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भूख से मरने से बेहतर है कि लड़ कर मरें..

एस्सार ने तोड़े वादे, 35 दिन से अनशन पर महिलाएँ
अविनाश कुमार चंचल
सिंगरौली। करीब पांच साल पहले जब फुलझरिया अपने बेटे के कैंसर का ईलाज करवा कर जबलपुर से लौटी तो देखा कि उसके घर को तोड़ दिया गया है और उसके सामान को बाहर एक कोने में फेंक दिया गया है। एक तरफ बीमार बेटा तो दूसरी तरफ तोड़ दिया घर। फुलझरिया के उपर मुसीबतों का पहाड़ टूट चुका था, जिसे पांच साल बाद भी हर रोज फुलझरिया झेलने को मजबूर है।

दरअसल, यह किस्सा अकेले किसी फुलझरिया की नहीं है बल्कि 35 दिन से अनशन पर बैठी सैकड़ों दलित-आदिवासी महिलाओं की है जिन्हें एस्सार नाम की कंपनी के पावर प्लांट को स्थापित करने के लिए पांच साल पहले विस्थापित होने पर मजबूर किया गया था। साल 2007 में एस्सार पावर प्लांट को सिंगरौली के बंधौरा गांव में स्थापित किया गया था। कंपनी के आने से क्षेत्र का विकास होगा, विस्थापित परिवार के लोगों को नौकरी मिलेगी, बच्चे स्कूल जायेंगे और बीमार को ईलाज के लिए घर के पास ही अस्पताल की सुविधा होगी- हर तरफ खुशहाली के ये कुछ सपने थे जो पावर प्लांट लगने से पहले इन दलित-आदिवासी आँखों को दिखाये गए थे।

हालांकि सिंगरौली जिले में न तो ‘विकास’ के ये सपने नये हैं और न यहां के लोगों का इन सपनों के बहाने ठगे जाना। 1962 में बने रिहंद बांध से चलकर ये सपने एनसीएल, एनटीपीसी, रिलायंस के पावर प्लांट और कोयला खदान से होते हुए हिंडाल्को और एस्सार तक पहुंचा है। इस सफर में यहां की जनता के साथ-साथ सिंगरौली भी कभी स्वीजरलैंड तो कभी सिंगापुर बनने का ख्वाब देखती रही और उन ख्वाबों के टूटने, छले जाने के दर्द को सहती रही है।

मानमति बियार दलित महिला है। मानमति पावर प्लांट लगने से पहले की कहानी को सुनाना चाहती है। ‘जमीन लेते समय हम लोग को बहलाता-फुसलाता रहा। खुद प्रशासन और कंपनी मिलकर समझौता किया था। कंपनी के मनई (आदमी) हर रोज घर पर आकर दुआ-सलाम करता और कहता कि अब हमार दुख दूर भई जाई।’ धीरे-धीरे मानमति के आँखों में कहानी सुनाते-सुनाते जो चमक आयी थी वो कम और अंत में सख्त होती चली गयी। ‘वादा के मुताबिक न प्लाट न भत्ता कुछ नहीं दिया कंपनी। अब यही शासन और कंपनी कहता है-कुछ नहीं देंगे’। बात खत्म करते-करते मानमति की सख्त आँखों में पानी उतर आता है।

अपने 50 डिसिमिल जमीन में बसे लंबे आहाते वाले घर को छोड़कर कंपनी के 60 बाय 90 के दिए गए प्लाट में रहने को मजबूर जागपति देवी उस दिन को याद करती है जब कंपनी ने उसके घर और जमीन को खाली करवाया था। सुबह का वक्त था। चूल्हे पर अभी चावल-दाल चढ़ाया ही था कि कंपनी और प्रशासन के लोग पुलिस वालों के साथ आ गए। ‘हम कहे कि हम नहीं डोलव ( जायेंगे) जब तक मुआवजा न देवे। पटवारी कहा- मिलेगा लेकिन अब कोई पूछने भी नहीं आता है’।

इन विस्थापित परिवारों में ज्यादातर खेती और पशु पालन पर निर्भर रहने वाले लोग ही थे। जमीन से विस्थापन ने इनसे इनकी अर्थव्यवस्था का ये दो मजबूत आधार ही खत्म कर दिया। पहले लगभग सभी परिवारों के पास गाय-बकरियां होती थीं लेकिन विस्थापित कॉलोनी में न तो चारागाह है और न ही इतनी जगह कि पशुपालन किया जा सके। नतीजन खेती के साथ-साथ पशुपालन उद्योग भी खत्म। चैनपति बड़े उत्साह से फसल गिनाती है, “हम लोगों की अपनी दो एकड़ की खेती थी। अरहर, गेंहू, धान, उड़द, तिली, मक्का। सब कुछ खुद के खेत में उपजा लेते थे। कभी बाजार से खरीद कर अनाज नहीं खरीदे। पूरा परिवार मिलकर खेती करते और गुजर-बसर होता रहा।’ चैनपति का पति आज घर बनाने के काम में जाकर मजदूरी करता है।

