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बिरसा मुंडा की तरह हम सभी मार दिये जायेंगे क्योंकि लकड़बग्घा तुम्हारे घर के करीब आ गया है

पलाश विश्वास
भाई फैसल अनुराग ने लिखा हैः
बिरसा मुंडा की तरह हम सभी मार दिये जायेंगे यदि हम अब भी नहीं सचेत हुये तो। ये बड़ी कम्पनियों के एजेन्टों की पार्टियाँ हैं। हमारे जंगल और खदानों को लूटने के लिये ये हमें खरीदना चाहतीं हैं। हम बिरसा की तरह मरना पसंद करेंगें लेकिन बिकना नहीं। एक मुंडा ने एक भाषण में यह कहा।
तो रियाज ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पोस्ट की है।
इन दोनों के एक ही प्रसंग और संदर्भ में रखकर आज का यह रोजनामचा है।
रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दोनों टॉप के कवि थे तो टॉप के पत्रकार भी। हिंदी पत्रकारिता के नवउदारवादी संघी मसीहा संप्रदाय के अभ्युत्थान  से पहले, आपरेशन ब्लू स्टार पर बाकायदा इंदिरा गांधी को संपादकीय में बिना देर स्वर्ण मंदिर प्रवेश का उपदेश देते हुये हिन्दुत्व की मौलिक तूफान रचने में जो सबसे ज्यादा सिद्धहस्त थे और मौजूदा तमाम दिग्गज जिनके आशीर्वादधन्य  गुरुघंटाल हैं, उनके सर्वव्यापी वर्चस्व की वजह से आज न कविता में और न पत्रकारिता में कोई उनकी कहीं चर्चा करता है।
हमने तो दिनमान से पत्रकारिता के सरोकार के साथ साथ उसकी भाषा भी आत्मसात की है। जिस जनसत्ता प्रभाव में पत्रकारिता की तत्सम मुक्ति सम्भव हुआ, उसमें भी सर्वेश्वर और सहाय के साथी हरिशंकर व्यास, वनवारी, जवाहरलाल कौल के साथ मंगलेश डबराल की महती भूमिका रही है।
 आज भले ही रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर की तरह औद्योगिक पूँजी का समय नहीं है। लंपट, क्रोनी, आवारा वित्तीय पूँजी के शिकंजे में हैं भारतवर्ष, लेकिन समझने वाली बात तो यह भी है कि उनसे भी पहले सामंती उत्पादन प्रणाली मध्ये मुक्तिबोध, प्रेमचंद और रामविलास शर्मा का रचा आज भी समान रूप से प्रासंगिक है। शहीदेआजम भगत सिंह के दस्तावेज आज भी हमें दिशाबोध कराते हैं।
सर्वेश्वर का लकड़बग्घा आज का यथार्थ समाज वास्तव है। कॉरपोरेट क्रोनी कैपिटल अबाध प्रवाहमान, नरसंहार अभियान अबाध और इस राजसूय यज्ञ को फासीवादी कर्मकांड में बदलने का यह आयोजन बाकायदा चुआड़ विद्रोह उपरांत अंत्यजों से बेदखल भूमि के स्थाई बंदोबस्त के तहत बरतानी गर्भजात शासक वर्णवर्चस्वी नस्ली सत्तावर्ग के सर्वव्यापी आधिपात्य धाराप्रवाह समय में भगवान बिरसा के अरण्य के अधिकार के उद्घोष के बिना प्रतिरोध असम्भव है।
ख्याल करने की बात तो यह है कि भारत का संविधान रचने वाले डॉ. बीआर अंबेडकर ने भी अंततः चेतावनी दी थी-

Parliamentary Democracy has never been a government of the people or by the people, and that is why it has never been a government for the people. Parliamentary Democracy, notwithstanding the paraphernalia of a popular government, is in reality a government of a hereditary subject class by a hereditary ruling class. It is this vicious organization of political life which has made Parliamentary Democracy such a dismal failure. It is because of this Parliamentary Democracy has not fulfilled the hope it held out the common man of ensuring to him liberty, property and pursuit of happiness.

