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बुनियादी गलती हिंदू राष्ट्रवाद की काट जाति अस्मिता समझने की है

कारपोरेट तौर तरीके से चलेगी केसरिया कारपोरेट सरकार, लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रावधानों के बगैर
सब कुछ तो सत्ता के लिए है, जनता के लिए क्या है, फिर-फिर वही कारपोरेट राज।
पलाश विश्वास
तुमही बरोबर लिहिले श्रीमन सुदत्त वानखेड़े साहब,अंबेडकरीच राहा अंबेडकरवादी होवु नका!
यानी अंबेडकरी बने रहो, अंबेडकर विचारधारा से कोई मतलब नहीं। अंबेडकर भुनाते रहो। अंबेडकर के विचारों को पचा नहीं सकते तो अंबेडकर का नाम जापते रहो। दलितवाद और महारवाद चलाते रहो। यानी अंबेडकरी दुकानदारों के अंध भक्त बने रहो।
हालांकि अंबेडकर का दलितवाद क्या है, अंबेडकरी विचारों में इसकी खोज की जानी चाहिए।
अंबेडकर ने डिप्रेस्ड क्लास की बात की है, जाति उन्मूलन का एजेंडा दिया है और मेहनतकश तबके के दो दुश्मन बताये हैं, ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। अंबेडकर को हम दूसरों की तरह पंक्ति दर पंक्ति वामपंथी तर्ज पर मार्क्स लेनिन माओ उद्धरणों की तरह उद्धृत नहीं कर सकते। लेकिन यह सही है कि अंबेडकरी आंदोलन जाति उन्मूलन मार्फत वृहत्तर बहुजन समाज के उत्थान और उनके मुक्तिकामी जनसंघर्ष के अंबेडकरी लक्ष्य के विपरीत अब जाति को ही मजबूत करता रहा है।
कुल मिलाकर प्रतियोगिता ही है अंबेडकरी, अपनी अपनी जाति को मजबूत बनाने की। अंबेडकर के बाद अंबेडकरी आंदोलन का यही हश्र मुकम्मल जाति प्रतियोगिता,जा ति संघर्ष सिवाय जाति उन्मूलन की किसी भी तरह की किसी प्रचेष्टा के।
महाराष्ट्र के महार जैसे अंबेडकरी विरासत के दावेदार हैं, उसी तरह बंगाल में अंबेडकरी आंदोलन का कोई वजूद जमीन पर न होने के बावजूद मजबूत दलित जाति नमोशूद्र ही अंबेडकरी आंदोलन के झंडेवरदार हैं। कहीं चमार तो कहीं जाटव।
मतलब यह कि अंबेडकरवादी कोई है ही नहीं, सारे के सारे अंबेडकरी हैं, अपनी अपनी जाति के हितरक्षक।
इस लिहाज से देखें, तो सत्तावर्ग में शामिल जातियां कोई गलत नहीं कर रही हैं क्योंकि वे भी अपनी अपनी जाति के हित साध रहे हैं। फिर जिसकी जितनी ताकत, वह उतना तो हासिल करेगा ही। 2014 के निर्वाचनी साफल्य कोई आकस्मिक वज्रपात है नहीं, इसे समझने और स्वीकराने में लोग अब भी चूक रहे हैं। या मरुआंधी में रेत में सर छुपाये हैं शुतुरमुर्ग प्रजाति के बहुजन बुद्धिजीवी, नेता, कार्यकर्ता। और बाकी लोग।
भारत में असंख्य राजनीतिक दल पंजीकृत हैं, जो चुनाव मैदान में थे। दस साल तक सत्ता में रही कांग्रेस के ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी है। अंबेडकरी की बनायी पार्टी रिपब्लिकन हजार धड़ों में महारवादी वर्चस्व आत्मघात में लिप्त हैं तो मान्यवर कांशीराम जी के बोल पचासी, मायावती के तिलक तराजू तलवार मारो जूते चार, नारों के बहुजन हिताय को सर्वजन हिताय में बदलने वाली बहुजन पार्टी भी कांशीराम और मायावती की जातियों के वर्चस्व को बरकरार रखने खातिर ब्राह्मणों के समर्थन पाने के लिए उन्हीं के द्वारा संचालित संयोजित एढ़ी चोटी का जोर लगाती रही है।
