीयन और अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया है। 

कुल 84 मिनट और 64 सेकेण्ड  की यह फ़िल्म अपने दर्शकों को बांधने और उन पर छाप छोड़ने में सफल रहती है। इस फिल्म में फिजी में बसे भारतीय मूल के लोगों की कहानी को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही में फिजी की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति की स्पष्ट तस्वीर सामने आती है।

फिजी में भारतीयों ने अभी भी अपनी संस्कृति को संजोए रखा है। इनकी पहचान बहुत मजबूत है। भोजपुरी और अवधी भाषा का प्रयोग आज भी फिजी में प्रचलित है। आज की स्थिति में भी फिजी के भारतीय मूल के लोगों ने अपनी भारतीयता को पूर्वजों की धरोहर मानते हुए सुरक्षित रखा  है।

फिजी में 1874 के ब्रिटिश कानून ‘डीड ऑफ सेशन’ के कारण भारतीयों का अनुबंधित मज़दूर के रूप में आगमन शुरू हुआ। फ़िजी किसी राष्ट्र के अधीन नहीं था। उसके साथ डीड के अनुसार उसे अपने संसाधनों से ही अपना राज्य चलाना था। इस प्रक्रिया के तहत सर आर्थर हमिल्टन गोर्डन ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जिससे धन अर्जित कर देश का शासन चलाया जा सके। फिजी में भारतीय अनुबंध समाप्त होने के बाद वहीं पर बस गए।

भारतीय एग्रीमेंट को गिरमिट नाम से बोलने लगे, जो आगे चलकर गिरमिटिया पहचान नाम से प्रचलित हो गई ।

फिल्म में एक पोते का अपने आजा का सपना पूरा करने का जुनून और उसके लिए किया गया संघर्ष को बखुबी चित्रित किया गया है। शंभु के आजा का सपना होता है कि वह फिजी में खूब मेहनत से काम करे और फिजीयन भाइयों के साथ मिलजुलकर रहे पर यह सपना पूरा नहीं हो पाता है तो शंभु अपने आजा का सपना पूरा करने की चाह में जुट जाता है। फिजी में वह अपनी पत्नी और चाची के साथ रहता है। दोनों का एक छोटा-सा परिवार है। फिजी में बसे भारतीय के लोगों के बीच तनाव और संघर्ष का मूल कारण जमीन थी। भारतीय जिस जमीन पर खेती करते थे, वह फिजीवासियों की थी। लीज के आधार वे उस पर खेती करते थे। फिजी के मूल निवासियों के पास जमीन थी, पर मेहनत नहीं करने और अलग जीवन दृष्टि होने की वजह से वे गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े थे। भारतीय आर्थिक रूप से समृद्ध थे, मगर उनके पास जमीन नहीं थी। लीज पर मिली जमीन नोटिस मिलने के बाद वापस करनी पड़ रही थी। इसी वजह से दोनों समुदायों के बीच एक संघर्ष की स्थिति पनप रही थी।

भारतीयों को लग रहा था कि सरकार कानून सिर्फ फिजियन लोगों के लाभ के लिए बना रही है, जिससे उनको नुकसान हो रहा है। शंभु अपने कथन में यह कहता है कि “काईबीती लोग मेहनत से आगे नहीं बढ़ते हैं और चालाकी से नये-नये कानून लगाते हैं, हिंदुस्तानियों को दबाने के खातिर।“  

फिजी भारतीयों को लगता है  कि कानून हिन्दुस्तानियों की आर्थिक तरक्की में बाधा बन रही है।  इस बात को लेकर इनके मन में वैमनस्यता और आक्रोश पनपता है।

Indians in Fiji were better off in Fiji.

