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भारतीय प्रसंग में सूचना महाविस्फोट हिरोशिमा नागासाकी और भोपाल गैस त्रासदी से बड़ी आपदा

आइये, सूचनाओं के केसरिया परिदृश्य को पहले समझ लें!
पलाश विश्वास
जाय मुखर्जी की तरह मेरे होंठों पर कश्मीर की वादियों की युगलबंदी में कोई गीत सजने वाला नहीं है। जन्मजात काफी बदसूरत होने की वजह से अपरपक्ष के लिए मेरे प्रति आकर्षण कम है। हालांकि मेरी मां सुंदर थीं, जबकि मेरे पिता भी मेरी तरह एकदम निग्रो जैसे ही थे। हालांकि मेरी पत्नी भी सुंदर हैं। दोनों महिलाएं हमारे परिवार में यथारीति मरने खपने को चली आयीं। नस्ल सुधारने के लिए ऐसी महिलाओं का आभार।

यह सौभाग्य ही कहा जाना चाहिए कि कैशोर्य और जवानी में अप्रत्याशिक लिफ्ट की गुंजाइश करीब-करीब शून्य होने की वजह से हम पवित्र पापी बनने का मौका कभी पा नहीं सकें।

नैनीताल में जीआईसी से ही लगातार एमए तक की पढ़ाई के कारण अमेरिकी, यूरोपीय और जापान की विकसित बयारें हमें यदा कदा छूती ही रही हैं। एक वक्त तो हम लोग भी हिप्पी और गिन्सबर्ग से भी प्रभावित थे तो ओशो से भी।

फिर भी हमारे भटकाव की गुंजाइश बेहद कम थीं।

हमारी कविताओं और गीतों, कहानियों में रोमांस और सेक्स पर 1973-74 में ही हमारे गुरुजी ताराचंद त्रिपाठी ने जीआईसी नैनीताल में ही वीटो दाग दिया था।

मोहन ओशो भक्त था और महर्षि वात्सायन की तरह कामशास्त्र का नया संस्करण लिखना शुरु कर चुका था, गुरुजी ने ही तत्काल उस पर फुल स्टाप लगा दिया था। उन्होंने ही हमें मार्क्स और माओ के साथ फ्रायड और हैवलाक एलिस का पाठ भी दिया। उन्हीं के सान्निध्य की वजह से विचारधाराओं का अध्ययन हमारे लिए दिनचर्या बन गया। उनकी वजह से नोट्स के बजाय पाठ हमारे लिए अनिवार्य था।

वे हमेशा चेताते रहे कि भारतीय समाज बंद समाज है, वर्जनाओं के दरवाजे खिड़कियां टूटेंगे तो कुछ भी नहीं बचेगा। न मूल्यबोध, न नैतिकता और न संस्कृति। जो हम सच होता हुआ अब देख रहे हैं।

संजोग से हमारे गुरुजी अब भी हमारा कान ऐंठते रहते हैं।

जाहिर है कि हमारे लिए भटकाव के रास्ते बन ही नहीं सके हमारे गुरुजी की वजह से। हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी पीढ़ी के गुरुजी संप्रदाय से हमारे बच्चों का वास्ता नहीं पड़ा वरना इस सांढ़ संस्कृति से भी एस्केप एवेन्यू निकल सकते थे।

लेकिन हम लोग रोमांटिक कम भी नहीं थे। ख्वाब सिलिसिलेवार हम लोग भी देखते थे। मूसलाधार बारिश में भी भीगते थे और हिमपात मध्ये बंद दीवारों में कैद भी न थे हम। उन्हीं दिनों हमारे रिंग मास्टर बन गये महाराजक गिरदा।

गुरुजी चार्वाक दर्शन के अनुयायी थे तो गिरदा भी कम न थे।

रात रात भर हिमपात मध्ये या दिसंबर जनवरी की कड़ाके की सर्दी में झील किनारे मालरोड पर तल्ली मल्ली होते हुए हम लोग देश दुनिया पर चर्चा करते थे।

पत्रकारिता के शुरुआती दौर में भी संपादकीय में जोर बहसें होती थीं, जिसमें संपादक नामक विलुप्त प्राणी की अहम भूमिका होती थी।