-Dr Babasaheb Ambedkar
भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हालात और विकल्पहीनता के इस संकट पर इस अंबेडकरी तात्पर्य के संदर्भ में भी चर्चा होनी चाहिेए।
अंबेडकर क्या, जिस बरतानी संसदीय लोकतंत्र के हम लोग अनुगामी हैं, उस पर जार्ज बनार्ड शॉ का लिखा एप्पिल कार्ट का अध्ययन भी बेहद प्रसंगिक है। जहाँ जनता के द्वारा, जनता के लिये और जनता की सरकार वाली अवधारणा पर शॉ की दीर्घायित विचारोत्तेजक प्रस्तावना है।
धनतंत्र कोई नयी व्यवस्था तो है ही नहीं। भारतीय वंशवादी नस्ली सामाजिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में अंबेडकर की यह चेतावनी समझनी होगी।
मुझे तो ताज्जुब हो रहा है कि स्टार स्पोर्ट्स पर हर ओवर अंतराल “अबकी बार मोदी सरकार” के उद्घोष को भारतीय जीत की धारावाहिकता में या मोदी की तर्ज पर या घर घर मोदी की तर्ज पर रूपांतरित करने से कैसे चूक गये मोदियाये सृजनकर्मी।
इस नारे को तो हिसाब से अब यह होना चाहिेए कि अबकी बार मोदी की सरकार, भारत की जय जयकार। लगता है कि सेमीफाइनल या फाइनल में अश्वमेधी घोड़ों के पिट जाने की आशंका से उन्होंने यह दुस्साहस नहीं किया होगा।
खेलों में जो मुक्त बाजार का खेल है, वह आइकोनिक अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि है। विज्ञापनी सितारे अब चुनाव के सबसे जीतने वाले काबिल उम्मीदवार हैं। यह संकट कितना घनघोर है कि चंडीगढ़ में किरण खेर और गुल पनाग का मुकाबला है तो मेरठ में मोहसिना किदवई के संसदीय विकल्प बतौर प्रस्तुत हैं नगमा। बंगाल में तो सितारे ही चुनाव मैदान में हैं और उनके रोड शो में फैनी तूफान में बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता निष्णात है।
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था, वर्णवर्चस्व, वंशवाद और नस्ली क्षेत्रीय भेदभाव का नतीजा है आज का फासीवाद, जिसे विकास के लिये धर्मोन्माद के विकल्प बतौर मैनेजरी सूचनाई विशेषज्ञता और दक्षता के मार्फत सर्जिकल प्रिसिजन के साथ पहले ही खस्ताहाल जनप्रतिनिधित्व शून्य लोकतंत्र की देह में असंवैधानिक नीति निर्धारक चिप्स की तरह प्रस्थापित किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि संघ परिवार अब राम मंदिर को हिन्दुत्व का सबसे बड़ा मुद्दा नहीं मानता। इसे संघी एजेण्डा का विचलन समझने की भूल कर रहे हैं हम।
हिन्दुत्व के मुकाबले अगर ध्रुवीकरण हुआ तो अहिंदू अस्मिताओं का भी ध्रुवीकरण होना लाजिमी है। जिसका विस्फोट हम हाल में खूब देखते रहे हैं। इसीलिये अस्मिताओं के कामयाब और नाकाम पिटे हुये चेहरों को भी फैसन परेड में केसरिया कायाकल्प में प्रस्तुत करना संघी रणनीति है ताकि पैदल सेनाओं को एकदूसरे के विरुद्ध लामबंद किया जा सकें।
राम मंदिर हो न हो, संघ परिवार का हिंदू राष्ट्र का एजेण्डा मौलिक तौर पर अमल में लाने की तैयारी है। दरअसल हम जिस लकड़बग्घे के सामने हैं, उसका चेहरा शायद सर्वेश्वर के बिंब संयोजन में भी अनुपस्थित है।