फिजी में फिजीवासियों से भारतीयों की स्थिति अच्छी थी। भारतीय तेजी से आगे बढ़ रहे थे और मूल निवासी वैसे ही थे, इसका खतरा फिजीवासी को हमेशा लगा रहता था और यही कारण दोनों में संघर्ष की स्थिति का निर्माण कर देता है। फ़िजी की स्वतंत्रता के बाद फ़िजी के राजनीतिक वर्गों द्वारा व्यापक पक्षपात झेलना पड़ा। भारतीय समुदायों को बहिष्कार और नृजातीय सफाए के आतंक से भी गुजरना पड़ा। 1987 तथा 2000 में सैनिक सत्ता परिवर्तन के बाद भारतीयों के आत्मविश्‍वास में कमी आई और इसके बाद करीब एक लाख भारतीय फ़िजी छोड़कर दूसरे स्थानों के लिए प्रस्थान कर गए। जैसे न्यूजीलैंड, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया। इस घटना को “घर-परदेस” फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

Fiji Indians migrated to other countries in search of a good future.

फिजी भारतीयों ने अच्छे भविष्य की तलाश में दूसरे देशों में प्रवासन किया। फिल्म में भी शंभु की पत्नी मिन्ला उसे बार-बार कनाडा प्रवासित होने के लिए उकसाती है लेकिन शंभु अपने आजा का सपना पूरा करने के लिए फिजी में ही रहना चाहता है।

फिजी भारतीय स्वतंत्र होकर भी राजनैतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाते हैं। यह फिल्म में दिखाया गया है।

फिल्म में भारतीय डायस्पोरा को अपनी पहचान के लिए संघर्ष की कहानी को अभिव्यक्त किया गया है।

पहचान के संघर्ष और आर्थिक, राजनैतिक अधिकार के लिए प्रयासरत भारतीयों को इस सिनेमा ने एक वैश्विक पहचान दिलाने में मदद की है। आपसी मतभेद और अविश्वास को भूल कर एक इंडो-फिजियन मिश्रित संस्कृति के निर्माण को भी फिल्म में प्रमुखता से दिखाया गया है। इन्हीं तनावों और संघर्षों के समायोजन का परिणाम है कि आज फिजी नए लोकतन्त्र ओर अग्रसर है। कई नृजातीय समूहों और पहचानों के आधार पर विभाजित फिजीवासी अब इतिहास को बदलने वाले हैं। अब ये लोग एक राष्ट्र और एक नागरिक के नाम से जाने जाएंगे। वैश्विक स्तर पर इन्हें फिजियन नागरिक के रूप पहचाना जाएगा।

2014 के सितंबर महीने में फिजी की जनता नई व्यवस्था के अंतर्गत अपनी पहली लोकतान्त्रिक सरकार चुनेगी। यह शोध उन लाखों फिजी-भारतीयों के आंतरिक तनावों और संघर्ष को रेखांकित करता है, जिन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत की बदौलत हर आपसी मतभेद को भुलाकर फिजी को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।

महेंद्र पाल चौधरी, भारतीय मूल के एक फिजी राजनीतिज्ञ और फिजी लेबर पार्टि के नेता हैं। इन्होंने 19 मई 1999 को फिजी के प्रधानमंत्री का कर्यभार संभाला था। आज वर्तमान में फिजी में भारतीयों के स्थिति में बहुत बदलाव हुए है।

फ्रंटलाईन में प्रदर्शित शुभा सिंह के एक लेख में “नए लोकतंत्र को ओर फिजी” में फिजी के नए संविधान के शुरुआत होने को बया किया गया है। फिजी नए संविधान के साथ अपने पहले लोकतांत्रिक चुनाव के लिए तैयार है। नए संविधान के अनुसार यहाँ रहने वाले विभिन्न समुदायों के लोग अब केवल फिजीयन के नाम से ही जाने जाएँगे। इसके पहले यहाँ रहने वाले विभिन्न अस्मिता के लोग अपनी पूर्वजभूमि के नाम से ही जाने-पहचाने जाते थे। यहाँ रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों को पहले भारतीय और बाद में इंडो-फिजीयन के नाम से जाना जाता था। सिर्फ फिजी मूल के स्थानीय निवासियों की पहचान ही फिजीयन के रूप में होती थी, लेकिन इतिहास में पहली बार ऐसा होने वाला है कि कई देशों और एथनिक समूहों के लोग अब एक राष्ट्र और एक नागरिक के रूप में जाने जाएँगे। नयी चुनाव प्रणाली के साथ इस साल सितम्बर महीने के अंत यहाँ चुनाव होंगे। चुनाव का आधार एक आदमी एक वोट के मूल्य को अपनाया गया है।

