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बहुत कठिन है डगर “आप” की

उद्योग जगत में कॉन्ट्रैक्ट नौकरी का चलन जड़ तक पहुंच चुका है। ऐसे में उसे खत्म करने का आप का वादा केवल वादा ही रह जाएगा क्योंकि इस मामले में उसे कॉर्पोरेट मीडिया को भी आड़े-हाथों लेना पड़ेगा। अभी तक केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कॉर्पोरेट मीडिया में चल रहे श्रम कानूनों के उल्लंघन और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट नहीं की है…
शिव दास प्रजापति
भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के दिलों में देशव्यापी अलख जगाकर जन लोकपाल कानून की मांग करने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे के पूर्व सहयोगी और आम आदमी पार्टी (आप) प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों दिल्ली की कमान मुख्यमंत्री के तौर पर संभाल ली। दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शपथ-ग्रहण के कार्यक्रम के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के सदस्यों की चुनौतियां अब और भी बढ़ गई हैं। अगले कुछ महीनों में लोकसभा चुनाव होने हैं और इसमें आप ने भी सभी 543 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी है। दिल्ली की सत्ता में ‘आप’ के आने और आसन्न लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उसकी चुनौतियों और रणनीति की परीक्षा अन्य राजनीतिक पार्टियों की अपेक्षा ज्यादा कठिन है। व्यवस्था परिवर्तन की उसकी घोषणा और उसके अनुपालन पर लोगों की निगाहें टिकी हैं।
केंद्र की सत्ता में काबिज कांग्रेस के आठ विधायक पार्टी आलाकमान के आदेश पर बाहर से समर्थन दे रहे हैं लेकिन सत्तर सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के चुनावों में 28 सीट जीतकर वहां दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी ‘आप’ की सरकार के थोपे गए निर्णय वे कब तक सहेंगे, इसकी गारंटी नहीं है। पार्टी आलाकमान के फैसले के खिलाफ वे अपना रुख भी प्रकट कर चुके हैं और ‘आप’ की सरकार से समर्थन वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। इनके अलावा आप की सरकार को जनता दल (युनाइटेड) के एक विधायक समेत एक निर्दलीय विधायक का समर्थन भी है। इसलिए दिल्ली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत (36) के आंकड़े अपनी शर्तों पर ‘आप’ पूरा कर चुकी है। हालांकि उसकी वास्तविक परीक्षा अभी होनी बाकी है। इस परीक्षा में सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना घोषणा-पत्र है जिसे लेकर वह जनता के बीच गई और संभावना है कि उसी के बल पर वह दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 सीट जीतने में सफल रही है। अब घोषणा-पत्र के प्रमुख बिन्दुओं को लागू करने की चुनौती है जिसमें से बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जो सैद्धान्तिक रूप में अच्छे लगते हैं लेकिन उन्हें धरातल पर उतारना उतना ही कठिन है जितना बिना पानी के मछली को जिंदा रखना।
आम आदमी पार्टी के घोषणा-पत्र पर गौर करें तो वह पहला वादा भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाने का करता है। इसके लिए उसने जन लोकपाल कानून लागू करने की बात कही है। वास्तविकता में जन लोकपाल कानून को लागू करने में कई संवैधानिक बाधाएं हैं। इनमें केंद्र की सत्ता में काबिज राजनीतिक पार्टियों समेत विपक्षी पार्टियों का समर्थन बहुत ही जरूरी है। पश्चिमी बाजार की परिस्थियों ने जिस प्रकार से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला किया है, उससे यह गारंटी नहीं है कि जन लोकपाल कानून लागू होने के बाद देश से भ्रष्टाचारियों का नामो-निशान मिट जाएगा। आप ने स्थानीय फैसलों में अफसर की जगह जनता को निर्णय लेने का अधिकार देने की वकालत की है। अगर वह इस निर्णय को लागू करती है तो कई प्रकार की संवैधानिक और व्यावहारिक रुकावटें पैदा हो जाएंगी। वैसे भी जो आम आदमी सरेआम बेगुनाहों के पीटे जाने पर आवाज नहीं उठाता हो, वह कैसे इतनी आसानी से स्थानीय निर्णय में भागीदार बनेगा। वैसे भी दिल्ली का वर्तमान माहौल निजी नौकरी करने वालों को इतना समय नहीं दे पाता है कि वे अपने परिवार के सदस्यों की जरूरतों के हिसाब वार्तालाप कर सकें।
