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मजदूर हैं ही मरने के लिए!

पेशेगत बीमारियों की चपेट में मजदूर
यदि आप अन्याय की हालत में उदासीन हैं तो आप अत्याचारी के पक्ष में हैं- डेसमंड टुटु।
समित कुमार कार
 कल कारखानों और खदानों में मजदूरों की पेशेगत बीमारी और दुर्घटनाओं से मौत और कार्यस्थल पर महिला मजदूर और कर्मचारियों के यौन शोषण, बलात्कार और हत्या की घटनाएं बढती जा रही हैं। इनके मद्देनजर सभी स्तर पर पेशागत सुरक्षा, सेहत और अन्य श्रम अधिकारों के लिये मजदूर और कर्मचारियों को जागरूक करने के लिये ऑक्युपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ एसोसिएशन ऑफ झारखण्ड (ओशाज) और राइजिंग ऑक्युपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ नेटवर्क ऑफ इंडिया (रोशनी) ने अभियान शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य है मजदूरों को नए सिरे से जागरूक कर और सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) को संवेदनशील बनाकर कार्यस्थल को सुरक्षित बनाए रखने का संस्कार विकसित करने और पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य को मजदूरों के मौलिक अधिकार के रूप में कायम करने की दिशा में अभियान जारी रखना।
 झारखण्ड खनिज सम्पदा से भरपूर है। यहाँ कोयला, लोहा, तांबा, यूरेनियम, क्योर्टज, क्योर्टजाइट, क्रोमाईट, ग्रेनाइट आदि खनिजों के खनन दलन और प्रसंस्करण इकाईयों और इससे सम्बंधित सार्वजनिक और निजी छोटे मंझोले और बड़े कल कारखानों की संख्या 16 हजार के आस पास होगी। इसमें ताप विद्युत प्लांट, सीमेंट प्लांट, स्पंज आयरन प्लांट, कोयला, तांबा, यूरेनियम, क्रोमाईट, बॉक्साइट, लौह अयस्क, रैमिंगमास (क्योर्टज यानी सफेद पत्थर का पाउडर) इकाईयाँ और ग्रेनाइट स्टोन क्रेशर आदि शामिल हैं। ये सबसे ज्यादा धूल पैदा करने और प्रदूषण फैलाने वाली उद्योगिक इकाईयाँ हैं। इन खनिजों के खनन और प्रसंस्करण के दौरान मजदूर फेफड की कई लाइलाज पेशागत बीमारियों से पीड़ित होते है। फेफड़े की पेशागत बीमारियों के विभिन्न रूप हैं। निउमोकोनिओसिस इसका जेनेरिक नाम है। इन खनिजों के धूलकण हवा के साथ फेफड़े में जाने से ये बीमारियाँ होती हैं। काम करने के दौरान सांस के साथ धूल खींचने से फेफड़ों में निशान जैसे मांस तंतु पैदा करता है। यह हवा से ऑक्सीजन निकालने की फेफड़ों की क्षमता को कम कर देता है। धूल कण फेफड़ों की गहरी वायुकोशीय थैलियों में खुद को जकड कर रख सकते हैं। इन्हें श्लेष्मा या खाँसने से साफ नहीं किया जा सकता हैं।नीचे दिये गये टेबल (1) में इन बीमारियों के स्रोतों के बारे में बताया गया है।
 इन सभी बीमारियों में से सिलिकोसिस और कोल वर्कर निउमोकोनिओसिस से पीड़ितों और मृतकों की संख्या मजदूरों में सबसे ज्यादा है। मार्बल, क्योर्टजाइट, ग्रेनाइट का खनन, सुरंग खुदाई, कटाई और निर्माण, ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग, सड़क निर्माण स्थल और सैंड ब्लास्टिंग, फाउंड्री, कांच निर्माण, सिलिकायुक्त अब्रेसिव, स्लेट पेंसिल आदि के उत्पादन और सडक निर्माण स्थल, क्योर्टज यानी सफेद पत्थर के पाउडर के उत्पादन और स्टोन क्रशिंग सहित 77 किस्म की उत्पादन प्रक्रियाओं में सिलिका धूल का उत्सर्जन होता है।
                   तालिका- बीमारियों के स्रोत और उनकी किस्में
 
 अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार हर साल लगभग 24 लाख लोग अपने पेशे या काम के कारण मरते हैं। इसमें 20.2 लाख लोग पेशागत बीमारी और 3.8 लाख लोग कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण मौत का शिकार होते हैं। आईएलओ द्वारा पेश आँकड़े काफी कम दिखते हैं क्योंकि भारत सहित अन्य विकासशील देशों से सही आँकड़े मिलते ही नहीं। झारखण्ड सहित अन्य राज्य भी इसी तरह की रिपोर्ट देते रहते थे कि उनके राज्य में सिलिकोसिस जैसी पेशागत बीमारी नहीं है। कहीं दो या कहीं तीन सिलिकोसिस पीड़ित मजदूरों के आँकड़े देकर खानापूरी कर दी जाती है।
 भारत में सिलिका धूल प्रभावित मजदूरों की तादाद आईएलओ के अनुसार 2007 में 1 करोड थी। यह संख्या आज काफी बढ गयी है क्योंकि खनन और उद्योगिक इकाईयों की संख्या बढती जा रही है। सिलिका धूल प्रभावित मजदूरों को सिलिकोसिस से ग्रसित होना ही है। अमरीका स्थित ओके इंटरनेशनल के अनुसार भारत में 30 हजार लोग सिलिकोसिस से मरते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (अंमुको) की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल 70 हजार लोगों की मौत कोयला की धूल प्रदूषणजनित बीमारी से होती हैं।
 मुसाबनी में सफेद पत्थर का पाउडर बनाने वाली दो इकाईयों के 40 मजदूरों की मौत पिछले10 वर्षों में सिलिकोसिस से हो चुकी है। मौत की औसत उम्र 33 साल है। 20 मजदूर सिलिकोसित से प्रभावित हैं जो अभी भी जिंदा हैं और 150 धूल पीड़ित मजदूरों की जाँच नहीं हुयी है।

सिलिकोसिस से पीड़ितों एवं मृतकों की सूची

40 मजदूरों की सिलिकोसिस बीमारी से मौत

बादल सोरेन, प्रधान हेमब्राम, कार्तिक (कालू) खूंटिया, मृगेन पातोर, सुधीर सोरेन, श्रीमती चिंता कर्मकार, सचिन पातोर, बीरबहादुर, ठाकुर हेमब्राम, सेख सलाउद्दीन, नरबहादुर सोनार, सुक राम गोप, रोहिन पातोर, सुरु पातोर, सोना कर्मकार, सोमाय मुंडा, सुजीत गिरी, उहिराम हांसदा, सस्टी दास, मंगल किस्कू, सेख रहमान, मोनो कर्मकार, श्रीमती जोबा हांसदा, दसरथ गोप, मणि कुमार, मः रफीक, श्रीमती गुड्डी मुखी, परसुराम कालिन्दी, सानो माहतो, गौर सिंह, श्रीमती कार्मी हांसदा, किशुन सोरेन, दिकू सोरेन, श्रीमती पार्वती मार्डी, अंतर्यामी नायक, पराण मुर्मू, पोदनो मुर्मू, शंकर गिरी, श्रीराम मुंडा, सालखु मुर्मू,

20 सिलिकोसित से पीड़ित मजदूर जो अब भी जीवित र्हैं
श्रीमती तारामणि कर्मकार, श्रीमती डांगी(बासो) हांसदा, श्रीमती रानी मुर्मू, श्रीमती पानो हांसदा, श्रीमती लक्समि पातोर, लेविआ बानरा, घाशीराम कर्मकार, सालखु हांसदा, रामदास माझी, मनोरंजन राजवर, बासुदेव भगत, सुरेश रजवार, सोम बहादुर, विशाल (भोला) मुखी , गिड्डू बेहेरा, ढिबर मुर्मू, सुरु लोहार, रामबगल, महाकुड़

