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बंगाल-मुसलमानों के वोट से बनेगा जनादेश

बम से चार मरे तो छह साल की मासूम बच्ची ईशानी को हवा में उछाल दिया भूतों ने और उसे चोटें भी खूब आयी हैं…
इस लोकतंत्र में वोटर कितने आजाद हैं, बंगाल के नतीजे बतायेंगे, बाकी हिंसा का सिलसिला जारी..
आतंक का यह रसायन अंतिम चरण में भी काम करेगा कि देखो, बिगड़ैल जनता से सत्ता कैसे निबटती है…
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
कोलकाता (हस्तक्षेप)। आखिर इस चुनाव में भी मुसलमानों के वोट से जनादेश बन रहा है बंगाल में। 35 साल तक इस अटूट वोट बैंक के सहारे बंगाल में वामशासन जारी रहा है और औचक नंदीग्राम, सिंगुर जैसे तमाम मुस्लिम बहुल इलाकों के गरीब किसानों की जमीन पर अंधाधुंध शहरीकरण और औद्योगीकरण की आंधी से वह वोट बैंक दीदी के खाते में स्थानांतरित हो गया है। संघ परिवार की हर चंद कोशिश से वह वोटबैंक केसरिया सुनामी के मुकाबले किसके साथ है या सिरे से पलट गया है, कहना मुश्किल है।
हिंदू राष्ट्र में लोकतंत्र, कानून का राज और संविधान का कुल पर्यावरण यह है कि जैसे हिमालय में दावानल है और उसकी आंच मैदानों तक कहीं पहुंचती ही नहीं है।
आतंक का रसायन जिनके लिए हैं, उनके अलावा बाकी लोगों को अहसास भी नहीं है कि कितनी स्वतंत्रता , कितनी सहिष्णुता और कितनी बहुलता हमारी सांस्कृतिक विरासत की अभी बची खुची सही सलामत है।
इस मर्ज का क्या कहिए कि अब भी हर चुनाव में बूथों की रक्षा करने के लिए सरहद पर दुश्मनों का मुकाबले तैनात रहने वालों को लोकतंत्र उत्सव में जनादेश की पहरेदारी के लिए तलब किया जाता है और उनकी मौजूदगी में भी वोटर समीकरण में राजनीति कम अपनी जान माल की सलामती का सबसे ज्यादा ख्याल करता है।
हिंदुत्व का एजेंडा इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि देश में कहीं भी चुनाव हो मुसलमानों का सरदर्द यही होता है कि किसे वोट दें तो उनकी जान और माल सही सलामत रहनेवाली है।
बंगाल के मुसलमानों ने इस पहेली को कैसे सुलझाया है, इस पर बंगाल का जनादेश निर्भर है। संघ परिवार की नकली सुनामी से डर कर भाजपा को हराने के लिए उनने किसे वोट डाला है, यह तय करने वाला है जनादेश।
बहरहाल धर्मोन्मादी इस ध्रुवीकरण से फिलहाल फायदा दीदी को नजर आ रहा है। इसका फौरी नतीजा यह हो सकता है कि दीदी की सत्ता में वापसी के साथ बिहार फार्मूले पर विपक्ष की हैरतअंगेज गोलबंदी से निबटकर बेहतर हालत में यूपी का चुनाव लड़ सकती है भाजपा, बाकी कहीं के नतीजे कुछ भी हो, फर्क पड़ता नहीं है।
बहरहाल बंगाल में आखिरी चरण के लिए मतदान 5 मई को निबट जायेगा और फिर 19 मई तक लंबा इंतजार। जंगल महल के बाद चुनावों में फर्जी मतदान की शिकायतें बेहद कम रही तो कमसकम मतदान के दौरान हिंसा छिटपुट ही रही।
आगजनी बमबाजी वगैरह वगैरह जारी हैं। जिन बमों का इस्तेमाल बूथों पर हो नहीं पाया है, वे भी जहां तहां फटने लगे हैं। नतीजे आने के बाद बाकी हिसाब बराबर होगा, जाहिर है।
मसलन मालदा जिले के जौनपुर में एक मकान में कथित रूप से बम बनाते वक्त रविवार देर रात विस्फोट होने से चार लोगों की मौत हो गई। जबकि छह लोग घायल हो गए।
गौरतलब है कि यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब पांच मई को राज्य में आखिरी चरण के चुनाव होने हैं।
पुलिस प्रवक्ता ने मीडिया को बताया कि यह घटना उस समय हुई जब बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाके में देर रात करीब एक बजे गियासु शेख के मकान में बम बनाए जा रहे थे। उन्होंने बताया कि इस घटना में स्थानीय गुंडे शामिल थे। गियासु फरार है। जिले में 17 अप्रैल को चुनाव हुआ था। यह मकान तृणमूल नेता का बताया जा रहा है।
इसकी उलट खबर यह है कि धमाके की गूंज सुनाई दी है और मालदा में तृणमूल कांग्रेस के एक पंचायत प्रधान समेत चार लोगों की बम से उड़कार हत्या कर दी गई है। हत्या के लिए कथित कांग्रेस समर्थकों को आरोपी बताया जा रहा है।
घटना मालदा के बैष्णबनगर की है। तृणमूल का आरोप है कि चुनाव में कांग्रेस को वोट नहीं देने के कारण इस वारदात को अंजाम दिया गया।
बहरहाल पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है, वहीं मालदा जिला कांग्रेस के महासचिव नरेंद्रनाथ तिवारी ने इस ओर आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि यह कांग्रेस को बदनाम करने की साजिश है।
