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बलि के लिए जिम्मेवार : हिन्दू धर्म– शास्त्र !

इक्कीसवीं सदी में बच्चों की बलि | Twenty-first century children’s sacrifice

इक्कीसवीं सदी में एक ओर जहां ‘शाइनिंग इंडिया’ के बाद ‘मेक इन इंडिया’ के नारों के साथ हम विश्वविजयी मुद्रा में दुनिया भर में कुलांचे मारते अपनी गाथा का गान करते घूम रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर हमारे देश भारत में अभी भी बच्चों की बलि की घटनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं। मोदी मन्त्र का लोहा मानती दुनिया की ख़बरों पर लहालोट होते हम अपनी दुनिया के अँधेरे में तंत्र-मन्त्र का शिकार होते मासूमों की ली जाती जान को कभी भी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में नहीं ला पाते, ना शिशुबलियों को प्रेरित करने वाले तांत्रिक के गर्हित कर्म को अवैध घोषित करने की मांग कर पाते हैं।

आखिर यह कैसा विकास है जिसकी चौंधियाती रोशनी में अपने ही बाल-गोपालों की चीखों को अनसुना करते हुए जीते चले जाने को मजबूर हैं।

कासगंज जिले के सिढ़पुरा थाना क्षेत्र के गांव चांदपुर में विगत शनिवार की सुबह दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जब एक पिता ने अपने ही तीन महीने के मासूम बेटे को बलि देकर खून से सने हाथों से शंकर की मूर्तियों का तिलक किया।

आखिर यह कौन सा नशा है जो विनीत को सत्य और सुन्दर के देवता शिव को बलि चढ़ाने को अँधा कर रहा था।

सवाल उठता है कि इसे गर्हित नशे के मरीजों की पहुँच हमारे पवित्रता के केंद्र माने जाने मंदिरों तक कैसे हो जाती है और इसे रोकने के उपाय कौन करेगा? अन्धविश्वास की छुरी आखिर कब तक इंसानियत को काटती रहेगी? अगर इसे रोकने का प्रयास नहीं की गयी तो संतुलित विकास की कोई मिसाल आखिर हम कैसे दे पाएंगे?”

पाठकों इस लेख की उपरोक्त पंक्तियाँ मेरी नहीं,  17 नवम्बर, 2014 को छपे किसी अखबार की सम्पादकीय का अंश हैं। बहरहाल अखबार अगर यह कह रहा है कि बच्चों की बलि की घटनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं, तो इस पर हमें जरा भी अविश्वास नहीं करना चाहिए। सचमुच ऐसा ही होता है तभी तो विभिन्न प्रान्तों से रह-रह कर इस किस्म की घटनाओं की खबरें अख़बारों में छपती रहती हैं। इसी साल मार्च में रायपुर में दो साल बच्चे की बलि देने के आरोप में भिलाई के एक तांत्रिक, उसकी पत्नी और उसके पांच शिष्यों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। अभी पिछले महीने ही उप्र के सुल्तानपुर में संतान की लालच में बच्चे की बलि देने वाले तांत्रिक व पिता-पुत्र को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसी तरह महाराष्ट्र के मराठावाड़ क्षेत्र के जिला हिंगोली में चार साल पहले दो महीने में पांच नरबलि दिए जाने का मामला सामने आया। छठे बच्चे की बलि देने से पहले हत्यारे पकड़ लिए गए थे। तांत्रिक ने बच्चे की चाहत रखने वाले उस हत्यारे दंपति को 11 बच्चों की बलि का सलाह दिया था।

बहरहाल देश में जब-जब मानवता को शर्मसार करने वाली बलि की घटनायें जनसमक्ष आती हैं,   बुद्धिजीवी इसके लिए अन्धविश्वास की भर्त्सना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, किन्तु इस अन्धविश्वास के पृष्ठ में हिन्दू धर्म शास्त्रों की क्रियाशीलता को उजागर नहीं करते। जबकि सच्चाई यही है कि भूरि-भूरि पशुबलि ही नहीं मानव-बलि के लिए भी सीधे तौर पर जिम्मेवार हिन्दू धर्म शास्त्र ही हैं।