हिटलरी मुसोलिनिया फासीवाद नाजीवाद का जायनी मुक्त बाजारी उत्तरआधुनिक संस्करण है यह लकड़बग्घा, जो अब तक का सबसे जहरीला तत्व है। विकास के बहाने इस विकल्प को जनादेश में अनूदित करने का प्रकल्प मोदी सर्वभूतेषु है। दैविक विशुद्धता नस्ली भेदभाव का अंतःस्थल है और हम ईश्वरत्व में लोकतंत्र को समाहित करने लगे हैं।
लकड़बग्घा का यह अवतार ग्रह ग्रहांतर में भी स्वतंत्रता और मानवाधिकार, प्रकृति, पर्यावरण, मनुष्य और मौसम चक्र के भयावह विवर्तन का महाकाव्य है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम या देवि दुर्गा के हाथों सारे आयुध सौंपे जा रहे हैं दानवीकृत बहुसंख्य के वध के लिये।
इस वध उत्सव में बिरसा मुंडा का प्रतिरोधकल्पे आवाहन बेहद जरूरी है।
ध्यान देने वाली बात है कि अस्मिताओं के आधार पर हो रहे निर्वाचन में जाति, वंश के साथ आवारा क्रोनी पूँजी के तमाम तत्वों की निर्णायक भूमिका है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि कांग्रेस को भारतीय जनता खारिज करती, उससे पहले तमाम रेटिंग एजेंसियां खारिज कर चुकी हैं।
विनिवेश, प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश, भारत अमेरिकी परमाणु संधि का कार्यान्वयन, कर संशोधन और श्रम कानूनों का सफाया, सेवाओं के मुक्त बाजार के संदर्भ में कांग्रेस की नीतिगत विकलांगता के विरोध में कॉरपोरेट साम्राज्यवाद का स्वर अपने ही गुलामों के विरुद्ध मुखर है।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि भारतीय राजनीति में कांग्रेस एक मंच बतौर अपनी भूमिका निभाती रही है, जिसका कोई वैचारिक चरित्र कभी नहीं रहा है। कांग्रेस एजेण्डा मार्फत काम करती रही है।
आर्थिक सुधारों को लागू करते वक्त पारंपारिक जनाधार की चिंता कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक मजबूरी रही है तो नेतृत्व में वंशवादी विरासत का बोझ उसकी ऐतिहासिक कमजोरी। मीडिया जो उसके विरुद्ध हुआ, उसे समझने के लिये मीडियामध्ये आप का अभ्युत्थान और माडियामध्ये उसका उसी तरह विसर्जन के घटनाक्रम को समझने की जरूरत है।
कॉरपोरेट और अमेरिकी हितों के विरुद्ध किसी तरह का स्वर इस पतित लोकतंत्र में मुक्तबाजार में तब्दील लोकतंत्र में असम्भव हुआ, इसीलिये अरविंद केजरीवाल के तमाम वरदहस्त अब परिदृश्य से अदृश्य हैं।
उसी तरह अमेरिकी एजेण्डे को लागू करने में नाकाम कांग्रेस जनाधारों को टटोलने और वंशवादी नेतृत्व बहाल करने के अनिवार्य कार्यभार के चलते अब इस मुक्तबाजारी लोकतंत्र में जनादेश का विकल्प नहीं है।
 इस पर भी ध्यान देना जरुरी है कि आर्थिक सुधारों के पहले चरण के कार्यान्वयन में राममंदिर सर्वस्व संघ परिवार गुजरात के भयावह नरसंहार के बावजूद पूरी तरह व्यर्थ रहा है।
 जो सुधार लागू हुये वे मनमोहनी पहली और दूसरी यूपीए सरकारों ने पिछले दशक में लागू कर दिये।
 विनिवेश मंत्रालय का आविस्कार भाजपा ने किया तो उसके राजकाज को सम्भव बनाया वाम समर्थित यूपीए ने ही।
 प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश की अनंत धारा और अबाध पूँजी प्रवाह के महायज्ञ को पूर्णाहुति दी गयी मनमोहनी ईश्वरत्व केमाध्यम से ही।
मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है श्रम कानूनों का सफाया न कर पाना। मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है खुदरा बाजार और रक्षा क्षेत्र में विदेशी पूँजी विनिवेश को सम्भव न बना पाना। मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है जंगल में जारी जनयुद्ध को सलवा जुडु़म पद्धति से निपटा न पाना और बहुराष्ट्रीय पूँजी की असंख्य परियोजनाओं का वर्षों से लंबित हो जाना। मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है करसंशोधनों के जरिये प्रभुवर्ग के साथ कॉरपोरेट लंपट क्रोनी आवारा  पूँजी को पूरीतरह करमुक्त न कर पाना। मुक्त बाजार से मुटियाये कॉरपोरेट इंडिया को अब छूट, रियायत और प्रोत्साहन में कोई रुचि है ही नहीं। मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है वित्तीय संशोधनों के जरिये वित्तीय पूँजी के हवाले नागरिकों की जान माल न कर पाना।
मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है बायोमेट्रिक डिजिटल आधार प्रकल्प के बावजूद सब्सिडी को पूरी तरह खत्म न कर पाना। मनमोहन की सबसे बड़ी नाकाम है भारत अमेरिका परमाणु संधि का कार्यान्वयन करके आतंक के विरुद्ध युद्ध के बहाने एशिया महाद्वीप के बाजार में एकाधिकार वर्चस्व के लिये रणनीतिक अमेरिकी, इजरायली, बरतानी पारमाणविक गठजोड़ के तहत बाजार और संसाधनों पर पूरा कब्जा कर पाना।
मनमोहन की सबसे बड़ी नाकामी है भारतीय देहात को कृषि के सफाये के साथ उपभोक्तावादी शहरी चरित्र न दे पाना।
ये तमाम सुधार विकास के पर्याय हैं।
ये तमाम सुधार आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण का एजेण्डा है।
ये तमाम अधूरे कार्य भारत की नई बनने वाली केंद्र सरकार के अनिवार्य कार्यभार हैं।
इसी एजेण्डा को अपनाने के लिये राममंदिर की तिलांजलि के बिना कॉरपोरेट समर्थन असम्भव है और देस में सर्वभूतेषु मोदी भी असम्भव है। इसीलिये बंधु, राममंदिर का मुद्दा अब संघ एजेण्डा में सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है।
विकास या आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण के एजेण्डा के कार्यान्वयन का घोषणापत्र है हर संघी पदक्षेप का तात्पर्य। लेकिन इसका कहीं यह मतलब भी नहीं कि वह रामरथी लालकृष्ण आडवानी के बलिदान से अपने हिन्दुत्व के एजेण्डे का परित्याग कर चुका है या काशी से मुरली मनोहर जोशी के स्थानांतरण मार्फत उसने अपने चरित्र से विचलन भी नहीं अंगीकार किया है।
हम पहले से निरंतर लिखते रहे हैं कि नस्ली हिन्दुत्व की विशुद्धता जनसंहारी रक्तपात की फसल है तो उसी खेत की उपज है यह मुक्त बाजार।
विकास का मायने चुआड़ विद्रोह, भील विद्रोह, मुंडा विद्रोह, संथाल विद्रोह, संन्यासी विद्रोह, गोंड विद्रोह, नील विद्रोह में शामिल हमारे तमाम पूर्वजों से लेकर शहीदे आजम भगत सिंह और स्वतंत्र भारत में जल जंगल जमीन नागरिकता और मानवाधिकार के लिये लड़ रहे हर व्यक्ति को मालूम है।
बहुसंख्य जनगण को अपनी पैदल सेना बनाये रखने के लिये डायवर्सिटी की समरसी समावेशी चादर ओढ़कर धर्मोन्मादी मुख से विकास का अखंड जाप है यह और वह विकास सचमुच गुजरात मॉडल का विकास है।
सर्वेश्वर के लकड़बग्घे का मायने बदल गया है।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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