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बंगाल- दिलचस्प सवाल और कांटे की लड़ाई !

उज्ज्वल भट्टाचार्य
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा दीवार पर पीठ टिकाकर लड़ रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि ममता सरकार, वाम मोर्चे के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को छू भी नहीं रही है, वे जस के तस बरकरार हैं। लफ़्फ़ाज़ी में वह वामपंथियों से कहीं आगे है। राजनीतिक विरोधियों का गला दबाने के मामले में सीपीएम का गुरू है। साथ ही, वामपंथी नेतृत्व के सामने पीढ़ी का संकट भी है। नेता बूढ़े हो चुके हैं।
लेकिन वामपंथियों को अपना संकट दिख रहा है। इसके विपरीत तृणमूल – धीरे-धीरे ही सही – अपना संकट तैयार कर रही है। राज्यसभा के चुनाव में तीन वामपंथी विधायकों को खरीदने के प्रकरण से दो बातें सामने आई हैं : पार्टी के अंदर भी वामपंथियों का सांगठनिक दबदबा खोखला हो चुका है। लेकिन साथ ही, 1968 के बाद पहली बार बंगाल में दलबदल की राजनीति सामने आई है, सत्तारूढ़ दल उसे प्रोत्साहित कर रहा है। कम से कम भद्रलोक के लिये यह बात परेशान करने वाली है। उसके नीचे के तबकों में भी देर-सबेर इसका असर पड़ सकता है।
रिपोर्टें देख रहा हूं। कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि वाम रैली तृणमूल के बराबर थी। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि उससे कहीं बड़ी थी। तृणमूल नेता भी मान रहे हैं कि रैली अप्रत्याशित रूप से बड़ी थी, लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा है।
सबसे अच्छी टिप्पणी सीपीआईएम के एक स्थानीय नेता की थी, जिन्होंने कहा – पता नहीं, नेता लोग जनता को भरोसा दिला सके या नहीं, लेकिन जनता ने नेताओं को भरोसा दिलाया है।
लाखों की इस प्रतिस्पर्धा में मोदी की 40-50 हज़ार की रैली महत्वपूर्ण हो गई है। अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के उम्मीदवार झंडे-बैनर के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगे। कांग्रेस भी मर नहीं गई है, उसका एक ठोस वोट बैंक है, जो सभी निर्वाचन क्षेत्रों में दिखाई देगा।
पश्चिम बंगाल में लगभग सभी सीटों पर जमानत बचाने वाले तीन-चार उम्मीदवार होंगे। शायद पहली बार। कौन किसका वोट काटेगा ? इसके अलावा वहां सिर्फ़ वोट बैंक ही नहीं हैं, विरोधी वोट भी हैं – वाम विरोधी वोट, तृणमूल विरोधी वोट, कांग्रेस विरोधी वोट, यहां तक कि भाजपा विरोधी वोट भी। इन वोटों का अक्सर ध्रुवीकरण होगा। कौन किसका वोट काटेगा ? कौन किसके साथ जुड़ेगा ? “आप” भी टपक पड़ेगा क्या ? दिलचस्प सवाल और कांटे की लड़ाई !

About the author

उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है।

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