बलि तो एक तरह से वैदिक धर्म की मूल आत्मा है।

व्यक्तिगत व सामूहिक कल्याण के लिए बलि की वैधता हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा स्वीकार्य है। वेद, पुराण और स्मृतियों में बलि को इस तरह महिमामंडित किया गया है कि भौतिक सुखों के कामी किसी हिन्दू के लिए बलि से विरत रहना भारी कठिन कार्य है। इस मामले में ‘काली पुराण’ के ‘रुधिर अध्याय’ का कोई जवाब ही नहीं है।

पशु व नरबलि पर डॉ. आंबेडकर के विचार | Dr. Ambedkar’s thoughts on animal and human sacrifice

डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय खण्ड-8 के पृष्ठ-126 पर पशु व नरबलि के लिए प्रलुब्ध करने में काली पुराण के रुधिर अध्याय की भूमिका पर डॉ. आंबेडकर ने विस्तृत आलोकपात किया है। वह लिखते हैं-

‘मैं रुधिर अध्याय का सारांश देता हूं। इस अध्याय में शिव ने बेताल, भैरव और भैरो को निम्न प्रकार से संबोधित किया है :-‘मेरे पुत्रों! देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए सम्पादित होने वाले संस्कार और नियमों के विषय में मैं तुम्हे बताता हूँ। वैष्णवी तंत्र में जो प्रावधान किया गया है, उनका सभी अवसरों पर सभी देवताओं को बलि चढ़ाकर पालन किया जाय। पक्षी, कच्छप, घड़ियाल, मीन, वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियाँ, भैंसा, बृषभ, बकरा, नेवला, जंगली-सुअर, दरियाई घोड़ा, मृग, बारहसिंगा, सिंह-बाघ, मनुष्य और बलिदाता का स्वयं का रक्त चण्डिका देवी और भैरो की पूजा के उचित पदार्थ हैं। बलि चढ़ाने से ही राजाओं को सुख, स्वर्ग और शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। देवी मछली और कच्छप के चढ़ाने से एक माह की अवधि के लिए खुश रहती है और मगरमच्छ से तीन मास तक, वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियों से देवी नौ महीने प्रसन्न रहती है और इस अवधि में वह भक्त का कल्याण करती है। गौर, नीलगाय के रक्त से एक वर्ष और मृग तथा जंगली सुअर से बारह वर्ष तक संतुष्ट रहती है। सरभ का रक्त देवी को पच्चीस वर्ष तक संतुष्ट रखता है, सिंह, बारहसिंगा और मानव जाति का रक्त एक हजार तक प्रसन्न रखता है। इनके मांस से भी उतनी ही अवधि तक संतुष्टि होती है जितने दिन इनके रक्त से।

….. निम्नांकित विधि से दी गयी मानव-बलि बलि से देवी एक हजार वर्ष तक प्रसन्न रहती है और तीन मनुष्यों की बलि से एक लाख वर्ष तक। मेरे रूपधारी कामाख्या, चण्डिका, और भैरव मनुष्य के मांस से एक हजार वर्ष के लिए संतुष्ट हो जाते हैं। रक्त का अर्घ्य पवित्र अमृत बन जाता है, कामख्या को शीश अर्पित किया जाय तो वह अति प्रसन्न होती है। जब ज्ञानी देवी को चढ़ावा चढ़ाएं तो रक्त और शीश अर्पित करें और जब अग्नि को आहुति दें तो मांस डालें। ’

उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में जब यह बात सुस्पष्ट है कि बलि के लिए मुख्य जिम्मेवार तत्व हिन्दू धर्मशास्त्र ही हैं, जो बलि से मिलने वाले दैविक-कृपालाभ का ऐसा प्रलुब्धकारी चित्र खींचे हैं, जो किसी भी कमजोर संकल्प वाले व्यक्ति को ऐसे अमानवीय कार्य अंजाम देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। सिर्फ पशु और नर-बलि ही नहीं अगर इस देश में एक विपुल संख्यक आबादी अस्पृश्य रूप में सदियों से मुख्यधारा के समाज से बहिष्कृत रही है तो उसके लिए जिम्मेवार हिन्दू धर्म-शास्त्र ही हैं।