आवाज जैसे धनबाद के छोटे अखबार में भी अजब-गजब चामत्कारिक माहौल था। रांची के प्रभात खबर में भी। जागरण और अमर उजाला में भी। वीरेन डंगवाल जैसे लोग संपादकों पर भारी थे।

जनसत्ता के शुरुआती दौर में यह बहस संस्कृति प्रबल रही है। अभय कुमार दुबे इसके लिए हमेशा याद किये जायेंगे।

अब न वह संपादकीय विभाग है अब और न वैसे संपादक हैं।

हमने अब तक अमित प्रकाश सिंह जैसा कोई काबिल संपादक देखा नहीं है। सूचनाओं के प्रति इतने संवेदनशील, संपादन में इतने सिद्धहस्त। लेकिन हमारी उनसे कभी पटी नहीं। किससे क्या काम लेना है, इसका प्रबंधन उनसे बेहतर किसी को करते नहीं देखा अब तक।

हमारी नजर में तो पत्रकारिता के असली मसीहा कवि रघुवीर सहाय थे, जिन्होंने हम जैसे नौसीखिया टीनएजरों को पत्रकारिता का अआकख पढ़ाया दिल्ली से देश भर में बिना अपना कुनबा बनाये।

प्रभाष जी ने जो टीम जनसत्ता की बनायी थी, उसमें मंगलेश लखनऊ से आये थे लेकिन वे सहाय जी के बेहद नजदीदी थे लेखन के जरिये। जवाहरलाल कौल, हरिशंकर व्यास और दूसरे मूर्धन्य लोग, जिनकी भूमिका जनसत्ता को आकार देने की रही है, वे दिनमान में रघुवीर सहाय के सहयोगी ही थे। इस बात की शायद ज्यादा चर्चा नहीं हुई।

विचार विनिमय में सहाय जी बाकी लोगों से ज्यादा लोकतांत्रिक थे। गौर करें कि उनके संपादकीय सहयोगियों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से लेकर श्रीकांत वर्मा जैसे लोग भी रहे हैं। हम जैसे अत्यंत जूनियर बच्चों में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का बोध पनपाने वाले वे ही थे।

जिस तरह अमित जी के साथ वर्षों काम करने के बावजूद हमारे मधुर संबंध नहीं थे, जिस तरह प्रभाषजी या अच्युतानंद मिश्र से हमारी पटती न थी, उसी तरह जनसत्ता के मौजूदा संपादक ओम थानवी से हमारा कभी संवाद नहीं रहा है। हालांकि दिल्ली और अन्यत्र हमारे कई अंतरंग मित्रों से उनकी घनिष्ठता है, लेकिन मैंने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। कोलकाता संस्करण के प्रति मैनेजमेंट की लगातार उदासीनता का जिम्मेदार भी हम उन्हें मानते रहे हैं। इसलिए जब भी वे कोलकाता और जनसत्ता रहे, कहीं भिड़ंत न हो जाये या कोई अमित प्रकाश जैसी अप्रिय हालत न बन जाये, इसलिए मैं आकस्मिक अवकाश लेकर अनुपस्थित भी होता रहा हूं।

मजे की बात है कि अमित जी एकमात्र व्यक्ति हैं जो मुझे छात्रावस्था से जानते रहे हैं। इंदौर में नयी दुनिया में जब वे थे उनको मैं वैसे ही जानता था, जैसे इलाहाबाद में अमृत प्रभात से मंगलेश डबराल को।

इतवारी पत्रिका के संपादक ओम थानवी की हमारी दृष्टि में ऊंची हैसियत थी। लेकिन जनसत्ता की ढलान के बंदोबस्त में इनमें से किसी से हमारे संबंध सामान्य नहीं रहे।

इन लोगों से सामान्य संबंध भी न बन पाने का मुझे अफसोस है।

सार्वजनिक तौर पर कहना सिर्फ निजी स्वीकारोक्ति नहीं है। समीकरण साधने का की कोई जुगत भी नहीं है। दो साल के भीतर पेशेवर पत्रकारिता से विदा हो जाना है और हमारे लिए बिना छत सारे जहां को घर बनाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है।

दस साल पहले अगर हमारी हैसियत थोड़ी बेहतर हो जाती तो हम कम से कम अब तक बेघर नहीं बने रहते। अब बैकडेडटेड असमय प्रोमोशन से हमारी हैसियत में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। इस प्रतिकूल परिस्थितियों में कहीं संपादक बनकर भी हमारी औकात कुछ करने की नहीं है।

