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बलिहारी उनकी भी, जो नहीं समझते कि हिंदू साम्राज्यवाद क्या है!

नेपाल भूकंप की आड़ में हिंदू साम्राज्यवादी एजेंडा का हम लोग लगातार पर्दाफाश कर रहे हैं। लेकिन भारत के लोगों को मालूम ही नहीं पड़ रहा है कि यह हिंदू साम्राज्यवाद क्या बला है।
भारत के गृहमंत्री एकदा प्रधानमंत्रित्व के मजबूत उम्मीदवार राजनाथ सिंह मोदी ममता युगलबंदी से टैगोर के भूगोल को केसरिया बनने के दिन ही अयोध्या में गये और हमनुमानगढ़ी से उनका उद्गार लाइव प्रसारित हुआ कि राज्यसभा में बहुमत नहीं है और इसीलिए राममंदिर वे कानून बनाकर पास नहीं कर सकते। भलें नहीं वह नारा, अयोध्या झांकी है, मथुरा काशी बाकी है।
आनंद पटवर्द्धन की फिल्म राम के नाम फिर एक दफा देख लें। वैसे अयोध्या के बाद काशी और मथुरा से लेकर उत्तर पूर्व पश्चिम दक्खिन सर्वत्र झांकियों में गुजरात लहलहाने लगा है।
वैसे गृहमंत्री के इस बयान से हिंदुत्व एजेंडा का कुछ लेना देना नहीं है और न ही इससे न संघ परिवार का एजेंडा साफ होता है और न हिंदू साम्राज्यवाद के ग्लोबल महाविध्वंस का। विदेशी पूंजी और विदेशी हित कारपोरेट केसरिया राज की सर्वोच्च प्राथमिकता है और शत प्रतिशत हिंदुत्व के राजकाज में राम मंदिर एक दिलफरेब शिगूफा के अलावा कुछ भी नहीं है।
बिना बहुमत जब दो तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन कानून तक पास कराकर नरमेध की वधसंस्कृति लहालहा रही है 1991 से, जबकि बाबरी विध्वंस हुए जमाना बीत रीत गया, हिंदुत्व के कारोबारी राम की सौगंध खाकर बच्चा बच्चा राम नाम के हवाले करने के बावजूद, सत्ता में होने के बावजूद वोट बैंक समीकरण साधने के लिए मुसलमानों को टोपी पहनाने की धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर निरंतर राम मंदिर राम मंदिर जयश्री राम जय श्रीराम जाप कर रहा है।
भव्य तो क्या, राम मंदिर के नाम पर कुछ नहीं करने वाला यह संघ परिवार क्योंकि राममंदिर दरअसल उसके एजेंडे में हैं ही नहीं। वैसे भी शतप्रतिशत हिंदुत्व के हिंदू राष्ट्र में हर धर्मस्थल राम मंदिर ही ठैरा।
दरअसल अधर्म जिनका धर्म है, आस्था जिनका कारोबार है, मनुस्मृति जिनका नस्ली रंगभेदी शासन है और मनुष्य और प्रकृति का महाविनाश जिनका परमार्थ है, उनका धर्म कर्म सब कुछ मनुष्यता के विरुद्ध युद्ध अपराध का बेइंतहा सिलसिला है जिससे कयामती मंजर भले बनते नजर आये, कहीं कोई राम का मंदिर बन ही नहीं सकता।
जैसे बंगाल के हिंदू और मुसलमान, शरणार्थी और आदिवासी धर्मोन्मादी धर्मनिरपेक्ष ध्रुवीकरण के झांसे में सच्चर रपट का यथार्थ भूले हैं और पीपीपी विकास की नूरा कुश्ती के बाद अब झूलनोत्सव में मगन है, बाकी देश भी उसी तरह रामराज्य है।
रफ़ाल युद्धक विमानों के सौदे के बारे में काफी कुछ छपा है। अब कहा जा रहा है कि भारतीय सेना के पास लड़ने के वास्ते हथियार नहीं है। परमाणु रिएक्टरों का जाल, अंतर्जाल के डिजिडल देश में बुलेट ट्रेन, भारत निर्माण, भारत माला के मध्य राष्ट्र का सैन्यीकरण तेज तेज तेज। यही है संघ परिवार का स्वराज रामराज्य।
