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भ्रष्टाचार के विरुद्ध सच्ची मुहिम के जनक थे विश्वनाथ प्रताप सिंह

भ्रष्टाचार के विरुद्ध सच्ची मुहिम के जनक थे विश्वनाथ प्रताप सिंह
विद्या भूषण रावत
आज देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चला है और जो भ्रष्ट है वो सर्टिफिकेट दे रहे हैं के सब अच्छा है और गरीब और मध्य वर्गीय नौकरी पेशे वाले लोग लंबी लंबी लाइनों में खड़े होकर ‘ मुहिम’ को मज़बूत कर रहे हैं और लगता है भारत अब ‘ भ्रष्टाचारमुक्त’ हो जाएगा।
ये समझने वाली बात है कि जो समाज, जाति और वर्ग भ्रष्टाचार के जनक हैं वो ही इसके विरुद्ध आंदोलन के शूरमा बन रहे हैं और बेचारे गरीब कालेधन के चक्कर में अपनी जिंदगी से हाथ धो रहे हैं। अभी तक इस लड़ाई में मरने वालों की संख्या लगभग 70 हो गयी है जिसमें बैंकों के कर्मचारी भी हैं, जो इतना बड़ा दबाव नहीं झेल पा रहे हैं।
जब भी भ्रष्टाचार की बात होगी तो एक ऐसे व्यक्ति की बात क्यों न हो, जिसने राजनीति को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में लगा दिया और जो उसके खिलाफ लड़ा तो अपने आप में भी, अपने निजी जीवन में निहायत साधारण और ईमानदार था।
जब कभी ईमानदारी से राजनीति करने की बात आएगी तो विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम उन सभी नेताओं की फेहरिस्त में सर्वोच्च होगा जो अपनी जंग ईमानदारी से लड़ा। चाहे वो साइकिल में चुनाव प्रचार की बात हो या बिलकुल मितव्ययी तरीके से रहने की बात, वी पी की जिंदगी एक सन्देश थी लेकिन दुर्भाग्यवश वो हर प्रकार के पूर्वाग्रहों का शिकार हो गए।

कुछ लोग उन्हें मंडल के लिए याद करते हैं तो कुछ तो उनको इसका भी क्रेडिट नहीं देना चाहते।
मंडल की मलाई खाने वाले नेताओ ने भी उनको पूर्णतः भुला दिया, क्योंकि वी पी बनना आसान नहीं और उसके लिए क़ुरबानी देनी पड़ती है।
एक ऐसा शख्स जो कभी सत्ता और संसद के पीछे नहीं भागा और इस्तीफ़ा उसकी जेब में हमेशा तैयार रहता था। आज जब हमारे नेता बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं और पैसे की अय्याशी करते फिरते हैं, वी पी की शख्सियत ईमानदारी की थी, नैतिकता की थी और अपने सिधान्तों पर अटल रहने की थी।
लोगों ने कहा वो खबरों में रहना जानते हैं। चंद्रशेखर ने कहा था कि धरना प्रदर्शन प्रधानमंत्री पद के लोगों को ‘शोभा’ नहीं देता और बोफोर्स की जांच एक इंस्पेक्टर अच्छे से कर सकता है।
जब राजनीति में भ्रष्ट और चरण राजनीति का बोलबाला हो, जब राज्यों के क्षत्रप अपने आप में फासीवादी तानाशाह बन रहे हों तो वी पी की राजीनीति से सीख कर भी जनोन्मुखी राजनीति की जा सकती है।
1984 में राजीव गाँधी भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री बने थे। हम सब के युवा प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बने थे वी पी सिंह। और जब वी पी ने औद्योगिक घरानों की टैक्स चोरी को गंभीरता से लेना शुरू किया तो रिलायंस जैसे नवोदित कंपनियों को परेशानियां शुरू हो गयीं। वित्त मंत्रालय ने कई औद्योगिक घरानों के ऊपर टैक्स रेड की और उनसे हिसाब मांगना शुरू किया। फलतः इनके मालिक जो कांग्रेस को चन्दा देते थे और राजीव के दोस्त थे, उनके पास शिकायत करने गए।

