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भंग करो अदालतें, फैसला करेंगे केजरीवाल !

अपने कोढ़ को आभूषण बनाना सीखें केजरीवाल से
बिना सबूत किसी भी औरत को वेश्या कह देंगे? उसकी मेडिकल जाँच करा देंगे? औरत की अस्मिता कुछ भी नहीं?
एक अराजकतावादी तानाशाह के पीछे पागल होता देश
अभिरंजन कुमार
(आम आदमी पार्टी के समर्थक इस लेख को ज़रूर पढ़ें और जवाब दें)
अपने कोढ़ को ही कैसे अपना आभूषण बना लिया जाये- यह कोई केजरी भाई से सीखे। अपने मन्त्री सोमनाथ भारती की नालायकी से ध्यान बँटाने के लिये उन्होंने लोकलुभावन मुद्दों की ऐसी नौटंकी तैयार की है कि हाशिये पर पड़ी जनता, सिस्टम और पुलिस से नाराज़ जनता बिना आगा-पीछा सोचे उन्हें क्रांति का फरिश्ता मान बैठी है। ऐसे में यह अस्वाभाविक नहीं है कि मेरे कुछ मित्र आज मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं। ऐसे असहमत मित्रों के सामने कुछ सवाल छोड़ रहा हूँ-
1. अगर किसी स्वयंभू मन्त्री को तुष्ट करने के लिये किसी दिन पुलिस बिना पुख्ता आधार के आपके घर में रेड कर दे और आपके घर की महिला को उठा ले जाये, तो भी क्या आपकी वैसी ही प्रतिक्रिया होगी, जैसी युगांडा की महिलाओं के साथ हुये बर्ताव के बाद हैं?
2. अपने घर की किसी महिला के साथ वैसा बर्ताव होने पर आप मन्त्री की बर्खास्तगी माँगेंगे या सिस्टम की कमियों पर मुख्यमन्त्री का भाषण सुनेंगे?
3. जब अमेरिका में हमारी राजनयिक देवयानी के साथ बदसलूकी हुयी, तब तो हम बड़े उत्तेजित हो रहे थे, लेकिन अब जबकि अपने देश में दूसरे देशों की महिलाओं की अस्मिता का प्रश्न उठा है, तो हम सब दुःशासन की भूमिका में क्यों आ गये हैं? यहाँ यह भी याद रखें कि देवयानी के ख़िलाफ़ तो केस और कुछेक सबूत भी थे, लेकिन युगांडा की महिलाओं के ख़िलाफ़ सुनी-सुनाई बातों के अलावा मन्त्री के पास क्या था?
4. सेक्स रैकेट और ड्रग्स के जाल को आप तोड़ना चाहते हैं, तो हम भी आपका पुरज़ोर समर्थन करते हैं, लेकिन बिना सबूत किसी भी औरत को वेश्या कह देंगे? उसकी मेडिकल जाँच करा देंगे? औरत की अस्मिता कुछ भी नहीं?
5. क्या अपने सिस्टम से हम इतने नाराज़ हो गये हैं कि अब हमें कोई “रूल ऑफ लॉ” चाहिए ही नहीं? क्या हम अपने देश और अपने राज्यों में ऐसी सरकारें चाहते हैं, जिसके कारिन्दे बिना जाँच, बिना सुनवाई, बिना सबूत “ऑन द स्पॉट” फैसला ले ले और किसी को भी सज़ा सुना दे?
6. क्या सरकार चलाने वाले लोग कोई भी आरोप लगने की स्थिति में हमारा-आपका अपने को डिफेंड करने का बुनियादी अधिकार भी छीन लें?
7. पूरे मामले की जाँच के लिये लेफ्टिनेंट गवर्नर ने ज्यूडीशियल कमीशन बनाने का फ़ैसला कर क्या ग़लत किया? और अगर यह सचमुच ग़लत है, तो क्यों नहीं हम सब एक फ़ैसला कर लेते हैं कि अब से इस देश में किसी अदालत, किसी आयोग की ज़रूरत नहीं है?
8. क्या देश की सारी अदालतों और आयोगों को भंग कर केजरी-दरबार को ही त्वरित जाँच, सुनवाई और फ़ैसला देने का अधिकार दे दें?
9. कल तक तो केजरीवाल सीबीआई को, पुलिस को… स्वायत्तता देने के लिये आन्दोलन कर रहे थे। पूरा जनलोकपाल आन्दोलन यही तो था। अब वे पुलिस को अपने अधीन लेने के लिये आन्दोलन क्यों कर रहे हैं? आन्दोलन इस बात के लिये क्यों नहीं कर रहे हैं कि पुलिस न हमारे अन्दर हो, न तुम्हारे अन्दर… वह स्वायत्त हो?
10. न्याय का सिद्धान्त क्या कहता है? अगर बिना जाँच, बिना सुनवाई, बिना सबूत तीनों पुलिस अफसरों को निलम्बित कर दिया जाना चाहिए, तो फिर कम से कम जाँच पूरी होने तक मन्त्री को भी क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए?
11. आज देश में दूसरों की सरकार है तो आप “रूल ऑफ लॉ” नहीं मानते, लेकिन कल अगर केन्द्र में भी आपकी सरकार बन जाये, तो बिना “रूल ऑफ लॉ” के देश कैसे चलाएंगे? और तब अगर आप अपनी सुविधानुसार एक “रूल ऑफ लॉ” कायम भी कर लें और इसी तरह हर नागरिक या मन्त्री या मुख्यमन्त्री अपने-अपने हिसाब से उसे मानने से इनकार करने लगे, तब आप क्या करेंगे?
12. क्या केजरीवाल के व्यवहार से ऐसा नहीं लगता कि वह हड़बड़ाए हुये हैं? उनकी मंशा जनता का भला करने की है अथवा महीने-दो महीने के भीतर देश में ऐसा माहौल तैयार करने की है, जिससे लोकसभा चुनाव में फायदा उठाया जा सकें?
मुझे तो लगता है कि जो लोग लोकतंत्र और तानाशाही का फ़र्क़ और गुण-दोष नहीं समझते, ताज़ा घटनाक्रम के बाद सिर्फ़ वही केजरीवाल को सपोर्ट कर सकते हैं, लेकिन जो इसे समझते हैं, वे अब कभी उन्हें समर्थन देना नहीं चाहेंगे। यह सच है कि देश के दूसरे नागरिकों की तरह मैं भी कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों की राजनीति से असहमत हूँ, लेकिन आम आदमी पार्टी की राजनीति? यह तो विनाशकारी है। इसमें कांग्रेस और भाजपा से भी ज़्यादा निजी स्वार्थ और महत्वाकाँक्षा की पूर्ति की मंशा निहित दिखाई दे रही है। इसमें अपने ग़लत को भी सही ठहराने की दादागीरी दिखाई दे रही है। उन्हें तो देश में किसी पर विश्वास नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि पूरा देश उनके अंधविश्वास में डूब जाये।
इसीलिये आज मुझे बड़े दुख और नाउम्मीदी के साथ कहना पड़ रहा है कि अगर केजरीवाल के हाथ में देश की सत्ता चली गयी, तो पूरे देश में अराजकता फैल जायेगी, रूल ऑफ लॉ ख़त्म हो जायेगा, तमाम संस्थाओं की गरिमा समाप्त हो जायेगी, विकास के सारे काम रुक जायेंगे और अर्थव्यवस्था रसातल में चली जायेगी। वे नरेंद्र मोदी से ज़्यादा बड़े तानाशाह और तुगलकी मिज़ाज़ वाले शासक सिद्ध होंगे। जब व्यवस्थित कानून-व्यवस्था वाले राज्य में उनसे पाँच हज़ार लोगों का जनता दरबार नहीं संभलता, तो एक अराजक मुल्क में लाखों-करोड़ों लोगों के हुजूम को वे कैसे संभाल पायेंगे?
मुझे तो अब यह आशंका भी हो रही है कि भारत को अस्थिर करने की कोई विदेशी साज़िश तो नहीं रची जा रही, ताकि मिडिल ईस्ट के मुल्कों की तरह यहाँ भी अराजकता फैलाकर इसकी बढ़ती ताकत को रोका जा सके।
अमेरिका की टाइम पत्रिका में अभी-अभी एक लेख छपा है, जिसमें भारत में नरेंद्र मोदी के उभार को लेकर अमेरिका की चिन्ता, दुविधा और मुश्किलों के बारे में बात की गयी है। गुजरात दंगों के बाद से ही अमेरिका मोदी को वीज़ा देने से लगातार इनकार कर रहा है। ऐसे में अगर मोदी प्रधानमन्त्री बन गये, तो उसके सामने काफी लज्जाजनक स्थिति पैदा हो जायेगी और अपने कई स्टैंड को लेकर उसे घुटनों पर आना पड़ेगा, जो कि उसे किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। देवयानी के मामले में भी हमने अच्छी तरह देख लिया है कि अमेरिका का “ईगो” तीसरी दुनिया के हम जैसे मुल्कों के सामने कितना बड़ा है।
ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि भारत में सत्ता-परिवर्तन की सारी स्क्रिप्ट अमेरिका में अथवा उसकी एजेंसियों या संस्थाओं द्वारा लिखी जा रही हो, ताकि दिल्ली में अपना रोबोट बिठाकर न्यूयॉर्क से उसे रिमोट के ज़रिए चलाया जा सके।

