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ब्रिटेन आउट, कैमरुन आउट! संप्रभु ब्रिटिश नागरिकों ने यूरोपीय समुदाय के धुर्रे बिखेर दिये

संप्रभु ब्रिटिश नागरिकों ने यूरोपीय समुदाय के धुर्रे बिखेर दिये और कबंध अंध देश के हमारे हुक्मरान नरमेधी सुधार तेज कर रहे हैं।
सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हो और लोकतंत्र जिंदा हो।
सत्ता के झंडे लहराते हुए भारत माता की जय बोल देने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता बल्कि राष्ट्रहित में सत्ता से टकराकर सरफरोशी की तमन्ना ही असल देशभक्ति है
पलाश विश्वास
ब्रेक्सिट हो गया आखिरकार। दुनियाभर में रंग बिरंगी अर्थव्यवस्थाओं में सुनामी है आज। ब्रिटेन आउट। कैमरुन आउट। ब्रिटिश जनता ने यूरोपीय समुदाय के धुरेरे बिखेरने के साथ सात कैमरुन का तख्ता पलट दिया।

सेबों की गाड़ी उलट गयीं। सेबों की लूट मची है। किसके हिस्से कितने सेब आये, हिसाब होता रहेगा।
बहरहाल शरणार्थी समस्या और विकास के नाम विस्थापन और आव्रजन का चक्र महामारी की तरह दुनिया के नक्शे में जहां तहां जैसे संक्रमित हो रही है, उसे समझे बिना ब्रेक्सिट को समझना असंभव है। क्योंकि ब्रेक्सिट का सबसे बड़ा कारण यह शरणार्थी समस्या है, जिससे भारत विभाजन के बाद हम लगातार जूझने के बदले भुनाते रहे हैं और विकास के नाम विस्थापन का जश्न मनाते हुए बाहर से आने वाले शरणार्थियों के मुकाबले देश के भीतर कहीं ज्यादा शरणार्थी बना चुके हैं।
ब्रिटेन में अल्पसंख्यक होते जा रहे ब्रिटिश मूलनिवासियों की यह प्रतिक्रिया है तो समझ लीजिये, भारत के मूलनिवासी जागे तो भारत में क्या होने वाला है।
जिन्हें दसों दिशाओं में समुदरों और पानियों में, फिजाओं में लाखोलाख आईलान की लाशें नजर नहीं आतीं, जिन्हें खून का रंग नजर नहीं आता, वे समझ नहीं आखिर क्यों यूरोप में मुक्तबाजार से इतना भयानक मोहभंग हो रहा है। क्यों फ्रांस में भयंकर जनविद्रोह है? और क्यों ब्रिटेन यूरोपीय समुदायसे अमेरिका का सबसे बड़ा पिछलग्गू होने के कारण अलग हो रहा है?

हम फेंकू पुराण के श्रद्धालु पाठक हैं और सारी दुनिया से अलगाव की तेजी से बन रही परिस्थितियों पर हमारी नजर नहीं है वरना एनएसजी के लिए हम पगलाये न रहते।
आसमानी फरिशतों के दम पर राष्ट्र का भविष्य बनता नहीं है, बल्कि उसका भूत वर्तमान भी तहस नहस हो जाता है। ऐसा बहुत तेजी से घटित हो रहा है और हम देख नहीं पा रहे हैं।
मुक्तबाजार को यूरोप में शरणार्थी सैलाब ने तहस नहस कर दिया है और हमारे हुक्मरान रोज रोज शरणार्थी सैलाब पैदा कर रहे हैं।
लोकतंत्र का ढांचा वही है लेकिन संसद में अध्यक्ष की कुर्सी के नीचे वह ऊन नहीं है जो ब्रिटेन की विरासत के साथ संसद को जोड़ती है और हमारी संसदीय प्रणाली हवा हवाई है। जबकि यह संसदीय प्रणाली भी उन्हीं की है। जिसे हम अक्सर अपनी दुर्गति की खास वजह मानते हैं। हमारे ज्यादातर कानून उन्हीं के बनाये हुए हैं। हमारे संविधान में उनके अलिखित संविधान की परंपराओं की विरासत है। फर्क सिर्फ इतना है कि वे स्वतंत्र संप्रभु नागरिक हैं और हम आज भी ब्रिटिश राज के जरखरीद गुलाम, राजा रजवाड़ों जमींदारों के उत्तर आधुनिक वंशजों के कबंध अंध प्रजाजन हैं।
ब्रिटिश नागरिकों ने आधार योजना लागू करने के खिलाफ पहले ही सरकार गिरा दी और नाटो की यह योजना नाटो के किसी सदस्य देश में लागू नहीं हुई। एकमात्र मनुस्मृति राजकाज के फासीवाद तंत्र मंत्र तिलिस्म में नागरिकों की निगरानी और उनके अबाध नियंत्र के लिए नरसंहारी मुक्तबाजार का यह सबसे उपयोगी ऐप लगा ली है।
अपनी आंखों की पुतलियां और उंगलियों की चाप कारपोरेट हवाले कर देने वालों को मुक्तबाजार के नरसंहारी सलाव जुड़ुम परिदृश्य में सब मजा सब मस्ती न घर न परिवार न समाज न देश मनोदशा के कार्निवाल बाजार में क्रयशक्ति की अंधी मारकाट और सत्तावर्ग की फेंकी हड्डियां बटोरने से कभी फुरसत हो तो मनुष्यता, सभ्यता, प्रकृति और पर्यावरण के बारे में सीमेंट के इस घुप्प अंधियारा जंगल में सोचें। … और विवेक काम करे, अब यह निहायत असंभव है। इसीलिए कही जनता की कोई आवाज नहीं है।