आज भी बड़ी बड़ी कारपोरेट केसरिया वारदातों की सूचनाएं हैं। ड्राइव में पहले ही अंबार लगा है, जिन्हें निपटाना बाकी है।

लेकिन इन सूचनाओं को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए मीडिया की अंतर्कथा जानना समझना बेहद जरूरी है। इसीलिए आज यह अवांछित जोखिम चर्चा।

मेरे हिसाब से संघ परिवार को हिंदू राष्ट्र के अपने एजेंडा और राष्ट्रहित में तत्काल पांचजन्य और आर्गेनाइजेर जैसे मीडिया पक्ष की छंटनी कर देनी चाहिए।

अब इसकी कोई जरूरत नहीं है।

करोड़ों की रीडरशिप वाले ब्रांडेड मीडिया वाले तमाम पांचजन्य और आर्गेनाइजर की भूमिका बेहद पेशेवाराना ढंग से निपटा रहे हैं। उनका किया कराया गुड़ गोबर ही कर रहे हैं पांचजन्य, आर्गेनाइजर और सामना जैसे अखबारात के गैर पेशेवर लोग।

आज अखबारों के संपादकीय कार्यालयों में देश दुनिया पर कोई चर्चा की गुंजाइश नहीं होती। पोस्ट, प्रमोशन, पैसा मुख्य सरोकार हैं।

जो कामन है वह है, राष्ट्रवादी हिदुत्व के पुरोधा गुरु गोलवलकर का अखंड पाठ।

विनम्रता पूर्वक कहना है कि विभाजन पीड़ित परिवार से हूं। मेरे पिता के अटल जी से लेकर अनेक महान संघियों से संवाद रहा है।

मेरे ताऊजी भारत विभाजन के लिए कभी कांग्रेस, गांधी और नेहरु को माफ नहीं कर सके। हमारे परिवार और बसंतीपुर गांव में वे एकमात्र प्राणी रहे हैं जो आजीवन केसरिया रहे हैं।

हमने बचपन में विभाजन के संघी कथाकार गुरुदत्त का समूचा लेखन पढ़ा है।

विभाजन की त्रासदी वाले परिवार में वाम और दक्षिण दोनों विचारधाराओं का अखंड द्वंद्व हमारा भोगा हुआ यथार्थ है और हमने अपने पिता को देखा है कि अपने बड़े भाई के विपरीत इस द्वंद्व से बाहर निकलकर विशुद्ध किसान नेता बनते हुए।

मेरे पिता बांग्लादेश के भाषा आंदोलन में जैसे जेल गये, विभाजन से पहले तेभागा के कारण कैशोर्य में आकर दत्त पुकुर के सिनेमा हाल में टार्च दिखाने वाले की हैसियत से जैसे सर्वभारतीय शरणार्थी नेता बन गये, उसी तरह उनका कायाकल्प असम के दंगापीड़ितों के बीच साठ के दशक में हिंदू दंगा पीड़ित विभाजन विस्थापितों के बीच काम या तराई में सिखों-पंजाबियों-पहाड़ियों के साथ गोलबंदी के साथ के बाद यूपी के दंगापीड़ित मुस्लिम इलाकों में भागते रहने के मध्य भी देखा।

आज बंगाल में जो शरणार्थी वोट बैंक बना है, उसकी पूंजी विभाजन त्रासदी के बदले की भावना है, जिससे हम भी सारा बचपन लहूलुहान होते रहे हैं।

बता दूं कि लाल किताब पढ़ने से पहले ही हम गुरु गोलवलकर को पढ़ चुके थे। अपने गुरुजी से मिलने से पहले।

दिमाग में जो कबाड़ था, वह पहले तो गुरुजी ने निर्ममता से निकाल फेंका।

बाकी रही सही कसर गिरदा, शेखर, राजीव लोचन, नैनीताल समाचार, युगमंच टीम के साथियों ने पूरी कर दी, जो शुरु से इस सांढ़ संस्कृति के विरुद्ध चिपको पृष्ठभूमि में सक्रिय थी। गिरदा के न होने के बाद भी हमारी ताकत, हमारी प्रेरणा आज भी वही नीली झील है।