निजी कंपनियों के हाथों में बिजली आपूर्ति की व्यवस्था उनके बिजली की दर को आधा करने के वादे पर कई सवाल खड़ा करती है क्योंकि दिल्लीवासियों की जरूरत के हिसाब से राज्य में बिजली उत्पादन नहीं है और ना ही इसकी सार्वजनिक इकाई के पास इतने संसाधन और कर्मचारी हैं जो इसे बखूबी अंजाम दे सकें। साफ पानी की आपूर्ति का मामला भी कुछ ऐसा ही है। दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में भूमिगत जल इस कदर दूषित हो चुका है कि लोग इससे नहाना पसंद नहीं करते। मजबूरी में लोगों को भूमिगत जल के पानी से नहाना पड़ता है। दिल्ली क्षेत्र में यमुना में पानी की जगह पूरे शहर का कचरा बहता रहता है, जहां सामान्य मछलियां भी जीवित नहीं रह पाती हैं। वैसे में दिल्लीवासियों की जरूरत के हिसाब से ‘आप’ पीने योग्य पानी मुफ्त में कहां से उपलब्ध कराएगी, इसे वह अभी तक स्पष्ट नहीं कर पाई है। ‘आप’ की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली की वह बहुतायत आबादी है जो वहां की मूल निवासी नहीं है और ना ही उसके पास रहने के लिए स्थाई मकान अथवा भूमि है। आप ने अपने घोषणा-पत्र में ऐसी असंगठित आबादी की सुरक्षा और रोजगार का वादा कर सबसे बड़ी चुनौती ले ली है। इस आबादी को सबसे ज्यादा महंगाई की मार किराए और भाड़े के रूप में चुकाना पड़ता है। आप कैसे इसे हल करेगी, अभी तक उसने इस पर बात नहीं की है। ना ही सार्वजनिक रूप से और ना ही अपने घोषणा-पत्र में। उसने झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अधिकतर असंगठित और ठेका मजदूरों के पुनर्वास का वादा किया है जबकि इसके लिए उसने अभी तक अपनी स्पष्ट रणनीति का खुलासा नहीं किया है। इससे आप भी उन्हीं राजनीतिक पार्टियों की कतार में खड़ी नजर आती है, जिसमें अन्य खड़ी हैं।
उद्योग जगत में कॉन्ट्रैक्ट नौकरी का चलन जड़ तक पहुंच चुका है। ऐसे में उसे खत्म करने का आप का वादा केवल वादा ही रह जाएगा क्योंकि इस मामले में उसे कॉर्पोरेट मीडिया को भी आड़े-हाथों लेना पड़ेगा। अभी तक केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कॉर्पोरेट मीडिया में चल रहे श्रम कानूनों के उल्लंघन और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट नहीं की है। हालांकि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले की उनकी रणनीति सामने आ चुकी है।
सामाजिक न्याय का सवाल भी ‘आप’ की घोषणा में शामिल है लेकिन सार्वजनिक और प्राकृतिक संसाधनों में आबादी के आधार पर विभिन्न समुदायों एवं वर्गों के प्रतिनिधित्व के मुद्दे उनके घोषणा-पत्र का हिस्सा नहीं है और ना ही उन्होंने इसके समर्थन में कुछ भी स्पष्ट किया है। इससे उनके घोषणा-पत्र में सामाजिक न्याय का मुद्दा केवल ख्याली पुलाव ही है। इसके साकार होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है। फिलहाल दिल्ली की सत्ता में आप का आना भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

About the author

शिवदास, लेखक उत्तर प्रदेश के ‘सोनभद्र’ जिले से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘वनांचल एक्सप्रेस’ के संपादक हैं। हस्तक्षेप टीम का महत्वपूर्ण अंग हैं। यह लेख ‘वनांचल एक्सप्रेस’ के 12वें अंक में प्रकाशित हो चुका है।)

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