सारांश – केजरीवाल का विरोध आज मैं इतने पुख्ता तरीके से इसलिये कर रहा हूँ, क्योंकि अब मुझे तनिक भी संदेह नहीं रह गया है कि लोकतंत्र में उनकी आस्था नहीं है और वे एक अराजकतावादी तानाशाह हैं। भारत जैसे मुल्क के लिये उनके प्रयोग विनाशकारी साबित होंगे। वे दूसरों की कमियाँ गिनाकर भोली-भाली दुखी जनता को तो लामबंद कर सकते हैं, लेकिन ख़ुद उनकी उम्मीदों को पूरा करने और सफ़ल लोकतांत्रिक सरकार चलाने का माद्दा नहीं रखते। साथ ही उनकी हड़बड़ाहट न सिर्फ़ मुझे निजी स्वार्थ और महत्वाकांक्षा से प्रेरित दिखाई दे रही है, बल्कि इसके पीछे मुझे विदेशी हाथ की भी आशंका नज़र आ रही है।
 नोट- आम आदमी पार्टी के समर्थक चाहें तो मुझे दूसरी पार्टियों का एजेंट घोषित कर दें, लेकिन मेरे इस लेख को भविष्य के लिये संभालकर ज़रूर रख लें।

About the author

 अभिरंजन कुमार, लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं, आर्यन टीवी में कार्यकारी संपादक रहे हैं।

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