हम न सिर्फ अंध हैं, हम मूक वधिर मामूली कल पुर्जे हैं, जिनमें कोई संवेदना बची नही है तो चेतना बचेगी कैसे।
हम सार्वजनिक सेवाओं और संस्थानों का जैसे निजीकरण के पक्ष में हो गये हैं, तो हमें लोकतंत्र और राजकाज, राजकरण के कारपोरेट बन जाने से कोई तकलीफ उसी तरह नहीं होगी जैसे हमें भाषाओं, माध्यमों, विधायों, सौंदर्यबोध, संस्कृति और लोकसंस्कृति, जाति और धर्म, मीडिया और मनोरंजन, शिक्षा दीक्षा चिकित्सा और परिवहन के कारपोरेट हो जाने से चारों तरफ हरियाली नजर आती है और खेतों, खलिहानों, समूचे देहात, कल कारखानों, लघु उद्योगों, खुदरा बाजार के कब्रिस्थान में बदलने से हमारी शापिंग पर असर कोई होना नहीं है, बशर्ते कि क्रयशक्ति सही सलामत रहे।
यह इस देश के पढ़े लिखे तबकों का खुदगर्ज बनने की सबसे बड़ी वजह है।
उनके हिसाब से पैसा ही सबकुछ है और बाकी कुछ भी नहीं है। अपढ़ लोगों में भी यह ब्याधि अब लाइलाज है। भाड़ में जाये देश।
अब फिर संप्रभु स्वतंत्र ब्रिटिश नागरिकों ने सत्ता का तख्ता पलट दिया है क्योंकि उन्हें यूरोपीय समुदाय में बने रहना राष्ट्रहित के खिलाफ लगता है।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने इस्तीफे का एलान किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अक्टूबर में अपने पद से इस्तीफा देंगे। अक्टूबर में ब्रिटेन के नए पीएम का फैसला होगा।
सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले अपने ही बच्चों को राष्ट्रविरोधी बताकर उनपर हमला करने वाले हम, जात पांत मजहब के बहाने असमता और अन्याय के झंडेवरदार और मनुस्मृति राज की पैदलसेनाएं हम क्या सपने में भी अपने इस कबंध अंध देश में ऐसा लोकतंत्र बहाल कर सकते हैं?

क्या हम कभी अनंत बेदखली और अनंत विस्थापन के खिलाफ मोर्चाबंद हो सकते हैं?
विश्व इतिहास में बर्लिन की दीवार गिरने के बाद इस घटना को सबसे अहम माना जा रहा है। वो ब्रिटेन जिसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय देशों को करीब लाने के लिए यूरोपियन यूनियन के आइडिया को जन्म दिया, कई सालों तक उसका पैरोकार रहा और आज उसी देश ने खुद ईयू से अलग होने का फैसला किया।
अमेरिकी नागरिक रंगभेद के खिलाफ अश्वेत रष्ट्रपति चुन सकते हैं लेकिन हम सभी समुदायों को समान अवसर और समान प्रतिनिधित्व देने के लिए किसी भी स्तर पर तैयार नहीं हैं।
न संविधान कहीं लागू है और न कही कानून का राज है। संसद में क्या बनता बिगड़ता है, किसी को मालूम नहीं है क्योंकि कोई भी ऐरा गैरा मंत्री संत्री प्रवक्ता इत्यादी संवैधानिक असंवैधानिक नीति निर्माण संसदीय अनुमति के बिना , संसद की जानकारी के बिना कर देता है और मुनाफावसूली के कालेधन के मनुस्मृति शासन में वह आन आनन लागू भी हो जाता है। कहीं कोई प्रतिरोध असंभव।
अब बताइये, 1991 से लेकर अब तक जितने सुधार लागू हुए हैं कायदे कानून ताक पर रखकर और संविधान के दायरे से बाहर उनके बारे में हमारे अति आदरणीय जनप्रतिनिधियों की क्या राय है और उन जनप्रतिनिधियों ने अपने मतदाताओं से कब इन सुधारों के बारे में चर्चा की है या उनका ब्यौरा सार्वजनिक किया है।
अब बताइये, ब्रेक्सिट के बहाने जिन अत्यावश्यक सुधारों को लागू करके अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने की उदात्त घोषणाएं की जा रही हैं, उनके लिए क्या संसदीय अनुमति ली गयी है और जनता के मतामत के लिए कोई सर्वे किसी भी स्तर पर किया गया है या नीतिगत फैसलों के लिए किसी भी स्तर पर कोई जनसुनवाई हुई है। जनमत संग्रह की बात रहने दें।

हमारे यहाँ एफआईआर तक दर्ज कराने में पीड़ितो को लेने के देने पड़ जाते हैं। हत्या बलात्कार संस्कृति है इन दिनों। बाहुबलि तो जनप्रतिनिधि हैं।
संप्रभु ब्रिटिश नागरिकों ने यूरोपीय समुदाय के धुर्रे बिखेर दिये और कबंध अंध देश के हमारे हुक्मरान नरमेधी सुधार तेज कर रहे हैं।
सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हों और लोकतंत्र जिंदा हो।
ब्रिटेन के नागरिकों ने संवैधानिक राजतंत्र के बावजूद बायोमैट्रिक नागरिकता की योजना पूरी होने से पहले सरकार बदल दी और अब मुक्तबाजार के सबसे शक्तिशाली तंत्र यूरोपीय यूनियन के धुर्रे बिखेर दिये। गौर करें कि ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह के नतीजतन सिर्फ ब्रिटेन यूरोपीय समुदाय से बाहर नहीं निकल रहा है, प्रबल आर्थिक संकट में फंसे जनांदोलनों की सुनामी में यूरो कप फुटबाल के जश्न में बंद आइफल टावर और रोमांस, कविता और नवजागरण व क्रांति का देश फ्रांस भी अमेरिकी मुक्त बाजार के चंगुल से निकलने के लिए छटपटा रहा है।
फ्रांस के अलावा स्वीडन, डेनमार्क, यूनान, हालैंड और हंगरी के साथ तमाम यूरोपीय देश इस मुक्त बाजार की गुलामी से रिहा होने की तैयारी में हैं।
हमारे हुक्मरान ने इसके बदले ब्रिटेन से उठने वाली इस सुनामी में अपने अमेरिका आकाओं के हितों को मजबूत करने के लिए शत प्रतिशत निजीकरण और शत प्रतिशत विनिवेश का विकल्प चुना है और सीना ठोंककर दावा भी कर रहे हैं कि ब्रेक्सिट से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

