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‘भगत सिंह का सपना’-सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना

अनिल यादव
       अगर आजादी के आन्दोलन के नेताओं की बात करें तो हम पाते हैं कि भगत सिंह एकमात्र नेता थे जिन्हें इतनी कम उम्र होने के बावजूद यह अन्दाजा था कि आजादी के बाद का हिन्दुस्तान कैसा होगा। कैसे समय और किस दौर से हमें गुजरना पड़ सकता है। इसका अंदाजा भगत सिंह को था। इसलिये हमारे दौर के लिये भगत सिंह ज्यादा प्रासंगिक है। 23 मार्च 1931 में शहीद भगत सिंह के पास आने वाले भारत के लिये एक सपना था। आज निश्चित तौर पर हम भगत सिंह के उस सपने से कोसों दूर खड़े हैं। आज पर भारत का लोकतन्त्र अपनी वैधता की कसौटी पर 16वीं बार परखा जा रहा है तो यह समय का तकाजा है कि आज के भारत को हम भगत सिंह के सपने की कसौटी पर भी परखें।
       एक ओर आज हमारे नेता विकास का झुनझुना बजा रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत की जनता आर्थिक बेहाली की हालत में ‘नून-रोटी’ के जुगाड़ में ही तबाह है। भगत सिंह ने ऐसे नेताओं की कल्पना पहले ही कर चुके थे। जिन्हें वह प्रायः ‘भूरे साहब’ की संज्ञा देते थे। 16वीं लोक सभा के इस चुनाव का मुद्दा भ्रष्टाचार है फिर भी चुनाव में अब तक हजारों करोड़ रूपया चुनाव के नाम पर फूंका जा चुका है। क्या ऐसा लोकतन्त्र भगत सिंह के सपने की कसौटी पर खरा उतर सकता है? फिरोजशाह कोटला मैदान में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना के समय भगत सिंह ने अपने साथियों को अपने लक्ष्य के बारे में बताते हुए कहा था कि हमारा लक्ष्य भारत की आजादी नहीं है। आजादी का मायने यह नहीं हो सकता कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जायें बल्कि आजादी का मतलब है- शोषण मुक्त समाज एक ऐसी व्यवस्था जिसमें मानव के द्वारा मानव का शोषण नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु आज भारत में शासक वर्ग द्वारा दलित वंचित और वंचित और अल्पसंख्यकों के ऊपर जुल्म ढाहे जा रहे है। जल जंगल और जमीन से उनके मालिकों को बेदखल किया जा रहा है। भारत का लोकतंत्र ‘पूँजीवादी लोकतंत्र’ का बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरा है।
       साम्प्रदायिकता पर लिखे अपने एक ऐतिहासिक लेख में भगत सिंह ने आने वाली पीढ़ियों को सावधान किया था परन्तु अभी गुजरात दंगे की आग शान्त ही नहीं हुयी थी कि मुजफ्फरनगर जल उठा। ‘भूरे साहब’ लोगों के उपर  आज भी भगत सिंह की टिप्पणी सटीक बैठती है कि जो स्वराज-स्वराज और राष्ट्रीयता के दमगजें मारते नहीं थकते है वह प्रायः साम्प्रदायिकता के नाम पर मौन साध लेते हैं। आज पूरे भारत में तमाम बुर्जआ पार्टिया धर्मनिरपेक्षता का ढकोसला कर रही हैं इन पार्टियों के नेतृत्व को भगत सिंह का 1927 में लिखे गये लेख ‘साम्प्रदायिकता ओर उसका इलाज’ जरूर पढ़ना चाहिए।  आज हमारे ‘भूरे साहबों के लिये इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि वह भगत सिंह के बारे में कुछ जानते तक नहीं स्वघोषित रूप से प्रधानमंत्री का दावेदार तो यह भी नहीं जानता कि भगत सिंह ने अपना कैदी जीवन किस जेल में काटा? उनके सपने के भारत के बारे में तो हमारे नेताओं की जानकारी राम भरोसे ही है, जिस पाकिस्तान का भय दिखाकर हमारे नेता वोट माँगते हैं उन्हें यह जान लेना चाहिए कि पाकिस्तान की सरकार ने भगत सिंह को अपने मुल्क का सर्वोच्च पुरस्कार दिया है और उनके शहादत को ‘शहीद दिवस’ के रूप में याद भी करती है, प्रतीकात्मक रूप से ही सही परन्तु पाकिस्तान हुकूमत ने भगत सिंह के प्रति अपना सम्मान व्यक्त तो किया है परन्तु क्या हमारी हुकूमत भगत सिंह के क्रान्तिकारी सपने से भयातुर है या फिर उसे इस बात का ख्याल तक नहीं है?
       आज चुनाव के अगड़े-पिछड़े के नारे में भगत सिंह का सपना पता नहीं कहाँ खो गया वोट की राजनीति में हाशिये पर खड़ा एक वर्ग आज भी अपनी स्थिति में कोई सकारात्मक तब्दीली नहीं महसूस करता है सिर्फ उसे वोट बैंक ही समझा गया। मई 1928 में किरती में लिखे एक लेख ‘अछूत समस्या’ में भगत सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हमें दूसरों की खुराक नहीं बनना चाहिए हमें उठकर सामाजिक, आर्थिक क्रांति के लिये कमर कस लेनी चाहिए, परन्तु आज हमारे नेता वंचितों को सिर्फ एक वोट बैंक की नजर से ही देखते हैं।
       खैर इन सारी चीजों में एक सकरात्मकता भी दिखायी देती है कि आज की पीढ़ियां अक्सर ‘भगत सिंह जिन्दाबाद’ का नारा विश्वविद्यालयों, सड़कों और अपने संघर्षों में शामिल किये हुये हैं। भगत सिंह जिन्दाबाद का अर्थ यह नहीं है कि भगत सिंह शारीरिक रूप से जिंदा है बल्कि इसका अर्थ कि उनके जीवन के आदर्श, उनकी अदम्य ऊर्जा, जिसने उस महान शहीद को अपने आदर्श के लिये अकथनीय कष्ट झेलने और सर्वोच्च बलिदान देने का साहस दिया वह हमेशा जीवित रहेगा। यह नारा लगा रही नई पीढ़ी यह आकाँक्षा रखती है कि वह इस सपने को जिंदा रखेगी क्योंकि पाश के शब्दों में ‘सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना।’

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अनिल यादव, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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