वी पी का भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान इतना सशक्त हो चुका था कि राजीव की सरकार हिल चुकी थी और उनके अंदर अपने वित्त मंत्री को हटाने की हिम्मत नहीं हुई, इसलिए किसी बहाने की तलाश थी।
पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध ख़राब थे और सीमा पर तनाव था इसलिए राजीव ने मौका देखके वी पी को रक्षा मंत्रालय भेज दिया और वित्त मंत्रालय खुद अपने पास रखा। लेकिन वी पी जैसे सुलझे व्यक्ति को जानने में देर नहीं लगी कि राजीव ने उनका मंत्रालय क्यों बदला है, लेकिन उन्होंने ईमानदारी से अपने नए मंत्रालय का कार्यभार संभल लिया।
लेकिन ये क्या भ्रष्टाचार की बहुत बड़ी गंगोत्री तो रक्षा मंत्रालय के भीतर भी है जिसे कोई छूता भी नहीं था, क्योंकि आपकी देशभक्ति दांव पे लग सकती है लेकिन वी पी ने तो रक्षा सौदों में दलाली की नब्ज पकड़ कर एच डी डब्लू सबमरीन में हुई दलाली के जांच के आदेश दे दिए।
राजीव इससे सकते में आ गए। उधर से बोफोर्स तोपो में घोटाले की खबर आई। राजीव और वी पी के रस्ते अलग हो गए।
उसके बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही 1989 का चुनाव हुआ और कांग्रेस पार्टी पिट चुकी थी।
बड़े स्थानों पर भ्रष्टाचार से लड़ना आसान नहीं है। राजीव ने वी पी को भ्र्ष्ट बनाने के लिए सब कुछ किया। उनके नाम से झूठा बैंक खाता सेंट कीटस में चंद्रास्वामी की मदद से खोला और भारत में अपने पिछलगू पत्रकारों जिसमे एम् जे अकबर प्रमुख थे, के जरिये उस खबर को खूब उछाला, लेकिन अकबर की पत्रकारिता को वी पी की ईमानदारी ने ध्वस्त कर दिया। हालाँकि अकबर ने हमेशा अवसरवादी चरित्र दिखाया और अपने करियर के लिए वो उन लोगों के साथ भी चले गए जिनको उन्होंने जी भर के कोसा था।
मीडिया के अभियान के वावजूद वी पी देश के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने बोफोर्स की जांच के लिए सी बी आई की जांच कमिटी बनायी, लेकिन बड़े लोगों के हाथ बड़े होते हैं और अगर आप ईमानदार नहीं है तो ये आपको ख़त्म कर सकते हैं।

वी पी के चरित्र हनन का पूरा प्रयास हुआ, उनको भ्रष्ट बताने का पूरा प्रयास हुआ लेकिन वो पिट गए।
राजनीति में वी पी को ख़त्म करने की, गली गलौज देने की जितनी कोशिश हुई है उनका कोई सानी नहीं है।
वी पी ने राजनीति को साफ़ करने की कोशिश के लेकिन क्योंकि राजनीति में उनके अपने मित्र ही बहुत सामंती सोच रखने वाले थे और सबने एक बार सत्ता आने के बाद वही मूल्य अख्तियार कर लिए जिनके विरूद्ध वो लडे। वी पी की उनको जरुरत नहीं थी क्योंकि सभी ने अपनी अपनी जातियो का जमावड़ा कर लिया था।
मंडल के बाद सबसे ज्यादा गालिया तो वी पी को मिली लेकिन मलाई और ले गए। आज मंडल की राजनीति हिंदुत्व के साथ समझौता परस्त बन गए और 2009, 2014 के चुनावों ने तो बता दिया की हिंदुत्व से बड़ा सोशल इंजीनियरिंग करने वाले कोई नहीं, क्योंकि मंडल के प्रमुख नेताओ ने इसे सम्पूर्ण दलित बहुजन सामाज का आंदोलन न कर अपनी अपनी जातियों और कुनबों तक सीमित कर दिया।
अब मंडल के मलाई खाऊ नेताओं के लिए वी पी के भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई के कोई मतलब नहीं थे क्योंकि सत्ता में रहकर तो उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर कोई विशेष कोशिश की हो ये दिखाई नहीं देता। हाँ जब भ्रष्टाचार में फंसे तो जाति का दामन थाम लिया।
7 अगस्त 1990 को लिया गया वी पी का फैसला ऐतिहासिक था जिसने भारत की राजनैतिक दिशा बदल दी जहाँ बहुजन भारत अब राजनीति में अपनी दिशा और दशा तय कर रहा था। लेकिन सवर्णो की भ्रष्ठ ताकतों ने भी सोच लिया के वी पी का नाम मिटा लिया जाएगा और इसलिए उनकी न केवल सरकार गयी अपितु उनको सम्पूर्ण तौर पर उनके पूरे वज़ूद को समाप्त करनी कोशिश की गयी जो इस बात में दिखाई देती है कि अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भी कभी वी पी का नाम नहीं आया और मोदी को तो कभी फुरसत भी नहीं मिलेगी वी पी का नाम लेने की, क्योंकि अम्बानी से लेकर अमिताभ तक तो वी पी ने जन्म जात दुश्मनी ले ली थी।

