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बनारस में फासीवाद की आहट

महादेव और जयरामी के जगह नमो-नमो का प्रचलन भी बनारस की संस्कृति पर हमला ही है
अंशु शरण
वाराणसी। राष्ट्रवादियों के खेमे की बौखलाहट अब बनारस में लगने वाली अड़ियों पर तीखी झड़पों के रूप में सामने आ रही है। फासीवाद के राह पर चल पड़े ये
राष्ट्रवादी अब किसी विपक्ष को स्वीकार करने के मनो स्थिति में नहीं है
अब इनके इस मिज़ाज़ से परेशान लोग सार्वजनिक जगहों पर बहस करने से कतरा रहें हैं। और उनके इस व्यव्हार से कहीं न कहीं उनका अलोकतांत्रिक चेहरा
भी सामने आ रहा है जो सरकार में आने पर इनके कार्य प्रणाली को लेकर बड़ा
सवाल उठाती है।
इस तरह का आक्रामक और हिंसक चुनाव प्रचार बनारस ने शायद कभी नहीं देखा होगा जिसमे राष्ट्रवादी उन्माद ने लोगो को परेशान कर रखा है, स्थिति यहाँ तक आ पहुंची है की चाय और पान के विक्रेता भी राजनैतिक बहस करने वाले ग्राहकों को भगा दे रहे हैं। भले ही देश भर के लोग इस पूरे हाई प्रोफाइल ड्रामे पर नज़र गड़ाए हों लेकिन अब बनारस के लोग इस प्रचार अभियान से आज़िज़ आ गए हैं और प्रचार अभियान को नौटंकी की संज्ञा दे रहे हैं।
मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट इन्स्टीन ने राष्ट्रवाद की तुलना शैशव काल में
होने वाले संक्रामक रोग से की थी जिसकी संक्रामकता हम लोग पहली बार बनारस में महसूस कर रहें हैं। बनारस में महादेव और जयरामी के जगह नमो नमो का प्रचलन भी बनारस की संस्कृति पर एक तरह का हमला ही है। और अब इस भारी फासीवादी शोरगुल के बीच में न सिर्फ स्थानीय मुद्दे दरकिनार हो गए हैं बल्कि कई चरणो के चुनाव बाद भी हम जान नहीं पाये की गुजरात मॉडल है क्या। इस आम चुनाव के पहले भी प्रचार अभियान जनभावनाओं पर सवार होते रहें हैं, जो मूलतः सरकार के प्रति रोष पर आधारित थे लेकिन इस आम चुनाव में वोट बैंक बढ़ाने के लिए जनभावनाओं को सांप्रदायिक आधार पर भड़काया जा रहा है, जिसका सीधा प्रभाव अब बनारस में देखा जा सकता है और साथ ही साथ फ़ासीवादियों द्वारा एकाधिकारिक देशभक्ति की जमीं पर कुछ राजनैतिक दलों के प्रति घृणा और नफरत का मौहाल तैयार करना ही, बनारस में हो रही मारपीट की घटनाओं की मुख्य वजह है।

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अंशु शरण, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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