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भगत सिंह बनाम सावरकर – दोनों अलग ध्रुवों पर खड़े नज़र आते हैं…

भगत सिंह बनाम सावरकर Bhagat Singh vs Savarkar.

कश्मीर में हिन्दुत्त्ववादी वही खेल खेल रहे हैं जो उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग के साथ मिल कर खेला था। सावरकर को द्विराष्ट्र सिद्धान्त का जन्मदाता माना जाता है जिसे बाद में अंग्रेजों ने मान्यता प्रदान करते हुए देश को हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्रों में बांट कर आज़ाद कर दिया।

हम लोग कई बार देशभक्तों के मूल्यांकन में उन्हें सरसरी तौर पर देशभक्त या देश का शत्रु अपनी विचारधारा के अनुकूल या प्रतिकूल होने के कारण मान कर उनके वास्तविक महत्व या कमज़ोरी को रेखांकित करने में चूक जाते हैं। मसलन कुछ लोग हिन्दुत्व के प्रचारक सावरकर को देशभक्त मानने से एकदम इन्कार कर देते हैं जबकि हिन्दुत्व को अपनी विचारधारा मानने वाले सावरकर और भगत सिंह को एक ही पंक्ति में खड़ा करके उनकी देशभक्ति को शहीदे आज़म की देशभक्ति के समकक्ष स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। ऐसी चेष्टा हाल ही में साध्वी प्रज्ञा के प्रवचन में ही प्रकट हुई है।

साध्वी अपनी अल्पज्ञता को विद्वता की तरह पेश करते हुई बताती है कि देश को आज़ादी महात्मा गान्धी के चरखे या तकली से नहीं अपितु भगत सिंह और सावरकर जैसे देशभक्तों के कारण प्राप्त हुई है। इस वक्तव्य से साध्वी द्वारा गान्धी का अंधविरोध ही नहीं अपितु ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझ कर तोड़ मरोड़ कर पेश करने की जि़द भी प्रकट होती है।

साध्वी ने भगतसिंह को सावरकर से जोड़ कर हिन्दुत्त्ववादियों द्वारा देश के स्वाधीनता संग्राम में देशहित के विरुद्ध किये गये कारनामों पर पर्दा डालने की कोशिश ही की है। आमतौर पर संघ और उसके समर्थक विहिप, बजरंगदल जैसे संगठन भगत सिंह को अपनी विचारधारा का समर्थक बताते रहते हैं।

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वास्तव में यदि भगत सिंह उत्तरी ध्रुव हैं तो सावरकर दक्षिणी ध्रुव हैं। भाजपा के पूर्व राजनीतिक अवतार  हिन्दू महासभा जैसे घटकों का देश के स्वाधीनता संग्राम में तनिक मात्र भी योगदान नहीं रहा है। इसलिए जनता में अपनी देशभक्ति की छवि पेश करने में असुविधा और झेंप को मिटाने के लिए ये समुदाय सुभाष और भगत सिंह जैसे हिन्दुत्व विरोधी विचारधारा के नेताओं को अपनी विचारधारा से जोड़ देते हैं।

सुभाष चन्द्र बोस और भगतसिंह का स्वाधीनता आन्दोलन में अहिंसा के बजाये हिंसा के समर्थक मानकर उन्हें अपनी विचारधारा के समर्थक मानने की भूल जानबूझ कर करते आये हैं।

वास्तविकता यह है कि सुभाष की आज़ाद हिन्द सेना में शाहनवाज़ जैसा देशभक्त मुसलमान सेना का अधिकारी था। भगतसिंह तो अपने आप को समाजवादी विचारधारा का समर्थक मानते हुए धर्म और राजनीति के घालमेल को घातक मानते हुए आज़ादी के बाद देश में समाजवादी शासन व्यवस्था स्थापित करने के पक्षधर था जब कि सावरकर के लिए आज़ादी का मतलब था देश में हिन्दूराष्ट्र की स्थापना करके गुप्तकालीन स्वर्णयुग जैसी स्थिति तक पंहुचना। इसलिए दोनों नेताओं को एक समान विचारधारा के समर्थक मान लेना ऐतिहासिक विसंगति ही है।

भगतसिंह तो 23 मार्च 1931 को शहीद हो गये लेकिन सावरकर आज़ाद देश के नागरिक बने, लेकिन महात्मा गान्धी की हत्या में उनकी संलिप्तता के कारण मुकदमा भी चला था। वे इसमें मुक्त अवश्य हो गये थे, लेकिन जिस विचारधारा को जन्म देने का श्रेय उन्हें दिया गया है, उसे गान्धी की हत्या का दोषी माना गया था।