2006 में फिजी की निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट हो गया था। कमांडर फ्रैंक बैनीमरामा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से असहमति की वजह से बिना किसी खून-खराबे के सरकार का तख्ता पलट कर दिया था। इसके बाद 2009 में कमांडर फ्रैंक ने प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और जनता को आश्वासन दिया कि 2014 में वे आम चुनाव कराएंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिए कि फरवरी के अंत में वे अपने सैन्य पद को त्याग कर चुनाव में भाग ले सकते हैं। साथ ही  उन्होंने घोषणा की है कि वह एक राजनीतिक पार्टी बनाने की योजना भी बना रहे हैं।

सात साल तक सैन्य शासन में रहने के बाद फिजी की जनता अपने पहले लोकतांत्रिक चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित है। लगभग 80 प्रतिशत योग्य मतदाताओं ने इलेक्ट्रोनिक वोटिंग सिस्टम के जरिए अपने आप को पंजीकृत करवा लिया है। मतदान की न्यूनतम आयु 18-21 वर्ष के बीच है। इसके अतरिक्त फिजी से बहार रहने वाले फिजीयन के लिए भी सरकार ने यह पंजीकरण शुरू कर दिया है। प्रवासी मतदान पंजीकरण की शुरुआत आस्ट्रेलिया से की गई है।

2009 में बने एक फिजीयन कानून के अनुसार फिजी अपने डायस्पोरा को दोहरी नागरिकता प्रदान करता है। फिजी से संबंधित काफी भारतीय और फिजी मूल के नागरिक आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन में रहते हैं। इस देशों में रहने वाले फिजी मूल के जिन नागरिकों के पास फिजी का वैध पासपोर्ट है, वे लोग आस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों में जाकर अपना प्रवासी मतदाता पंजीकरण करवा रहे हैं।

अब तक चार राजनैतिक पार्टियां चुनाव में भाग लेने के लिए अपना पंजीकरण करवा चुकी हैं। इनमें फिजी लेबर पार्टी, द नेशनल फेडरेशन पार्टी, द सोशल डेमोक्रेटिक लिबरल पार्टी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी शामिल हैं। चुनाव में भाग लेने वाली राजनैतिक पार्टियों के लिए के यह जरुरी है कि पूरे देश से कम से कम 5000 लोग उनकी पार्टी के सदस्य हों। नए संविधान के तहत संसद के सदस्यों का चुनाव समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाएगा। संसद ही सर्वोच्च कार्यकारी संस्था होगी। संसद देश के राष्ट्रपति का चुनाव करेगी, जो फिजी आर्म फोर्स के चीफ कमांडर होंगे।

The twenty-first-century Indian diaspora is a composite form of both the ‘new diaspora’ and the ‘old diaspora’

इक्कीसवीं सदी का भारतीय डायस्पोरा ‘नए डायस्पोरा’ और ‘पुराने डायस्पोरा’ दोनों का सम्मिलित रूप है, भारतीय डायस्पोरा ने अत्यंत कठिन संघर्ष के साथ अपने कौशल्य और सृजनात्मक क्षमता के बल पर नए गंतव्य देशों की सामजिक दशाओं से सामंजस्य स्थापित करते हुए अपनी पहचान को संरक्षित रखा है। भारतीय डायस्पोरा ने अपनी भाषाओं, बोलियों, धार्मिक मूल्यों और सांस्कृतिक मान्यताओं को संरक्षित रखने का सफल प्रयास किया है। साथ ही इसने लोकप्रिय संस्कृति (संगीत, नृत्य, और सिनेमा आदि) के विकास में गर्मजोशी के साथ अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। इनके प्रयासों के कारण ही आधुनिक वैश्विक गाँव में भारत एक प्रमुख सांस्कृतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, इससे भारतीयता की एक नई पहचान भी रेखांकित हो रही है। इस शोध के लिए उन्‍हें डायस्‍पोरा विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मुन्‍नालाल गुप्‍ता का महत्‍वपूर्ण सहयोग प्राप्‍त हुआ है।

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