अगर आधी आबादी शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह वंचित होका अबला बनने के साथ-साथ सती और विधवा जैसी अमानवीय प्रथाओं का शिकार बनी तो उसके लिए जिम्मेवार हैं सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म-शास्त्र। अगर देश विश्व में दीर्घतम काल तक पराधीनता का दंश झेलने के लिए अभिशप्त हुआ तो उसके लिए जिम्मेवार हैं, वही हिन्दू धर्म-शास्त्र। अगर हिन्दू समाज सहस्रों भागों में विभक्त व भ्रातृत्व का पूरी तरह कंगाल है तो उसके लिए जिम्मेवार हिन्दू धर्म-शास्त्र ही हैं। अगर आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी, जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, का भीषणतम रूप में व्याप्ति भारत में है, तो इसके लिए जिम्मेवार हिन्दू धर्म-शास्त्र ही हैं।

ऐसे में बलि ही नहीं तमाम तरह की अमानवीयता से अगर देश को मुक्त करना है तो उसके लिए लिए आधुनिक कानूनों को सख्ती से लागू करने के साथ प्रमुखता से हिन्दू धर्म-शास्त्रों के प्रति लोगों को पूरी तरह अनास्थाशील बनाने का उद्योग लेना पड़ेगा, क्योंकि धर्म शास्त्रों के प्रति गहरी आस्था ने हिन्दुओं को काफी हद तक बर्बर बना दिया है।

डॉ. आंबेडकर ने धर्मशास्त्रों को डायनामाइट से उड़ाने का आह्वान किया | Dr. Ambedkar called upon the theology to blow dynamite.

इसीलिए डॉ. आंबेडकर को समाज विज्ञान की दुनिया में मील का पत्थर बनी अपनी रचना-जाति का उच्छेद – में जाति के विनाश के प्रसंग में यह कहना पड़ा-‘ऐसा नहीं कि हिन्दू क्रूर मनुष्य प्राणी हैं या उनमें कोई मानसिक विकृति है। वे जातिभेद के पाबंद इसलिए हैं क्योंकि धर्म-शास्त्र उन्हें वैसा करने के लिए प्रेरित करते हैं।’

चूंकि हिन्दुओं को बिगाड़ने में सारा दोष धर्म शास्त्रों का है इसलिए डॉ. आंबेडकर ने धर्मशास्त्रों को डायनामाईट से उड़ाने व उनके प्रति लोगों को अनास्थाशील बनाने का खुला आह्वान किया था?

पर कौन धर्मशास्त्रों को डायनामाईट से उड़ाने व उनके प्रति लोगों को अनास्थाशील बनने का उद्योग लेगा?जो लोग धर्मशास्त्रों के कारण मनुष्येतर व अशक्त मनुष्य- प्राणी में तब्दील हुए, वे दलित-पिछड़े व महिलाएं आज भी दैविक कृपा-लाभ की चक्कर में धर्म शास्त्रों से बुरी तरह चिपके हुए हैं। दूसरी तरफ धर्मशास्त्रों के सौजन्य से जो अल्पजन तबका विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न जीवन के भोग का अवसर पाया है, उसे धर्म-शास्त्रों के महिमागान से फुर्सत नहीं है। अब थोड़े जो विवेकवान लोग हैं वे धर्मशास्त्रों को डायनामाईट से उड़ाने में इसलिए असमर्थ हैं क्योंकि लागों की धार्मिक भावनाओं का आदर करने के नाम पर कोर्ट उनकी राह एवरेस्ट बनकर खड़ा हो जाता है।

आज लोगों को धर्मशास्त्रों से विमुख करने का मामला पहले की तुलना कई और गुना कठिन इसलिए हो गया है क्योंकि वर्तमान में जो सरकार प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज है, वह हिंदुत्व की परम उत्तोलक है। उसके राजत्व में हिन्दू धर्म-शास्त्रों के खिलाफ कोई भी अभियान चलाना, एक दुष्कर काम है।

अब चूंकि वर्तमान अनुकूल परिवेश में धर्मशास्त्रों के विरुद्ध अभियान चलाना दुष्कर है, इसलिए यह मानकर चलना ही ठीक रहेगा कि आने वाले दिनों में हिन्दू धर्म शास्त्र-जनित समस्यायों में इजाफा ही होगा, जिनमें एक समस्या मानव-बलि भी है।

O- एच. एल. दुसाध

About the author

एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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