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आज़ादी से पहले सन 1942 में कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया भारत छोड़ो आन्दोलन को असफल करने के लिए हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का सिन्ध सूबा) मे मिलीजुली सरकार का गठन किया था और सूबा बंगाल में हिन्दू महा सभा के सम्मान्य नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के मुख्यमन्त्री फजलुल हक के साथ गठबन्धन वाली सरकार बनाई थी। इस दृष्टि से वर्तमान भाजपा सरकार में आर एस एस के दिशानिर्देशन में कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में अलगाववादी पी डी पी के साथ मिलीजुली सरकार का गठन किसी प्रकार से चौंकाने वला नहीं है। यहां हिन्दुत्त्ववादी वही खेल खेल रहे हैं जो उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग के साथ मिल कर खेला था। सावरकर को द्विराष्ट्र सिद्धान्त का जन्मदाता माना जाता है जिसे बाद में अंग्रेजों ने मान्यता प्रदान करते हुए देश को हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्रों में बांट कर आज़ाद कर दिया। इस तरह भगत सिंह और सावरकर को एक लाईन में बिठाकर साध्वी ने भगतसिंह के साथ अन्याय किया है।
भगतसिंह अंग्रेजों को देश से निकाल कर समाजवादी शासन व्यवस्था कायम करना चाहते थे जबकि सावरकर को डर था कि यदि अंग्रेज़ चले गये तो वे मुस्लिम लीग की मांग के अनुसार उन्हें सत्ता सौंप देंगे। यह एक ऐसा डर था जो दोनों साम्प्रदयिक पक्षों में एक समान रूप में विद्यमान था।

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मुस्लिग लीग को खतरा था कि यदि अंग्रेज़ चले गये और सत्ता बहुसंख्यक हिन्दुओं को सौंप देंगे तो मुसलमान अपने वतन में ही दूसरे दर्जे के नागरिक हो जायेंगे। इसलिए दोनों की यह सामान्य इच्छा थी कि यदि अंग्रेज़ जायें तो सत्ता उन्हें ही सौंप कर जायें अन्यथा यहीं राज करते रहें। अंग्रेज़ों ने इस डर का फायदा उठाते हुए देश को दो टुकड़ों में बांट दिया। इसलिए देश के विभाजन की पूरी जिम्मेवारी हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर ही आती है।

देशभक्ति इस बात पर खत्म नहीं होती कि देश से विदेशी शासन समाप्त कर दिया जाए बल्कि वहां से देशभक्ति की भावना की कसौटी शुरू होती है कि उसके बाद क्या करेंगे? क्योंकि आज़ादी मिलने के बाद उसका जिस तरह से उपयोग किया जाएगा उससे आज़ादी के स्वरूप का पता चलता है। यहीं पर आज़ादी की पहचान हो सकती है कि वह लोगों के लिए कितनी लाभप्रद या हानिकारक है।

एक ऐसे देश में जहां अनेक धर्मों के मानने वाले सदियों से इकट्ठे रहते आये हों और जहां अलग अलग भाषाएं बोलने वाले एक ही देश की सीमाओं में जीवनयापन करते आये हों , तो यह बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि आज़ादी के बाद उनके नागरिक रिश्ते कैसे तय होंगे ? इस नज़रिए से देखें तो भगत सिंह और सावरकर दो अलग ध्रुवों पर खड़े नज़र आते हैं।

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भगत सिंह देश की आज़ादी के बाद जिस समाज की नींव रखना चाहते थे वह जनवादी धर्मनिरपेक्ष समाजवाद पर आधारित था। सावरकर की परिकल्पना में हिन्दू राज्य था जिसमें अन्य धर्मों के प्रति उस सीमा तक आदरभाव की नीति तय थी जिस सीमा तक हिन्दू धर्म इज़ाज़त देता हो।  हिन्दू धर्म बहुसंख्यक जनता का धर्म होने के नाते ही नहीं देश का मूल धर्म होने के नाते इस विशेषाधिकार का हकदार बताया जाता था।

स्पष्ट है कि जब इन दोनों देशभक्तों की देशभक्ति का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाए तो भगतसिंह की देशभक्ति सावरकर की देशथक्ति से भिन्न है उसमें वह धार्मिक स्वतन्त्रता है जिसमें किसी विशेष धर्म को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। हालांकि भगत सिंह व्यक्तिगत रूप में नास्तिक थे लेकिन किसी दूसरे पर अपनी विचारधारा लादने के पक्ष में नहीं थे।उनकी आज़ादी समानता पर आधारित समाजवादी संरचना का लक्ष्य लेकर चलती है। सावरकर की आज़ादी सदियों पीछे छोड़ आये सामाजिक ढांचे को पुनर्जीवित करने वाली है। अतः जनकल्याण की दृष्टि से भगतसिंह जनता के अग्रगामी नेता सिद्ध होते हैं। दोनों का मकसद एक जैसा नहीं माना जा सकता इसलिए एक बराबर दर्जा भी नहीं दिया जा सकता।

सुन्दर लोहिया

 

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