इसीतरह पासी, चमार, लोध, गुज्जर, बनजारा, कुर्मी, यादव, जाट, मीणा, मराठा, लिंगायत जैसी मजबूत जातियां अपनी अपनी पहचान के लिए राजनीति करते हुए एक दूसरे के खिलाफ लामबंद हैं। खटिक कोई मजबूत जाति नहीं है, लेकिन उनकी दावेदारी भी उदितराज बजरिये पेश हो ही गयी।
अपनी ही जाति का वर्चस्व बनाये रखने के नाम पर अपने ही कुनबे का हित साधने वाले अंबेडकरी झंडेवरदार अंबेडकर घोषित दोनों प्रमुख शत्रुओं ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को गला लगाने और उन्हें ही आत्मसात करने की अंधी चूहादौड़ में इस तरह शामिल हो गये कि बसपा को चार फीसद वोट मिलने के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली।
यूपी में नमोलहर रोकने के दूसरे दावेदार मुलायम राज्य में अपनी सरकार होने के बावजूद अपने कुनबे से बाहर किसी को जीता नहीं पाये।
संघ पार्टनर बने अठावले की चमक शिवसेना और मनसे के आगे फीकी है।
पप्पू यादव और उनकी पत्नी की जीत लेकिन राबड़ी और मीसा की हार के जरिये अकेले भगवा आंधी रोकने का ताल ठोंक रहे लालू अब नीतीश का सहारा बनने को मजबूर हो गये तो बेचारे नीतीश कुर्सी से ही अलहदा हो गये।
शरद यादव तो बाहुबलि पप्पू यादव का ही मुकाबला नहीं कर पाये, नमो सुनामी का मुकाबला कैसे करते। जाति समीकरण के अलावा उनके पास कोई औषधि नहीं है,ऐसे वैद्य हैं वे और तमाम अति महत्वाकांक्षी क्षत्रप। जखम गहरा है, प्राण संशय में है और जातनाम जापने का इलाज है। वाह।
महादलित जीतन मांझी का मुख्मंत्रित्व का स्वागत है, लेकिन विडंबना यह है कि बिहार में भाजपा सरकार रोकने के लिए यह एक नायाब सोशल इंजीनियरिंग के अलावा कुछ भी नहीं है। इससे मुसहरों और बिहार के महादलितों और पसमंदा मुसलमानों का क्या कल्याण होगा राम जाने।
उदित राज और राम विलास के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं और सर कड़ाही में। नई शेरवानी भी सिल चुकी होगी।

मतलब यह कि अब तक जाति उन्मूलन के एजेंडे को विपरीत जाति को ही मजबूत करने की जो बहुजन राजनीति चल रही थी, तो संघ परिवार ने ओबीसी कार्ड खेलकर जवाबी तुरुप फेंककर पहचान राजनीति का खेल तमाम कर दिया तो हारी हुई बाजी जीतने के लिए फिर वहीं दांव सोशल इंजीनियरिंग का।
संघ परिवार के राजग के संयोजक रहे शरद यादव और चारा घोटाले में जेल गये लालू यादव मायावती और मुलायम को किनारे रखकर न जाने किस किसको लेकर केसरिया कायाकल्प का जहर मोहरा बनायेंगे।
दूसरी ओर, आज ही इकोनामिक टाइम्स के संपादकीय पेज पर अजय छिब्बर ने कि दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों की नई केसरिया कारपोरेट सरकार की सर्वच्च प्राथमिकता का खुलासा करते हुए लिखा है कि मोदी पर भारत का दस ट्रिलियन डालर का दांव है।
जाहिर है भारत से मतलब उनका बाजार ही है।