इस सिलसिले में पुलिस का बयान गौरतलब है,
”एक घर में हुए एक विस्फोट में चार लोगों की मौत हो गई और चार अन्य लोग घायल हो गए। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, घर में देसी बम रखे हुए थे, जिनमें विस्फोट हो गया।”
घायलों को मालदा मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
केंद्रीय वाहिनी और चुनाव आयोग की इस सिलसिले में तारीफ करनी ही होगी कि भूतों के नाच पर अंकुश तो लगा ही जनादेश लूटने के दहशतगर्द इंतजामात को भी अंजाम तक पहुंचने नहीं दिया। कहा जा रहा है कि इतना शांतिपूर्ण मतदान दशकों में नहीं हुआ है। यही फौरी अमन चैन दीदी के सरदर्द का सबब है।
पिछले चुनाव के चुपचाप फूल छाप की यादें ताजा हैं और 2011 में यादवपुर से तत्कालीन मुख्यमंत्री की हार का अनुभव भी धूमिल हुआ नहीं है। बिगड़ैल जनता का कोई अचूक इलाज किसी की समझ से बाहर है। तब भी समझा जा रहा था कि वाम जनाधार अटूट तो मुसलमानों का वोटबैंक जस का तस।
सभाओं में तब भी भारी भीड़ थी वाम समर्थन में और तब बूथों पर वाम वर्चस्व ही दीख रहा था। जनता ने चुपचाप परिवर्तन कर दिया और सत्ता के लिए उस परिवर्तन की याद से बचने के लिए बेलगाम हिंसा ही सबसे बढ़िया जवाब सूझ रहा है। हिंसा थम नहीं रही है।
हालीशहर में तीन साल की जख्मी बच्ची की तस्वीर अभी हटी नहीं है कहीं से तो कैनिंग में पोस्टर को पतंग बना देने की सजा भी याद है तो अब दीदी के खास तालुक दक्षिण कोलकाता के हरिदेवपुर में एक मासूम पर फिर हमला हो गया। जहां से कार्टून शेयर करने वाले यादवपुर विश्वविद्यालय के निर्दलीय प्रोफेसर अंबिकेश वाम कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशी हैं।
छह साल की मासूम बच्ची ईशानी को हवा में उछाल दिया भूतों ने और उसे चोटें भी खूब आयी है।
आरोप है कि रविवार की शाम से लगभग पूरे दक्षिण कोलकाता में कस्बा, बाघा जतीन, पेयाराबागान, गांगुलीबागान, वैष्णवघाटा, पाचुली वगैरह वगरह स्थानों पर फर्जी मतदान में नाकाम भूतों की बाइक वाहिनी हंगामा बरपा रही है।
करीब सौ बाइक के साथ उनका अश्वमेध जारी है और पुलिस की मौजूदगी में ही विपक्षी समर्थकों, कार्यकर्ताओं और आम वोटरों पर हमले हो रहे हैं। ये हमले टीवी पर लाइव हैं। तो आतंक का यह रसायन अंतिम चरण में भी काम करेगा कि देखो, बिगड़ैल जनता से सत्ता कैसे निबटती है।
जाहिर है कि सत्ता दल और सरकार तमाम लाइव खबरों का खंडन करने में लगी है।
इसी सिलसिले में हरिदेवपुर के पेयाराबागान के एक समर्थक की छह साल की बच्ची ईशानी पात्र को भी लोकतंत्र का सबक सिखाया गया है। उसका जुर्म इतना है कि उसकी चाची स्मिता पात्र बालिगंज विधानसभा क्षेत्र में मंत्री सुब्रत मुखर्जी के खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णा देवनाथ की पोलिंग एजंट रही हैं।
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अमन चैन बहाली के साथ हुए इस चुनाव से खुश नहीं हैं।
केंद्रीय बलों और चुनाव आयोग की वाम कांग्रेस भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप तो वे शुरू से लगाती रही हैं, अब आखिरी चरण के लिए अपनी चुनाव सभाओं में अपनी ही पुलिस पर वे खूब बरस रही हैं और खुलेआम कह रही हैं कि उनकी पुलिस बिगड़ गयी है और चुनाव जीतने के बाद वे बिगड़ैल पुलिस का इलाज करेंगी।
जिन क्लबों को पिछले पांच साल के दौरान राज्य कर्मचारियों का वेतन रोककर खैरात बांटे गये, वे भी उनके हक में वोट नहीं करा सके हैं, यह शिकायत करके मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुलेआम कह रही हैं कि चुनाव जीत लेने के बाद सबकी खबर लेंगी वे।
हालांकि ममता बनर्जी ने सोमवार को भरोसा जताया कि उनकी पार्टी ”बहुमत” का आंकड़ा हासिल कर चुकी है। फिर भी उन्होंने राज्य में तैनात केन्द्रीय बलों पर मतदाताओं से ”दुर्व्यवहार” करने का आरोप लगाया।
दीदी कैसे इंच-इंच का हिसाब बराबर कर देंगी , यह तो बाद की बात है। फिलहाल जहां वोट पड़ चुके हैं , वहां विपक्षी एजेंटों, नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा वोटरों को भी सबक खूब पढ़ाया जा रहा है। हाथ पांव तोड़े जा रहे हैं।

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