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भाजपा का ये दांव कांग्रेस नहीं, तीसरे मोर्चे के खिलाफ है

तीसरे मोर्चे की प्रासंगिकता का सवाल

तीसरे मोर्चे से ही मिल सकती है देश पर कारपोरेट के कब्जे को चुनौती; और मीडिया व नागरिक समाज को यह मंजूर नहीं
प्रेम सिंह
लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान की कई कोशिशों के बावजूद राजनीति की तीसरी शक्ति पर आधारित तीसरे मोर्चे का स्वरूप बन कर सामने नहीं आ सका है। न उसमें शामिल होने वाली पार्टियों के स्तर पर, न साझा कार्यक्रम के स्तर पर। हालांकि इस प्रयास में एबी बर्द्धन, मुलायम सिंह, नितीश कुमार और शरद यादव जैसे वरिष्ठ नेता भूमिका निभा रहे थे। तीसरे मोर्चे के गठन की प्रक्रिया में शामिल नेताओं का अब कहना है कि चुनाव परिणाम के बाद तीसरे मोर्चे का स्वरूप तय हो जाएगा और सरकार तीसरे मोर्चे की बनेगी। उनके इस कथन पर जनता में भरोसा नहीं बना है। मीडिया और नागरिक समाज की चर्चाओं में तीसरे मोर्चे की बात को न केवल गंभीरता से नहीं लिया जाता, उस पर होने वाली चर्चा में कटाक्ष और उपहास का स्वर होता है। इसके लिए कुछ हद तक तीसरे मोर्चे की बात करने वाले नेताओं का अवसरवादी और अस्थिर व्यवहार जिम्मेदार है। लेकिन असली कारण है कि देश पर कारपोरेट के कब्जे को किंचित चुनौती तीसरे मोर्चे से ही मिल सकती है; और मीडिया व नागरिक समाज को यह मंजूर नहीं है।

सामाजिक न्याय की दावेदारी जताने वाली ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस-भाजपा की तरह नवउदारवाद की सीधे एजेंट नहीं हैं। उनका सामाजिक आधार नवउदारवाद के सीधे समर्थन के आड़े आता है। इसीलिए देखने में आता है कि इन पार्टियों के नेता कभी भी खुल कर पूंजीवाद का समर्थन नहीं करते। बल्कि अपने वक्तव्यों और दस्तावेजों में अक्सर उसका विरोध करते हैं। देश की राजनीति पर काबिज पूंजीवादी-संप्रदायवादी गठजोड़ पर वामपंथी पार्टियों समेत तीसरा मोर्चा, जिसे कांग्रेस का बाहर से समर्थन हो, ही कुछ हद तक लगाम लगा सकता है।

नब्बे के दशक के शुरू में नई आर्थिक नीतियां लागू किए जाने के साथ जो वैकल्पिक राजनीति का संघर्ष शुरू हुआ था, वह इंडिया अगेंस्ट करप्शन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, आम आदमी पार्टी और इनके सम्मिलित परिणामस्वरूप पैदा हुई नरेंद्र मोदी की ‘सुनामी’ में छिन्न-भिन्न हो चुका है। यह सही है कि नवउदारवाद का विकल्प स्थापित करके ही वंचित जनता को वास्तविक राहत दी जा सकती है। वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और राजनीतिक संस्कृति की एक गंभीर रूपरेखा किशन पटनायक ने दी है, जिसमें पूंजीवाद और बेतहाशा खर्चीली ‘तमाशा’ राजनीति का आमूल विरोध निहित है। उसकी जगह पर वे एक स्वतंत्र, स्वावलंबी, समाजवादी आर्थिक राष्ट्रवाद की स्थापना का आह्वान हैं। लेकिन वह संघर्ष नए सिरे से खड़ा करने में काफी समय लगेगा। अगर पांच साल तीसरे मोर्चे की सरकार रह जाए तो काम आसान हो सकता है। सीधे कारपोरेट के पिठ्ठुओं की सरकार बनेगी तो हो सकता है आगे भविष्य में पूंजीवादी-संप्रदायवादी गठजोड़ द्वारा नवउदारवाद के विकल्प की गुंजाइश ही खत्म कर दी जाए। इसमें कांग्रेस को समझदारी दिखानी होगी कि वह ईमानदारी से तीसरे मोर्चे की सरकार को पांच साल तक समर्थन दे और अपनी पुनर्वापसी के लिए नवउदारवादी नीतियों का त्याग करे।

भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार पहले से घोषित और प्रचारित करके असलियत में कांग्रेस के नहीं, तीसरे मोर्चे के खिलाफ दांव चला है। भाजपा को मालूम है कांग्रेस तीसरी बार सत्ता में नहीं आएगी। दोनों की एक जैसी आर्थिक नीतियों से तबाह मेहनतकश जनता तीसरे मोर्चे को समर्थन न दे, इसके लिए उसने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके पानी की तरह धन बहा दिया है। भाजपा जानती है कि तीसरे मोर्चे में सबसे विवादास्पद मसला यही है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा। तीसरे मोर्चे के गठन का प्रयास करने वाले नेता इस मामले में संख्याबल की बात करते हैं। लेकिन 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार से सीख लेकर बहुत कम सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को भी प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। नवउदारवाद और सांप्रदायिकता पर स्पष्ट समझ रखने वाले वयोवृद्ध सीपीआई नेता एबी बर्द्धन ऐसा एक नाम हो सकता है। उनके साथ संख्याबल वाले दो उपप्रधानमंत्री बनाए जा सकते हैं।

तीसरे मोर्चे में वे छोटे दल भी शामिल किए जाने चाहिए जो नवउदारवादी और सांप्रदायिक शक्तियों के गठजोड़ के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि उनकी संसद अथवा विधानसभाओं में उपस्थिति नहीं है। इस बाबत बर्द्धन साहब के साथ सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष भाई वैद्य और जस्टिस राजेंद्र सच्चर के बीच पिछले एक साल से पत्राचार और संवाद होता रहा है। चुनाव के कुछ महीने पहले हमने भी पत्र लिख कर कुछ ऐसी पार्टियों और नेताओं के नाम सुझाए हैं। जस्टिस सच्चर और हमने यह चर्चा नितीश कुमार और तीसरे मोर्चे की समन्वय समिति के सदस्य केसी त्यागी के साथ भी की है। इस बात से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि छोटे दल सत्ता में हिस्सा मांगेंगे। इन दलों की भूमिका तीसरे मोर्चे के नजदीकी आलोचक की हो सकती है। ऐसा होने पर तीसरे मोर्चे की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता व प्रभाव बनेगा। कारपोरेट का कहर कुछ कम होगा तो जनता स्वाभाविक तौर पर तीसरे मोर्चे के साथ खड़ी होगी और वह आगे की राजनीति में पहला मोर्चा या शक्ति का स्थान ले सकता है।

अगर इस बार तीसरे मोर्चे की सरकार नहीं बन पाती है तो भी यह प्रयास जारी रहना चाहिए। कांग्रेस या भाजपा की सरकारों से जनता का विद्रोह तेज होगा। कारपोरेट घरानों, मीडिया और नागरिक समाज की मिलीभगत लंबे समय तक नवउदारवाद के पक्ष में ‘मैन्युफेक्चर्ड कंसेंट’ को बनाए नहीं रख सकते। बहुप्रचारित नवउदारवादी भारत का निर्माण देश के मुठ्ठी भर युवाओं का सपना हो सकता है। तीसरे मोर्चे की सरकार बनने पर दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और गरीब अगड़ी जातियों के बेरोजगार युवाओं का वृहत्तर समुदाय समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के सपने को आगे बढ़ाने की भूमिका निभा सकता है। तीसरे मोर्चे की राजनीति केंद्र में आने पर उन विचारों, विचारधाराओं व विमर्शों को नया आकाश और साहित्यिक-सांस्कृतिक रचनाशीलता को नया उन्मेष मिल सकता है जिन्हें जबरन नवउदारवादी दायरे में दबा कर रखने की कोशिशें की जा रही हैं।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव हैं। )

About the author

डॉ. प्रेम सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव हैं।

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