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ब्रिक्स में मोदीजी और भोंपू नेटवर्क- ब्रिक्स में मौक़ा चूक गए मोदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी
नरेन्द्र मोदी का पीएम के नाते ब्रिक्स सम्मेलन पहला बड़ा कूटनीतिक सम्मेलन था। इस सम्मेलन में क्या हुआ ? भारत ने क्या खोया और क्या पाया यह बात भारत का मीडिया कम से कम जानता है।
मोदीजी ने अपनी ख़ामियों को छिपाने की रणनीति के तहत मीडिया के समूचे तामझाम को अपनी यात्रा से बेददखल कर दिया।
‘नियंत्रित ख़बरें और सीमित कवरेज’ की रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर भक्तटीवी चैनलों का भोंपू की तरह इस्तेमाल किया। यह एक तरह से भोंपू टीवी कवरेज यानी अधिनायकवादी कम्युनिकेशन मॉडल की वापसी है। दुर्भाग्यजनक है कि भारत में व्यापक मीडिया नेटवर्क के रहते हुए मोदी ने भोंपूनेटवर्क का ब्रिक्स कवरेज के लिए इस्तेमाल किया।
ब्रिक्स भोंपू टीवी कवरेज की ख़ूबी थी कि पीएम कम और भोंपू ज़्यादा बोल रहे थे। पहली बार ऐसा हुआ कि जो मीडिया साथ में गया था उससे भी सम्मेलन और सामयिक विश्व घटनाक्रम पर मोदीजी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपने ज्ञान-विवेक और विश्व राजनीतिक नज़रिए का परिचय नहीं दिया। यहाँ तक कि सम्मेलन में भी मोदीजी ने सरलीकृत रूप में गोल-गोल बातें कीं।
ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी अपने विदेशनीति विज़न को सामने नहीं रख पाए और यह बताने में असमर्थ रहे कि इन दिनों राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ी चुनौती क्या है ? कम से कम इस मामले में मनमोहन सिंह का रिकॉर्ड बेहतर रहा है उनके भाषण हमेशा नई रणनीतियों के परिप्रेक्ष्य से भरे रहते थे। उनके बोलने का गंभीर असर होता था और नई समस्याओं को हल करने में उनके नज़रिए से विश्व के नेताओं को मदद मिलती थी, लेकिन मोदीजी ने इस पक्ष का अभी विकास नहीं किया है।
मोदीजी भारत की सक्रिय नीति निर्माता की भूमिका को महज़ हिन्दी वक़्ता की भूमिका तक सीमित करके देख रहे हैं।
मोदी सरकार को समझना होगा कि भारत को विश्व राजनीतिक मंचों पर महज़ हिन्दी वक्ता के रूप में नहीं सक्रिय नीति निर्माता के रूप में भूमिका निभानी है।
मोदीजी और उनके मंत्रीमंडल के सहयोगियों को विदेश नीति से लेकर अन्य नीतियों के संदर्भ में विश्व मंचों पर हिन्दी वक्ता के दायरे के बाहर निकलकर सोचना होगा। भाषा प्रेम और सरलीकृत भाषणों से आगे निकलकर नीतिगत तौर पर पहल करनी होगी। विश्व की जटिलताओं को समझना होगा और उनमें हस्तक्षेप करना होगा। ब्रिक्स में वे मौक़ा चूक गए।

About the author

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक प्रगतिशील चिंतक, आलोचक व मीडिया क्रिटिक हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चतुर्वेदी जी आजकल कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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