हर बार बड़े रक्षा सौदों के वक्त यही कहा जाता है और सीमा पर युद्ध का माहौल बनाया जाता है। ग्लोबल हिंदुत्व की ब्रांडिंग में भारत के जिन नवअरबपति का सबसे बड़ा योगदान हैं, भारत के सारे समुद्रतट जिनके नाम कर दिये गये हैं और सरकारी बैंकों से जिन्हें अरबों का कर्ज निवेश के लिए मिल रहा है, रफ़ाल और दूसरे सौदों में उनकी सबसे बड़ी भूमिका है।
भारत माता स्मार्ट सिटी बनाने में ट्रिलियन डालर का स्कैम दरअसल राममंदिर एजेंडा है।
हो तो हो, हमारा आपका क्या बनता बिगड़ता है। इस देश की जनता की औकात उसके पांचसाला मताधिकार से बढ़कर कुछ नहीं है।
वोट निपट गया तो फिर वहीं कुत्ते की गत। चाहे खेतों खलिहान में खुदकशी करें, चाहे दुकान में फांसी लगा लें, चाहें घर में बिना इलाज मरें, चाहे बंद कल कारखानों या चायबागानों के साथ दम तोड़ दें या चाहे महानगरों के फुटपाथ पर कुत्तों की तरह सोते हुए किसी महानायक की कार के नीचे कुत्ते की मौत मरें।
हम बार बार लिख रहे हैं कि इस धरती पर सेबी से बड़ा कोई पोंजी नेटवर्क है नहीं। जिन्हें शेयरबाजार समझ में नहीं आता वे कायदे से आईपीएल का स्कोर देख लिया करें।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के पिटे हुए तमाम घोड़े कैसे रेसकोर्स पर सरपट दौड़ते हैं और हर चौके और हर छक्के और हर विकेट के साथ चियरिनों के साथ साथ सितारों के जलवा और विज्ञापनों के इंद्रधनुष सिडनी की आतिशबाजी में तब्दील है। इसके साथ दुनियाभर की सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग को जोड़ ले। कुल मिलाकर शेयर बाजार का किस्सा यहींच।
अब राजकाज यही है कि
अब बुनियादी जरुरत यही है कि
अब मसला यही है सिर्फ
अब भारत निर्माण के साथ साथ
रिजर्व बैंक को फिनिश करके सेबी के हवाले है अर्थव्यवस्था फिर भी विदेशी पूंजी और विदेशी हितों के लिए अनंत टैक्स होलीडे, विदेशी निवेशकों को पिछला टैक्स माफ करके भारतीय इंडिया इंक का बाजा बजाते हुए एकमुश्त खुदरा कारोबार, निर्माण विनिर्माण, ऊर्जा, संचार, कृषि, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, विमानन , खनन, बीमा, औषधि, रसायन, रेलवे, बंदरगाह, बैंकिंग सारे सेक्टर से देशी कंपनियों का सफाये, देशी उत्पादन प्रणाली के ध्वंस, विनिवेश, विनियंत्रण और विनियमन सुनामी के जरिये ग्लोबल हिंदुत्व के विस्तार के लिए जो हाई कस्ट इकोनामी का महाश्मशान बनाने के लिए सोने की चिड़िया प्राकृतिक संसाधनों का भूगोल विदेशी पूंजी के हवाले करने वास्ते इंडिया टीम बनायी जा रही है मेकिंग इन के तहत, वहीं शत प्रतिशत हिंदुत्व का वर्ण वर्चस्वी नस्ली हिंदू साम्राज्यवाद है जिसका प्रकृतिविरोधी, पर्यावरण विरोधी और मनुष्यविरोधी चेहरा नेपाल के महाभूकंप में बेपर्दा भी हो गया है।
अब भी लोगों को हिंदू साम्राज्यवाद समझ में नहीं आ रहा है तो बंगाल के मुसलमानों और बंगाल के हिंदुओं की तरह वे लोग बेहद मासूम हैं।
हम लोग लिख रहे थे कि माकपा के नये महासचिव की चुनौतियां क्या हैं। कामरेड महासचिव ने खुदै साफ कर दिया है कि उनकी इकलौती चुनौती बंगाल में कामरेडों को घुरे दाडा़नो का मौका बनाने का है, जो वे हर्गिज कांग्रेस के साथ नये सिरे से हानीमून का सिलसिला शुरु करके भी कर नहीं सकते।
