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बंगाल में माकपा और तृणमूल का ‘हथियार’ बनी भाजपा

रीता तिवारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल देश के उन गिने-चुने राज्यों में शुमार है जहां अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैलियों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी कहीं मुकाबले में नहीं नजर आती। राज्य की 42 में से ज्यादातर सीटों पर मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच है। कहीं-कहीं कांग्रेस भी मुकाबले में है। भाजपा ने तमाम सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर मुकाबले को महज चौकोना बना दिया है। माकपा और तृणमूल कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्रों में भाजपा का जिक्र महज दो लाइनों तक ही सीमित है। लेकिन बावजूद इसके इन दोनों राजनीतिक दलों ने इस भगवा पार्टी को ही एक-दूसरे पर हमले का प्रमुख हथियार बना लिया है। इन दलों के तमाम नेता एक-दूसरे को भाजपा का दोस्त कह कर उस पर हमले कर रहे हैं।
माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने चुनाव घोषणापत्र में भाजपा का जिक्र महज दो लाइनों में होने के बारे में एक सवाल पर कहा था कि इससे पता चलता है कि बंगाल में यह पार्टी कितनी प्रासंगिक है। लेकिन यहां पार्टी के नेताओं ने मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पर भाजपा के साथ गोपनीय साठ-गांठ का आरोप लगाते हुए एक पुस्तिका जारी की है। उसमें छपी एक तस्वीर में ममता को नरेंद्र मोदी को माला पहनाते हुए भी दिखाया गया है। इससे पहले ममता अपनी तमाम रैलियों में कांग्रेस और माकपा पर भाजपा के साथ मिल कर काम करने के आरोप लगाती रही हैं। वाम मोर्चा अध्यक्ष विमान बसु कहते हैं कि भाजपा पर ममता के हमले महज दिखावा हैं। वे चुनाव के बाद उससे हाथ मिला सकती हैं। आखिर पहले भी वे राजग सरकार में शामिल रही हैं।
ममता ने 30 जनवरी को यहां ब्रिगेड परेड मैदान में आयोजित तृणमूल की रैली में एलान किया था कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बरतेगी। उसके बाद वे अपने हर भाषण में भाजपा पर हमले करती रही हैं और खासकर माकपा पर उसकी सहायता करने का आरोप लगाती रही हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने यहां पत्रकारों से कहा था कि तृणमूल कांग्रेस को भाजपा से खतरा महसूस हो रहा है। इसलिए वह पार्टी पर जोरदार हमले कर रही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की छवि ने राज्य के मुसलमानों को असमंजस में डाल दिया है। अब वे दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। पहले यह वोट बैंक कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ था। पिछले लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों के बीच तालमेल होने की वजह से अल्पसंख्यकों के सामने ऐसी कोई स्थिति नहीं थी।
मौलाना आजाद एशियाई अध्ययन संस्थान के प्रोफेसर अमिय चौधरी कहते हैं कि पहले 62 फीसदी अल्पसंख्यक वोट वाममोर्चा की झोली में थे और 21 फीसदी तृणमूल के। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में यह समीकरण बदला और तब इस तबके के लगभग 60 फीसदी वोट तृणमूल को मिले थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले शिवाजी प्रतिम बसु कहते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक के इस बदलते समीकरण ने ही माकपा और तृणमूल कांग्रेस को भाजपा पर हमले करने और उसे एक-दूसरे के खिलाफ हथियार बनाने पर मजबूर कर दिया है।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

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