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बेरोजगारी और भय के बीच एक उभरता वाजिब आंदोलन

आतंकवाद एक प्रत्याशित भय की जकड़न है
शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
बेरोजगारी देश के लिए आतंकवाद की जमीन तैयार करती है। यह पंक्ति आप को विचलित कर सकती है और करनी भी चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि आतंकवाद की जड़ें आखिर हैं कहाँ। हम गौर करेंगे तो पाएंगे कि आतंकवाद की जड़ें बेरोजगारी में हैं, गरीबी में हैं, जहालत में हैं, बेकारी में हैं। यह समस्यायें जिस देश जितनी कम होती हैं वहाँ आतंकवाद उतना कम होता हैं। देश को इसके बुनियादी सवालों से टकराने की जरूरत है। बेरोजगारी बेकारी पैदा करती है, बेकारी से गरीबी का नग्न नृत्य शुरू होता है, इसी से जहालत जघन्य होकर दिमाग को कुपोषित करती है। एक कुपोषित दिमाग देश की प्रगति के लिए एक अहं खतरा होता है। यह मनुष्यता की विशेषताओं को नष्ट कर भय के वितान गढ़ता है। एक डरा हुआ आदमी देश और दुनिया के लिए बड़ा डर होता है। आतंक भय का द्योतक है। यह आतंकवाद की संस्कृति कौन रच रहा है, कई-कई बार सोचना चाहिए। आतंकवाद एक प्रत्याशित भय की जकड़न है।
            बेरोजगारी अक्सर दो तरह की होती है एक कामगार बेरोजगारी और दूसरी शैक्षणिक बेरोजगारी। कामगार मशीनीकरण की रणनीति से ही केवल बेरोजगार नहीं होते बल्कि कृषि और बाजार संबंधी पूंजीवादी समर्थित सरकारी दुर्नीतियों द्वारा बेरोजगार होते हैं। यह बेरोजगारी बेकारी की, कुपोषण की, गरीबी की, जहालत की, भुखमरी की गर्त बनाती है जिसमें देश की देशी जनता घुट-घुट कर मरती है। इसी जनता से राजनीति के घोटाले-बाज नेता थोड़ा सा व्यक्तिगत लालच देकर मनमाने जघन्य अपराध करवाते हैं। यह सब आतंकवाद के हिस्से ही जाता है।
बेरोजगारी एक बड़ा भय है। इसकी भयावह स्थिति शिक्षित समाज में देखी जा सकती है। यह जो शिक्षित तबका आज शिक्षा के क्षेत्र में संघर्ष करते हुये आज हमारे सामने है और रोजगार मांग रहा है, यह इसकी ईमानदारी है। यह रोजगार को लेकर बहुत अधिक डरा हुआ है। इसका डर जायज है।

आज शिक्षित बेरोजगार देश के लिए बहुत बड़ा संकट है।
समय रहते अगर भारत की सरकारें अपने निजी स्वार्थों के चलते इसे नजरंदाज करती रहीं तो यह देश के लिए भारी खतरा साबित होगा। आखिर यह शिक्षित बेरोजगार बेकारी में क्या करेगा यह गंभीर सवाल है। आज हिन्दू मुस्लिम की राजनीति चरम पर है और राजनीतिक मठाधीश इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं। यह सब बेरोजगारी की बुनियादी गलती का परिणाम है।

बेरोजगार या तो अत्महत्या करने को मजबूर हैं या हत्यारे बनाने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।
हमारे समाज में एक बेहूदी फुर्सत अश्लीलता से पैर फैलाये लेटी है और समाज का एक बड़ा तबका लगातार कुंठित होता जाता है। शिक्षा के उच्चतर स्तर पर एक भयानक घटिया राजनीति हो रही है और सरकारी सामंत मनमाने ढंग से एक नौकरी के लालच में शिक्षित युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। बेरोजगारी में विचारधाराओं को लगातार कट्टर बनाया जा रहा है। आज हमारे पास अवसरों की निहायत कमी है। हम विकल्पहीन संस्कृति में घुटते हुये जी रहे हैं। बेरोजगार या तो अत्महत्या करने को मजबूर हैं या हत्यारे बनाने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।
            देश के कुछ उत्साही युवा साथी इस खौफनाक माहौल में एक आशान्वित मशाल लेकर बेरोजगारी के खिलाफ एक सक्रिय आंदोलन लेकर सड़कों पर उतर पड़े हैं। इस आंदोलन की शुरुआत दिल्ली के विश्वविद्यालयों से होती हुई गली, नुक्कड़, चौराहों तक पहुंची। आंदोलन का नेतृत्व आशीष मिश्र, जगदीश सौरभ, लक्ष्मण यादव, अनुपम सिह, अन्नु सिंह, नीति सिंह, अरस्तू चौधरी, अखिलेश यादव कर रहे हैं।
ये सुलझे हुये छात्र पहले छोटी-छोटी सभाएं करते हैं, फिर नुक्कड़-चौराहों पर इकट्ठे होकर सबके बीच अपनी जरूरी बात रखते हैं, फिर बड़ी सभाएं करते हैं और तथ्यों और आरटीआई के आए जवाबों पर अपनी बात रखते हैं। ये बेरोजगार जब हजारों की संख्या में रेलियाँ निकालते हैं तो अवाम को एक जिंदा अंगड़ाई महसूस होती है।
दरअसल यह देश के लिए देश के अधिपतियों से लड़ाई है। यह अपना वाजिब हक मांगते हुये सरकार की आँख में किरकिरी बनते जा रहे हैं। यह आंदोलन आज दिल्ली से होते हुये इलाहाबाद की जमीन पर अपने तम्बू तान चुका है। इसका असर दिल्ली और इलाहाबाद के अतिरिक्त कानपुर, मेरठ, लखनऊ, भोपाल, पटना, मुजफ्फरपुर, शिमला के शिक्षित बेरोजगारों में देखा जा सकता है। आने वाले समय में यह एक देशव्यापी आंदोलन बनेगा।

