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फिर नफरत के बोल- चोर की दाढ़ी में तिनका

यदि अमित शाह अपने आप को बेकसूर मानते हैं, तो उन्हें गिरफ्तारी का डर क्यों हैं ? सच बात तो यह है कि चोर की दाढ़ी में कहीं न कहीं तिनका है।
जाहिद खान
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अमित शाह अपने बदला लेने वाले बयान पर फंसते नजर आ रहे हैं। चुनाव आयोग ने हाल ही में इस पूरे मामले का सज्ञांन लेते हुये, उन्हें आदर्श चुनाव आचार संहिता के प्रथम-दृष्टया उल्लंघन का नोटिस जारी किया। शाह को जारी नोटिस में कहा गया है कि मुजफ्फरनगर, शामली और बिजनौर में उनके भाषणों के आधार पर क्यों न उनके खिलाफ आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की कार्रवाई शुरू की जाये। शाह को अब तीन दिन के भीतर आयोग के सामने अपना जवाब दाखिल करना होगा। यदि चुनाव आयोग उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है। अमित शाह के सिर पर ना सिर्फ चुनाव आयोग की तलवार लटकी हुई है, बल्कि इस मामले में उनकी किसी भी समय गिरफ्तारी भी हो सकती है।
       भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के करीबी और उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह के उस बयान के बाद विवाद पैदा हो गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि आम चुनाव खासकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में सम्मान के लिये चुनाव हैं। ये चुनाव अपमान का बदला लेने के लिये हैं। ये चुनाव उन लोगों से बदला लेने के लिये हैं, जिन्होंने अपमान किया है। यह चुनाव उनको सबक सिखाने का है, जिन्होंने अन्याय किया है। शाह ने अपनी चुनावी सभाओं के दौरान उन्मादी भाषण देते हुये ना सिर्फ जाटों को मुजफ्फरनगर के दंगों की याद दिलाई बल्कि उन्हें बदला लेने के लिये भी उकसाया। जाहिर है शाह के इस भड़काऊ बयान के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में तूफान आ गया है। सियासी पार्टियां जहां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में लगी हुई हैं, तो वहीं दूसरी ओर प्रदेश में दो जगह अमित शाह के खिलाफ आइपीसी और जनप्रतिधित्व कानून की अलग-अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया गया है। शाह के खिलाफ आइपीसी की धारा 153 (लोगों को भड़काना) और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 (अलग-अलग वर्गों के बीच दुश्मनी पैदा करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
लोगों की साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाले अमित शाह के इन बयानों की जहां देश में हर तरफ निंदा हो रही है, तो वहीं इस मामले में पूरी भाजपा शाह के साथ खड़ी है। उनकी गलती को मानने की बजाय बड़ी ही बेशर्मी से शाह को बचाने की कोशिशें की जा रही हैं। शाह के खिलाफ एफआइआर की आलोचना करते हुये भाजपा इसे प्रदेश में चुनाव का ध्रुवीकरण करने की सोची समझी चाल बता रही है। उसका कहना है कि चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने की सोची-समझी ‘साजिश’ के तहत ऐसा किया गया है और यह कार्रवाई वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है। अमित शाह के बचाव में ऐसी-ऐसी दलीलें दी जा रही हैं, कि प्रवक्ताओं की समझ पर रोना आ जाये। भाजपा के ‘गुणी’ प्रवक्ता देश को बतला रहे हैं कि शाह की तरफ से बदला शब्द का इस्तेमाल कोई असामान्य बात नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी ओहायो में चुनाव प्रचार के दौरान इस शब्द का इस्तेमाल किया था। ओबामा ने लोगों से कहा था कि मतदान सर्वश्रेष्ठ बदला है। जाहिर है कि शायद ही यह दलील किसी के गले उतरे। भड़काऊ भाषण के मामले में सिर्फ अमित शाह ही अकेले दोषी नहीं हैं, बल्कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी पिछले दिनों एक चुनावी सभा के दौरान इसी तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुये, खुली धमकी दी थी कि कौन किसके टुकड़े करता है ?, यह चुनाव के बाद देख लेंगे।
