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बहुजनों का आत्मघाती जातिवाद ही मनुस्मृति शासन को बहाल रखे है

अरुंधति राय ने जो असल एजेंडा ब्राह्मणवाद का बताया है, उसका आशय ब्राह्मणों को गाली नहीं है
आज का वीडियो टाक मैं अपनी पुरानी भूमंडलीकरण कविताओं के पाठ से शुरू कर रहा हूं और कोशिश रहेगी कि अरुंधति राय ने जो असल एजेंडा ब्राह्मणवाद का बताया है, उसका आशय ब्राह्मणों को गाली नहीं है, हम यह जरूर साफ करें। अव्वल तो अरुंधती खुदै ब्राह्मण हैं और जाति उन्मूलन का नया पाठ जारी करते हुए उनकी प्रस्तावना बहुजनों को इसीलिए नागवर गुजरी है। सम्राट चंद्रगुप्त के गुरू ब्राह्मण हैं। हमारे गुरुजी भी ब्राह्मण हैं।
हम बंगाल में चंडाल आंदोलन के वंशज हैं और अछूत हैं, इसीलिए शरणार्थी तो हैं ही, सीनियर मोस्ट, रेटिंग में टाप पर होने के बावजूद सबएडीटर रियार कर रहे हैं। हम लोग जो हमारा सत्यानाश कर रहे हैं, उनका विरोध करने में कोताही नहीं करते, लेकिन ब्राह्मणों को गरियाकर जाति व्यवस्था को वैधता और मजबूती देने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
आप अमलेंदु को कोई मदद नहीं करते और यह भी नहीं समझते कि हम किन मुद्दों को संबोधित कर रहे हैं। हस्तक्षेप की सलीब पर रोज मैं टंगा होता हूं और मेरी जिस्म पर जख्मों के सैलाब, मेरे बहते खून की आपको परवाह नहीं है।
हस्तक्षेप की मदद मेरी मदद है, समझ लें। इसी तरह अरुंधती को नहीं पढ़ेंगे या उनकी नहीं सुनेंगे, तो मुक्त बाजार का यह फंडा, कत्लेआम का नजारा समझ न पायेंगे। हम भले ही वीडियो टाक में आगे पीछे अरुंधति का कहा लिखा शामिल कर लें, जब तक न आप उन्हें बहुजनों के हित में न समझें, देखेंगे नहीं।
यह भी जातिवाद है। बहुजनों का यह आत्मघाती जातिवाद ही मनुस्मृति शासन को बहाल रखे हुए हैं। थोड़ा विज्ञान, थोड़ा इतिहास की समझ से चीजों को देखने की तहजीब सीख लें तो चीजें बहुत साफ हो जायेंगी और समझ में आ जाई कि दरअसल कौन दोस्त बा, कौनो दुश्मनो ह। बाकी सब कुछ ठीक ठीक मुक्त बाजार।
उन्होंने मैसी साहेब में अभिनेत्री बतौर कैरियर शुरू कर किया था लेकिन उनका चेहरा कोई विश्व विजेता नहीं है और अंबेडकर की जुबान बोलकर बदलाव के ख्वाबों को वे जो जल जंगल जमीन से जोड़ने लगी हैं, इसलिए वे न आइकन है और न स्टार।
अरुंधती राय दरअसल मुक्तबाजार के सौंदर्यबोध और व्याकरण तबाह कर रही हैं। सो, वह हमें इतनी प्रिय भी हैं।
कल ही हमने इस पर हस्तक्षेप पर त्वरित टिप्पणी की है जो शायद काफी नहीं है। फिर यह खुलासा।
हमारी अरुंधति के कहे का आशय कुलो इतना है कि यह जो जातिवाद है, वहीच ब्राह्मणवाद का तोता है।
मनुस्मृति शासन की जान का का कहे, वहींच मनुस्मृति है।

जाति खत्म कर दो, मनुस्मृति खत्म।
फिर आपेआप बौद्धमय भारत।
सनातन एकच रक्त अखंड भारत वर्ष और सनातन उसका धर्म हिंदूधर्म। पहिले मुक्ताबाजार का यह वियाग्रा छोड़िके बलात्कार सुनामी को थाम तो लें।
रचनाकर्म के लिए फूल मस्ती मोड जरुरी है ताकि दिलो दिमाग के सारे ऐप्पस खुद ब खुद खुलता चला जाये। रचनाकर्म से मजा न आये जिंदगी का, तो वह रचनाकर्म दो कौड़ी का नहीं है।
चार्ली चैपलिन हंसोड़ न होता तो न दार्शनिक होता और कलाकार।
रचनाकर्म में डिकेंस और लैंब की तरह पैथोस और ह्यूमर दोनों न हो, या फिर मंटो जैसा तीखापन और परसाई जैसा डंक न हो तो लिखना भी क्या और पढ़ना भी क्या।
पाठक, श्रोता की जुबान कुछ भी हो, भाषा की दीवारें लांघकर उसके दिलोदिमाग तक पहुंचने की कुव्वत न हो तो पिछवाड़ा दागकर महान जितनो बनो आप, हमारे हिसाब से आपकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं।
दिलो दिमाग के सारे तार झनझना देना ही रचनाकर्म है और वहां वर्चस्व सिर्फ मुहब्बत का है।
घृणा निषिद्ध है।
फिर वहींच सत्यं शिवम् सुदरम्!
