Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » भाजपा को सेक्यूलर शब्द से डर क्यों लगता है?
S.R. Darapuri
S.R. Darapuri

भाजपा को सेक्यूलर शब्द से डर क्यों लगता है?

सेक्यूलर शब्द को धर्म निरपेक्ष के रूप में मानने में भाजपा को बहुत डर लगता है क्योंकि उस को मान लेने से उसकी हिंदुत्व की राजनीति खतरे में पड़ जाएगी | The BJP is very afraid to consider the word secular as “Dharmnirpeksh” because accepting it will jeopardize its Hindutva politics.

एस.आर. दारापुरी

कल संसद में संविधान दिवस (Constitution Day) पर बोलते हुए भाजपा के प्रतिनिधि राजनाथ सिंह ने फिर दोहराया है कि संविधान में सेक्यूलर शब्द का समावेश अनावश्यक है और इस का बहुत दुरूपयोग हुआ है.

उन्होंने आगे सेक्युलरिज्म को परिभाषित करते हुए कहा है कि इस का अर्थ धर्म-निरपेक्षता नहीं बल्कि पंथ-निरपेक्षता है. इस से पहले भी भाजपा और उस के सहयोगी इस शब्द पर इसी प्रकार की आपत्ति करते रहे हैं.

यह ज्ञातव्य है कि संविधान की उद्देशिका में सेक्यूलर और सोशलिस्ट शब्द का समावेश 42वें संविधान संशोधन (42nd constitution amendment) द्वारा 1976 में किया गया था.

According to the right to freedom of religion in Article 25 of the Constitution, every citizen has the fundamental right to believe and propagate his religion.

यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान की धारा 14 में समानता के अधिकार के अंतर्गत राज्य द्वारा किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही है. इस के अतिरिक्त संविधान की धारा 25 में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के अनुसार प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को  मानने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार है. संविधान के इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि हमारा राज्य पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष है. यह प्रावधान इतने स्पष्ट हैं कि इन में किसी भी तरह के शक की गुंजाईश नहीं है, फिर भाजपा इन्हें परिभाषा में उलझाये रखना चाहती है.

एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (secular state) होने के कारण सभी राजनीतिक पार्टियों से अपेक्षित है कि वे राजनीति में धर्म का इस्तेमाल (Use of religion in politics) नहीं कर सकतीं जिस की मनाही पीपुल्स प्रेजेंटेशन एक्ट (People’s Presentation Act) में भी है. इसी प्रकार सरकार के मंत्रियों एवं अधिकारियों का भी यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह अपने कर्तव्य निर्वहन में पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष आचरण करें. परन्तु यह दुर्भाग्य है कि आज़ादी से लेकर अब तक न तो हमारी राजनीति धर्म निरपेक्ष हो सकी और न ही संवैधानिक पदों पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी ही पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष हो सके हैं. इस की सब से बड़ी मिसाल हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे. उन्होंने  राष्ट्रपति का पद सँभालने पर सब से पहला काम यह किया था कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कार्यरत सभी मुस्लिम खानसामें (बावर्ची) बदल कर हिन्दू बावर्ची रख लिए थे.

उनका दूसरा काम जिस से नेहरू बहुत नाराज़ हुए थे यह था कि राष्ट्रपति बनने के बाद वह काशी तीर्थ यात्रा पर गए और उन्होंने वहां पर 200 ब्राह्मणों के चरण धोये और उन्हें दक्षिणा दी.

उन्होंने ऐसा शायद इसी लिए किया कि वह जाति से कायस्थ थे जो बिहार में शूद्र माने जाते हैं. अतः उन्होंने काशी की विद्वतजन सभा से अपनी स्वीकृति हेतु आशीर्वाद लेना ज़रूरी समझा. उनका एक अन्य कृत्य जीर्णोद्धार उपरांत सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की स्थापना के लिए जाना था, जिस से नेहरू बहुत नाराज़ थे.

