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भाजपा मार्का फासिज्म सिर्फ आरएसएस तक सीमित नहीं

भाजपा मार्का फासिज्म सिर्फ आरएसएस तक सीमित नहीं
फासीवाद बनाम अधिनायकवाद के खतरे
जगदीश्वर चतुर्वेदी
प्रकाश कारात का  6 सितम्बर 2016 के ´इण्डियन एक्सप्रेस´ में छपा  लेख विवादों के केन्द्र में है। इस लेख को लेकर कन्हैया कुमार की टिप्पणियां भी चर्चा में हैं।
इस लेख में व्यक्त विचार एक हद तक सही हैं।
कुछ पुराने जेएनयू के पुराने कॉमरेड प्रकाश कारात के लेख पर सीताराम येचुरी से कैफियत भी मांग रहे हैं।
पहली बात यह कि भारत में लोकतंत्र हर स्तर पर सक्रिय है।
पंचायत से लेकर संसद तक, न्यायालय से लेकर विधानसभाओं तक लोकतंत्र जिंदा है, विभिन्न स्तरों पर विपक्ष सक्रिय है। ऐसी वस्तुगत स्थिति में फासीवाद के आने की संभावनाएं कम हैं। लेकिन फासीवाद इस तरह की संकट की घड़ियों में किसी भी शास्त्रीय तरीके से नहीं आएगा। संसदीय जनतंत्र को नष्ट करके नहीं आएगा।

संसदीय जनतंत्र में फासीवादी ताकतों की कार्यशैली बदल गयी है।

वे अब लोकतंत्र रहने देते हैं, लेकिन संविधान को निष्क्रिय करने, जनतंत्र को अपाहिज करने के नए मैथड निकाल लेते हैं। निरंतर बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिकता का राजनीतिक एजेण्डा मीडिया से लेकर सरकार तक चलाना वस्तुतःफासीवाद ही है, जिसे प्रकाश कारात समझने के लिए तैयार नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट को बार बार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। कॉलीजियम सिस्टम को अपाहिज बनाकर रख दिया गया है।

यह भारतीय फासिज्म का नया रूप है।
संयोग से इस मामले में भाजपा के साथ अन्य दल भी उसके साथ हैं। भाजपा मार्का फासिज्म सिर्फ आरएसएस तक सीमित नहीं है वह अपने साथ अन्य दलों को भी शामिल कर रहा है। सबसे करप्ट किस्म के दलों-नेताओं और पृथकतावादियों की खुली मदद ले रहा है। उनके साथ संयुक्त मोर्चा बना रहा है। यह उसका अन्य विशिष्ट लक्षण है।
फासिज्म में अल्पसंख्यकों को विभिन्न तरीकों से आतंकित किया जा रहा है, निरंतर भय में रखा जा रहा है। संविधान और न्यायपालिका भी भाजपा को रोकने में असमर्थ रहे हैं।
अंतिम बड़ा कारण है विपक्ष का निष्क्रिय रहना।
विपक्ष की निष्क्रियता का बड़ा कारण है भाजपा-आरएसएस के वैचारिक चरित्र को सही ढंग से न समझ पाना। नई स्थिति के अनुसार राजनीतिक संघर्ष के मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर तय न कर पाना। पहले फासिज्म हमले करके विपक्ष को नष्ट करता था, लेकिन भारत में उसे यह करने की जरूरत ही नहीं है। विपक्ष पहले से ही पस्त है। गैर जरूरी मसलों में उलझा है। इसने अधिनायकवाद के साथ फासिज्म के खतरे भी पैदा कर दिए हैं।

भारत में फासिज्म अधिनायकवादी मार्ग से ही आपातकाल में आया था।
उस समय तो जनता आंदोलनरत थी, इस समय तो सन्नाटा पसरा हुआ है। ऐसे में प्रकाश कारात का यह लेख विभ्रम पैदा करने वाला है।
प्रकाश कारात का लेख वस्तुतःवाम और उदार बुद्धिजीवियों को सम्बोधित है।
यह लेख माकपा की पार्टी लाइन और अब तक मोदी सरकार के वर्गीय चरित्र के विश्लेषण की संगति में ही लिखा गया है।

माकपा अभी यह नहीं मानती कि देश में फासीवाद आ गया।
माकपा यह भी नहीं मानती कि बुर्जुआ संसदीय जनतंत्र को उखाड़ फेंकने की भाजपा कोशिश कर रही है। वैसी अवस्था में फासीवाद आ गया, कहना सही नहीं होगा। लेकिन फासीवादी (जिनको अधिनायकवादी हमले या लोकतंत्र पर हमले कहना सही होगा) हमले की संभावनाएं हैं।
इधर हमारे अनेक मित्रों की मुश्किल यह है कि उनको प्रकाश कारात पसंद नहीं है, उसका लिखा पसंद नहीं है। उसकी समझ से वे असहमत हैं, इसलिए आत्मगत भाव से प्रकाश कारात के लिखे का विश्लेषण करते हैं।

फिलहाल हम फासीवादी शासन व्यवस्था में नहीं लोकतंत्र में रह रहे हैं।
सिद्धांततः प्रकाश ने सवाल खड़े किए हैं, ये सवाल भारत में फासीवाद के चरित्र संबंधी बहस को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है, फिलहाल हम फासीवादी शासन व्यवस्था में रह रहे हैं। हम लोकतंत्र में रह रहे हैं। हमारे पास लोकतांत्रिक हक हैं, संविधान और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम कर रही है। अनेक राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। इस सबको  देखकर भी हम अनदेखा करके फासीवाद फासीवाद का राग क्यों सुना रहे हैं।
   इस समय सबसे बड़ी समस्या यह है वामदल खासकर माकपा अपनी ओर से राष्ट्रीय स्तर का कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर पा रही है। यह वाम की सबसे बड़ी कमजोरी है। इस कमजोरी के कारण अधिनायकवाद भी हमें फासीवाद नजर आने लगा है। माकपा अपने मौजूदा गतिरोध या निष्क्रियता से कैसे बाहर निकले, इस पर सोचने की जरूरत है। इस प्रसंग में भी किसी भी किस्म का सिनिसिज्म विभ्रम पैदा कर सकता है।
माकपा पश्चिम बंगाल के सांगठनिक-राजनीतिक पराभव के असर से किसी भी तरह उबर नहीं पायी है। बंगाल के झटके ने समूचे देश में माकपा से जुड़े बुद्धिजीवियों को बुरी तरह संशयवादी बना दिया है।

माकपा की दूसरी बड़ी समस्या कांग्रेस और अन्य बुर्जुआदलों को लेकर है।
यह भ्रम बना हुआ है कि कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा बनाएं या नहीं ॽ यह भ्रम अभी लंबे समय बना रहेगा, यह भ्रम संघर्षों के दौरान ही खत्म होगा। राजनीति में अंततःसंघर्ष ही भ्रमों और गलत धारणाओं को दुरूस्त करते हैं। गलत धारणाएं वाद-विवाद से दुरूस्त नहीं होतीं।

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