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बजट में बोले खूब, कहा कुछ नहीं और जनता मस्त, भारत ध्वस्त, अमेरिका स्वस्थ

बकरे की अम्मा खैर मनाओ की कयामत जारी है।
पलाश विश्वास
 एक अत्यावश्यक सूचनाः
जब यह आलेख लिख रहा हूं और समूचे बजट डाक्यूमेंट की पड़ताल करते हुए प्रासंगिक तथ्य आलेख से पहले अपने ब्लागों में पोस्ट करने में लगा हूं, इसके मध्य मेरठ के एसएसपी का फोन आया कि उन्हें मेरा कोई मेल मिला होगा, उसे दुबारा भेजने के लिए उन्होंने कहा है। मैंने निवेदन किया कि मुझे जो मेल आते हैं,मैं फारवर्ड करके डिलीट कर देता हूं। तब उन्होने कहा कि किसी को भी मेरठ मंडल से संबंधित कोई शिकायत हो तो वे सीधे उन्हें, यानी एसएसपी मेरठ को सीधे फोन कर सकते हैं इस नंबर परः911212660548
जनहित में यह सूचना जारी की जा रही है।
एसएसपी मेरठ का आभार इस पहल के लिए।
विशुद्ध गुप्त तंत्र विधि है भारत सरकार का मुक्ताबाजारी बजट। इसका कूट रहस्य खोलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। डॉन के मुखातिब है पूरा देश, लेकिन डॉन की शिनाख्त असंभव। अपराध के प्रत्यक्षदर्शी है सारा जहां। कत्ल हो गया। लेकिन लहू का कोई सुराग नहीं। कातिल हाथों में महबूब की मेंहदी है।
गुप्त तंत्रविधि के बजट में बोले खूब, कहा कुछ नहीं और जनता मस्त, भारत ध्वस्त, अमेरिका स्वस्थ।
गौरतलब है कि अमेरिकी विशेषज्ञों व कारपोरेट जगत के लोगों ने भारत की मोदी सरकार के पहले बजट का स्वागत किया है और कहा है कि यह सही दिशा में है तथा इससे रोजगार एवं आर्थिक वृद्धि में तेजी आएगी।
कारोबारी जगत की दृष्टि से किसी नई सरकार के पहले बजट को उससे इकनॉमी को मिलने वाली दिशा के आधार पर आंका जाता है, न कि आंकड़ेबाजी के आधार पर। 2014-15 के लिए अरुण जेटली के बजट में एक साफ विजन है कि नई सरकार आने वाले वर्षों में इकनॉमी में इनवेस्टमेंट को बढ़ावा कितना मिलेगा, मुनाफा कितना गुणा बढ़ेगा, उसके नजरिये से राष्ट्रहित यह है।
कारपोरेट केसरिया बजट में इसका पूरा ख्याल रखा गया है।
अल्पमती नवउदारवादी धारा की सरकारों के मुकाबले जनादेश सुनामी मार्फत सत्ता में आयी गुजरात मॉडल की सरकार के चरित्र में केसरिया रंग के सिवाय कुछ भी बदलाव नहीं है, यह वाकई सत्ता वर्ग के वर्णवर्चस्वी नस्ली संहारक चरित्र का रंगबदल है। बाकी जादू टोना टोटका टोटेम हुबहू वही।
जैसे मनमोहिनी, प्रणवीय, चिदंबरमी बजटसुंदरी के होंठों में केसरिया रंगरोगन।
बंगाल में दो सदियों की भूमि सुधार आंदोलन की फसल बतौर बनी कृषक प्रजा पार्टी के स्थाई बंदोबस्त और जाति वर्ण नस्ल एकाधिकार के विरुद्ध जनविद्रोह से देशव्यापी राष्ट्रीय आंदोलन के गर्भपात हेतु जिन महामना श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बंगाल के अल्पसंख्यकों को बंगाल की खाड़ी में फेंक देने और भारत विभाजन हो या नहीं, बंगाल का विभाजन जरूर होगा, की सिंह गर्जना की थी और विभाजन एजेंडा पूरा होने के बाद भारतीय जनसंघ के जरिये भारतीयकरण मार्फते हिंदू राष्ट्र की नींव डाली थीं, यह कारपोरेट केसरिया बजट पहली बार गांधी, नेहरु और अंबेडकर के साथ साथ समूचे वाम पर उन्हीं श्यामाप्रसाद का ब्राजीली गोल पर जर्मन धावा है।