सत्यमेव जयते!
तमसोमाज्योतिर्गमय!
आज सुबोसुबो सविता बाबू यादों में फिर नई नवेली धनबाद के कोयलांचल चली गयी और हुक्म हुओ कि जलेबी सिंघाड़ा ले आओ और फिर होगा धनबाद का नाश्ता।
इस नेकी के लिए गर से निकला तो आठवीं की परीक्षा से फारिग एक दोस्त मिला जो दांतों में ब्रश फंसाये सड़क पर आदमरफ्त का जायका ले रहा था और हमउ टाइम मशीन में धड़ाक से अपने बचपन में।
हमारी भी आदत यही रही है कि सुबह का जायका खूब लिया जाये और उसी रोशनी, उसी ऊर्जा में बाकी दिन खपाया जाये। हाजतरफा के लिए सीधे नदीकिनारे। खेत से गन्ना उखाड़े दतौन। मटर की फलियां या खेत मा जो भी उगै हो, बिना मुंह हाध गोड़ वगैरह धोये उसीसे नाश्ता आउर फेर सगरे गांव में टहल के सबकुछ ठीकै बा।
इस हक की खातिर हमने बचपन में न जाने कितने गृहयुद्ध, चक्रव्यूह, युद्ध महायुद्ध फतह किये हैं रोशनी की खातिर।
मैंने पूछा कि अभी अभी उठे हो किया।
उनने जबाव में कहा, परीक्षा हो गयी है। नींदभर सोना है।
दुनिया भर के बच्चे मेरे दोस्त हैं क्योंकि वे दुश्मनी की तकनीक जानते ही नहीं हैं।
समझ लो कि दिलोदिमाग के सारे तार उन्हीं की मुट्ठी में।
सारे समुंदर उन्हींकी मुट्ठी में।
मुट्ठी में फलक।
हिमालय के उत्तुंग शिखर, नदियां, घाटियां, झरने यूं कि सारा कायनात।
फिर मेरे उस दोस्त ने कहा, मामा के घर जाना है।
कहां?
नैहाटी में।
नैहाटी में कहां?
पूरब तरफ।
पूरब तरफ कहां? बंकिम के घर के पास? कांठाल पाड़ा में?
कांठाल पाड़ा के उत्तर में। काठपुल के पार। जेखाने 29 हाथ कालीपूजा हय। सेखाने। उनने साहेब पाड़ा का भूगोल बताया।
फिर उनने बिना पूछे, औचक कह दिया, सैर सपाटे के लिए नहीं। साहेब पाड़ा में एक ठोंगे की दुकान है उसके वहीं इसी साल की पुरानी किताबें हैं नौवीं दसवीं की। वे खरीदनी हैं।
फिर क्या? नैहाटी का कांठाल पाड़ा और साहेबपाड़ा का पूरा भूगोल बसंतीपुर में तब्दील। जहां मैं परीक्षा में बैठने से पहले नई कक्षा की किताबें दबाकर पूरी पढ़ लिया करता था।
दूसरी में पढ़ता तो चौथी पांचवीं की किताबें मेरे खजाने में होतीं। पिताजी और चाचाजी के खजाने की चाबी भी मेरी मुट्ठी में।
मैंने अपना गरीब बचपन कोलकाता महानगर के हिस्से के बचपन के साथ शेयर किया और उनसे कहा कि कैसे दसवीं पास होने के बाद ही फूल पैंट पिन्हे। कैसे दसवीं पास होने के बाद ही जूते और घढ़ी के दर्शन हुए।
मैंने अपना गरीब बचपन कोलकाता महानगर के हिस्से के बचपन के साथ शेयर किया कि कैसे हम नदियां पार करके कीचड़ में लथपथ स्कूल पहुंचते थे और हमारे गांव के लोग कैसे अपढ़ थे कि हमें अपने बैलों भैंसो के साथ अंग्रेजी का अभ्यास करना होता था।
मैगी पित्जा बूस्टर से सजे इस बचपन को फटेहाल कंगाल उस बचपन के किस्से में मजा आया।
तो उनने कहा कि गाइड मैं नहीं पढ़ता। पहले टेक्स्ट पढ़ता हूं और फिर क्वेश्चन बैंक से सवालों के जवाब तलाशता हूं।
हमारे जमाने में भी कुंजी और गाइड होते थे और जिनके भरोसे हम कभी नहीं होते थे।
हमारी तकनीक बहुत सीधी थी, नौवीं दसवीं की परीक्षा इंटर की किताबों के ब्यौरेवार टेक्स्ट आत्मसात करके दो तो किला फतह! फिर ट्यूटर, टीचर का क्या काम?जो हमारे थे ही नहीं।
फिर मेरे दोस्त ने बिना पूछे कहा कि टेक्स्ट दो बार पढ़ लेता हूं। फिर बंद करके सवालों के जवाब खोजते हुए लिखता हूं। लिखकर फिर देखता हूं कि गलती कहां हो गयी। गलती सुधारते न सुधारते किताबें नदी होकर बहने लगती हैं दिलोदिमाग में।
जैसे मैं खुद ही अपना साक्षात्कार कर रहा था!