इस तरह किसानों के मजदूर बनते जाने की कहानी अंतहीन है। कोई आश्चर्य नहीं कि कल देश भर के किसान शहरों के किनारे घर बनाते या फिर पत्थर तोड़ते नजर आयेंगे। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़िशा, नोएडा तक। हर जगह किसानों-आदिवासियों से जमीन-जंगल छीन कर कॉर्पोरेट हाथों को बेचा जा रहा है और उन्हें मजदूर बने रहने को मजबूर कर दिया गया है।

एस्सार पावर प्लांट से विस्थापित लोगों को कंपनी ने जिस कॉलोनी में बसाया है वहां न तो बिजली की सुविधा है और न ही पानी की। अगर पानी का टैंकर नहीं पहुंचता तो लोग पानी के बिना ही रहने को मजबूर होते हैं। जिन लोगों के संसाधनों के सहारे कंपनी देश को रौशन कर मुनाफा कमाना चाहती है उन्हीं लोगों के घरों में अँधेरा पसरा है।

‘हमलोग सुतल (सोए) थे। कि अचानक से कंपनी वाला लोग बुलडोजर लेकर आ गया। हमारा फोटो खिंचने लगा और फिर घर को खाली करवा दिया।’ गुलाबी पनिका उस दिन को याद करने लगती है जब कंपनी के लोगों ने उनको जमीन और घर से निकाला था। गुलाबी सही सवाल उठाती है, ‘हमारा तीन बेटा है। एक को प्लाट मिला बांकि कहां जाएगा। वैसे भी प्लाट सिर्फ पुरुषों को बांटा गया है महिलाओं को देने का नियम भी नहीं है। हम कब तक पुरुषों की तरफ टकटकी लगाए रहेंगे।’

एस्सार पावर प्लांट से निकलने वाले जहरीले राखड़ (ऐश पॉण्ड) को खुले में ही बनाया गया है और ज्यादातर हिस्सा नदी में बहा दिया जाता है। जहरीले नदी के पानी को पीने से गांव वालों के जानवर आए दिन मरते रहते हैं लेकिन कंपनी ऐश पॉण्ड को लेकर बने सरकारी नियम को भी लागू करने के लिए तैयार नहीं।

कंपनी के शोषण, विस्थापन, पलायन, बेचारगी, मजबूरी, हताशा की अंतहीन कहानी यहां पसरी हुई हैं। चाहे विधवा फूलमति पनिका हो जिसे अपने दो बच्ची की शादी की चिंता है, अपने तीन बेटे को पढ़ा-लिखा कर कंपनी में नौकरी करते देखने का चाहत लिए मानमति रजक हो, प्लाट, मुआवजा, भत्ता के इंतजार में सोनमति साकेत हो, पति द्वारा छोड़ दी गयी सुगामति साकेत हो, गुजरतिया हो, कौशल्या साकेत हो या फिर झिंगुरी। भले सबकी अपनी अलग-अलग कहानी है लेकिन दर्द एक है- विस्थापन और हताशा से भरी।

अपना काम-धंधा छोड़कर कब तक बैठे रहियेगा?- मैं पूछता हूं।

“कौन-सा काम धंधा। काम ही नहीं है तो। खेती-किसानी भी नहीं है। होली तक में हमलोग अपने-अपने घर नहीं गए। अब तो जबतक मांग पूरी नहीं होगी नहीं हटेंगे”। सारी महिलाओं ने एक आवाज में जवाब दिया।

फिलहाल पुलिस और कंपनी हर रोज अनशन पर बैठी महिलाओं पर हटने का दबाव बना रही है। कभी महिला पुलिस के डंडे का खौफ तो कभी आँसू गैस के गोले का लेकिन अपना सबकुछ गवां चुकी इन महिलाओं ने अपना डर भी काफी पीछे छोड़ दिया है।

चलते-चलते एक महिला कहती है, “भूख मरने से बेहतर है लड़ाई ले लें। इसलिए महिला लोग लड़ाई में कूदे हैं”।

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