            इस आंदोलन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें लड़कियों की बुलंद आवाज हमारे सामने आ रही है। यंग गर्ल वालिंटियर्स इस लड़ाई में बढ़ चढ़ का भागीदारी कर रही हैं। अपने अधिकारों के लिए लड़ती हुई लड़कियां भारत की सोई हुई अस्मिता को जागा रही हैं। उनकी यह सहभागिता देख कर हुक्मरान को संजीदा हो जाना चाहिए।     “इलाहाबाद शहर आज एक दुर्लभ और ऐतिहासिक पल का चश्मदीद गवाह बना, जब सैकड़ों की संख्या में लड़कियों ने ‪#‎Youth_for_Right_to_Employment के बैनर-पोस्टर के साथ सड़क पर चीख-चीख कर ये आवाज़ लगाईं- “रोज़गार हमारा मौलिक अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे |”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के सामने, लल्ला चुंगी से आधी आबादी यानि लड़कियों के नेतृत्व में इस कैंडिल मार्च में शहर के जाने माने बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पीछे रहकर इनका समर्थन और उत्साहवर्धन किया | सबसे पीछे सैकड़ों नौजवानों ने इस रोजगार अधिकार मार्च की बागडोर सम्हाली |
तस्वीरें बोलती हैं, आप खुद देखिये”…..(जगदीश सौरभ की फेसबुक वाल से)
                इस आंदोलन में सक्रियता से सहभागिता निभाते लक्ष्मण यादव की एक पोस्ट ध्यान देने लायक। वह कितनी मजबूती से एक सच आप के सामने रखते हैं, आप देख कर दंग रह जाएंगे। उन्हीं से सुनिए- ‪ “#‎Youth_for_Right_to_Employment नाम से संगठित होकर बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे साथियों की RTI से प्राप्त आंकड़ों के मायालोक में आपका स्वागत है। जब हम कहते हैं कि इस देश में बहस उन मुद्दों पर होनी चाहिए, जो करोड़ों लोगों के रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े हैं तो इसका एक अर्थ भी यह है कि हम आपको खींचकर ज़बरदस्ती वहाँ ले जाना भी जानते हैं जहाँ आप या तो जाना नहीं चाहते या जा नहीं पाते। मसलन सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे प्रोजेक्टेड मैटीरियल की मायावी दुनिया से निकलकर आइये हमारी दुनिया में, जिसकी आह आप तक नहीं पहुंचती। लाखों पद ख़ाली हैं, युवा बेरोज़गार अवसाद-अपराध-आत्महत्या के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं और 5 फ़ीसदी घराने 50℃ को चिढ़ाते हुए 5℃ में बिसलरी कोक में पिज़्ज़ा जोड़कर सॉफ़्टी के साथ राष्ट्र निर्माण कर रहे हैं। हमारे सपनों का भारत आप वाले से मैच नहीं कर रहा है।
इस बार हम रेलवे के अन्याय को आपके सामने ला रहे हैं। जिस रेलवे को देश का सबसे बड़ा, सबसे मजबूत, सबसे ताक़तवर निकाय माना जाता है, वह कर्मचारियों की भयानक कमी से जूझ रहा है। ग्रुप बी वाले सी का और ग्रुप सी वाले ग्रुप डी का भी काम बिना किसी शिफ्ट के कर रहे हैं, ताकि देश का यह तमगा चमकता रहे। इसके एवज़ में ‘ओवरटाइम’ का लॉलीपॉप। नई नियुक्ति की बजाय जुगाड़। आप भी ट्राई कीजियेगा- सफ़र के दौरान किसी रेलवे कर्मी से बात कीजिये, आँख फ़टी रह जाएगी, कान और रोंगटे खड़े के खड़े। नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से ध्वस्त। कई वर्षों बाद 2015 के अंत में कथित ‘बम्पर वैकेंसी’ आती है, वह भी 18,252 मात्र। इसमें लगभग सभी वेतनमान के पद शामिल हैं। इनके लिए अभ्यर्थियों की संख्या 1,00,00,000 से अधिक। करोड़ को शून्य से लिखा, ताकि इसकी भयावहता आप तक पहुंचे। महीनों तक ऑनलाइन परीक्षा, आईपी ऐड्रेस हैक करने से लेकर तमाम ऐसी ख़बरें, जो प्राइम टाइम की राष्ट्रवादी डिबेट से ग़ायब। यह कौन सी प्रतियोगिता होगा और किसको विजयी घोषित करेगी, पता नहीं।
