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ममता-मोदी संयुक्त कॉरपोरेट उपक्रम में तब्दील होने जा रही है भारतीय राजनीति

थर्ड फ्रंट तोड़ो मिशन दीदी का
दिल्ली देखेगी दीदी का दम और देश देखेगा उत्कट राजनीतिक महात्वाकाँक्षाओं का केसरिया ताण्डव।
पलाश विश्वास
बंगाल में भूमि अधिग्रहण विरोधी जनज्वार पर सवार बाजार के शस्त्रों से लैस दुर्गारूपेण अवतरित अग्निकन्या ने वामासुर का वध कर दिया है और बंगाल को धनधान्य से परिपूर्ण शष्यश्यामला बनाने के पीपीपी कार्यक्रम, उनके शब्दों में गुजरात से बेहतर विकास का मॉडल को सैम पित्रोदा और मोंटेक बाबू के दिशा निर्देशन में राथचाइल्ड्स जमाई के संरक्षण में कार्यान्वित करके दिल्ली के सिंहद्वार पर दस्तक देने चल पड़ी हैं सादगी और ईमानदारी की छवि।
तसलीमा नसरीन को कोलकाता से निकालने के लिये जिस मध्य कोलकाता के जिस इलाके में भारी उपद्रव हुआ, उसी इलाके में प्रचण्ड दीदी समर्थक एक अखबार में प्रकाशित एक चित्र लेकर बवाल मचा हुआ है। स्थिति बेकाबू बतायी जाती है और बताया जा रहा है कि कर्फ्यू जैसे हालात हैं। दीदी इसे साजिश बताकर विपक्ष पर वार कर सकती हैं, हालाँकि उन्हें हालात सड़क पर उतरकर नियन्त्रित कर लेने की कला भी आती है और उम्मीद है कि वे हरचंद कोशिश करेंगी कि मामला नियन्त्रित कर लें।
लोकसभा चुनाव में वाम और काँग्रेस को मटियामेट करने और अन्ना सौजन्य से दिल्ली दखल की हड़बड़ी में दीदी ने दुर्भेद्य दुर्ग प्रगतिशील बंगाल के चप्पे- चप्पे को केसरिया रंग दिया है। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह एक मात्र गैर काँग्रेसी प्रधानमंत्री बतौर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले अब भी जीवित अटल बिहारी वाजपेयी का नामोनिशान पार्टी कार्यक्रमों से मिटा दिया, जैसे रामरथी लालकृष्ण आडवाणी को पैदल कर दिया, उसी तरह संसदीय नेता सुषमा स्वराज की बोलती बंद कर दी है, ठीक उससे दो कदम आगे हैं ममता बनर्जी, जिन्हें राजनीतिक विरोध कतई बर्दाश्त नहीं होता और जिनका राजकाज विशुद्ध फतवाबाजी है।
आज जिस आसानी से अमेरिका और यूरोप ने यूक्रेन के मुद्दे पर रूस पर प्रतिबन्ध लगा दिये और जिस पर चीन की भी सहमति हो गयी, उसके आलोक में यह सोचना जरुरी है कि बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अमेरिकी सातवें नौसैनिक बेड़े के मुखातिब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अगर प्रतिपक्ष के नेता अटलजी को भारत के राजनयिक प्रतिनिधि बतौर चुनकर विश्व जनमत को अपनी तरफ नहीं किया होता तो इतिहास कुछ और ही होता। इसे चंद्रशेखर जी की खाड़ी युद्ध के दौरान बतौर प्रधानमंत्री और राजीव गांधी की बतौर प्रतिपक्ष नेता भूमिकाओं के बरअक्स आंके तो शायद बात समझ में आ जाये।
राजनीति और राजनय में दोहरी उपलब्धियों के अपने महानायक को कबाड़ में डालकर संघ परिवार और भाजपा के मोदीकल्प से देश में जो राजनीति आने वाली है, वह विशुद्ध कॉरपोरेट मार्केटिंग की आइकन सेलिब्रिटी राजनीति है, जिसके तहत पार्टी के बाकी चेहरों को गैर प्रासंगिक बनाकर तानाशाह मसीहा बनाने का मुक्त बाजार तैयार होता है।