अब शायद अपने मित्र जगमोहन फुटेला और अपने प्रिय वीरेनदा जैसा हश्र हामारा कभी भी हो सकता है। उनके बच्चे फिर भी प्रतिष्ठित हैं। हमारे साथ वैसी हालत भी नहीं है।

इसलिए शायद कभी भी बोलने लिखने के दायरे से बाहर निकल सकता हूं।

अमित जी के बारे में गलतफहमी बहुत देरी से दूर हो सकी।

थानवी जी के बारे में गलतफहमी दूर करने का मौका शायद फिर न मिले।

फिलहाल हम गर्व से कह सकते हैं कि कम से कम जनसत्ता अब भी केसरिया नहीं है।

बैक डोर से आये लोग क्या से क्या बन गये। लेकिन हम आईएएस जैसी कड़ी परीक्षा देने के बावजूद तजिंदगी सबएडीटर रह गये, लेकिन एडीटर बनने की लालच में जनसत्ता छोड़कर नहीं गये, आर्थिक बारी दुर्गति के मध्य मुझसे ज्यादा मेरी पत्नी और बसंतीपुर में मेरे परिवार और मेरे गांववालों को इसकी खुशी होगी। यह मेरे लिए भारी राहत है।

मैं जैसा भी हूं, अच्छा बुरा, सिरे से नाकाम, मेरे लोगों का प्यार मेरे साथ है और आज भी मेरा पहाड़ मेरा ही है।

हमने अपनी जनपक्षधरता की विरासत से विश्वासघात नहीं किया।

पारिवारिक संपत्ति बेचकर जैसे मैं महानागरिक नहीं बना,वैसे मैं पत्रकारिता न बेचकर कामयाब लोगों की नजर में डफर जरूर हूँ।

आर्थिक मामलों को संबोधित करने में मुझे लोग बेहिसाब नक्सली माओइस्ट, राष्ट्रद्रोही, कम्युनिस्ट, घुसपैठिया वगैरह-वगैरह गाली दे रहे हैं और भूल रहे हैं कि बुनियादी तौर पर मैं अपने पिता की तरह अंबेडकर अनुयायी हूं।

वे नहीं जानते कि उनके ये तमगे मेरे लिए ज्ञानपीठ और नोबेल हैं जो मैं कभी हासिल कर ही नहीं सकता।

बाकी बहुजनों, अंबेडकरियों की तुलना में फर्क सिर्फ इतना है कि जैसे आनंद तेलतुंबड़े अंध भक्त नहीं हैं अंबेडकर के, मैं भी नहीं हूं।

हम दोनों साम्यवादी अवधारणाओं और अंबेडकर चिंतन व सरोकारों के मूल बुनियादी त्तवों में कोई अंतर नहीं मानते और यथासाध्य बहुसंख्य जमात को समझाने का प्रयास कर रहे हैं।

हम राष्ट्रतंत्र में बदलाव के लिए लाल नीली जमात को एकाकार करने के असंभव लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं। यही हमारी एक्टिविज्म है। मुझे खुशी है कि अरुंधती से लेकर नंदिता दास तक इस मुहिम हैं।

इसी के तहत ही आर्थिक मुद्दों पर यह फोकस।

यह न धर्मनिरपेक्षता की जुगाली है और न वाम अवसरवाद।

वाम विश्वासघात के हमसे बड़े आलोचक तो वाम श्राद्ध में सिद्धहस्त लोग भी नहीं हैं।

अशोक मित्र की तरह हम मानते हैं कि नेतृत्व भले ही नकारा हो, जैसा कि बहुजन समाज के बारे में भी प्रासंगिक है, वाम आवाम के बिना मुकम्मल बहुजन समाज बन ही नहीं सकता।

कम से कम उतना जितना फूले हरिचांद गुरुचांद, वीरसा टांट्या बील समय में रहा है।

आप हमें बेवकूफ बता सकते हैं बाशौक।

आप हमें ब्राह्मणों का दलाल भी बता सकते हैं बाशौक।

लेकिन यह हमारा नजरिया है और बकौल दिवंगत नरेंद्र मोहन, हम बदलेंगे नहीं। बदलना है तो आप बदलिये। जिसे घर फूंकना हो, उसे इस बेवकूफी का सादर आमंत्रण।