अब आइये, आंकड़े की दुनिया में। रेलवे के सभी डिवीज़न, सब-डिवीज़न से हमारी RTI का जवाब आते जा रहे हैं। इनमें आधे से अधिक ने ख़ाली पदों की संख्या का जवाब ही नहीं दिया है। किसी किसी ने तो ऐसा घुमाया है कि आपका विश्वास उठ जाए तमाम मान्यताओं से। कहीं कहीं ऐसे घपले की आग लग जाए, लेकिन इनपर बात फिर कभी। ख़ाली पदों का जो औसत निकल कर आ रहा है, वह कुल कर्मियों का चौथाई हिस्सा होगा। हम आपसे कुछ नमूने साझा कर रहे हैं। इन पर आप सोचियेगा। यदि इन औसतों पर हम गणना करें तो बम्पर वैकेंसी से लगभग 20 गुना पद ख़ाली हैं। 30 से ज़्यादा प्रमाण अपलोड करने की छूट तो फ़ेसबुक भी नहीं दे रहा है, फिर भी कुछ दस्तावेज़ आपके सामने हैं। ये नमूने हैं। खेल यह भी किया गया है कि तमाम जगहों से ग्रुप सी व डी के कुल आंकड़े ही नहीं दिए गए हैं।
एक सवाल यह भी, कि अगर आप एक केंद्रीकृत आंकड़ा बनाते तो आप इस देश के नौजवानों को पारदर्शी ढंग से उनका हक़ दिलाने में मदद करते। आप पूछने पर यूँ बाज़ीगरी न दिखाते। हम इन दस्तावेज़ों के साथ आपसे फ़िर से मांग करते हैं कि हे ‘प्रभो’! रेलवे की सभी श्रेणियों के अलग अलग डिवीज़न-सबडिवीज़न में ख़ाली पदों की कुल संख्या बताइये और इनको शीघ्र भरने के लिए प्रावधान कीजिये। हमारे अनुमान के मुताबिक़ यह कुल संख्या 3.5 लाख से अधिक होगी। हम ग़लत हैं, तो सभी आंकड़े ठीक नियम के अनुसार सार्वजनिक किये जाएं, हमारी चुनौती को स्वीकार किया जाए। वरना यह अब और जोरदार ढंग से सड़क से संसद तक आपको सुनाई देने वाली है।
हमने तो तय कर लिया है, हर तरह के छात्र-युवा विरोधी अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने, चुनौती देने का। आप भी आ गए तो और बात होगी” (लक्ष्मण यादव की फेसबुक वाल से https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1307310652630224&set=pcb.1307312962629993&type=3)
 इन छात्रों की अपनी मांगें हैं। यह रोजगार को अपना मौलिक अधिकार बनाने की पुरजोर लड़ाई लड़ रहे हैं। देश और राज्य की सरकारों से इनकी वाजिब अपील है कि सरकारी विभागों और संस्थानों में सालों से खाली पड़े लाखों पद शीघ्र भरे जाएँ। इनके पास सैकड़ों आरटीआई  बेस स्वीकृत खाली पदों के डाटा हैं। यह एकजुट होकर एक बड़ी मुहिम चला रहे हैं। देश की सरकारों को जल्दी से समय रहते जाग जाना चाहिए। यह बहुत बुरा समय है ज्यादा नींद अच्छी नहीं। एक यह भी विचारणीय प्रश्न है कि आखिर सरकारें इन खाली पड़े पदों को क्यों नहीं भरना चाहती ? इसका हम एक अंदाजा लगा लेते हैं कि सरकारों के पास बजट नहीं होगा, लेकिन यह सब अंदाजा भर है। इसके पीछे सच्चाई कुछ और ही है। सरकारों के अपने भाट और चारण हैं जिनके फायदे के लिए ये कमाऊ योजनाएं निकालने में मशगूल हैं। यह सब अधिकार सुख की चीजें हैं, जिन्हें सरकारें अपने पिछलग्गुओं के लिए संरक्षित करने में लगी हुई हैं। समय रहते चेत जाइए सरकार !! चेतिए ‘जन-गण-मन-अधिनायक !!’

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