उत्पादन प्रणाली ध्वस्त है। रोजगार आजीविका खत्म है।
बुनियादी सेवाएं और बुनियादी जरुरतें बेलगाम बाजार के हवाले हैं तो ये रथी महारथी न जाने किस अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं जिनका वित्तीय प्रबंधन शेयर बाजार में सांढ़ों और भालुओं के खेल का नियंत्र करके बाजार को लूटतंत्र में तब्दील करने और कर्ज और करों का सारा बोझ आम जनता पर डालने के अलावा कुछ नहीं है।
हम अमेरिका की तरह सीधे राष्ट्रपति का चुनाव नहीं करते और न हमारे यहां राष्ट्रपति सरकार के प्रधान है और न राजकाज से उनका कोई मतलब है। बकिंघम राजमहल की तरह रायसीना हिल्स के प्रासाद में वे संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष मात्र हैं और अपने तमाम विशेषाधिकारों के बावजूद भरत की सरकार या राज्य सरकारों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। वे सिर्फ अभिभाषण के अधिकारी हैं। या अध्यादेशों और विधेयकों पर अपना टीप सही दाग देते हैं।
न ही हम राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों के तौर तरीके या नीतिगत फैसलों के लिए जनमत संग्रह करा सकते हैं।
सरकार संसद के प्रति जिम्मेदार है, राजनीति शास्त्र में यही पढ़ाया जाता है और संविधान भी यही बताता है और संसद में अपने प्रतिनिधि जनता चुनकर भेजती है। लेकिन भारतीय जनता के लिए उनका ही तैयार जनादेश मृत्युवाण रामवाण है क्योंकि इस जनादेश के बाद सरकारें न संसद की परवाह करती हैं और न विधानमंडलों की। घोषणाओं पर टैक्स लगता नही है। सुर्खियां अलग मिलती हैं।
सबकुछ खुल्ला खेल फर्रूखाबादी मुक्तबाजार है, जिसके पास घोड़ों को खरीदने लायक अकूत संसाधन हैं वे गिनती के लिए चाहे जैसे भी हों, कैसे भी हों रंगबिरंगे घोड़े खरीद लें और उन घोड़ों के खुरों से आवाम को रौंदते रहें। यही राजकाज है और राजधर्म भी यही ता राजकरण भी यही है।
फिर भी सच यह भी है कि सत्ता निरंकुश नहीं होती अगर देश के नागरिक मुर्दा न हो और लोकतंत्र जिंदा हो।
सत्ता के झंडे लहराते हुए भारतमाता की जय बोल देने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता बल्कि राष्ट्रहित में सत्ता से टकराकर सरफरोशी की तमन्ना ही असल देशभक्ति है और इसके लिए निरंकुश सत्ता से टकराने का जिगर चाहिए जो हमारे पास फिलहाल हैं ही नहीं। पुरखे जरूर रहे होंगे वरना वे हजारों साल से गुलामी के बदले शहादतों का सिलसिला नहीं बनाते। पुरखौती की भी ऐसी की तैसी। दर्जनों गांव जलाने वाले फिर पुरखौती की नौटंकी करते हैं।
मजबूत अर्थव्यवस्था का नजारा यह है कि ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर होने के जनमतसंग्रह के नतीजे के कारण भारतीय शेयर बाजार में कुछ ही मिनटों के अंदर निवेशकों के करीब 4 लाख करोड़ रुपए डूब गए। ब्रिटेन में जनमत संग्रह के नतीजे आते ही टोटल इन्वेस्टर वेल्थ 98 लाख करोड़ के नीचे पहुंच गई।
राजन के जाने के बाद भारत का वित्तीय प्रबंधन नागपुर के संघ मुख्यालय में स्थानांतरित होना है और धर्म कर्म के मनुस्मृति राजधर्म का फर्जीवाड़ा जिन्हें समझ में नहीं आ रहा वे मुक्तबाजार के साथ फासीवादी अंध राष्ट्रवादा का, या जल जंगल जमीन से बेदखली के सलवा जुड़ुम का अर्थशास्त्र नहीं समझ सकते।
समझ लें कि ब्रेक्सिट से पहले अगर शत प्रतिशत अबाध पूंजी है तो नागपुर से संचालित वित्तीय प्रबंधन का जलवा कितना नरसंहारी होगा। शेयर बाजार में जिनके पैसे लगे होंगे वे शेयर बाजार के अपने दांव पर सोचें, लेकिन संघी राजकाज अब जब पेंशन बीमा वेतन जमा पूंजी सबकुछ वित्तीय सुधारों के बहाने शेयर बाजार से नत्थी करने जा रहा है तो समझ लीजिये आगे सिर्फ अमावस्या का अंधकार है। भोर के मोहताज होंगे हम और वह खरीद भी नहीं सकते।
क्योंकि बाकी जनता कमायेगी जरूर लेकिन जेबें किन्हीं खास तबके की मोटी होती रहेंगी और कर्ज, ब्याज और टैक्स का बोझ इतना प्रबल होने वाला है कि नौकरी और आजीविका, खेत खलिहान, कल कारखानों की छोड़िये, जो अभूतपूर्व हिंसा और घृणा का सर्वव्यापी माहौल बनने वाला है, उसमें हर वैश्विक इशारे के साथ डांवाडोल होने वाली अर्थव्यवस्था में किसी की जान माल की कोई गारंटी अब होगी नहीं।

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