नेहरू के निजी सचिव जॉन मथाई ने अपने संस्मरण में लिखा है कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार उस पैसे से किया गया था, जो तत्कालीन कृषि मंत्री के.एम. मुंशी द्वारा सरदार पटेल के साथ सांठगाँठ करके चीनी मिल संघ को चीनी के दाम बढ़ा कर उस का एक हिस्सा रिश्वत के तौर पर प्राप्त किया गया था. इसकी सूचना नेहरू को तब प्राप्त हुयी थी जब वह कुछ नहीं कर सकते थे. इसी प्रकार बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू और आंबेडकर द्वारा हिन्दू महिलाओं को अधिकार देने के लिए लाये गए हिन्दू कोड बिल को मंज़ूरी न देने की धमकी भी दे दी थी, क्योंकि वह एक सनातनी हिन्दू होने के नाते इस के विरुद्ध थे.

यह भी कहा जाता है कि सरदार पटेल चाहते थे कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार सरकारी पैसे से किया जाये परन्तु नेहरू ने ऐसा नहीं करने दिया.

सरदार पटेल ने तो नेहरू की अनुपस्थिति में कांग्रेस वर्किंग कमेटी से यह प्रस्ताव पारित करवा दिया था कि कांग्रेस के लोग आर.एस.एस के सदस्य बन सकते हैं परन्तु विदेश से लौटने पर नेहरू ने इसे रद्द करवा दिया था.

उपरोक्त उच्च पदों पर आसीन रहे कुछ व्यक्तियों के आचरण से स्पष्ट है भारत के राजनेता कभी भी पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष नहीं रहे. हमारे पूर्व उप राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी तो पूरे सरकारी तामझाम के साथ तीर्थ करने गए थे. इतना ही नहीं हमारे सभी सरकारी कार्यक्रम हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान और देवी देवताओं की वंदना से ही संपन्न होते हैं.

भाजपा जब जब भी और जहाँ जहाँ भी सत्ता में आई है उसने सरकारी कर्चारियों के लिए आर.एस.एस. की सदस्यता के दरवाजे खोले हैं. इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारी सरकारें और प्रशासन व्यवहार में कितना धर्म निरपेक्ष रहा है या इस समय है.

वैसे तो कांग्रेस भी अधिकतर धर्मनिरपेक्षता का दिखावा ही करती रही है. उसका आचरण भी अधिकतर साम्प्रदायिक ही रहा है. यह सभी जानते हैं कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद में 1949 में मूर्तिया कांग्रेस शासन में ही रखी गयी थीं. कांग्रेस सरकार ने ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया था और उस ने ही वहां पर राम मंदिर का शिलान्यास किया था. राजीव गाँधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से ही राम का आशीर्वाद लेकर ही की थी.

दरअसल कांग्रेस वास्तव में हमेशा ही नर्म हिंदुत्व का कार्ड खेलती रही है जिस में बाद में भाजपा ने उसे पिछाड़ दिया क्योंकि भाजपा हमेशा से उग्र हिंदुत्व की राजनीति करती आई है. राम मंदिर के मुद्दे पर भी वह कांग्रेस से आगे निकल गयी और उस ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस करवा कर बाजी मार ली.

BJP is not ready to consider India as a secular nation because it has been doing politics of religion till now.

कल संसद में भाजपा ने सेक्यूलर शब्द की व्याख्या धर्म निरपेक्षता की बजाये पंथ निरपेक्षता करके पुनः यह सन्देश दिया है कि वह भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र मानने को तैयार नहीं है क्योंकि वह अब तक धर्म की राजनीति करती आई है और भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना उस का राजनीतिक लक्ष्य है.

यदि भाजपा की परिभाषा को मान भी लिया जाये कि हमारा संविधान केवल पंथ निरपेक्ष है परन्तु धर्म निरपेक्ष नहीं है तो इसका अर्थ यह है कि भारत एक धार्मिक राष्ट्र है. अब क्योंकि हिंदुत्व ही सब से बड़ा पंथ है तो हिन्दू धर्म ही राष्ट्र का धर्म हो सकता है. अतः सेक्यूलर शब्द को धर्म निरपेक्ष के रूप में मानने में भाजपा को बहुत डर लगता है क्योंकि उस को मान लेने से उसकी हिंदुत्व की राजनीति खतरे में पड़ जाएगी और उस का भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने का संकल्प अधूरा रह जायेगा.

               एस.आर. दारापुरी आइ.पी.एस. (से.नि.)

About हस्तक्षेप

Check Also

Ajit Pawar after oath as Deputy CM

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित किया

जनतंत्र के काल में महलों के षड़यंत्रों वाली दमनकारी राजशाही है फासीवाद, महाराष्ट्र ने साबित …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: