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बनारसी तहजीब का दस्तावेज़ है काशी का अस्सी

शेष नारायण सिंह

अपने  देश में  साहित्यिक  रचनाओं को आधार बनाकर फ़िल्में बनाने का फैशन नहीं है लेकिन हर दौर में कोई फिल्मकार ऐसा आता है जो यह पंगा लेता है . ज़्यादातर फ़िल्में बाज़ार में पिट जाती हैं लेकिन कला की दुनिया में उनका नाम होता है . मुंशी प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो , अमृत लाल नागर, फणीश्वर नाथ रेणु, अमृता  प्रीतम जैसे बड़े लेखकों की कहानियों पर फ़िल्में बन चुकी हैं . कुछ फ़िल्में तो बाज़ार में भी बहुत लोकप्रिय हुईं लेकिन कुछ कला के मोहल्ले में ही नाम कमा सकीं . जब अमृतलाल नागर  मुंबई गए थे तो बहुत खुश होकर गए थे लेकिन जब वहां देखा कि फ़िल्मी कहानी लिखने वाले को किरानी कहते थे और वह आमतौर पर फिल्म के हीरो का चापलूस होता था , तो बहुत मायूस हुए. किरानी बिरादरी का मुकाबला अमृतलाल नागर तो नहीं ही कर सकते थे क्योंकि इन किरानियों की खासियत यह होती थी कि  उन पर हज़ारों कमीने न्योछावर किये जा सकते थे  . नागर जी वापस लौट आये अपने लखनऊ की गोद में और दोबारा उधर का रुख नहीं किया .अब सुना जा रहा है कि एक जिद्दी फिल्मकार ने उनकी किसी रचना पर फिल्म बनाने का मन बना लिया  है . इन श्रीमान जी ने इसके पहले भी पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम के एक मामूली उपन्यास पर बहुत अच्छी फिल्म बनायी थी . भारत के बँटवारे के वक़्त लाहौर और अमृतसर के बीच के कुछ गाँवों को इस फिल्मकार ने फिर से जिंदा कर दिया था. हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ  साहित्यकार प्रोफ़ेसर काशीनाथ सिंह का कहना है कि इतने घटिया उपन्यास पर जिस आदमी ने इतनी बढ़िया फिल्म बनाई  है वह निश्चित रूप से बहुत बेहतरीन रचनाधर्मी होगा . डाक्टरी की पढाई कर चुके इस फिल्मकार को लोग फिल्म ‘ पिंजर ‘ के निदेशक के रूप में जानते हैं .वैसे भारतीय जनमानस में इसकी पहचान आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य के रूप में भी है . इन्होने ‘चाणक्य ‘नाम के सीरियल को दूरदर्शन के लिए बनाया था.  वह बहुत लोकप्रिय हुआ था . जब इस चाणक्य ने काशीनाथ  सिंह से उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘ काशीं के अस्सी ‘ के ऊपर फिल्म बनाने की बात की तो काशीनाथ सिंह तुरंत तैयार हो गए. मुझसे उन्होंने कहा कि जिस आदमी ने ढाई हज़ार साल  पुराने चाणक्य को समकालीन चरित्र बना दिया हो और एक बहुत ही रद्दी उपन्यास पर पिंजर जैसी महान फिल्म बना दी हो , जब वह आपके किसी  उपन्यास पर फिल्म बनाने की बात करे तो बिना कुछ सोचे समझे हाँ कर देना चाहिए . मुंबई की फिल्म सिटी  में जब इस फिल्म की शूटिंग चल रही थी , तो काशीनाथ सिंह से फिल्म के सेट  पर ही मुलाक़ात हो गयी . बहुत खुश थे . उनको लग रहा था कि मुंबई में ही अस्सी की वह पप्पू की दुकान , पांडे जी का घर, वह मोहल्ला जिंदा हो उठा  है . हो भी क्यों न . फिल्मकार डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने अस्सी वाले पप्पू की पूरी दुकान खरीद कर उसे ट्रक में लाद कर  मुंबई की फिल्म सिटी में फिर से स्थापित कर दिया है . पप्पू  भी खुश कि उसकी टुटही दुकान को नए सिरे से सजाने का लिए पैसा मिल गया. और डॉ द्विवेदी भी खुश कि उनकी फिल्म का  सेट एकदम सही बन गया .