दीदी के मंत्री ज्योति प्रिय मल्लिक माकपाइयों के सामाजिक बहिष्कार का आवाहन करते हुये माकपाई परिवारों से वैवाहिक सम्बन्ध तक तोड़नी अपील करते हैं तो फिर सांप के साथ जो करते हैं, उन्हें उसी तरह खत्म करने के लिये आम सभाओं में आम जनता को भड़काते हैं। उनके जिलाध्यक्ष माकपाइयों की गड्ढे में फँसे चूहों की तरह बताते हुये उन्हें जहर देकर मारने की बात करते हैं।
अब अगर बाकी देश की जनता भी इस राजनीति को विकल्प बतौर अपनाती है तो समझ लीजिये कि क्या नतीजे होगें। दीदी इस मिशन को बंगाल में कामयाबी के साथ आजमा चुकी हैं और बाकी देश में ममता मिशन खुलने का कॉरपोरेट तैयारी है।
ममता मोदी संयुक्त कॉरपोरेट उपक्रम में तब्दील होने जा रही है भारतीय राजनीति।
केसरिया पहाड़ हँस रहा है और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के समर्थन से दार्जिलिंग ही नहीं, अलीपुर द्वार और जलपाईगुड़ी में भगवा लहराने की तैयारी है। इसी के साथ दमदम, हावड़ा, हुगली, कृष्णनगर, बारासात और जिन सीटों पर माकपा और काँग्रेस का कब्जा है, वहाँ अगम्भीर चमकदार चेहरे खड़ा करके वाम काँग्रेस शिविर के मजबूत महत्वपूर्ण उम्मीदवारों को हराकर बंगाल को केसरिया बनाने की पूरी तैयारी करके दीदी दिल्ली पहुंच रही है और वहाँ अरविंद केजरीवाल और आप अन्ना ममता निशाने पर हैं।
दिल्ली के हर लोकसभा क्षेत्र से चमकीले तृणमूल उम्मीदवार होंगे। जैसे माकपा के वासुदेव आचार्य के खिलाफ आदिवासी बहुल बांकुड़ा में वसंत पार ग्लेमर आइकन मुनमुन सेन और चुनाव नहीं लड़ रहे गुरुदास दासगुप्त के घाटाल में बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार देब को भाकपा के नक्सली संतोष राणा के खिलाफ उम्मीदवार बनाया गया है उसी तरह दिल्ली में चाकलेटी मुंबइया बेमेल जोड़ी विश्वजीत और मौसमी चटर्जी को बंगाल की शताब्दी तापस पाल जोड़ी के तौर पर बाकायदा मार्केटिंग आइकन अगम्भीर राजनीति तुरुप बतौर फेंककर आप को तहस नहस करने की तैयारी है। हालाँकि इस सिलसिले में यानी सिने स्टार, खिलाड़ियों और गायकों को टिकट देने के लिये अन्य राजनीतिक दलों की ओर से आलोचना के जवाब में तृणमूल सुप्रीमो की दलील भी उनकी शायरी की तरह लाजवाब है कि उम्मीदवार सूची को वास्तव में प्रतिनिधित्व वाला आभास देने के लिये कई नये चेहरे को शामिल किया गया है।
इस सिलसिले में एक दिलचस्प शरारत में शायद आप लोगों की भी दिलचस्पी हो। हमारे मित्र सहकर्मी शैलेंद्र चूँकि माकपाई हैं एकदम प्रतिबद्ध और कवि भी हैं, तो हम लोगों ने मजे-मजे में उसे छेड़ने के लिये साबित किया कि माकपा बंगाल, केरल और त्रिपुरा तीनों जगह से हारेगी और दीदी सौ सीटें जीतकर देश की प्रधानमंत्री हो जायेंगी तो हिंदी कविता के लिये भारी संकट हो जायेगा। दीदी कविता में भाषण करती हैं। हिंदी में शायरी करती हैं। उनके भाषण ही कविता संग्रह होंगे। सरकारी खरीद के मोहताज प्रकाशक उनके ही काव्य छापेंगे और नामवर सिंह उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ कवि साबित कर देंगे। वैसे भी बांग्ला में उनके असंख्य कविता संग्रह हैं जिनकी भारी बिक्री होती है। उनके हिंदी कविता संग्रह इतने बिकेंगे कि किसी कवि के कविता संग्रह फिर न छपेंगे और न उन्हें कोई आलोचक संपादक घास डालेगा। वैसे गम्भीरता पूर्वक विचार करें तो इसका खतरा मुकम्मल भी है। जैसे कोलकाता के चौराहों पर रवींद्र संगीत बजता है, राजधानी नयी दिल्ली में हर चौराहे पर दीदी बजेंगी। इसका शुभारंभ रामलीला मैदान से हो रहा है।