संघ परिवार का वरदहस्त दीदी पर है और धर्मोन्मादी ध्रूनवीकरण पूरे महादेश में है। हिंदू साम्राज्यवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना इस महाभारत का मंजर नहीं बदलने वाला है।
जो बंगाल रवींद्र जयंती को नरेंद्र महोत्सव में बदलने की हद तक केसरिया है, वहां वामदल सिर्फ वोटबैंक समीकरण से खोये जनाधार वापस नहीं कर सकते। सारे समाीकरण पर अब घासफूल कमल एकाकार हैं।
अब भी लेकिन ट्रेड यूनियन आंदोलन पर लाला झंडे का वर्चस्व है और विडंवना है कि मेहनतकश तबके के हितों पर कुठाराघात करके न सिर्फ बाबासाहेब के बनाये कानून एक के बाद एक खत्म किये जा रहे हैं, तमाम श्रम कानून भी खतम। इस खतम अभियान का सिलसिला जारी है और श्रम सुधारों की अगली किस्थ अभी बाकी है और मजे की बात है कि उसके खिलाफ संघ परिवार का भारतीय मजदूर संघ युद्धं देहि हैं और कामरेडकुल में सन्नाटा है।
नवउदारवादी जनसंहारी सत्ता का प्राणपखेरु जो लाल दुर्ग में भली भांति सुरक्षित है, कामरेड महासचिव ने परमाणु समझौते मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी के फैसले को भूल मानकर कांग्रेस के सात प्रेम पिंगों की उम्मीद में इसीकी खुलासा कर दिया है। अब खंडन मंडन विखंडन का क्या।
खैर सर्वहारा, बहुजन या अस्मिताओं में बंटी आत्मघाती आम जनता का क्या। हजारों हजार साल से गुलामों की आबादी जैसे बढ़ती है, वैसे ही सत्ता हित के अनंत वधस्थल पर उनका सफाया का अश्वमेध अभियान थमा नहीं कभी।
वे तो निमित्तमात्र हैं और अपना अपना कर्मफल भुगतते हुए परलोक कृतार्थ करने की फिराक में जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं, लेकिन इस बाटमलैस अर्थव्यवस्था पर अरबों का दांव लगाये बैठे हजरतान का क्या होना है, जबकि हिंदू साम्राज्यवाद की वैदिकी सभ्यता विदेशी पूंजी और विदेशी हितों की बलिबेदी पर दाना पानी चारा डालकर उन्हें ओ3म स्वाहा करने लगी है।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के पिटे हुए तमाम घोड़े कैसे रेसकोर्स पर सरपट दौड़ते हैं और हर चौके और हर छक्के और हर विकेट के साथ चियरिनों के साथ साथ सितारों के जलवा और विज्ञापनों के इंद्रधनुष सिडनी की आतिशबाजी में तब्दील है। इसके साथ दुनियाभर की सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग को जोड़ ले। कुल मिलाकर शेयर बाजार का किस्सा यहींच।
हिंदू साम्राज्यवाद का सबसे नंगा बेशर्म चेहरा भारत का मीडिया है, जहां चितपावन, अयंगर, कान्यकूब्ज, नंबूदरी, मुखर्जी बनर्जी चटर्जी गांगुली चक्रवर्ती, मैथिली, सारस्वत शाश्वत वर्चस्व है और भारत की तमाम जातियों को गुलाम बनाने की रघुकुल रीति के तहत मनुस्मृति शासन उली भारतीय मीडिया की वैदिकी संस्कृति है, हां पैदल सेना के लोग कभी सिपाहसालार नहीं बनाये जाते। गोत्र परीक्षा के बाद ही पुरोहित नियुक्त होते हैं। इस मंदिर के अंतःस्थल में गैरब्राह्मण अछूतों का प्रवेश निषिद्ध है।
