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भारत की दहलीज पर फासीवादी दस्तक

अरूंधति रॉय
शुक्र है कि अभी तक किसी भाजपाई ने एमजे अकबर को अलकायदा का आतंकवादी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह को राष्ट्रद्रोही घोषित नहीं किया है। वरना, किसी को भी ‘पाक ऐजेंट, देशद्रोही व आतंकवादी’ घोषित करना तो आरएसएस-भाजपा का जैसे जन्मसिद्ध अधिकार हो गया है।
फासीवाद का साम्राज्यवाद के साथ गहरा ताल्लुक रहा है। युद्ध के लिये जमीन तैयार करने और फिर जनता के खिलाफ युद्ध को जायज ठहराने के लिये साम्राज्यवादी, फासीवाद का इस्तेमाल करते थे। जाहिर है, इन परियोजनाओं पर कारपोरेट घराने दिल खोलकर अपनी पूंजी खर्च करते हैं ताकि युद्ध के दौरान और उसके कई सालों बाद तक वे अपना मुनाफा बेरोकटोक बटोरते रहें। द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले, यूरोप में हिटलर-मुसोलनी का उदय इसका सटीक उदाहरण है। और अब यही काम भारत में शुरू किया जा चुका है: फासीवादी आरएसएस के प्यादे नरेंद्र मोदी को उभार कर… जिसका आख़िरी परिणाम; लाखो-करोड़ों निर्दोष इंसानों का कत्लेआम और अरबों-खरबों की सम्पत्ति की बर्बादी के रूप में सामने आना निश्चित है।
बुर्जुआ रणनीति
भारतीय बुर्जुआ वर्ग द्वारा संघी फ़ासीवाद के चेहरे नरेंद्र मोदी की समय-समय पर की जा रही तारीफ़ और भाजपा द्वारा मोदी को 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिये आगे लाने में देशी-विदेशी कॉर्पोरेट जगत का गुजरात में जमावड़ा, भविष्य में बुर्जुआ कार्यनीति व रणनीति को दिखाता है।  अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवाद की भोंपू ‘टाइम’ पत्रिका ने तो बहुत पहले ही अपने मुखपृष्ठ पर मोदी की फोटो लगाकर उनके द्वारा गुजरात के “विकास” की तारीफ में कसीदे पढ़ना शुरू कर दिया था।
निसंदेह, अल्पसंख्यक साम्प्रदायिक धाराओं या फ़ासीवादी रंगतों में यह करने की न तो सामर्थ्य है और ना ही सम्भावना लेकिन चूँकि ये धाराएं और रंगतें, जनवादी ताक़तों के फ़ासीवादी-विरोधी कैम्प की एकता को तोड़ने, बिखेरने और संघी फ़ासीवाद के प्रचार के लिये मसाला उपलब्ध करवाने के सिवा और कुछ नहीं करतीं, इसलिये इनका पर्दाफाश भी उतना ही ज़रूरी है। याद रहे कि इनमें से ज़्यादातर ताक़तें अपनी खुराक संघी-मार्का हिन्दू फ़ासीवाद के विरोध में और अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना से ही प्राप्त करती हैं।
भाजपा भारतीय फ़ासीवादी धारा का सिर्फ एक राजनीतिक संगठन है, जिसका इस्तेमाल संघ, संसदीय स्पेस का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिये करता है। संघ के 30 से ज़्यादा और संगठन भी हैं। इसलिये अगर भाजपा सत्ता में नहीं हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि फ़ासीवाद का ख़तरा टला हुआ है और फ़ासीवाद का मुकाबला करने का मतलब महज भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने से रोकना है।  
इसके उलट, ऐसे समय में फ़ासीवाद अपना काम चुपचाप, लेकिन उतने ही सघन तरीके से कर रहा होता है जितना वह सत्ता में रहने के दौरान करता है। संघ की सरगर्मियों और पिछले एक दशक के दौरान, जब इसकी संसदीय ‘शाखा’ यानी भाजपा, केन्द्रीय सत्ता से बाहर है, इसके कारनामों को देखकर इस बात का अन्दाज़ा भली-भाँति हो जाता है।
संघी साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद को बेनकाब करने और उसका विरोध करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि दूसरे धर्मों की साम्प्रदायिक धाराओं और फ़ासीवादी रंगतों को किसी भी तरह की छूट दी जा रही है, या किसी को उनकी निन्दा और विरोध नहीं करना चाहिए।
मुस्लिम कट्टरपन्थी सहित हर तरह के साम्प्रदायिक संगठनों और फ़ासीवादी रंगतों को भी आवाम के सामने और ख़ास तौर पर उन धर्मों व इलाकों के लोगों के बीच, बेनक़ाब करना उतना ही ज़रूरी है। पर हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत में सरेआम फ़ासीवादी सत्ता कायम करने, धर्म, जाति या क्षेत्र पर आधारित अल्पसंख्यकों को दबाने, क़त्लेआम करने और बड़े पूँजीपतियों के लिये संकट के दौर में डण्डे का राज क़ायम करने और हर तरह के जनविरोध को कुचलने का सामर्थ्य और सम्भावना सिर्फ संघी फ़ासीवाद में ही है।
फासीवाद को तभी रोका जा सकता है जब उससे विचलित होने वाले लोग सामाजिक न्याय को लेकर उतनी ही दृढ़ प्रतिबद्धता दिखायें, जो साम्प्रदायिकता के प्रति उनके आक्रोश के बराबर हो। क्या हम इस राह पर चल पड़ने के लिये तैयार हैं? क्या हममें से कई लाख लोग न सिर्फ सड़कों पर प्रदर्शनों में, बल्कि अपने-अपने काम की जगहों पर, दफ्तरों में, स्कूलों में, घरों में, अपने हर निर्णय और चुनाव में एकजुट होने को तैयार हैं?इन दिनों, जब देश को उस इंसान को अपने प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाने के लिये तैयार किया जा रहा है, जिसकी निगरानी में गुजरात में तीन हजार से ज्यादा मुसलमानों का जनसंहार किया गया, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, बच्चों को मारा गया और मुसलमानों की संपत्ति को लूट कर उनकी आजीविका को तबाह किया गया, उन्हें विस्थापित और बेदखल कर दिया गया, तो हमें भारत के इस संसदीय लोकतंत्र के बारे में सोचने और विचार करने की जरूरत है, जिसके जरिए फासिस्ट हत्यारे सत्ता में आते रहे हैं। यह भी देखने की जरूरत है कि क्या फासीवाद भारत में किसी एक पार्टी तक सीमित है, या यह सत्ता और शासक वर्ग का बुनियादी चरित्र है। इसी से यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या इस देश में संसदीय लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था फासीवाद के किसी भी रूप से लड़ने, उसे सत्ता से बेदखल करने और दूर रखने में सक्षम है?

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