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http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/35474947.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst
साफ साफ ऐलान चुनाव प्रचार के दौरान ही हो गया था कि गुजरात माडल पूरे भारत में लागू होना है। गुजरात माडल को भाइयों ने धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता कुरुक्षेत्र मान लिया और जाहिर है कि खेत रहे। गुजरात माडल का असली मतलब है मुकम्मल कारपोरेट राज। मतलब सीईओ सीएम के बदले सीईओ पीएम।
कारपोरेट तौर तरीके से चलेगी केसरिया कारपोरेट सरकार।
लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रावधानों के बगैर।
अटल जमाने में जो अरुण शौरी विनिवेश अभियान के विश्वबैंकीय सिपाहसालार थे, उनका महिमामंडित प्रत्यावर्तन हो रहा है केसरिया सुब्रह्मण्यम स्वामी और गुजरात माडल के विशेषज्ञ अमित के साथ।
जोर का झटका धीरे से लगे, इसके लिए भाषाई करतब खूबै है।
मुकम्मल कारपोरेटराज को अच्छे दिनों के सपने में तब्दील करने वाले सौदागरों की भाषिक कौशल सुधारों के शैशव में ही निजीकरण को विनिवेश बना देने में क्लासिक उत्कर्ष छू चुका है।
अब राष्ट्रपति शैली की एकलवर्चस्वी चुनावी जीत का सेहरा बांधने के लिए एकमेव वक्ता प्रवक्ता कर्ता धर्ता नमो नमो।
पीएमओ ही कैबिनेट,पीएमओ ही मंत्रिमंडल, पीएमओ ही विशेषज्ञ, पीएमओ ही नीति निर्धारक, पीएमओ ही संसद, पीएमओ ही कार्यपालिका, पीएमओ ही प्रशासक।
यानी नमो दायबद्धता पर ही तीन ट्रिलियन डालर का दांव बाजार का।
यानी राष्ट्रहित में संसाधनों की फिर वही खुली लूट, फिर वहीं निरंकुश जल जंगल जमीन और नागरिकता से बेदखली।
खुल्ला नारा रहा है नमो मार्केटिंग, बहुत हुआ मानवाधिकार, अबकी बार नमो सरकार।
मध्य प्रदेश में मतदान के बाद हम भोपाल पहुंचे थे। लौटते हुए इल्युमिनेटी पर खास अध्ययन करने वाले प्रोफेसर वासनिक के घर नागपुर में एक दिन ठहरे थे। देश के हालात, अर्थव्यवस्था, राजनीति और जनांदोलन के बारे में उनसे लंबा विचार विमर्श हुआ।
हम लौटने लगे तो हमारे इंजीनियर मित्र रामटेके भी वहां पहुंचे तो प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि सत्ता समीकरण साधने के आंदोलन का नतीजा जीरो रहेगा। क्योंकि जमीन पर कोई प्रतिरोध आंदोलन खड़ा करने का जोखिम उठा ही नहीं सकते सफेदपोश बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, जनपक्षधर लोग, वामपंथी और अंबेडकरी मलाईदार महाजन।
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि सब कुछ तो सत्ता के लिए है, जनता के लिए क्या है, फिर-फिर वही कारपोरेट राज।
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि बेहद सख्ती से कहा कि आप जो वैचारिक बहस करते हैं, आयडियोलाजी पेलते हैं, उसमें हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। वामपंथी लगातार ऐसा करते रहे हैं। जनांदोलनों से विश्वासघात के सिवा हासिल हुआ क्या है। बामसेफ राष्ट्रीय आंदोलन का जनज्वार में लगा रहा, कहां है जनांदोलन वह?