जाहिर है नमो महाराज से बड़ा कोई रंगरेज नहीं है भारतीय इतिहास में जो सब कुछ इस तरह केसरिया बना दें। अपनी दीदी भी बंगाल को सफेद नील अर्जेंटीना बनाने की मुहिम में हैं और उन्हें लोहे के चने चबान पड़ रहे हैं।
 कल्कि का जलवा इतना जानलेवा, इतना कातिलाना कि सावन भी केसरिया हुआ जाये रे। घुमड़ घुमड़कर मेघ बरसै केसरिया।
जैसे कि उम्मीद थी, वोटरों को संबोधित करने की रघुकुल रीति का पालन हुआ है एकमुश्त वित्तीय प्रतिरक्षामंत्री के एफडीआई विनिवेश प्राइवेटाइजेशन बजट में।
गला रेंत दिया और बकरे को मरते दम चारा चबाने से फुरसत नहीं।
हमने पहले ही लिखा है कि मध्य वर्ग और निम्नमध्यवर्ग के साथ उच्चवित्तीय नवधनाढ्य मलाईदार तबके को खुश रखिये और मुक्तबाजारी जनसंहार नीतियों की अविरल गंगाधारा की निरंतरता निरंकुश छिनाल छइया छइया पूंजी का निखालिश कत्लेआम जारी रखिये, बजट के जरिये रणनीति यही अपनायी गयी है। इसी मुताबिक  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी सरकार का पहला बजट पेश किया।
हमने लिखा था कि आर्थिक समीक्षा का आइना हो बजट, कोई जरुरी नहीं है। यह सिर्फ संसद और जनता के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वाह की वैदिकी विधि है और बाकी बचा वही गुप्त तंत्र विधि।
बोले तो बहुत,लेकिन कहा कुछ भी नहीं। वैसे कहने बोलने को रहा क्या है, देश में लोकतंत्र और संविधान का तो सत्यानाश कर दिया है। हालांकि वित्त मंत्री ने रोजगार के अवसर और आर्थिक वृद्धि बढ़ाने तथा निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए अनेक उपायों की घोषणा की है।
 देहात और कृषिजीवी बहुसंख्य मूक भारत के चौतरफा सत्यानाश का जो एजेंडा आया है, वह अंध भक्त बजरंगी पैदल भेड़ सेनाओं की निर्विकल्प समाधि और सत्ता वर्ग से नत्थी चेतस तेजस केसरिया मलाईदार तबके के चरवाहों और गड़ेरियों के चाकचौबंद इंतजामात के मद्देनजर निर्विरोध है।
वोटबैंक समीकरण साधने के लिए लेकिन दिल्ली में पानी क्षेत्र में सुधार के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया।
बजट में आपका टैक्स कितना बचेगा, मीडिया का थीमसांग यही है। आज के तमाम अखबारों में कड़वी दवा न मिलने का विश्वकप वंचित ब्राजीली हाहाकार है। अर्थव्यवस्था के कायाकल्प के लिए सब्सिडी असुरों का एकमुश्त वध ने होने का क्रंदन है। बाजार की सारी उछलकूद है।
मजा देखिये, जनता बचे हुए नोटों का हिसाब लगाकर मस्त, असली भारत ध्वस्त और अमेरिका स्वस्थ।
गौरतलब है कि अमेरिका जब राजनीतिक बाध्यताओं के बहाने पूर्ववर्ती गुलामवंशीय सरकार की नीतिगत विकलांगकता के बहाने केसरिया कारपोरेट सुनामी की पहल कर रहा था, तब भी अमेरिका और उसके सहयोगी देश में अवांछित था गुजरात मॉडल।
आज उसी गुजरात मॉडल से समूचा पश्चिम बल्ले-बल्ले है।
इस बजट में श्यामाप्रसाद मुखर्जी के युद्धविजय की खुशबू जितनी है, भारत अमेरिकी परमाणु संधि, आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका और इजराइल के वैश्विक युद्ध में महाबलि गौरिक भारत की भागेदारी से नियत अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था की जमानत पर रिहा होने का नशा उससे कहीं ज्यादा है।
भारतीय उद्योग, वाणिज्य, कारपोरेट के सुधार सांढ़ों के उतावलेपन के मुकाबले में अंकल सैम की गुलमोहर हुई मुस्कान को समझिये।
बजट में जो निर्विरोध सत्ता जाति वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी बुनियादी एजंडा पास हो गया, वह प्रतिरक्षा बीमा समेत सारे क्षेत्रों, महकमों और सेवाओं में निरंकुश विदेशी पूंजी प्रवाह की सहस्रधारा है, जिसे संभव न बना पाने की सजा बतौर मुक्तबाजार के ईश्वर से स्वर्ग का सिंहासन छीन लिया गया।
इस पर अब सर्वानुमति है।
बजट में जो निर्विरोध सत्ता जाति वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी बुनियादी एजेंडा पास हो गया, वह गुजरात का पीपीपी मॉडल है जो बिना बजट के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश माध्यमे कृषिजीवी भारत के महाश्मशान कब्रिस्तान रेगिस्तान पर अंधाधुंध शहरीकरण का लक्ष्य हासिल करेगा।
इसीलिए एक साथ स्मार्ट सिटीज की सेंचुरी तेंदुलकरी। 1930 तक दस लखिया पचास शहर बनेंगे इसी तरह। इन्ही उन्मुक्त कत्लगाहों को जोड़ने के लिए एफडीआई प्लस पीपीपी मॉडल, जिसका कोई खुलासा किसी बजट में होना नहीं है और अरबों की कारपोरेट राजनीतिक कमाई की कोई कैग रपट जारी नहीं होनी है और न किसी घोटाले और न किसी घपले का झमेला है।
इसीलिए  इन्फ्रास्ट्रक्चर … इन परियोजनाओं को मंजूरी के लिए अब योजना आयोग के दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत नहीं होगी। … वही धन आवंटन की सिफारिश करता था, जिसके आधार पर वित्त मंत्रालय की ओर से धन का आवंटन होता था।
इस पर भी सर्वानुमति हो गयी।
पहले जमाने का बजट याद करें,अखबारों के पेज रंगे होते थे कि क्या सस्ता होगा, क्या महंगा। आज के अखबारों को देखें, बमुश्किल ग्राफिक समेत दो पैराग्राफ।
बजट में जो निर्विरोध सत्ता जाति वर्चस्वी नस्ल वर्चस्वी वर्ग वर्चस्वी बुनियादी एजंडा पास हो गया, वह मूल्यों, शुल्कों, किरायों पर सरकारी हस्तक्षेप निषेध है।
शत प्रतिशत विनियंत्रण, शत प्रतिशत विनियमन। हंड्रेड पर्सेंट लव लव लव कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर राज के लिए।
करछूट के लाखों अरबों करोड़ का किस्सा अब बेमतलब है।
करछूट धाराप्रवाह है।
मुनाफा धाराप्रवाह है।
कालाधन धारा प्रवाह है।
साकी भी है और शराब भी।
हुश्न भी है और नशा भी।
एफडीआई भी है और पीपीपी भी है।
तेल गैस, कोयला, उर्वरक, बिजली, रेलभाड़ा, स्कूली फीस, चिकित्सा व्यय, परिवहन खर्च, चीनी, राशन से लेकर मूल्यों, शुल्कों और किराया सरकार का सरदर्द नहीं है, बाजार की मर्जी है।
तो नवधनाढ्यों को गदगदायमान कर देने के अलावा वित्तमंत्री को बजट में कहना क्या था आखिर।