डॉ चन्द्र  प्रकाश  द्विवेदी  ने काशीनाथ सिंह को मुंबई आमंत्रित किया था. वहां पर फिल्म की शूटिंग देख कर वे बहुत ही खुश हुए.    जिस दिन काशीनाथ सिंह सेट पर पंहुचे थे ,पड़ाइन और  रामदेई  से सम्बंधित सीन की शूटिंग चल रही थी. शूटिंग शुरू होने के  पहले उन्हें  कलाकारों से मिलाया गया तो बहुत मायूस दिखे . उन्हें  लगा कि पड़ाइन और  रामदेई के चरित्र में जो बनारसी मस्ती और शोखी हैं उसकी एक्टिंग कर पाना  इन लड़कियों के बस की बात नहीं है . लेकिन जब  उन्हें काम करते देखा तो खुशी से झूम उठे .काशी का अस्सी उपन्यास की  पड़ाइन तीन बच्चों की माँ है .  काशीनाथ सिंह को लगता था कि साक्षी तंवर जैसी कम  उम्र की  अभिनेत्री कैसे वह काम कर पायेगी लेकिन उसके शाट को देख कर कहा कि भाई पडाइन का ठसका तो है इस पात्र में .  रामदेई का रोल सीमा आजमी ने किया है  उसकी भी उन्होंने बहुत तारीफ़ की लेकिन शूटिंग देखने के बाद ..उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से डॉ द्विवेदी बहुत बड़ा फिल्मकार है . फिल्म में सनी देओल का रोल एक बनारसी पण्डे का  है . कमीज़ ,धोती,चप्पल  और मूंछ धारी सनी देओल को अगर एकाएक देखें तो लगेगा ही नहीं कि वह मुंबई का इतना बड़ा फ़िल्मी कलाकार है . उनकी शख्शियत पूरी  तरह से बदल गयी है इस फिल्म में . डॉ द्विवेदी ने बताया कि  सनी देओल ने फिल्म में पांडे जी का रोल तैयार करने में बहुत मेहनत की है

काशी का अस्सी में  लखनवी तड़का भी है क्योंकि इस फिल्म के  प्रोड्यूसर  विनय तिवारी लखनऊ के हैं . उन्होंने उपन्यास को पढ़ रखा था और जब डॉ.द्विवेदी ने फिल्म बनाने  का प्रस्ताव किया तो वे तुरंत राजी हो गए. भोजपुरी फिल्मों के बड़े कलाकार रवि किशन कन्नी  के रोल में हैं जब कि मिथिलेश चतुर्वेदी  को डॉ गया सिंह का रोल मिला  है . दर असल डॉ गया सिंह का चरित्र ही कहानी को लगातार खींचता रहता है .मुंबई में  फिल्म के सेट पर  काशीनाथ सिंह के बड़े भाई और हिन्दी के सबसे बड़े नाम , डॉ नामवर सिंह भी हो आये हैं . शूटिंग देख कर वे भी बहुत खुश हुए और लोगों को बताया कि जब वे बनारस में  फाकामस्ती कर रहे थे तो उनकी प्रिय चाय की दुकान , केदार की दुकान थी लेकिन जब तक कासी का ज़माना आया , तब तक पप्पू की दुकान ही साहित्य का जंक्शन हो चुकी थी . डॉ काशीनाथ सिंह को उम्मीद है कि यह फिल्म अस्सी की संस्कृति को दुनिया के सामने अपने असली रूप में रखेगी और दो शताब्दियों के संधिकाल के बनारस की ज़िंदगी और मस्ती को जिंदा कर देगी.

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