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भारतीय रिजर्व बैंक की हत्या और अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घंटी

भारतीय रिजर्व बैंक की हत्या और अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घंटी
भारतीय जनता का कोई माई बाप नहीं

लाटरी आयोग कर रहा है नीति निर्धारण और वित्तीय प्रबंधन

नोटबंदी में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार, संसद में कोई चर्चा नहीं

जन प्रतिनिधि अब ब्रांड एंबेसैडर, मॉडल सुपरमॉडल, सेल्स एजेंट सुपर

भारतीय रिजर्व बैंक नकदी का वायदा पूरा नहीं कर पा रहा है, इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक मर गया है या उसकी हत्या कर दी गयी है।

यह हत्या का मामला है या आत्महत्या का, इसका फैसला कभी हो नहीं सकता क्योंकि किसी ने एफआईआर दर्ज नहीं करायी है।

पलाश विश्वास

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

भारतीय जनता का कोई माई बाप नहीं।

रिजर्व बैंक की हत्या और अर्थव्यवस्था के लिए मौत की घंटी।

लाटरी आयोग कर रहा है नीति निर्धारण और वित्तीय प्रबंधन।

नोटंबंदी में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार, संसद में कोई चर्चा नहीं।

जन प्रतिनिधि अब ब्रांड एंबेसैडर, मॉडल सुपरमॉडल, सेल्स एजेंट।

योजना आयोग, नीति आयोग के बाद अब लाटरी आयोग है।

अब लाटरी आयोग वित्तीय प्रबंधन कर रहा है।

रिजर्व बैंक, सुप्रीम कोर्ट और संसद के ऊपर लाटरी आयोग।

बाकी लोग देखते रह जाये, जिसकी लाटरी लग गयी वह सीधे करोड़पति।

बुहजनों के पौ बारह कि अंबेडकर जयंती पर खुलेगी लाटरी। बाबासाहेब तो दियो नाही कुछ नकदी में, जिन्हें दियो वे सगरे अब बहुजनों में ना होय मलाईदार।

अब बाबाससाहेब के नाम नकद भुगतान तो होई जाये केसरियाकरण।
क्या पता कौन भागवान के नाम भगवान खोल दे लाटरी।
अच्छे दिनों का कुलो मतलब यही लाटरी है।

बूझो बुड़बक जनगण।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

अर्थव्यवस्था भी इब लाटरी है जिसके नाम खुली वह करोड़ पति कमसकम।

बाकीर खातिर खुदकशी थोक इंतजाम बा।

उ नकद नहीं, तो मौत नगद। चाहें तो खुदकशी से रोकै कौण।

अरबपति खरबपति की लाटरी तो हर मौसम खुली खुली है। और न जाने ससुर कौन कौन पति ठैरा कहां कहां। भसुरवा देवरवा गोतीनी देवरानी जिठानी बहूरानी कुनबा जोडे़ वक्त क्या लगे है। लाटरी खुलि जाई तो चकाचाक सैफई का जलवा घरु दुआर मेकिंगिंडिया। डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

मसला मुश्किल है कि वित्तीय प्रबंधन करने वाले लोग जिंदा है कि बैंकों और एटीएम की कतार में शामिल देशद्रोहियों के साथ कहीं मर खप गये हैं, इसका अता पता नहीं है, बूझ सको तो बूझो जनगण बुड़बक।

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।
बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।
अम्मा जयललिता का शोक हम मना रहे हैं, किसी वित्तीय प्रबंधक के लिए शोक मनाने जैसी बात हमने सुनी नहीं है।

हांलाकि इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय शोक का समय है यह।

पीएम की मंकी बात पेटीएमिंडियाकैशलैशडिजिटल इंडियआ। ओयहोय। होयहोय।

एफएमकी ट्यूनिंग फिर सुर ताल में नहीं है।

कहि रहे हैं एफएमवा कैशलैस कोई इकोनामी हो ही नहीं सकती। ओयहोय। होयहोय।

हम भी दरअसल वही कह और लिख रहे हैं।

मंकी बातों में 30 दिसंबर के बाद मुश्किल आसान तो अब पता चल रहा है कि सालभर में भी आम जनता को कोई राहत नहीं मिलने वाली है।

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

कालाधन मिला नहीं है। ना मिलबै हैं।

बैंकों मे जमा नकदी निकालने से रोकने का अधिकार सरकार तो क्या रिजर्वबैंक को भी नहीं है। खातधारकों के खाते में नकद जमा किया है तो निकालने की आजादी होनी चाहिए। बैंक के पास नकदी नहीं है तो इसका मतलब बैंक दिवालिया है।

बेहिसाब या बिना हिसाब कालाधन समझ में आता है, लेकिन नकदी के लेनदेन बंद करने की कवायद बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है।