किस्से हमेशा मजेदार होते हैं और अतीत बेहद सुहावना होता है। लेकिन अतीत को ही जीना बेहद खतरनाक होता है।
हम देख रहे हैं कि हम अतीतोन्मुखी देश में तब्दील हैं।
वह छोटा सा बच्चा परंपरा अर्जित करने की कवायद में है और अतीत से उसे कोई मोह नहीं है।
अतीत के मोह में वर्तमान बहुत तेजी से अतीत में तब्दील होता जा रहा है और भविष्य अंधकार में।
पुनरूत्थान के संदर्भ और प्रसंग ये ही हैं।
हमने नोबेल विजेता टीएस इलियट के इनडिविजुअल एंड ट्रेडिशन की मर्डर इन द कैथेड्रल और इसी के समांतर प्रार्थना सभा में गांधी की हत्या के संदर्भ और प्रसंग में अपने वीडियो टाक में सिलसिलेवार चर्चा की है।
जिनने वीडियो देख ली, उन्होंने गौर किया होगा कि नाथूराम गोडसे की हत्या की दलील की क्लीपिंग और गांधी हत्या के दृश्यों के मध्य बैकग्राउंड में मर्डर इन द कैथेड्रल का मंचन है।
गौर करें कि आर्कविशप की हत्या से पहले उसे देश छोड़ने का फतवा है और उसकी हत्या के औचित्य की उद्घोषणा है। यह दृश्य अब इंडिया लाइव का अतीत में गोता, ब्लैक होल गर्भ में महाप्रस्थान।
परंपरा उत्तराधिकार नहीं है। मेधा विमर्श में जाति वर्ण आधिपात्य के कुतर्क का यह एक वैज्ञानिक जवाब है कि परंपरा रेडीमेड नहीं होती और न परंपरा वैदिकी या मिथकीय है। इसी तरह इतिहास के भी संदर्भ और प्रसंग बदलते रहते हैं।
कालातीत होने के बाद मारे जाने वाली हर शख्सियत परंपरा में तब्दील हो जाती है और उसी परंपरा में निष्णात होकर ही परंपरा अर्जित की जाती है। परंपारा न उत्तराधिकार है और न वंश विरासत या वंश वर्चस्व और न अतीत का अनुचित महिमामंडन है परंपरा।
दुनिया रोज बनती बदलती है और इतिहास के संदर्भ और प्रसंग उसीतरह बदलते हैं जैसे हमारी मुट्ठी से वर्मान फिसलकर अतीत के ब्लैकहोल में समा जाता है और इंद्रधनुषी उस अतीत के पुनरूत्थान की कोई भी कोशिश हमें सीधे ब्लैकहोल में फेंक देती है।
जिंदगी तकनीक है और सच पूछिये कि तकनीक उतनी बुरी भी नहीं है। तकनीक तो आपकी इंद्रियों की तरह हैं। यह आपके विवेक पर निर्भर है कि आप अपनी इंद्रियों का इस्तेमाल कैसे और क्यों करते हैं। अब बिना तकनीक हम एक कदम चल नहीं सकते जैसे विज्ञान का विरोध विकास का पर्याय नहीं है और न विप्लव का।
चूंकि विप्लव अंतरात्मा की आवाज है तो वैज्ञानिक दर्शन के साथ ही सामाजिक यथार्थ का महाविस्फोट भी है।
कल मुझे खूब हंसने को जी हुआ। साहिबे किताब बनने की न मेरी औकात है और न मेरी मंजिल। जब तक मुझे छापा जाता रहा है, मुझे भी खुशफहमी रही है कि मेरी किताबें भी निकल सकती हैं।
छपना बंद हो गया अमेरिका से सावधान अधूरा छोड़ते न छोड़ते। उसे पूरा इसलिए नहीं किया और न करने का इरादा है क्योंकि हम सावधान किसे करें, क्यों करें, क्योंकि देश नई ग्लोबल स्थाई बंदोबस्त के तहत वही अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील हैं और गुलाम आपकी हर्गिज नहीं सुनेंगे।
मंकी बातें वे भक्तिभाव से सुनते देखते हैं, हमारी काम की बातें उन्हें पसंद हैं नहीं। अंध भक्तिबाव आत्मध्वंस का सबसे अच्छा तरीका।