लोकगण राज्य के असान पर जश्नी कार्निवाल के शोर शराबे में सन्नाटा बहुत है।
विनिवेश की दिशा पहले से तय है।
गोपनीय तंत्र प्राविधि का सबसे संवेदनशील कर्मकांड, जो अटल जमाने की शौरी विरासत है। बचे हुए सरकारी उपक्रमों जैसे स्टेट बैंक आफ इंडिया समेत तमाम बैंकों, कोल इंडिया, जीवन बीमा निगम की पूंजी को बाकी सरकारी उपक्रमों के विनिवेश में खपाने की रणनीति है, उन्हें फिनिश करने चाकचौबंद इंतजाम है।
सबसे माफिक सहूलियत यह है कि सरकारी उपक्रमों, विभागों के कर्मचारी अफसरान और यहां तक कि ट्रेड यूनियनों को भी यह मारक तंत्रविधि समझ में नहीं आ रही।
सेल आफ हो रहा है, पता नहीं।
2000 में ही भारत पेट्रोलियम का सेल आफ तय हो गया। ऑयल इंडिया और ओएनजीसी, कोल इंडिया, सेल, एसबीआई, एलआईसी, एअर इंडिया, रेलवे, डाक तार, सरकारी बिजली कंपनियों का विनिवेश जारी है, खुदै शिवजी के बाप को नहीं मालूम।
घात लगाकर कत्ल कर देने का नायाब तरीका है यह।
जाने-माने कारपोरेट वकील हैं मान्यवर अरुण जेटली और आप उम्मीद कर रहे हैं कि वे विनिवेश और निजीकरण के रोडमैप खोलकर नाम पुकार पुकार कर कह देंगे कि कब किसका कत्ल होना है।
इसी तरह सब्सिडी खत्म करने का मामला है।
विनियंत्रण और विनियमन,एफडीआई और पीपीपी गुजरात मॉडल के बावजूद जो लोग अब भी सब्सिडी जारी रहने की खुशफहमी में हैं, वे फौरी कर छूट से बल्ले- बल्ले निम्न मध्यवर्गीय मौकापरस्त मानसिकता के लोगों से भी बुरी हालत में है कि किसी को नहीं मालूम कि इस मुक्त बाजार के तिलिस्म में जान माल इज्जत की गारंटी है ही नहीं।
रोजगार, आजीविका, नागरिकता, जल जंगल जमीन, नागरिक अधिकार मानवाधिकार के बदले हम सिर्फ भोग के लिए मरे जा रहे हैं। यह भोग पल- पल कैसे दुर्भोग में तब्दील हो रहा है, उसका अंदाजा नहीं है।
टैक्स बचाने के फिराक में आप भी निवेशक बनने का विकल्प चुनते हुए सेनसेक्सी बाजार के आत्मगाती दुश्चक्र में फंसने वाले हैं और हश्र वहीं बीमा प्रीमियम का होना है। मर गये तो वाह वाह, हो सकता है कि कवरेज का भुगतान हो गया, वरना क्या होता है, बीमा ग्राहक भुक्तभोगी जानते हैं।
यह जीरो बैलेंस मेडिकल इंश्योरेंश माध्यमे किडनी दान या बिना प्रयोजने जांच पड़ताल डायगनोसिस और मेजर आपरेशन का खुल्ला खेल है।
कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर राज में आम आदमी की औकात क्या जो धेला भी जेब में बचा लें।
जेबकटी कला का यह चरमोत्कर्ष है।
हम शुरु से नागरिकता संशोधन कानून को मुक्त बाजार का टूल बता रहे हैं। यह समझने वाली है कि अंधाधुंध शहरीकरण, निरंकुश विस्थापन और जनसंख्या सफाये की इस आटोमेशन क्रांति से न कृषि उत्पादन बढ़ सकता है, न औद्योगिक उत्पादन और न ही श्रमआधारित मैन्युफैक्चरिंग।
गधा भी समझता होगा कि फालतू घास का मतलब है बहुत ज्यादा कमरतोड़ बोझ।
इंसान की बुद्धि गधे से तेज है। लेकिन गधा मौकापरस्त नहीं होता। इसीलिए पिटता है। गधा घोड़ा भी नहीं हो सकता। लेकिन इंसानों की मौजूदा नस्ल घोड़ा बनने की फिराक में है।
