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बुंदेलखंड में बने विदर्भ जैसे हालात

अंबरीश कुमार
लखनऊ , । सूखे और भूखे बुंदेलखंड में विदर्भ जैसे हालत पैदा हो रहे है । पिछले तीस दिन तीन किसान खुदकुशी कर चुके है। वर्ष २००९ २०१० का का आंकड़ा भी कोई कम नही था और इस साल की शुरुआत तीन किसानो की खुदकुशी से हो चुकी है । कड़ाके की ठंढ के बाद दिन में बढती गरमी ने किसानो की चिंता बढ़ा दी है । गेंहूँ , अरहर , मसूर और मटर की फसल सूख रही है । दूसरी तरफ अर्जुन सहायक परियोजना के चलते किसानो में आक्रोश बढ़ रहा है । इस परियोजना के दायरें में 6700 किसानों की 30-56 हजार हैक्टेयर जमीन और कुल व 112 गांव आ रहें है। जिन किसानो की जमीन इस परियोजनाक दायरें में आ गई है वे काफी निराश है । जमीन तो जा ही रही मुआवजा भी नेताओं ,अफसरों और दलालों की मेहरबानी पर है । किसान राम विशाल ने अफसरों के सामने आत्मदाह किया तो जिले में सियासी हलचल हो गई है। कबरई बांध व झिर सहेबा गांव में पीएसी तैनात कर दी गई थी ।
बुंदलखंड के जिलों के भी हालात खराब हो रहे है । उरई में पानी का संकट बढ़ रहा है जिसके चलते किसान फसल खराब होने की आशंका से परेशान है । पिछले साल पानी का इतना संकट नही था पर इस बार गेंहू , मटर, अरहर और मसूर बोने वाले किसान पानी की कमी से जूझ रहे है ।जिसके चलते फिर खुदकुशी का सिलसिला तेज हो सकता है । साल की शुरुआत में ही उरई के शांति नगर निवासी मंटोले अहिरवार (उम्र ६५) वर्ष की मौत आर्थिक तंगी के चलते हुई। जिस दिन इनकी मौत हुई उस दिन घर में खाने के लिए एक किलो आटा भी नही था। परिवार में दो पुत्र व उनकी पत्नियों के साथ कुल 11 लोगों का परिवार था। कमाई का कोई ठोस जरिया नही था। इसके बाद एक फरवरी 2011 को ग्राम हुसेपुरा जागीर निवासी किसान करन सिंह (उम्र ३५ वर्ष) की कम खेती होने के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षो से भी पैदावार भी ठीक नही हो रही थी। जिसके चलते वह मजदूरी के लिए आगरा चला गया था। वहां भी स्थाई मजदूरी नही मिली। लौटकर वह अपने गांव आ गया। उसके परिवार में पिता, पत्नी के साथ तीन बेटियां भी उसकी कमाई पर निर्भर थी। आमदनी कम खर्च ज्यादा होने की वजह से उसने यमुना नदी में डूबकर खुदकुशी कर ली।
ललितपुर जिले में सरकारी रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 2010 में 163 लोगों ने आत्महत्या की। जिसमें फांसी, जहरीला पदार्थ व ट्रेन से कूद कटकर खुदकुशी की। इसमें 100 लोग तो ऐसे हैं जिन्होनें परेशान होकर मौत को गले लगा लिया। 41 व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी मौत जहरीला पदार्थ खाकर हुई, 13 व्यक्तियों ने ट्रेन से कटकर अपनी जान दी, 4 व्यक्तियों ने आग लगाकर आत्महत्या कर ली। बुंदेलखंड में सर्वाधिक मौतें ऐसी ही हैं। यह जनपद में आता है इसके शहरी क्षेत्र को हम छोड़ दें तो बाकी क्षेत्र में बेहद गरीबी हैं खेती की सिचाई के लिए कुएं व तालाबों के सहारे खेती होती है।
उरई से सुनील शर्मा के मुताबिक जिले में नहरों के दायरें में जनपद की दस फीसदी भूमि है। जिसकी सिंचाई हो पाती है । जनपद के अधिकांश तालाब अप्रैल में सूखने लगते हैं। बारिश के पानी से यह जल स्रोत भरे जाते हैं। बुंदेलखंड के डार्क जोन में यह जिला आता है आज भी वहां का आलम ज्यों का त्यों है। इस बार फरवरी में ही पानी का संकट शुरू हो गया है जिससे हालात बिगड़ने लगे है । पानी को लेकर किसान धरना प्रदर्शन भी कर चुके है और तंग आकर जान देने लगे है । बुंदेलखंड में अभी यह हाल है तो आगे का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।
भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा – बुंदेलखंड के हालत खराब हो रहे है । एक महीने में तीन किसान खुदकुशी कर चुके है और गर्मी के चलते फसल चौपट होने की आशंका है जिससे किसान बर्बाद हो जाएगा । इस मुद्दे को लेकर पार्टी बुंदेलखंड में किसानो को लामबंद करने जा रही है ।
जबकि भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा – केंद्र और प्रदेश सरकार की नीतियों के चलते ही बुंदेलखंड का किसान खुदकुशी पर आमादा है । कही गरीबी के चलते तो कही खेती की जमीन छीने जाने की वजह से किसान जान दे रहा है । जब अधिग्रहण की एक नीति बन गई तो पूरे प्रदेश में उस लागू किया जाना चाहिए । राजनैतिक दलों के इन आरोपों में दम है । सरकार अगसर भेदभाव नही करती तो करछना में किसान की जान नही जाती जो आंदोलन कर रहे थे । यही आरोप महोबा में भी लगाया जा रहा है जहाँ किसानो की खुदकुशी का सिलसिला शुरू हो चूका है ।
महोबा से जनसत्ता संवादाता हरिश्चंद्र के मुताबिक धसान और कें नदी को जोड़ने वाली अर्जुन सहायक परियोजना को लेकर किसान डरे हुए है । जिन किसानो की जमीन इस परियोजना में गई है उन्हें खेती की जमीन का मुआवजा भी ढंग से नही मिल रहा है । जिसका जैसा जुगाड़ वैसा मुआवजा मिल रहा है । किसी को लाख रुपए बीघा तो किसी को चार लाख रुपए । किसान अकाल और सूखे से पहले सी ही बेहाल है अब जमीन जा रही है तो जान दे दे रहा है । इस परियोजना से महोबा, हमीरपुर, बांदा जिलों के 112 गांव प्रभावित हो रहें है। कबरई बांध की उंचाई बढ़ा कर उसे परियोजना से जोड़ा जा रहा है। केन नदी का पानी रोक कर लहचूरा बांध महोबा से हरपालपुर , शिवबहार और चंद्रावल होकर बांदा पहुंचेगा । इस परियोजना को लेकर किसान नाराज है । झिर सहेबा गांव के राम विशाल उर्फ बब्बू के आत्मदाह के बाद ग्राम निवासी पुष्पेंद्र कुमार, मुकेश, गोपाल, राजाराम, प्रभू, रतनलाल ने यहां कहा कि किसानों की मागों को स्वीकार किए बिना राज्य सराकर के नुमाइंदे आगे कोई कार्य न करें। हमारी मागें न माने जाने पर हजारों किसान आत्मदाह कर लेगें।
साभार jansatta

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