भारतीय रिजर्व बैंक नकदी का वायदा पूरा नहीं कर पा रहा है, इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक मर गया है या उसकी हत्या कर दी गयी है।
यह हत्या का मामला है या आत्महत्या का, इसका फैसला कभी हो नहीं सकता क्योंकि किसीने एफआईआर दर्ज नहीं करायी है।
समयांतर ने पिछले साल से सरकारी विज्ञापन लेना बंद कर दिया है। वैकल्पिक मीडिया के लिए यह कदम ऐतिहासिक है। किसी भी स्तर पर किसी पत्र पत्रिका का यह कदम उसके जीवित रहने के लिए भारी चुनौती है।

साधनों के मुताबिक ज्वलंत मुद्दों को संबोधित करते हुए वर्षों से नियमित अंक निकालने के लिए हमारे पंकजदा का सार्वजिनक अभिनंदन होना चाहिए।

नोटबंदी के परिदृश्य में समयांतर का दिसंबर अंक आया है। हाशिये की आवाज स्तंभ में नोटबंदी के संदिग्ध फायदों और निश्चित नुकसान का खुलासा किया है तो नोटबंदी पर गंभीर विश्लेषण की सामग्री भरपूर है।

यह अंक संग्रहनीय और पठनीय है। जो नोटबंदी गोरखधंधे को समझना चाहते हैं, उनके लिए समयांतर का ताजा अंक अनिवार्य है। बेहतर हो कि आप इसका ग्राहक खुद बनें और दूसरों से भी ग्राहक बनने को कहें।

आज निजी काम से दक्षिण कोलकाता गया था। जहां सुंदरवन इलाके के गरीब मेहनतकशों की आवाजाही होती है और सारी ट्रेनें मौसी लोकल होती हैं। यानी कोलकाता महानगर और उपनगरों के संपन्न घरों में कामवाली महिलाओं से लदी फंदी होती हैं वहां की ट्रेनें।

इसके अलावा बंगाल के सबसे गरीब मुसलमानों और अनुसूचितों का जिला भी दक्षिण 24 परगना है, जहां कार्ड वगैरह, पीटीएम इत्यादि की कोई गुंजाइश ही नहीं है। बंगाल की खाड़ी और सुंदर वन के इस इलाके में संचार नेटवर्क की क्या कहें, द्वीपों को जोड़ने वाले पुलों और सड़कों की बेहद कमी है। स्कूलों, अस्पतालों, बुनियादी सेवाओं, बुनियादी जरुरतों, हवा राशन पानी तक की कमी है।
सांस सांस मुकम्मल महायुद्ध है। जमीन पर बाघ तो पानी में मगरमच्छ हैं। वहां सारी लेन देन नकदी में होती है और फिलहाल कोई लेनदेन वहां हो नहीं रही है।
जिंदगी 8 नवंबर की आधी रात के बाद जहां की तहां ठहरी हुई है। दीवाल से पीठ लगी है और रीढ़ गलकर पानी है। हिलने की ताकत बची नहीं है। आगे फिर मौत है।

बंगाल में रोजगार नहीं है तो ट्रेनें भर भर कर जो लोग देशभर में असंगठित क्षेत्रों में नौकरी करने निकले थे, वे तमाम लोग घर लौट चुके हैं और उनके घरों में राशन पानी के लिए कहीं कोई पेटीएम नहीं है।

अब हिंदुत्व के लिए बीजमंत्र नया ईजाद है।

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

बुद्धमय बंगाल के बाद प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रतासंग्रामी बंगाल के अवसान के बाद लगातार केसरिया, तेजी से केसरिया केसरिया बंगाल में ऐसे अनेक जिले हैं। जहां बैमौत मौत ही जिंदगी का दूसरा नाम है, अब बेमौत मौत नोटबंदी है।

भारत बांग्लादेश सीमा से सटे हुए तमाम इलाकों में जायें तो पता ही नहीं चलेगा कि हम भारत में हैं। नदियों के टूटते कगार की तरह जिंदगी उन्हें रोज चबा रही है। हालात के जहरीले दांत उन्हें अपने शिकंजे में लिये हुए हैं। जिंदगी फिर मौत है।
जहां बैमौत मौत ही जिंदगी का दूसरा नाम है, अब बेमौत मौत नोटबंदी है।
मसलन भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी मुर्शिदाबाद के जिस जंगीपुर इलाके से संसदीय चुनाव जीतते रहे हैं, वहां मुख्य काम धंधा बीड़ी बांधना है।