जिंदगी अब रेस है। इस रेस में जो आगे निकल जाये वही सिकंदर बाकी चुकंदर।
हम पहले ही लिख चुके हैं कि औद्योगिक क्रांति की उत्पादन प्रणाली में श्रम अनिवार्य है। मानव संसाधन प्राकृतिक संसाधनों के बराबर है। इसीलिए औद्योगिक क्रांति के दरम्यान श्रमिक हितों की परवाह पूंजीवाद ने खूब की और इतनी की कि मजूर आंदोलनों को बदलाव का कोई मौका हाथ ही न लगे।
अब आटोमेशन तकनीनी क्रांति है।
मनुष्य फालतू है।
कंप्यूटर, तकनीक, मशीन, रोबोट ही आटोमेशन के आधार।
निजीकरण और एफडीआई, विनेवेश और पीपीपी की प्रासंगिकता यही है।
उद्योग और पूंजी में अच्छी मुद्रा के प्रचलन से बाहर हो जाने का समय है यह।
भारी विदेशी देशी पूंजी के आगे मंझोली और छोटी पूंजी का असहाय आत्मसमर्पण का समय है यह।
अभी बनिया पार्टी की धर्मोन्मादी सरकार छोटे कारोबारियों को केसरिया बनाने के बाद कभी भी खुदरा कारोबार में शत प्रतिशत एफडीआई का ऐलान कर सकती है कभी भी।
बहुमती स्थाई सरकार है।
विधानसभाओं के आसण्ण चुनावों में जनादेश लूटने के बाद खुल्ला मैदान है, फिर देखें कि सुधारों की सुनामी को कौन माई का लाल रोक लेता है।
इस आटोमेशल तकनीकी क्रांति में उद्योग कारोबार में लगे फालतू मनुष्यों के सफाये का एजंडा सबसे अहम है और इसीलिए औद्योगिक क्रांति के परिदृश्य में श्रमिक हितों के मद्देनजर पास तमाम कायदे कानून खत्म किये जाना है ताकि स्थाई सुरक्षित नौकरियों के बजाय असुरक्षित हायर फायर की तकनीकी क्रांति को मुकम्मल बानाया जा सके।
अरुण जेटली ने कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के उपाय किये हैं, मीडिया का यह प्रचार मिथ्या है।
शैतानी गलियारों और स्मार्ट सिटीज ही नहीं, सेज को भी पुनर्जीवित किया गया है।
उद्यम के लिए तीन तीन साल की कर छूट, लेकिन छोटे उद्यमियों के लिए नहीं, कम से कम पच्चीस हजार करोड़ का निवेश कीजिये तब।
सेज के बारे में बहुत लिखा कहा गया है। उन्हें दोहराने की जरूरत नहीं है।
तो समझ लीजिये, खेतों, खलिहानों, वनों, नदियों, घाटियों यानि की शिखरों से लेकर समुंदर तक इस मिसाइली शहरीकरण के पीपीपी एफडीआई चाकचौबंद इंतजाम में कृषि का विकास कितना संभव है।
तो समझ लीजिये कि श्रम और मनाव संसाधन के सफाये के साथ प्राकृतिक संशाधनों को एक मुशत् छिनाल विदेशी पूंजी और गुजरात मॉडल के हवाले करके आटोमेशन, अंग्रेजी और तकनीक बजरिये कैसे औद्योगीकरण होगा।
मैन्युफैक्चरिंग की तो कहिये ही मत।
सब्सिडी खत्म करने के लिए आधार असंवैधानिक योजना ऩागरिकता का पर्याय बना दिया गया और अब नई सरकार भगवा डिजिटल देश बनाने चली है और फिर वही बायोमेट्रिक डिजिटल अनिवार्यता से जुड़ी नागरिकता और अनिवार्य सेवाएं, जान माल की गारंटी। आधार योजना को खत्म करने के बजाय उसे बहुआयामी बनाया जा रहा है।
बकरे की अम्मा खैर मनाओ की कयामत जारी है।

About the author

पलाश विश्वास।लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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