आदर्श चुनाव आचार संहिता के प्रावधानों के मुताबिक किसी भी पार्टी या उम्मीदवार को ऐसी किसी गतिविधियों में शामिल नहीं होना चाहिए, जो विभिन्न जातियों और समुदाय तथा धार्मिक या भाषाई आधार पर घृणा या मतभेद या तनाव पैदा करे। वहीं पार्टियों और उम्मीदवारों को ऐसी आलोचनाओं से भी बचना चाहिए जो किसी की निजी जिंदगी से संबंधित हों और नेता या कार्यकर्ता से सार्वजनिक कार्यों से जुड़े नहीं हों। आरपीएक्ट की धारा 123 (3), 123 ए और 125 ऐसी सभी गतिविधियों को पूरी तरह से गलत मानती हैं। जो इन कार्यवाहियों में दोषी पाया जाये, उसके खिलाफ संविधान और अन्य संबंधित कानूनों के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए। देश के मुख्य चुनाव अधिकारी को संविधान ने यह अधिकार दिया हुआ है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और कानून के अन्य प्रावधानों के तहत वह ऐसी पार्टियों, संगठनों एवं लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, जिनके क्रियाकलापों से संविधान को आघात पहुंचता हो।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में सुनवाई करते हुये धर्म, जाति, क्षेत्र या जातीयता के आधार पर सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के नफरत पैदा करने वाले भाषणों को समाज के लिये हानिकारक बताते हुये कानून लागू करने वाली एजेंसियों को ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। जाहिर है कि इस संबंध में अदालत के साफ-साफ दिशा-निर्देश हैं और कानून में भी इसकी सख्त मनाही है। बावजूद इसके हमारे सियासतदां जरा सा भी सुधरने का नाम नहीं ले रहे। न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देश और चेतावनियों के बावजूद इस चुनाव में भी नेता लगातार अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे हैं।
       भाजपा ने अमित शाह को जिस दिन से उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रभारी बनाया है, तभी से यह आशंकाएं जताई जाने लगी थीं कि वे चुनाव के मद्देनजर राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नापाक कोशिशें कर सकते हैं। गुजरात सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे अमित शाह के ऊपर वैसे भी अवैध वसूली, दंगा भड़काने और फर्जी मुठभेड़ जैसे कई गंभीर इल्जाम हैं। सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में तो वे कुछ महीने जेल में भी रहे। शाह हाल-फिलहाल जमानत पर हैं। अमित शाह पार्टी के महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी होने के साथ ही नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी माने जाते हैं। सच बात तो यह है कि मोदी के चाहने से ही पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी। शाह जिस तरह से उत्तर प्रदेश में एक-एक कर अपने मोहरे चल रहे हैं, उससे ये लगता है कि कहीं न कहीं उनके इन फैसलों में संघ परिवार और मोदी की भी सहमति है। गर उनकी खुली सहमति न होती, तो शाह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ते।
अमित शाह ने हाल ही में अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब आयोग में दाखिल कर दिया। आयोग को दिये जवाब में शाह ने आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया है। शाह ने बदला शब्द का इस्तेमाल करने से इंकार करते हुये कहा है कि सपा सरकार के दबाव में प्रशासन ने आयोग को दी गई सीडी में भाषण को उचित संदर्भ में पेश नहीं किया। भाषण में कुछ भी गलत नहीं है। यानी इस मामले में साफ-साफ आॅडियो और वीडियो सबूत होने के बाद भी चुनाव आयोग की आंखों में धूल झोंकने की कोशिशें की जा रही हैं। चुनाव आयोग से माफी मांगने की बजाये, अमित शाह अभी भी अपने आप को बेदाग बतला रहे हैं। एक तरफ निर्वाचन आयोग के सामने उनकी यह सफाई है, तो दूसरी ओर अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिये उन्होंने इलाहबाद हाई कोर्टं मे अपील भी दाखिल की हुई थी। अदालत के सामने उन्होंने मांग की थी कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द हो और उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगे। लेकिन इस मामले में जब अदालत का कड़ा रुख सामने आया, तो अमित शाह ने पीछे हटते हुये अपनी याचिका वापस ले ली।  जाहिर है यदि अमित शाह अपने आप को बेकसूरवार मानते हैं, तो उन्हें गिरफ्तारी का डर क्यों हैं ? सच बात तो यह है कि चोर की दाढ़ी में कहीं न कहीं तिनका है। यह तिनका नजर ना आ जाये, इसलिये वे इन सब बेमतलब की कवायदों में जुटे हुये हैं। बहरहाल अब फैसला चुनाव आयोग और उत्तर प्रदेश पुलिस को करना है कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाये ?

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जाहिद खान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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