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बृजभूषण शरण सिंह न जीते दियब दूसर क़ोई भी आ जायेँ

अनुराग मिश्र
करनैलगंज। मैं पिछले चार पांच दिनों से अपनी जन्मभूमि करनैलगंज में हूँ जो कि कैसरगंज ससदीय सीट का एक हिस्सा है। यहाँ आगामी 7 मई को चुनाव होने हैं, लिहाजा लोकसभा चुनाव की गूंज यहाँ भी बड़े जोर-शोर से सुनाई पड़ रही है पर इस गूंज में अबकी कुछ बदलाव नजर आ रहा है।
मोदी लहर पर सवार होकर अपनी चुनावी नैय्या पार लगाने के फेर में दिख रहे यहाँ के परम्परागत सांसद बृजभूषण शरण काफ़ी मुश्किल में नज़र आ रहे हैं। पिछले कई चुनावों को अपने बाहुबल, धनबल से जीतते चले आ रहे बृजभूषण शरण सिंह का अब सार्वजानिक तौर पर विरोध शुरु हो चुका है। इस विरोध में आवाज़ किसी नेता की नहीं बल्कि उस दबी कुचली आम जनता की सुनाई पड़ रही है जो अब सीधा बृजभूषण मे मुखतिब होकर उनके विकास का लेखा-जोखा माँग रही है। जो निश्चित तौर पर उन राजनैतिक दलों के लिये एक स्पष्ट संकेत है जो दबंग और आपराधिक प्रवृत्त के लोगों को जिताऊ उम्मीदवार समझकर अपनी पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बलि चढ़ा देते हैं।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि बृजभूषण शरण सिंह 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रत्याशी थे उस समय बीजेपी ने इन्हें बलरामपुर संसदीय सीट से पार्टी प्रत्याशी बनाया था जहाँ से अच्छे खासे मतों से जीते थे। बाद में वर्ष 2008 में अमेरिका से हुए परमाणु क़रार के मुद्दे पर केंद्र में स्थापित यूपीए प्रथम की सरकार को बचाने के लिये बीजेपी की गाइडलाइन से हटकर इन्होंने वोटिंग की और बाद में समाजवादी पार्टी की गोद में जा बैठे।
सपा के टिकट पर ही 2009 का लोकसभा चुनाव कैसरगंज संसदीय सीट से लड़ा जहाँ अपने बाहुबल और धनबल के बदौलत इन्होने तत्कालीन बीजेपी प्रत्याशी हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एल.पी. मिश्र को हरा दिया। उस समय मिश्रा के समर्थन में आने वाले बीजेपी के हर बड़े नेता ने बृजभूषण शरण सिंह को पानी पी-पी कर कोसा था। आज उसी बीजेपी ने एक बार फिर जरायम की दुनिया से राजनीति की दुनिया मे आये बृजभूषण  कंधों पर यकीन किया है।
मजे की बात यह है कि बीजेपी सहित सभी राजनैतिक दल इस बात को अच्छी तरीके से जानते हैं कि ऐसे लोग कभी भी एक दल के वफादार नहीं हो सकते फिर भी हिन्दुस्तान के राजनीति में जरायम क़ी दुनिया के बढ़ते प्रभाव से ये अछूते नही रहे हैं और इसीलिए बृजभूषण को जिताऊ प्रत्याशी मानकर बीजेपी ने इन्हें अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया।
 पर लगता है इस बार हवा का रुख बदल गया है। मोदी लहर पर सवार होने के बावजूद जनता साफ़-साफ़ कह रही है कि बृजभूषण शरण सिंह न जीते दियब दूसर क़ोई भी आ जायेँ। हालाँकि की कुछ लोग मोदी के नाम पर बृजभूषण को वोट देते दिख रहे हैं पर इनका साफ़ कहना है कि उनका वोट मोदी को जा रहा है ना कि बृजभूषण को ।
अब देखना ये रुचिकर होगा कि आने वाली 7 मई तक कैसरगंज की जनता अपने इस रुख पर कायम रह पायेगी या फिर एक बार फिर फिर बृजभूषण शरण सिंह अपनी अपराध की दुनिया से कमाये बाहुबल और धनबल के दम पर लोकतंत्र के इस महापर्व को प्रभावित कर ले जाते हैं।

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अनुराग मिश्र, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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