कल हंसी इसी बात पर आयी अपने साहित्यकारों की हत्या पर खामोश साहित्य अकादमी ने रवींद्र समग्र प्रकाशित किया है जो बांग्ला में सत्ता वर्ग की ओर से जमींदारियों रियासतों के वंश वर्चस्व के औचित्य के मुताबिक रंवींद्र विमर्श है।
करीब दस साल पहले हमने अपने महा आदरणीय कामरेड कवि से आखिरी बार पूछा था कि चूंकि हम दिल्ली प्रेस क्लब में आराम से पांडुलिपि पर चर्चा कर लेने की फुरसत और तहजीब में नहीं है तो कृपया बतायें रवींद्र के दलित विमर्श का हुआ क्या आखिर।
उन्हीं के तगादे पर लिखी थी वह किताब, जो मैंने उन्हीं के हवाले कर दी थी। तब उनने कहा था कि पांडुलिपि के संपादन उन्होंने एक रवींद्र विशेषज्ञ के हवाले किया है। जल्दी ही किताब छप जायेगी और प्रकाशक चेक भेज देंगे।
न चेक आया, न किताब छपी और न वह पांडुलिपि लौटी।
हैरत की बात मेरे लिए यह है कि जिन बिंदुओं पर मेरा रवींद्र का दलित विमर्श है, अकादमी कि किताब में उन्हें छुआ तक नहीं गया है। इन्ही रवींद्र विशेषज्ञ को पांडुलिपि जांचने को दिया गया था और रवींद्र समग्र के संदर्भ में कहना होगा कि इसमें नया जैसा कुछ भी नहीं है वैसे भी शायद चोरी का भी कुछ नहीं है।
शुक्र है, संकलन मौलिक है। जो माल समाज और समय के लिए खतरनाक हो, उसे उठा लेना और भी खतरनाक है।
वे उठा लेते तो हमें बेहद खुशी होती। हमें मुद्दों से मतलब है और नाम जितना है, उसीसे कम गालियां नहीं पड़ती हैं। आगे नाम और हुआ तो क्या पता, आखेरे अंजाम क्या हो।
जो मेरा लिखा छापते नहीं, बल्कि दबाते हैं वे इस मायने में हमारे शुभाकांक्षी हैं कि वे मुझे बेमतलब के खतरों से बचा रहे हैं।
बहरहाल साहित्य अकादमी के इस रवींद्र समग्र और रवींद्र विशेषज्ञता पर मैं निहाल हूं और फुरसत मिले तो गपशप के लिए कामरेड कवि के साथ दिल्ली प्रेस क्लब में शाम को बैठ भी सकता हूं। 18 मई के बाद मेरे लिए फुरसत ही फुरसत है।
वैसे मैं उनका आभारी भी हूं कि पांडुलिपि के जो अंश मेरे पास उपलब्ध हैं, उन्हें पढ़कर मुझे कुछ ठीक भी नहीं लग रहा है। यह मामला इतने सस्ते में निपटाने का सौदा था ही नहीं।
जाहिर है कि करीब बारह तेरह साल की अवधि में मैं रुका भी नहीं हूं और परंपरा में मेरी डुबकी का सिलसिला थमा भी नहीं है।

मुद्दा यह है कि रवींद्र विमर्श बेहद अनिवार्य है क्योंकि वह धर्मोन्मादी अतीतमुखी भारत के बचाव का एटम बम भी है।
उसका इस्तेमाल हड़बड़ी में तो होना ही नहीं चाहिए।
थैंक्यू, कामरेड कवि, आपने मुझे हड़बड़ी में एटम बम दागने से बचा लिया। यकीन भी कर लीजिये कि अब मेरी कोई किताब छपेगी नहीं और न हमें इसका कोई अफसोस भी होगा।
दरअसल हम तो किस्सागो हैं। किस्सा बांच दिया, बस। किस्सा कहां पहुंचा, नहीं पहुंचा, इसका कोई सरोकार मुझसे नहीं है।
किस्सागोई बहुत बुरी आदत है। देखिये न मैं कैसे कपास ओटने लग जाता हूं। मुझे बातें बेहद जरुरी करनी थीं लेकिन लग गया किस्सा बांचने। गंभीर बातें करने का मौका भी नहीं है

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