फर्क इतना है कि वी पी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम पूंजिपतियों और भ्रष्ट राजनेताओं के विरुद्ध थी, सेनाओं के हथियारों की खरीद फरोख्त में दलाली के सम्बन्ध में था।
वो राजनैतिक दलों को पूंजिपतियों के चंदे के खिलाफ थे और स्टेट फंडिंग ऑफ़ इलेक्शन्स की बात कर रहे थे।
क्या आज के स्वच्छ भारत की नेताओं के अपने दोस्तों के एकाउंट्स चेक करवाने की हिम्मत है। क्या आज अम्बानी अडानी, पतंजलि, अमिताभ, अजय देवगन, सहारा, बिरला इत्यादि के खातों की जांच हो सकती हैं। पूंजीवादियों की गोद में बैठकर तो भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन नहीं किया जा सकता। फर्क इतना है कि आज की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में सबसे भ्रष्ट लोगों ने ईमानदारी का ठेका ले लिया और आम जान भ्रष्ट नज़र आ रहा है और पूंजीपति और उनके भ्रष्ट सहायक, भ्रष्ट मीडिया ऐसा कर रहा है और ईमानदारी के तमगे बाँटते नज़र आ रहे हैं और गरीब इस युद्ध में मर रहा है, सड़ रहा है और लुट रहा है।
नोटबंदी से खरबो रुपये का व्यापार बन रहा है। पेटीएम जैसी कंपनियां दूकान चला रही हैं। अब बिग बाजार और एयर टेल बैंकिंग में आ गयी हैं। विजय माल्या और ललित मोदी आराम से लन्दन में बैठे हैं और मध्यवर्गीय लोगों को इनकम टैक्स के नोटिसेस जा रहे हैं। पूंजीपतियों ने बैंक डूबा दिए हैं और उनके खरबों रुपये माफ़ हो चुके हैं. 500 और दो हज़ार के नोटों को छपवाने में रिजर्व बैंक के लगभग सोलह हज़ार करोड़ रुपैया खर्च होने का अनुमान है और ठेका किस को मिला होगा, उसका अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं है।
वी पी ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई ईमानदारी से लड़ी, इसलिए उद्योग और उनके पिछलग्गू पत्रकारों ने उनको अपना दुश्मन नंबर एक माना। उनका सही आकलन नहीं हुआ। राजनैतिक भ्रष्टाचार के अलावा उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था की चूलें हिला दी।

मंडल ने भारत की राजनीतिक दिशा बदल दी और सबसे बड़े जातिवादी वर्णवादी भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद कर दिया।
मंडल की लड़ाई के चलते सवर्णवादी मानसिकता ने वी पी सिंह के अन्य महत्वपूर्ण कार्यो को भुला दिया और उनको इतिहास के पन्नों से गायब करने की कोशिश की, लेकिन जब भी भारत के राजनैतिक परिदृश्य का सही आकलन होगा और ब्राह्मणवादी भ्रष्टाचार के विरुद्ध ईमानदारी से जंग की कहानी लिखी जायेगी वी पी सिंह का नाम प्रमुखता से होगा।
वह अकेला शख्स था, जिसने भ्रष्ट पूंजिपतियो के किलों में सेंध लगाईं और बताया कि कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता।
भारत की सत्ता के बंद दरवाजे यहाँ के विशालकाय पिछड़े वर्ग के लोगो के खोलने के लिए वी पी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, जिसे ब्राह्मणवादी कुटिलताओं के चलते बंद रखा गया था।

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