150 धूल पीड़ित मजदूरों की जाँच नहीं हुयी है

वे सभी सर्वश्री के के मिनरल्स एबं केके इंडस्ट्रीज के मजदूर थे।

 

 सराइकेला-खरसवां जिला स्थित आदित्यपुर गम्हारिया उद्योगिक क्षेत्रों और कांड्रा में हजारों मजदूरों की मौत सिलिकोसिस से हो गयी। इसमे ईएसआई निबंधित इकाईयों के मजदूर भी शामिल हैं। उन्हें ईएसआई कार्ड नहीं दिया गया था और मुआवजा भी नहीं दिया गया है। झारखण्ड में कितने लोगों की इस बीमारी से मौत हो गयी है जिसका कोई सही आंकडा सरकारी विभागों के पास नहीं है। झारखण्ड में विभिन्न किस्म के धातव और अधातव खनिजों का खनन और प्रसंस्करण दो सौ सालों से अधिक समय से जारी है। सोलह हजार के करीब धूल उत्सर्जनकारी और प्रदूषण फैलाने वाली खदानें और उद्योगिक इकाईयाँ हैं। ऊपर वर्णित आँकड़ों के अनुसार झारखण्ड में सिलिकोसिस सहित अन्य पेशागत बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या आनुमानिक 25-30 लाख है। कमाऊ पिता/माता की सिलिकोसिस से असमय मौत या फेफड की बीमारी के कारण अपाहिज बन जाने से झारखण्ड के 60 लाख बच्चों की जिंदगियाँ प्रभावित हुयी हैं। 30 लाख अन्य आश्रितों की जिंदगियाँ भी प्रभावित हुयी हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं भी प्रभावित हैं जिनके पति की मौत इस बीमारी से हो गयी है या जो इससे पीड़ित हैं। नतीजा हुआ है कि प्रभावित परिवारों के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। उन्हें पढ़ाई लिखाई छोड़नी पड़ी। इन बच्चों को घरेलू नौकर या बाल श्रमिक के रूप में काम करना पड रहा है।
 कारखाना और खदान मजदूरों की पेशागत सुरक्षा और सेहत से सम्बंधित कानून हैं द फैक्ट्रीज एक्ट 1948 और द माइनिंग एक्ट 1952 । मजदूरों की पेशागत और शारीरिक तकलीफ के इतिहास का आकलन और छाती के एक्स-रे से बीमारियों की जाँच सम्भव है। एक्स-रे प्लेटों का आई.एल.ओ. (ILO) वर्गीकरण कर धूल के सम्पर्क में रहने की पुष्टि की जाती है और लगातार फैलनेवाली बीमारियों के विस्तार की जानकारी दी जाती है। इसी प्रक्रिया से सिलिकोसिस के साथ फेफड़े की अन्य पेशागत बीमारियों की जाँच की जाती है। फैक्ट्रीज एक्ट 1948 की तीसरी सूची में अनुबंधित बीमारियों के लक्षण मजदूरों में पाये जाने पर चिकित्सक को मुख्य कारखाना निरीक्षक को सूचित करना कानूनी बाध्यता है। अनुबंधित बीमारियों से पीड़ितों और मृतकों के परिजनों की सामाजिक सुरक्षा के लिये नियोजक द्वारा कानूनन वर्कमैन कंपेंनसेशन एक्ट 1923 और ईएसआई एक्ट 1948 के हत मुआवजा देने का प्रावधान है। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश लागू नहीं हो रहा है और मजदूर न्यायोचित अधिकार से वंचित हैं। सिलिकोसिस सहित अन्य पेशागत बीमारियों की पहचान बी के रूप में की जाती है। अस्पतालों में सिलिकोसिस पीड़ितों को पर्ची नहीं दी जाती है। भर्ती होने पर छल से उन्हें निकाल दिया जाता है। उनकी जाँच सही पद्घति से नहीं की जाती है और डॉक्टरों द्वारा टीबी से पीड़ित बता दिया जाता है। टीबी के लिये मुआवजे का प्रावधान नहीं हैं। इस तरह मजदूरों को अपने अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। इन इकाईयों के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी सहित श्रम अधिकारों और कानून के तहत मिलने वाली अन्य सुविधाएं भी नहीं दी जातीं।
 उच्चतम न्यायालय का आदेश
 राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में हस्तक्षेप याचिका दायर की गयी। इस पर न्यायालय ने सिलिकोसिस से हुयी मौतों में मृतकों को मुआवजा देने और पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा प्रदान करने का आदेश 5 मार्च 2009 को दिया और इन आदेशों को लागू करने के लिये आयोग को अधिकृत किया है, जो मानवाधिकार कानून 1993 के धारा 18 के तहत जीवन के अधिकार की अवहेलना से हुयी मौत पर आधारित है। लेकिन झारखण्ड सरकार उस पर अमल नहीं कर रही है। विभिन्न कारण बताकर मुआवजा देने के आदेश को ठुकरा रही है। सिलिकोसिस और सिलिका धूल पीड़ितों की जाँच और चिकित्सा भी नहीं करा रही है। इसके कारण आयोग अपनी कार्यवाही नियमानुसार चला रही है।
 झारखण्ड सरकार ने ओशाज की पहल पर झारखण्ड ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ सेल का गठन किया और सिलिकोसिस निवारण और रोकथाम के लिये राज्य स्तरों पर कार्य योजना तैयार की है। लेकिन इसमें मृतकों के पोस्टमॉर्टम कराने की बात को जोर दिया गया है। इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है। पोस्टमॉर्टम को मुद्दा बनाकर मृतकों के परिवारों को मुआवजा नहीं दिया जा रहा है। न ही कार्य योजना लागू की जा रही है। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी सिलिकोसिस नियंत्रण कार्यक्रम की घोषणा की है। इन दो राज्य सरकारों द्वारा किये गये फैसलों को मजदूरों के हित में लागू कराना मजदूरों की सक्रिय सहभागिता के बिना सम्भव नहीं है। आदिवासी, दलित और गरीब मजदूरों के लिये मुआवजे की माँग हो या एयर होस्टेज मौसमी चौधरी का मामला हो, सभी मामलों में न्याय पाने में देर हो रही है।
 क्वार्क साइंस सेंटर झारग्राम और नागरिक मंच कोलकाता की पहल पर इंटक, ऐटक, एचएमएस, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी, और यूटीयूसी (एल-एस) सरीखे ट्रेड यूनियनों द्वारा पश्चिम बंगाल के झारग्राम में सिलिकोसिस से मरे श्रमिकों के मुआवजे के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक हस्तक्षेप याचिका दायर की गयी थी। इस पर अदालत ने 26 नवंबर 1996 को द वर्कमेन कंपनसेशन एक्ट 1923 के तहत सिलिकोसिस पीड़ितों और मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देने की राय दी थी। राय के मुताबिक सम्बंधित कम्पनी को मुआवजा देना पड़ा जबकि वह इकाई डायरेक्टोरेट ऑफ फैक्ट्रीज में निबंधित ही नहीं थी। उनके मजदूरों को कोई भी नियुक्ति पत्र, गेट पास और कम्पनी के मजदूर होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था। यह दिखाता है कि कम्पनी और श्रमिकों के सरकारी विभागों में निबंधित होने या नहीं होने या मजदूरों की यूनियन होने या नहीं होने से कोई इकाई संगठित से असंगठित नहीं हो जाती। तथाकथित असंगठित इकाई की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। लिहाजा इन पर श्रम अधिकारों से सम्बंधित कानून लागू नहीं होते। फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के तहत उपायुक्त, जिला मजिस्ट्रेट, जिला कलक्टर को कारखाना निरीक्षण का अधिकार प्राप्त है। लेकिन यह निरीक्षण होता ही नहीं। इसी वजह से कार्यक्षेत्र असुरक्षित रहता है और मजदूर पीड़ित होते हैं। इकाई अगर निबंधित नहीं है या मजदूरों को पहचान पत्र नहीं दिया जाता है तो उक्त इकाई के मालिक, प्रबन्धक, सम्बंधित सरकारी नियामक विभाग, कारखाना निरीक्षक, श्रम