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि आप असल में जनता के मध्य क्या ऐक्शन प्लान लेकर जा रहे हैं, बुनियादी सवाल यही है।
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि आप जो भी कुछ कर रहे हैं, वह इसी स्थाई बंदोबस्त को बहाल रखने की कवायद है। इससे बेहतर है कि आप अपने ही परिवार के लिए कुछ करो।
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि जिन पर आपको भरोसा है, वे कुछ भी करने वाले नहीं हैं। अपनी-अपनी खाल बचाकर माल बटोरने के फिराक में है यह सफेदपोश जमात।
प्रोफेसर वासनिक ने कहा कि स्थानीय स्तर पर आपकी कोई हरकत भी नहीं है और राष्ट्र की सत्ता बिसात पर आपका दांव है।
रामटेके को और मुझे उनका मंतव्य बेहद बुरा लगा। लेकिन अब मुझे यह कहने में कोई दुविधा नहीं है कि वासनिक साहब सच कह रहे थे।
बुनियादी गलती, संघपरिवार के दशकों की तैयारी को नजरअंदाज करने की है। बुनियादी गलती ध्रुवीकरण के जाल में फंसने की है। बुनियादी गलती हिंदू राष्ट्रवाद की काट जाति अस्मिता समझने की है। बुनियादी गलती संघी ऐमबुश मार्केटिंग में अंधा होकर चुनाव को व्यक्तिकेंद्रित बनाकर सारे अहम मुद्दों को किनारे करने की है। बुनियादी मुद्दा आर्थिक सुधारों के नाम पर जारी जनसंहारी एजेंडे पर मौकापरस्त खामोशी है और अलग से विकास का राग अलाप कर सड़क, पेयजल, निकासी, स्कूल, अस्पताल, लैंपपोस्ट पर वोट डालने की मजबूरी है। बुनियादी गलती जनविरोधी कांग्रेस के हक में ढाल बन जाने की है।
बुनियादी गलती कांग्रेस की जनसंहारी नीतियों के लिए उसे कटघरे में खड़ा न कर पाने की है। बुनियादी गलती आर्थिक नीतियों की निरंतरता और कारपोरेट राज पर खामोशी है। बुनियादी गलती कारपोरेट जिहाद छेड़ने के लिए वैश्विक पूंजी के झंडेवरदारों की जमात को खुल्ला मैदान छोड़ने की है। बुनियादी गलती है कि अल्पसंख्यकों को असुरक्षाबोध से लबालब भरकर उनके वोट से नमो सुनामी की बिसात सजाने की है।
इन गलतियों से किसी ने कोई सबक लिया हो,ऐसा नहीं लगता।
मीडिया दिग्गज अपनी भविष्यवाणी सच होने से सत्ता मलाई बटोरने में तल्लीन है और सूचना वंचित जनता के मध्य हारे हुए योद्धाओं और महायोद्धाओं की हवाई तलवार बाजी है। जैसे कि वे इस देश पर संघ मुख्यालय और देशी विदेशी के साझा राजकाज को ही झुठला देंगे।
अब पहचान अस्मिता जाति पार्टियां ईवीएम फर्जीवाड़े को लेकर मुखर है। देश भर में लड़कर हर सीट पर जमानत गँवाने वाली पार्टी भी नाराज कार्यकर्ताओं को उल्लू बनाने के लिए ईवीएम घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं तो वामपंथी भी संत्रास-संत्रास चिल्ला रहे हैं बंगाल लाइन के बूमरैंग हो जाने के बाद भी।
सवाल पूछने वाले तमाम लोग जिस पार्टी में भी हैं, निकाल पेंके जा रहे हैं। वाम दक्षिण किसी भी पार्टी में संघ परिवार की तरह बुनियादी एजेंडे, आब्जेक्टिव और विचारधारा के लिए बेरहमी से नेतृत्व बदल देने की कोई औकात नहीं है।
सत्तासुख के परेंदे कड़ी धूप से बचने के लिए थोक भाव से केसरिया छांव का विकल्प खोज रहे हैं तो लाल हरी नीली जमीन पर लहलहाने लगी है कमल की फसल। फेल नेताओं के पुनरुत्थान के लिए सत्ता समीकरण की बिसात नये सिरे से सजाने की हलचल के अलावा इस देश में जनपक्षधर लोग भी नहीं सोच रहे हैं कि चौतरफा तबाही से आम बहुसंख्य जनता को बचाने के लिए क्या करना चाहिेए और जनता के बीच जाने लायक साख भी तो नहीं बची है।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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