शैलेंद्र मित्रों की घेराबंदी से निकल भागे लेकिन देश और देशवासियों के भागने का रास्ता है ही नहीं।
संघ के एक्शन प्लान बी के मुताबिक मोदी थम गये तो दीदी पेश हैं।
दीदी का थर्ड फ्रंट तोड़ो मिशन कामयाब है और अब नमोममय भारत के स्वर्णमार्ग पर आखिरी स्पीडब्रेकर को तोड़ने का मिशन है। यही नहीं, तय है कि जहाँ भी मोदी को कड़ी चुनौती मिलेगी, उसे तोड़ने के लिये बजरिये अन्ना दीदी का इस्तेमाल ब्रह्मास्त्र बतौर होगा। मसलन गुजरात में अरविंद केजरीवाल के दौरे और उनके सोलह सत्रह सवालों से संघियों की नींद हराम हो गयी तो अपने मीडिया अवतारों और दवमंडल के हारे स्टिंग ट्विस्टिंग कराकर बहस केजरीवाल की साख और विश्वसनीयता की तरफ मोड़ दी और वे सारे यक्ष प्रश्न जो भारतीय वामपंथियों ने भी दागे नहीं कभी उनुत्तरित ही रह गये। अब केजरीवाल वाइरल से गुजरात को मुक्त करने के लिये अन्ना ममता फिनाइल का इस्तेमाल होना है।
वाम दल बंगाल और केरल के दम पर तीसरे मोर्चे की चुनावी राजनीति करते रहे हैं। बाकी भारत के कम्युनिस्ट आंदोलनकारियों और सक्रिय ईमानदार कार्यकर्ताओं को बंगाली मलयाली वर्ण वर्चस्व के तहत किनारे करने का खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है वामपंथ को।
बंगाल का किला ध्वस्त होते ही वाम अप्रासंगिकता आज के भारत का सबसे भयानक यथार्थ है।
वृंदा कारत और सीता राम येचुरी के लिये सीट मिली या नहीं, या वे चुनावी जंग में लहूलुहान होना नहीं चाहते। पता नहीं, लेकिन जिस सुभाषिनी अली को वाम नेतृत्व का राष्ट्रीय चेहरा होना चाहिए था, जिसे पोलित ब्यूरो में होना था, उन्हें हारा हुआ मंगलपांडेय के गढ़ बैरकपुर में उतारा गया है।
कामरेडों को हाशिये पर रखकर जिन लालू, मुलायम, पासवान, मायावती, चंद्रबाबू, जयललिता, प्रफुल्ल महंत, नवीन पटनायक को पलक पांवड़े पर बैठाकर वाम विचारधारा और आंदोलन की नींव में बारुदी सुरंग बिछा दी गयी हैं, दीदी की चिनगारी से वहाँ एक के बाद एक केसरिया विस्फोट होते चले जा रहे हैं। इसी के मध्य तृणमूल काँग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के जयललिता के साथ काम करने की इच्छा जताने के एक दिन बाद ही एआईएडीएमके सुप्रीमो जयललिता ने ममता बनर्जी से फोन पर बात की। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच आम चुनाव को लेकर बातचीत हुई है।
अब जब दिल्ली को संबोधित करेंगी दीदी और अन्ना का वरद हस्त होगा अपने ही चेले अरविंद केजरीवाल के मत्थे, तो न कहीं लाल होगा, न हरा और न नील, दसों दिशाओं में होगा केसरिया और केसरिया।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित इस मंतव्य पर गौर करना जरूरी है
क्‍या अन्‍ना हजारे नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच कड़ी का काम कर रहे हैं? बुधवार को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में अन्‍ना-ममता की साझा रैली से पहले राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है।
 यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्‍योंकि
1. टीम अन्‍ना के कई सदस्‍य भाजपा से सीधे तौर पर जुड़ गए हैं या जुड़े होने के संकेत दे चुके हैं। अन्‍ना के सहयोगी पूर्व सेनाध्‍यक्ष जनरल वी.के. सिंह भाजपा में शामिल हो गए हैं, जबकि उनकी साथी किरण बेदी खुले आम नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन कर चुकी हैं।