आज भी मेरे मेल बाक्स में दुनियाभर से विभिन्न भाषाओं के फीडबैक जमा हैं। कल रात माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के परमाणु समझौते पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी की खबर देते हुए अमलेंदु से बातें हुईं। नीलाभ का चट्टानी संगीत वाले आलेख की अगली कड़ी हस्तक्षेप पर पिछले रविवार को लग नहीं सकी थी, इसबार लगाने की याद दिलाने पर अमलेंदु ने कहा कि फीडबैक दसों दिशाओं से आ रहा है और रीडरशिप तेजी से बढ़ रही है। मदद करने को कोई अभी खड़ा नहीं हो रहा है। हमने कहा कि सब्र करो। दसों दिशाओं से मदद भी आने वाली है अगर तब तक हम जिंदा रहें।
शायद हमारे मित्रों को हमारी मौत का ही बेसब्री से इंतजार हो और हमारे मरने से पहले वे हमारे साथ खड़े नहीं हो सकते शायद।
बहरहाल मौत में अभी शायद कुछ वक्त बचा है और अभी हमारे रिटायर करने में कुल 372 दिन बाकी हैं और हम इस दौरान आनलाइन रहेंगे। सड़क पर आने से पहले तक।
हम कोई उन लोगों में शामिल नहीं हैं जो खास तौर पर बाजार में सांढ़ और घोड़े दौड़ाकर वसूली करते रहने के बाद अखबार का प्रसार साठ हजार से तीन सौ तक पहुंचा देने के बाद रिटायर होने के बाद छप्पन इंच की छाती में तब्दील होकर जनप्रतिबद्ध पत्रकारिता का दावा करें या हम उनमें भी नहीं हैं जो सलमान खान को सबसे बड़ा समकालीन मुद्दा मानते हैं।
दुनियाभर के अखबारों का प्रिंट प्रसार घट रहा है। अमेरिका से लेकर जापान और अब भारत में भी अखबारों का राजस्व आनलाइन है और प्रिंटेड सर्कुलेशन आंकड़ा भर है।
इसी वास्ते मैनफोर्स और जापानी तेल और राकेटकैप्सूल की बहारें हैं। आइकन हैं।
इस धोखाधड़ी का किस्सा भी हम बतायेंगे कि कैसे जिंदा अखबारों का कत्ल जानबूझकर किया जाता है और महज फाइल कापी छापकर देश भर के केंद्रों के फर्जीवाड़ा को करोड़ों के सर्कुलेशन में बदला जाता है।
बहरहाल कारपोरेट मीडिया के कारोबार का जनता से कोई मतलब है ही नहीं तो उसका रोना लेकर बैठना क्या।
हस्तक्षेप का सर्कुलेशन कुछ हो नहीं सकता क्योंकि यह आनलाइन है। लेकिन तेजी से रीडरशिप बढ़ रही है और नेटवर्क का भी विस्तार हो रहा है। अभी सर्वर तुरंत बदलने की जरूरत है और अपलोडिंग के लिए कम से कम पांच लोग चाहिए।
हमारे पास लोग तैयार हैं लेकिन न बैठने की जगह है, न कंप्यूटर है और न सर्वर के पैसे। हाल तो यह है कि स्टीवेंस से अब राजनीतिक मंतव्य या स्थानीय खबरे लिखने के लिए हमें मना करना पड़ा है क्योंकि सत्ता समर्थक तत्वों ने इस बीच उस पर कई दफा हमले किये हैं। हिंदी के बजाय उसे अब आर्थिक मुद्दों पर अंग्रेजी में लिखने को कहा है।
हस्तक्षेप पर लिखे का असर यह होने लगा है कि प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं। अब सोशल मीडिया पर हमारे लिखे पर सवाल दागे जा रहे हैं, यह हिंदू साम्राज्यवाद क्या बला है?
हमारा लिखा जिनकी समझ में नहींं आता वे कृपया अपनी शिथिल इंद्रियों को मैन फोर्स से तनिक राहत दें, जापानी तेल से थोड़ा परहेज करें, शापिंग से थोड़ा वक्त निकालें और गौर से अपने आस पास सामाजिक यथार्थ की गगन घटा गहरानी का जायजा ले और खबरों के दूसरे रुख को नजरअंदाज न करें।
पलाश विश्वास

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