बैंकों में मुद्रा कैद, सड़कों से नेता गायब, एकदम दिव्यांग भारत!

बैंकों में मुद्रा कैद, सड़कों से नेता गायब, एकदम दिव्यांग भारत!
जगदीश्वर चतुर्वेदी

मोदीजी कैसे हैं, जनहितकारी हैं या जनविरोधी हैं। यह तय करना हो तो क्या करें ?
मोदी भक्त कह रहे हैं, मोदी कैसे हैं यह तय करना होतो मोदी के बयानों को देखो और उनको ही मानो !
लेकिन जिंदगी का तजुर्बा कहता है किसी भी व्यक्ति की असलियत उसके बयानों में नहीं उसके कर्मों के ठोस यथार्थ में देखनी चाहिए. मसलन्,कोई शिक्षक कहे कि मैं बढ़िया शिक्षक हूं, खूब पढ़ा लिखा हूँ। जाहिर है उसके बयान के आधार पर तय नहीं होगा, तय इस बात से होगा कि वह नियमित समय पर पढाने जाता है या नहीं, शोध करता है या नहीं, किताबें लिखता है या नहीं, जब पढाता है तो छात्रों का अनुभव क्या है, नया कितना पढ़ाता है, आदि बातों की रोशनी में तय होगा कि शिक्षक कैसा है न कि उसके बयानों के आधार पर।
यही बात मोदीजी पर लागू होती है, उनकी नीतियां व्यवहार में आम जनता को सुख दे रही हैं या दुख दे रही हैं, सुख दे रही हैं तो मोदीजी अच्छे हैं, दुख दे रही हैं तो मोदीजी बुरे हैं, जनविरोधी हैं।

हाल ही में लागू की गयी नोट नीति की परीक्षा इसी आधार पर करनी चाहिए, कौन क्या कहता है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है आम जनता का यथार्थ अनुभव।
नई नोट नीति का यथार्थ अनुभव बेहद खराब, पीड़ादायक और विनाशकारी है। इसलिए चैनल क्या कह रहे हैं, मोदी क्या कह रहे हैं लोग क्या कह रहे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है यथार्थ अनुभव।
नई नोट नीति का यथार्थ अनुभव है अपने पैसों को आप बैंक से निकाल नहीं सकते, गैर जरूरी तौर पर अनेक शर्तें आप थोप दी गयी हैं, घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ता है, समस्त बाजार ठप्प पड़ा है, यह रीयल यथार्थ है और यह यथार्थ पीड़ादायक है, फलतःहम तो यही कहेंगे मोदीजी की नोट नीति जनविरोधी है।

आम तौर लोग कह रहे हैं मोदीजी की नीति सही है बस थोड़ी परेशानी हो रही है, नोट मिल जाएं बाकी सब ठीक हो जाएगा।
इस तरह की धारणा के पीछे जनता में सक्रिय गुलामदशा और परजीवी दशा ही काम कर रही है, इसी दशा का दोहन करके नरेन्द्र मोदी लोकसभा का चुनाव जीतक आए हैं, इस तरह की मनोदशा के काऱण समाज में शोषण के अनेक स्तर धडल्ले से चल रहे हैं। गुलामगिरी को लोकतांत्रिकचेतना नहीं कहते।

मोदी की नोट नीति से सबसे ज्यादा कमाया है ज्वैलर्स ने, नोट दलालों और एक का दो करने वालों ने।
फिल्म उद्योग बंद, बाजार ठप्प, सार्वजनिक परिवहन खासकर बस और ट्रक का संचालन ठंडा, सब्जी-फल सड़ रहे हैं, शादियों में सूखे शंख बज रहे हैं, बराती रो रहे हैं, बैंकों में मुद्रा कैद, सड़कों से नेता गायब,कितना सुंदर लग रहा है मेरा भारत, एकदम दिव्यांग भारत!