नरेंद्र मोहन छह साल तक मेरे बॉस रहे हैं। मैं उनका आभारी हूं कि उन्होंने हमारे कामकाज में कभी हस्तक्षेप नहीं किया जबकि वे नख से शिख तक संघी ही थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे 1991 से आज तक जनसत्ता में मेरी गतिविधियों पर कभी अंकुश नहीं लगा और न मेरे विचारों को नियंत्रित करने की कोई कोशिश हुई।

हमने अपने बड़े भाई हिंदी के अनूठे उपन्यासकार व पत्रकार पंकज बिष्ट से भी फोन पर लंबी बात कर चुके हैं। वे भी मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ओम थानवी की भूमिका की तारीफ से सहमत हैं। जबकि समांतर में लगातार थानवी की आलोचना होती रही है। हम भी साहित्य अकादमी प्रसंग में उनकी भूमिका के पक्ष में नहीं थे। मालूम हो कि थानवी की नाराजगी के बावजूद मैंने शुरुआत से लगातार समयांतर में लिखा है।

पंकज बिष्ट से पहाड़ों के जरिये हमारा पारिवारिक नाता है तो वैकल्पिक मीडिया के मसीहा हैं आनंद स्वरूप वर्मा। हम दुनिया छोड़ सकते हैं। कम से कम इन दो लोगों को नहीं, भले ही खुदा भी हमसे नाराज हो जायें।

रोजाना लेखन के कारण अब उनकी पत्रिकाओं में अनुपस्थित जरूर हूं, जैसे जनसत्ता के पन्ने पर मैं शुरु से ही अनुपस्थित हूं। लेकिन जनसत्ता तो मेरे वजूद में है। अलग से पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है।

अच्छे बुरे जनसत्ता में जितने भी लोग हैं, रहे हैं, रहेंगे, वे हमारे परिजन हैं।

शिकायते होंगी, झगड़े भी होंगे। लेकिन हम संघ परिवार की तरह हर हाल में एक परिवार हैं। इसलिए जनसत्ता में ही रिटायर होने की तमन्ना लेकर हमारे तमाम साथी जीते मरते रहे हैं। हमें उन पर गर्व है।

प्रभाष जी के जीते जी उनकी सारस्वत भूमिका के बारे में हंस में लिखा है। मरने के बाद हमने प्रभाष जी के बारे में जोसा नहीं लिखा, रिटायर करने के बाद यदि पढ़ता लिखता रहा तो सांवादिकता प्रसंग में न लिखुंगा, न बोलुंगा।

लिखने बोलने का वक्त तो तब होता है कि जब आप उसी व्यवस्था के अंग होते हैं। दम है तो उसके खिलाफ खड़े होकर दिखाइये। सारी सुविधाओं के भोग के बाद बिल्ली की हजयात्रा सा पाठकों दर्शकों का हाजमा खराब करने का कोई मतलब नहीं होता।

दरअसल हम लिखना चाह रहे थे कि भारतीय बहुसंख्य जनसंख्या के बहिष्कार, निष्कासन और सिलेक्टेड एथनिक क्लींजिग के लिए पतनशील सामंतों की भूमिका के बारे में, भारतीय मेधा, सूचना, ज्ञान, राजनीति और अर्थव्यवस्था समेत तमाम जीवनदायी क्षेत्रों में जो वर्ण वर्चस्वी हैं, नस्ली एकाधिकार है जिनका, उनकी भूमिका के बारे में।

लेकिन इसे समझने के लिए यह खुलासा जरूरी है कि सूचना महाविस्पोट कम से कम भारतीय प्रसंग में हीरोशिमा नागासाकी और भोपाल गैस त्रासदी से बड़ी आपदा है।

सुधारों का यह जो कार्निवाल कबंध कारवां निकला है, यह बहुसंख्य जनता को सूचना से वंचित करने के महाविनिवेश के बाद ही। अबाध पूंजी मीडिया के कोख में ही पलती पनपती है। अब जनादेश भी मीडिया की महामाया है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 में आखिरी लड़ाई हुई।

पहली कतई नहीं।

किसान और आदिवासी विद्रोहों की कथा व्यथा और इतिहास को खारिज करके ही इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम लिखा और कहा जा सकता है।

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