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ब्राह्मण के बदले ब्राह्मण!

अवधेश आकोदिया

वैसे तो महाराष्ट्र की राजनीति से राजस्थान का कोई सीधा कनेक्शन नहीं है, लेकिन आदर्श सोसायटी घोटाले की भेंट चढ़े अशोक चव्हाण की जगह की पृथ्वीराज चव्हाण की ताजपोशी ने सूबे में कांग्रेस का कप्तान बनने का ख्वाव सजा रहे ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदों के पंख लगा दिए हैं। आलाकमान ने महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन करते समय जिस तरह से कास्ट केमिस्ट्री का ध्यान रखा है, उसके बाद कयास लगाया जा रहा है कि राजस्थान में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का मसला भी इसी फॉर्मूले से सुलझाया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो डॉ. सीपी जोशी की जगह कोई ब्राह्मण नेता ही लेगा। ब्राह्मण की जगह ब्राह्मण फॉर्मूले से मोहन प्रकाश, सांसद डॉ. महेश जोशी, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. गिरिजा व्यास, महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष बीडी कल्ला, विधायक रघु शर्मा और मंत्री बृजकिशोर शर्मा के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं।
महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन से पहले भी प्रदेशाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नेताओं की दावेदारी मजबूत थी, क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग की लिहाज से ओबीसी, अल्पसंख्यक और एससी-एसटी को पहले ही बहुत कुछ मिल चुका है। ओबीसी वर्ग में सबसे मजबूत जाटों की बात करें तो छह जाट लोकसभा में हैं और नरेंद्र बुडानिया दूसरी मर्तबा राज्यसभा में पहुंच चुका है। केंद्र में महादेव सिंह खंडेला मंत्री हैं तो कमला गुजरात में राज्यपाल हैं। युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष भी इसी वर्ग से हैं। ओबीसी वर्ग के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं तो डॉ. प्रभा ठाकुर महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सचिन पायलट केंद्र में असरदार मंत्री हैं। विजयलक्ष्मी बिश्नोई महिला कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। मूल ओबीसी के 14 और 17 जाटों सहित कुल 31 विधायक हैं। इनमें से छह जाट, एक जट सिख और तीन मूल ओबीसी के मंत्री हैं। साफ है पार्टी अब किसी जाट या ओबीसी को ही प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की राजनीतिक मजबूरी से उबर चुकी है। जहां तक अल्पसंख्यक का सवाल है विधानसभा चुनाव हारे अश्क अली टाक को राज्यसभा पहुंच गए हैं। मुख्य सचिव भी मुस्लिम हैं। विधायकों में से दस अल्पसंख्यक हैं तो मंत्रिमंडल में दो हैं। एससी-एसटी को देखें तो दोनों के तीन-तीन सांसद राज्यसभा और लोकसभा में हैं। नमोनारायण मीणा केंद्र में मंत्री हैं। उन्हें सामान्य कोटे की सीट मिली है। जगन्नाथ पहाडिय़ा हरियाणा के राज्यपाल हैं। विधायकों में से 18 एससी और 20 एसटी के हैं। गहलोत कैबिनेट में चार एससी और आठ एसटी के हैं।
इस लिहाज से देखें तो ब्राह्मणों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। तीन ब्राह्मण लोकसभा और एक राज्यसभा में हैं। आनंद शर्मा और सीपी जोशी केंद्र में मंत्री हैं। बीएल जोशी राज्यपाल हैं। गिरिजा व्यास महिला आयोग की अध्यक्ष हैं। इसके बावजूद भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का सोच रही कांग्रेस में इस वर्ग को प्रतिनिधित्व की उम्मीद जताई जा रही है। ब्राह्मण नेताओं में डॉ. महेश जोशी, ममता शर्मा, रघु शर्मा, ममता शर्मा, बीडी कल्ला और बृजकिशोर शर्मा के नाम तो पहले से चल रहे थे अब इसमें मोहन प्रकाश और डॉ. गिरिजा व्यास का नाम नया जुड़ा है। मोहन प्रकाश पूर्व राज्यपाल नवलकिशोर शर्मा की पसंद माने जाते हैं। उनकी छवि वैचारिक दृढ़ता वाले नेता की है। बीएचयू के छात्र संघ अध्यक्ष रहे मोहन प्रकाश आठवीं विधानसभा में धौलपुर के राजाखेड़ा से लोकदल के विधायक थे। उनके पिता डॉ. मंगल सिंह बाड़ी से कांग्रेस की टिकट पर पहली विधानसभा के सदस्य बने थे। माना जाता है कि जनार्दन द्विवेदी और नवलकिशोर शर्मा जैसे नेताओं ने उनका नाम आगे बढ़ाया है। गिरिजा व्यास उन्हें टक्कर दे रही हैं। उनको लेकर आलाकमान के ध्यान में यह बात भी है कि वरिष्ठ होने के बाद भी उन्हें मनमोहन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली थी। सीपी जोशी को केबिनेट में एडजस्ट करना गिरिजा को ही भारी पड़ा था। ऐसे में आलाकमान जोशी की जगह उनकी ताजपोशी कर सकता है।
मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने से पहले डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को तगड़ा दावेदार माना जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा का गढ़ कही जाने वाली जयपुर सीट से फतह हासिल कर संसद में पहुंचे महेश जोशी का नाम प्रदेशाध्यक्ष के लिए तब से चल रहा है, जबसे डॉ. सीपी जोशी केंद्र में मंत्री बने हैं। वे इसके लिए लॉबिंग भी अच्छे से कर रहे हैं। उन्हें पता है कि आलाकमान उसे ही यह जिम्मेदारी देगा, जो गहलोत और सीपी दोनों की पसंद हो। इसलिए वे एक अरसे से इस तरह की राजनीति कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी खुश रहें और सीपी जोशी भी नाराज न हो। हालांकि जयपुर नगर निगम चुनाव के दौरान उम्मीदवार चयन पर सीपी के साथ उनकी तनातनी हो गई थी, लेकिन राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में उन्होंने सभी गिले-शिकवे दूर कर दिए। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में कई आला नेता उनकी आवाज दस जनपथ तक भी पहुंचा रहे हैं। हालांकि मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने के बाद उनकी पैरवी करने वाले नेताओं की संख्या कम हुई है।
इधर महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा भी अपने दावे पर डटी हुई हैं। उन्हें महिला होने का फायदा मिल रहा है, लेकिन सीपी जोशी से उनका छत्तीस का आंकड़ा भारी पड़ रहा है। सीपी से उनकी प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है। ममता शर्मा ने लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोटा-बंूदी सीट से टिकट मांगा था, लेकिन सीपी जोशी ने उनके खिलाफ लॉबिंग की और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाने वाले इज्येराज सिंह को टिकट दिलवा दिया। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव में बूंदी जिला प्रमुख के लिए ममता शर्मा के खास माने जाने वाले राकेश बोयत को टिकट नहीं दिया। और जब वे बागी ही मैदान में कूद जीतने में सफल रहे तो ममता शर्मा से महिला कांग्रेस की जिम्मेदारी छीन आलाकमान से उनकी शिकायत कर दी। हालांकि दस जनपथ अपने जोरदार रसूखों के दम पर ममता ने इसका करारा जबाव दिया और आलाकमान ने उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए भी ममता शर्मा का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट यही है राजस्थान में गहलोत कैंप और दिल्ली में जर्नादन द्विवेदी कैंप उनकी पैरवी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसी के दम पर उनका राज्यसभा जाना तय हो गया था, लेकिन ऐनवक्त पर आनंद शर्मा के राजस्थान आने से गणित बिगड़ गया। ममता का प्रदेशाध्यक्ष बनना इस पर निर्भर करेगा कि अशोक गहलोत उन्हें कितना सपोर्ट करते हैं।
जहां तक अन्य ब्राह्मण दावेदारों का सवाल है तो वे डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को टक्कर नहीं दे पा रहे हैं। जहां बीडी कल्ला पूर्व में भी अध्यक्ष रह चुके हैं और उम्र भी उनके आड़े आ रही है, वहीं विधायक रघु शर्मा पर खुद का बड़बोलापन भारी पड़ रहा है। गौरतलब है कि रघु एक अरसे से पार्टी और सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयानबाजी कर रहे हैं। यहां तक कि विधानसभा में भी कई मंत्रियों की घेराबंदी कर चुके हैं। पिछले सत्र में तो उन्होंने पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री भरत सिंह को अवसाद का शिकार बता सनसनी फैला दी। हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्राम सेवकों का मामला उठाते हुए उन्होंने कहा कि ‘मंत्री मानसिक अवसाद के शिकार