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भारत की अखण्डता को दो चीजें ही बनाए रख सकती हैं जीटीरोड और हिंदी

हिंदी के झंडाबरदारों को आत्ममुग्धता त्यागकर आत्माभिमान रखना चाहिए-अशोक चक्रधर
साहित्य, राजनीति से अलग नहीं हो सकता- शरद आलोक
नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर ने कहा है कि नई तकनीक, यूनिकोड और कंप्यूटर ने हिंदी के विकास और हिंदी के वैश्विक भाषा बनने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

श्री चक्रधर रविवार को हिंदी भवन में नॉर्वे से प्रकाशित होने वाली हिंदी और नॉर्वेजी भाषा की पत्रिका Spiel दर्पण के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। Spiel दर्पण के संपादक जाने माने साहित्यकार व पत्रकार सुरेश चंद्र शुक्ल “शरद आलोक” हैं।

श्री चक्रधर ने कहा कि हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने में Spiel दर्पण जैसी प्रवासी पत्रिकाओं ने अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा तभी जीवंत बनती है जब हम उसमें संवाद करें न कि विवाद। हिंदी के पिछड़ने के मुख्य कारणों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा को संपर्क भाषा बनाने में विज्ञापन अहम भूमिका निभाते हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि हमने देवनागरी लिपि पर ध्यान नहीं दिया जिसके कारण हिंदी पिछड़ी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदी के झंडाबरदारों को आत्ममुग्धता त्यागकर आत्माभिमान रखना चाहिए।

गुरू नानक देव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरविन्दर सिंह बेदी ने विस्तार से हिंदी के वैश्विक भाषा बनने के प्रयासों पर चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में हिंदी विश्व की संपर्क भाषा बन सकती है और प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से राष्ट्रमंडल देशों की संपर्क भाषा अंग्रेजी है उसी तरह सार्क देशों में भी यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या सार्क देशों की भी कोई संपर्क भाषा हो सकती है। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से यह हिंदी ही बनेगी और ऐसी चर्चा सार्क देशों में चल रही है। डॉ. बेदी ने कहा कि भारत की अखण्डता को दो चीजें ही बनाए रख सकती हैं। पहली जीटीरोड और दूसरी हिंदी।

हस्तक्षेप.कॉम के संरक्षक और देशबंधु के राजनीतिक संपादक शेषनारायण सिंह ने अपनी ओस्लो यात्रा और शरद आलोक के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि नार्वे में भारतीयों के सबसे प्रिय इंसान के रूप में सुरेश चन्द्र शुक्ल जाने जाते हैं। सुरेश चन्द्र शुक्ल का एक और नाम शरद आलोक है लेकिन ओस्लो की सड़कों पर जो भी उन्हें जानता है वह उन्हें शुक्ला जी ही कहता है। हिंदी और नार्वेजी भाषा के पत्रकार और साहित्यकार होने के अलावा सुरेश शुक्ल नार्वे की राजनीति में भी दखल रखते हैं। ओस्लो की नगर पार्लियामेंट में सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी ( एस वी ) की ओर से सदस्य रह चुके हैं। 2007 में ओस्लो टैक्स समिति के सदस्य थे और 2005 में हुये पार्लियामेंट के चुनाव में  सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रीय चुनाव में शामिल हो चुके हैं। नार्वेजियन जर्नलिस्ट यूनियन और इंटरनैशनल फेडरेशन और जर्नलिस्ट्स के सदस्य हैं। इसके अलावा बहुत सारे भारतीय और नार्वेजी संगठनों के भी सदस्य हैं। डेनमार्क और कनाडा के कई साहित्यिक संगठनों से जुड़े हुये हैं।

अक्षर पर्व की संपादक सर्वमित्रा सुरजन ने कहा कि एक प्रवासी हिंदी पत्रिका का 25 वर्ष पूरा करना कोई छोटी-मोटी उपलबधि नहीं है। उन्होंने कहा कि शुक्ल जी ने जिस तरह से हिंदी वाली हठधर्मिता का त्याग करके भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच में संवाद सेतु बनाने का काम किया और नॉर्वेजी साहित्य को भी बराबर स्थान दिया, वह काबिले तारीफ है।

इस अवसर पर श्री शुक्ल ने पत्रिका को निकालने में किए गए संघर्ष और हिंदी के यूरोप में प्रसार पर अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि विदेशों में हिंदी को प्रोत्साहन देने वाले अधिकतर गैर हिंदी भाषी हैं और विदेश में भारतीयों की संपर्क भाषा हिंदी ही है जिसे बनाने में इन गैरहिंदीभाषियों का बहुत बड़ा योगदान है। उन्हें जोर देकर कहा कि साहित्य राजनीति से अलग नहीं हो सकता।

इस अवसर पर Spiel दर्पण के नवीनतम अंक का लोकार्पण भी किया गया।

कार्यक्रम में देशबंधु के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव, डॉ. विद्या बिंदु सिंह, प्रो. एस शेषरत्नम्, अंजला सेठी, डॉ. गिरिराज सरण अग्रवाल, विनोद बब्बर, प्रो. उबैदुर्रहमान हाशमी, प्रो. हेमेंद्र पांडे, हरिप्रसाद शुक्ल ने भी विचार व्यक्त किए।

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