 2. अन्‍ना के निशाने पर सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी (आप) है। ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस ने अन्‍ना को ‘आप’ को नुकसान पहुंचाने के लिये राजनीतिक मंच मुहैया कराया है। यह जुगलबंदी अंतत: भाजपा को ही फायदा पहुंचाएगी।
 3. बुधवार की रैली से पहले अन्‍ना दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर सकते हैं। इसमें वह 30-40 ‘ईमानदार’ निर्दलीय उम्‍मीदवारों का समर्थन करने की घोषणा कर सकते हैं।
 4. राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भाजपा को एक मात्र विकल्‍प मानने वाली किरण बेदी का ममता-भाजपा गठबन्धन की संभावनाओं पर मानना है कि हर कोई हर विकल्‍प खुला रखता है। उन्‍होंने एक अखबार से कहा कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव में भाजपा कितनी सीटें जीतती है।
 5. दिल्‍ली का गणित: दिल्‍ली में पहली बार तृणमूल काँग्रेस सभी सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी का यहां कोई आधार नहीं है। लेकिन, उसे उम्‍मीद है कि अन्‍ना का साथ मिल जाने से उन लाखों मतदाताओं का वोट मिल सकता है, जो केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में मतदान कर सकते थे। अब तक आए चुनावी सर्वे के नतीजों के मुताबिक दिल्‍ली में मुख्‍य मुकाबला ‘आप’ और भाजपा में ही होने वाला है। ऐसे में तृणमूल के उम्‍मीदवार खड़े करने और उन्‍हें अन्‍ना का साथ मिलने का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को ही होने वाला है।
इसके विपरीत सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने मोदी पर निशाना साधा है जबकि ममता बनर्जी का गुणगान किया है। उन्होंने कहा नरेंद्र मोदी की चाय पर चर्चा कार्यक्रम पर निशाना साधते हुये कहा कि शराब की बोतल लेकर वोट देना या कोई चाय पिला दे उसको वोट देना, सही नहीं है।
हस्तक्षेप पर ओमेर अनस का लेख इतना भाया कि अफसोस हुआ कि मैं इस लेखक को नहीं जानता। शायद पहली बार अमलेंदु को फोन लगाकर मैंने इस लेख की तारीफ की। हम उनके बारीक विश्लेषण से सहमत हैं। उनके लिखे इस विश्लेषण पर खास गौर करने की जरूरत हैः

भाजपा के अंदरूनी बदलाव, नरेंद्र मोदी के उभार और कथित विकास राजनीति के बीच में दरअसल सिफ मौकापरस्ती का रिश्ता नजर आरहा है। न तो भाजपा का ब्राह्मणवाद बदला है और न उसके अन्दर समाजिक न्याय के लिये उनकी सोच में कोई अंदरूनी और नीतिगत या पार्टी के अन्दर किस किस्म का परिवर्तन दिख रहा है। मोदी को पार्टी का चेहरा बना देने मात्र से पार्टी के पदों पर ब्राह्मणों और ऊँची जाति के लोगों का वर्चस्व कम नहीं हो जायगा और ना ही दलितों और पिछड़ों के मुहल्लों में भाजपा की इकाइयों का अचानक विस्तार हो जायगा। पार्टी में दलित चेहरे खरीद खरीद कर लाने पड़ रहे हैं, जो पार्टी हिंदुत्व और हिन्दू धर्म के आधार पर समाजिक सरंचना पर विश्वास करती हो वो अम्बेडकर के “मैं हिन्दू पैदा हुआ था लेकिन हिन्दू मरूँगा नहीं” की हद तक खुद को कैसे बदल सकती है।
कृपया पूरा लेख हस्तक्षेप पर अवश्य पढ़ लें। मैंने हस्तक्षेप से ही इसे अपने ब्लागों पर लगाया है और मित्रों से आवेदन है कि यह जरूरी लेख खुद तो पढ़ें ही, दूसरों को भी पढ़ायें।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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