विभाग और सर्वोपरि जिला प्रशासन जिम्मेदार है। सिलिकोसिस या अन्य पेशेगत बीमारियाँ टीबी या एचआईवी एड्स जैसी छुआछूत की बीमारियाँ नहीं है। इसे असंगठित इकाई बताकर या दोषी इकाई को बंद हो गया बताकर मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुकरा नहीं जा सकता। उसके कार्यक्षेत्र में मजदूरों के सिलिकोसिस या अन्य पेशागत बीमारियों से पीड़ित होने और उसकी मौत के लिये जिम्मेदार भी उपरोक्त सभी सरकारी प्रशासनिक पदाधिकारी हैं। इसीलिये सर्वोच्य न्यायालय ने अपने आदेश में मुआवजा देने की राय दी सरकार को मुआवजा देना ही है। फिर भी हजारों मजदूरों के मरने के बावजूद राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों के नेता और कार्यकर्ता, एनजीओ, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता उदासीन बने हुये हैं। वे पेशागत बीमारी से मौत को अहम मुद्दा नहीं समझते और उसे मुद्दा नहीं बनाते हैं।
 सभी धूल उत्सर्जनकारी खनन प्रसंस्करण और उद्योगिक इकाईयाँ संगठित क्षेत्र के दायरे में आती हैं। भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने संगठित क्षेत्र में आनेवाली सिलिका धूल उत्सर्जनकारी इकाईयों रैमिंगमास (क्योर्टज-सफेद पत्थर का पाउडर), स्टोन क्रेशर और स्लेट पेंसिल को असंगठित क्षेत्र की संज्ञा दे दी। इन इकाईयों में पीड़ित मजदूरों को असंगठित क्षेत्रों का बताकर उनके लिये सामाजिक सुरक्षा के लिये मुआवजे का कानूनी प्रावधान नहीं होने का जिक्र कर मुआवजे की सिफारिश नहीं करने का निर्णय लिया है। इसमें सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और एनजीओ ने समर्थन दे दिया है। असंगठित क्षेत्र की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। लिहाजा इन पर श्रम अधिकारों से सम्बंधित कानून भी लागू नहीं होते हैं। लेकिन देश के विभिन्न राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं, एनजीओ, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जाने अनजाने ऐसा प्रचार किया है जिससे मजदूरों का अधिकार छीना जा रहा है। मजदूरों को इन विषयों पर जागरूक और एकजुट होने की जरूरत है। अपने अधिकारों को लेकर कम्पनी प्रबन्धन से संवाद बनाना जरूरी पहल है। बिना संघर्ष और संवाद किये कोई भी अधिकार हासिल करना सम्भव नहीं हो सकता है। उन्हें यह बात समझाने की जरूरत है कि पेशागत बीमारी और दुर्घटनाओं से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 4 फीसद नुकसान हो जाता है। खराब पेशागत सुरक्षा और सेहत की वजह से दुनिया के विभिन्न देशों में कुल राष्ट्रीय उत्पाद का 2- 14 फीसद बर्बाद हो रहा है। प्रबन्धकों द्वारा किये जा रहे उत्पादन और विकास के दावों का असली चेहरा इन तथ्यों से उजागर हो गया है। आज के आर्थिक प्रतिस्पर्धा के युग में उतनी भारी रकम गँवाने से हुये नुकसान का बोझ मजूदरों के अधिकारों का हनन कर उन पर लादना चाहते हैं।
 मजदूरों की न्यायोचित माँगों को स्वीकृति देकर कार्यस्थल में पेशागत सुरक्षा और स्वास्थ्य बनाए रखने की व्यवस्था की शुरूआत कर मजदूरों के जीवन के अधिकार और मानवाधिकार के अन्य सवाल और पर्यावरण संरक्षण को सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि उत्पादन प्रणाली को टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सके। अन्यथा मज

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