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भारत में लोकतंत्र के महापर्व का मतलब धनबल, बाहुबल

लोकतंत्र का महापर्व
संघ सत्ता में वापसी के लिए बेचैन है इसलिए उसने हिन्दुत्व का नाम लिये बिना हिन्दुत्व के मुखौटे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर लिया है।
सुनील कुमार
भारत में अप्रैल माह में दो महापर्व चल रहे हैं एक नवरात्रि का तो दूसरा भारतीय ‘लोकतंत्र’ को मजबूत करने का महापर्व चुनाव। इन दोनों महापर्वों का जो महत्व है यथार्थ में वह 180 डिग्री उल्टा है। नवरात्रि में महिला शक्ति की पूजा 8 दिन उपवास रख कर  किया जाता है लेकिन असल जिन्दगी में महिलाओं के साथ उल्टा व्यवहार होता है। लिंग जांच कराकर गर्भ में ही लड़कियों को मार दिया जाता है। महिलाओं के साथ घर में यौन हिंसा से लेकर, शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना झेलना पड़ता है, वहीं ऑफिस, फैक्ट्री, कार्यस्थलों, सड़कों पर उपभोग की नजर से देखा जाता है। यहां तक की अस्पतालों में डॉक्टरों व स्टाफों के यौनिक हिंसा का भी सामना महिला मरीजों को करना पड़ता है। यानी हम जिस व्रत में महिला शक्ति को देखते हैं उसके उल्ट हमारा आचरण महिलाओं के प्रति होता है।
इसी तरह 16 वीं लोकसभा चुनाव का महापर्व चल रहा है जिसमें भाग लेने के लिए भारत के लगभग 81.5 करोड़ लोगों का मतदाता सूची में नाम दर्ज है। यह महापर्व लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए होता है लेकिन भारत में इस महापर्व का मतलब धनबल, बाहुबल है। हर चुनाव में इस तरह के अमीरों, अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। 15 वीं लोकसभा में 1205 करोड़पति-अरबपति उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था जिसमें से 300 करोड़पति-अरबपति संसद में पहुंचे। यही हाल अपराधिक पृष्ठभूमि की सांसदों की रही हैं जहां 2004 में बीजेपी, कांग्रेस के 29 व 26 सांसद थे वहीं 2009 में इन दोनों पार्टियों के अपराधिक पृष्ठभूमि के सांसदों की संख्या 42 व 41 हो गई।
यह केवल इन्हीं दो पार्टियों में समस्या नहीं है, इसमें कोई भी राष्ट्रीय व क्षेत्रिय पार्टी पीछे नहीं है। धनबल, बाहुबल के अलावा पार्टियां ग्लैमर छवि वालों को भी टिकट देने में एक दूसरे से आगे दिखती हैं। ग्लैमर छवि का रिकॉर्ड अभी तक संसद में अच्छा नही रहा है वह संसद में बहुत कम समय ही देते हैं उनको ज्यादातर समय अपने प्रोफेशनल कामों के लिए होता है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को राज्य सभा में कांग्रेस ने भेज दिया लेकिन वे आज तक सांसदनिधि के पैसे खर्च करने के लिए बैंक एकाउंट तक नहीं खोला। यही हालत और भी अभिनेता और खिलाड़ियों का रहा है जिसमें गोविन्दा और नवजोत सिंह सिद्ध की प्रसिद्धि है कि वह संसद में उनकी उपस्थिति बहुत कम रही है।
भारत का चुनाव अब पार्टी के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति के आधार पर लड़ा जा रहा है। लोकतंत्र से पहले जहां लोग गायब थे केवल कुछ सांसद, विधायक, नौकरशाह ही देश को चला रहे थे अब उनको भी किनारे करते हुए एक व्यक्ति विशेष देश का भविष्य तय करेगा। 16 वीं लोकसभा का चुनाव मोदी, राहुल, केजरीवाल के नाम पर लड़ा जा रहा है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का अवमूल्यन नहीं है?
चुनाव का मॉडल
देखने में लगता है कि भारत का चुनाव अमेरिकी मॉडल बनता जा रहा है जहां पर दो उम्मीदवारों के बीच मे बहस होती है। अमेरिकी मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए कम्पनियों के बड़े-बड़े सीईओ नौकरी छोड़ कर या छुट्टी पर आते हैं और कार्यकाल पूरा होते ही अपने नौकरी पर वापस लौट जाते हैं। भारत का चुनाव की हालत भारतीय शासक वर्ग जैसा है जिस तरह यहां का शासक वर्ग अपने फायदे में सामंतवाद-पूंजीवाद के कुरूप रूप को अपनाया हुआ है उसी तरह चुनाव में भी अमेरिकी और भारतीय मॉडल के कुरूप रूप को अपना लिया है। जहां अमेकिरा में दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच आमने-सामने बहस में खुलकर सामाजिक, आर्थिक, विदेश नीतियों को रखते हैं यह नीतियां कब और कैसे लागू होगी उस पर खर्च होने वाले पैसे कहां से आयेंगे सब पर विस्तृत चर्चा होती है। भारत में इसके विपरीत अपनी पार्टियों का घोषणा-पत्र चुनाव के समय ही लाया जाता है जिसको आप अच्छे से पढ़ कर फैसला भी नहीं ले सकते। हर पार्टियां अपनी नीतियों की खुलासे कम और दूसरी की कमियां गिनाने पर ज्यादा समय खर्च करती हैं। भारत के मतदाता अपनी राय को नहीं, गुस्से को प्रकट करती है जिससे जितने वाली पार्टियां अपने नीतियों की सहमति मान लेती है। सभाओं में भीड़ बढ़ाने के लिए पैसे देकर लोगों को लाया जाता है। सभा में ऐेसे लोग उपस्थित होते हैं जो बिना भाषण सुने भी ताली बजाते रहते हैं। ज्यादा तेज आवाज में बोलने वालों को एक अच्छा वक्ता माना जाता है। राजनीति में आने का मकसद अब समाज सेवा नहीं है सत्ता का सुख कैसे भोगा जाये इसकी चिंता रहती है। यही कारण है कि जब एक पार्टी टिकट नहीं देती तो दूसरी, तीसरी पार्टी में जाने में कोई गुरेज नहीं होती है।
भाजपा मोदी को आगे कर गुजरात विकास मॉडल की बात कर रही है। गुजरात विकास मॉडल क्या है यह किसी  को पता है? संघ सत्ता में वापसी के लिए बेचैन है इसलिए उसने हिन्दुत्व का नाम लिये बिना हिन्दुत्व के मुखौटे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर लिया है। इसके लिए वह लौह पुरुष आडवाणी को भी किनारे करने में कोई नुकसान नहीं दिखा। भाजपा अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर का का मुद्दा उठाया है और मोदी के दायें हाथ माने जाने वाले अमित शाह को यूपी का प्रभारी बनाकर यह संकेत दे दिया है कि हमारा एजेंडा हिन्दुत्व है। कांग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार राहुल गांधी मछुआरों, कुलियों, किसानों, महिलाओं इत्यादी के पास जाकर उनकी राय को घोषणा पत्र में जोड़ने की कोशिश की है। यह वही कांग्रेस पार्टी है जो यूपीए 2 में कहा था कि 100 दिन के अन्दर हम महिला आरक्षण बिल को संसद से पास करा देंगे लेकिन पॉच साल बीत जाने के बाद भी महिला आरक्षण बिल पास नहीं हुआ। कांग्रेस ने नारा दिया है ‘हर हाथ तरक्की, हर हाथ शक्ति’। अभी तक देश में सबसे अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी में आम जनता की हालत क्या है? लोगों के जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन को पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है इससे क्या हर हाथ शक्ति और हर हाथ तरक्की आ सकती है? भ्रष्टाचार की बात करने वाली आम आदमी पार्टी पूंजीवाद को रखना चाहती है लेकिन भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है। क्या यह मुमकिन है?
भारत की 6 राष्ट्रीय पार्टियों व 45 क्षेत्रियों पार्टियों के लिये उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण जिसा जड़ नई आर्थिक नीतियों में है उससे किसी को विरोध नहीं है। विश्व व्यापर संगठन में भारत रहे इससे भी कोई विरोध नहीं है। यानी देश की स्वास्थ्य को खराब करने वाली नीतियों पर सभी एक हैं और उसे लागू रखना चाहते हैं। यानी पेड़ खड़ा रहे और वे उसकी पत्तियों और डालियों की बात होती रहे। हम पुरानी पत्तियों, डालियों को छांटते रहेंगे उसके जगह नये पत्तियां और डालियां आ जायेंगी इसलिए जरूरत है पेड़ को गिरा कर नये पेड़ लगाने की। इसलिए सत्ता में जो भी आये आम जनता की हालत दिन प्रति दिन खराब होना ही है। सत्ता में चेहरे बदलते रहे हैं लेकिन नीतिया वही लागू होती है जो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के पक्ष में हो। जरूरत है साम्राज्यवाद-पूंजीवाद परस्त नीतियों को बदल कर जनकल्याणकारी नीतियां बनाने की।

About the author

सुनील कुमार, लेखक सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।

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