हैं। इनको डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। ग्रामसेवक और सरपंच हड़ताल कर रहे हैं। ग्रामीण विकास की नोडल एजेंसी का काम ठप है। मंत्री ने हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्रामसेवकों सें ज्ञापन तक नहीं लिया। मंत्री को यह तक पता नहीं है कि इनका मांग पत्र क्या है। ये खुद ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बन रहे हैं, लेकिन कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। ईमानदार हैं तो जनता के निर्वाचित राजस्थान के सभी सरपंचों को चोर ठहराने का इनका कोई अधिकार नहीं बनता। आज नरेगा में 500 सरपंचों के खिलाफ एफआईआर करवा दी गई हैं, ऐसे में काम कैसे होगा। सरपंच को 14 फंदों में फांसकर उससे कैसे उम्मीद करते हैं कि नरेगा का काम ठीक तरह से होगा।’ इस तरह की चर्चा है कि सीपी जोशी के इशारे पर रघु शर्मा ऐसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस मुहिम से गहलोत खासे खिन्न हैं। सूत्रों की मानें तो उन्होंने यह तय कर लिया है कि रघु को किसी भी स्थिति में अध्यक्ष नहीं बनने देना हैं। जहां तक गहलोत सरकार में मंत्री बृजकिशोर शर्मा का सवाल है, तो इसके लिए वे खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं।
महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल गैर ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदें धूमिल जरूर हुई हैं, लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं। कई नेताओं अभी भी लॉबिंग में लगे हुए हैं। जाट नेताओं में पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान, सांसद लालचंद कटारिया और नेरंद्र बुड़ानिया का नाम चर्चा में है। इन तीनों नेताओं को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का विश्वासपात्र माना जाता है। पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन कद्दावर नेता हैं। सॉफ्ट जाट के रूप में उनकी स्वीकार्यता सभी गुटों में है। सांसद कटारिया भी प्रदेशाध्यक्ष बनने की कोशिश में हैं। उनका एकमात्र सहारा गहलोत हैं। पिछले दिनों जब पार्टी उपाध्यक्ष डॉ. हरी सिंह ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमला किया तो बचाव में आने वाले प्रमुख जाट नेता थे। गहलोत से नजदीकियों के चलते राज्यसभा सांसद नरेंद्र बुडानिया का नाम भी सुर्खियों में है। यदि जाट अध्यक्ष चुना जाता है तो उनकी दावेदारी प्रबल है। हालांकि किसी जाट को मौका मिलने की संभावना कम ही लग रही है। ठीक इसी तरह से अल्पसंख्यक समुदाय की दावेदारी भी कमजोर पड़ रही है। अश्क अली टांक के राज्यसभा जाने और एस. अहमद के मुख्य सचिव बनने के बाद किसी अल्पसंख्यके प्रदेशाध्यक्ष बनने की संभावना कम ही है। वैसे चिकित्सा मंत्री दुर्रू मियां और अश्क अली टांक इस वर्ग के दावेदारों में शामिल हैं। अनुसूचित जाति व जनजाति कोटे से सांसद रघुवीर मीणा और कार्यकारी अध्यक्ष परस राम मोरदिया का नाम चर्चाओं में है।
राजपूत दावेदारों में भंवर जितेंद्र सिंह का नाम चर्चा में है। वे राहुल के काफी नजदीकी हैं, लेकिन राहुल के संगठन संबंधी जरूरी कामों को संभालने वाले जितेंद्र प्रदेश की राजनीति में शायद ही रुचि लें। वैश्य दावेदारों में पूर्व वित्त मंत्री प्रद्युम्न सिंह और संयम लोढ़ा का नाम लिया जा रहा है। दोनों पहले गहलोत कैंप में थे, लेकिन संयम अब सीपी के साथ हैं। बहरहाल, निर्णय अब सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अहमद पटेल, राजस्थान के प्रभारी मुकुल वासनिक और चुनाव प्रभारी जनार्दन द्विवेदी के हाथों में है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की राय महत्वपूर्ण रहेगी। सीपी जोशी, भंवर जितेंद्र सिंह और सचिन पायलट से भी सलाह मशविरा किया जाएगा। हालांकि कोई चौकाने वाला फैसला तब ही आ सकता है जब राहुल गांधी इस मामले में विशेष रुचि लें। उनके हस्तक्षेप के बाद ही किसी ऐसे नए चेहरे को प्रदेश की कमान दी सकती है, जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं हो।

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