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भक्तों वेदों से बाहर आओ वरना रायता फैलाने वालों की कमी नहीं है

भक्‍तगण गाय को बचाने के चक्‍कर में मनुष्‍य की हत्‍या को जायज ठहराने के लिए वेदों का हवाला देकर बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। या तो उन्‍होंने वेदों को पढ़ा नहीं है, या फिर यह लोगों को भड़काने की सेलेक्टिव राजनीति है। अगर कायदे से वेदों को पढ़ कर उससे उद्धृत किया जाने लगा, तो हिंदू धर्म की मिट्टी पलीद हो जाएगी और सारी नैतिकता पानी भरने चली जाएगी।

आइए, ऋग्‍वेद के दसवें मंडल से एक उदाहरण लेते हैं और देखते हैं कि भक्‍तगण इसे कितना पचा पाते हैं।

ऋग्‍वेद के दसवें मंडल में यम-यमी का एक संवाद है। इसका दसवां सर्वप्रसिद्ध सूक्‍त कुछ यों है :

”ओचित् सखायं सख्‍या ववृत्‍यां, पितु र्नपानं आदधीत्”।

यमी अपने सगे भाई से कह रही है कि तुम मुझसे पति-भाव से व्‍यवहार करो और अपने पिता का पौत्र मेरे द्वारा उत्‍पन्‍न करो।

यमी का यह कथन यम को पसंद नहीं आया, तो यमी ने आग्रह करते हुए कहा-

”जायेत पत्‍ये तन्‍वं रिरिच्याम् विचिद गृहेव रथ्‍येव चक्रा”।

यमी ने कहा कि भाई के रहते हुए बहन अनाथ रहे, तो ऐसा भाई किस काम का? (किं भ्रातासद्यदानार्थ भवाति। किमु स्‍वसा यन्निर्ऋति र्नि गच्‍छात्।।) यहां भ्राता लक्ष्‍य है। भ्रातृ और भर्तृ, ये दोनों शब्‍द भृ, भरना, पालन करना- मूल धातु से निकले हैं। इनमें भ्रातृ रूप भर्तृ रूप से पुराना है। बहन का, यानी भगिनि का, भाई पति-भाव से भरण-पोषण करते थे। स्‍वसृ शब्‍द का भी यही इतिहास है- स्‍वान सरति अनुगच्‍छति इति स्‍वसा। स्‍वयं के कुल में उत्‍पन्‍न भाइयों का जो अनुसरण करती है, वह स्‍वसृ है।

भ्रातृ से वह शरीर-संबंध रखा करती थी और इस संबंध की वजह से वह सनाथ यानी सुरक्षित हुआ करती थी। यही मूल इतिहास है।

अत्‍यन्‍त प्राचीन आर्षकाल में सहोदर बहनों और भाइयों के बीच शरीर-संबंध हुआ करते थे, इसकी पुष्टि ऋग्‍वेद से होती है। वेदों में ऐसी ही पुष्टि पिता और पुत्री के बीच संबंध की भी है।

ज्‍यादा जानना हो तो विश्‍वनाथ काशीनाथ राजवाड़े को पढ़ें। भक्‍तों, यहां किसी के माथे पर सीनहीं लिखा है। हफ्ते भर में सब वेद-पुराण पढ़कर तुम लोगों को लाइन पर लाया जा सकता है। वो तो अपनी दिलचस्‍पी इन चीजों में नहीं है, इतना गनीमत समझो।

वेदों से बाहर आओ वरना रायता फैलाने वालों की कमी नहीं है।

अभिषेक श्रीवास्तव

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