बीड़ी के तमाम कारखाने नकदी के बिना बंद हैं। घर में राशन पानी भी नहीं है।

न नकदी है और न पेटीएम जिओ एटीएम डेबिट क्रेडिट कार्ड हैं।

सिर्फ वोट हैं, जिसके बूते स्वयं महामहिम हैं।

पद्मा नदी की तेज धार से बची हुई जिंदगी बीड़ी के धुएं में तब्दील है।

वह धुआं भी नहीं है और वे तमाम लोग राख में तब्दील हैं।

रोज उनके घर नदी के कटाव में खत्म होते जाते हैं।

खुले आसमान के नीचे वे लोग बाल बच्चों के साथ मरने को छोड़ दिये गये हैं।

नोटबंदी ने उन्हें बीच धार पद्मा में डूबने को छोड़ दिया है।

जिलों की क्या कहें, कोलकाता की आधी आबादी फुटपाथ पर जीती है तो मुंबई का यही हाल है। राजधानी में फुटपाथ थोड़े कम हैं, चमकीले भी हैं। लेकिन वहां झुग्गी झोपड़ियां कोलकाता और मुंबई से कम नहीं हैं। अब पेटीेएम से लावारिश जिंदगी की कैसे गुजर बसर होती है और कैसे छप्परफाड़ सुनहले दिन उगते हैं, देखना बाकी है।

हालात लेकिन ये हैं कि मुसलमान बहुल मुर्शिदाबाद जिले के लगभग हर गांव से लोग महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, गुजरात से लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में भी मजूरी की तलाश में जाते हैं। उनकी जिंदगी में सब कुछ नकद लेन देन से चलता है।

इसी तरह मालदह, बाकुंड़ा, पुरुलिया जैसे जिलों की कहानी है।
हम उन जिलों को गिनती में नहीं रख रहे हैं जहां लोग थोड़ा बहुत संपन्न है या कुछ लोग कमसकम कार्ड वगैरह से काम चला लेते हैं।
बिहार और ओड़ीशा के अलावा झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और यूपी में भी ऐसे अनेक जिले होंगे। हिमालय के दूरदराज के गांवों में, या पूर्वोत्तर भारत या जल जंगल द्वीप मरुस्थल थार में कैशलैस डिजिटल इंडिया का क्या जलवा है, हम इसका अंदाज नहीं लगा सकते।

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

बहुत थका हुआ हूं। कल 17 दिसंबर को कोलकाता के गणेशचंद्र एवेन्यू के सुवर्ण वणिक हाल में शाम चार बजे हमारे आदरणीय मित्र शमशुल इस्लाम कोलकाता में प्रगट होने वाले हैं तो कल का दिन उनके नाम रहेगा।

आज की सबसे बुरी खबर है कि नोटबंदी में कई दफा सरकार को फटकारने वाली सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी मामले में हाथ खड़े कर दिये हैं।

नोटबंदी के मामले में भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है।

हालांकि यह कोई खबर नहीं है कि संसद के इस सत्र में लगातार शोरशराबे के अलावा नोटबंदी पर कोई चर्चा नहीं हुई है।

क्योंकि हमारे नेता और जनप्रतिनिधि चाहे जो हों आम जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं।

वे तमाम लोग ब्रांड एंबेसैडर हैं।

वे तमाम रंगबिरंगे लोग मॉडल सुपरमॉडल हैं।

वे तमाम लोग बाजार के दल्ला का काम छीनकर कंपनीराज के माफिया गिरोह में शामिल हैं और वसूली के लिए पहले से बंटवारे के तहत अपने अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं।

वे तमाम लोग करोड़पति हैं या अरबपति। खरबपति भी।

वे कभी किसी कतार में खड़े नहीं होते।

यह संसदीय लोकतंत्र करोड़पति अरबपति खरबपति तंत्र है।

 करोड़पति अरबपति खरबपति तंत्र में आम जनता की कोई सुनवाई नहीं हो सकती।

सर्वोच्च न्यायालय के भी हाथ पांव बंधे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का दस्तखत हर नोट पर होता है और इसके बावजूद इस मुद्रासंकट के मध्य उनके लिए कुछ करने को नहीं है क्योंकि रिजर्व बैंक की हत्या कर दी गयी है और बैंक दिवालिये बना दिये गये हैं।

कोलकाता में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को काला झंडा दिखाया गया तो दिनभर पूरे कोलकाता में उनके खिलाफ प्रदर्शन होता रहा। बंगाल की मुख्यमंत्री ने उन्हें जमकर करी खोटी सुनायी।

यह घटनाक्रम भारतीय अर्थव्यवस्था की मौत की घंटी है।

डिजिटलंडियाकैशलैसंडियापैटीएमिंडियाजिओंडिया। ओयहोय। होयहोय।

बूझो बुड़बक जनगण। बूझसको तो बूझ लो। भोर भयो अंधियारा दसों ओर।

बाकी ससुरा भाग्यविधाता जो है सो है, अधिनायक नरसिस महानो ह।

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