मशालें फिर भी तैयार रखनी होंगी क्योंकि अभी अंधेरी रात का अंत हुआ नहीं है

हमने भी कभी वर्षों तक अमेरिका से सावधान लिखा था। लेकिन अब खतरा उससे भी भयंकर है और हम समझते हैं कि कविता में भी इस आन पड़ी विपदा की दस्तक सुनायी देनी चाहिए।
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Palash Biswas

शिक्षक दिवस को गुरु गोलवलकर के संकल्प दिवस में तब्दील करने का संघी कार्यभार

पलाश विश्वास

3 सितंबर 2014.

कवि अनिल जनविजय ने जनकवि बल्लीसिंह चीमा को लाल सलाम कहते हुए फेसबुक पर यह पोस्ट कल टांगा है -

आज जनकवि बल्ली सिंह चीमा 62 साल के हो गए। उनको जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ। प्रस्तुत है उनकी बेहद प्रसिद्ध कविता।। हमारी शुभकामनाएं भी। हालांकि जानता हूं कि चीमा किसी शुभकामना के मोहताज नहीं रहे कभी।

हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका।

झुकाओ सिर को तो देगा उधार अमरीका।

बड़ी हसीन हो बाज़ारियत को अपनाओ,

तुम्हारे हुस्न को देगा निखार अमरीका।

बराबरी की या रोटी की बात मत करना,

समाजवाद से खाता है ख़ार अमरीका।

आतंकवाद बताता है जनसंघर्षों को,

मुशर्रफ़ों से तो करता है प्यार अमरीका।

ये लोकतंत्र बहाली तो इक तमाशा है,

बना हुआ है हक़ीक़त में ज़ार अमरीका।

विरोधियों को तो लेता है आड़े हाथों वह,

पर मिट्ठूओं पे करे जाँ निसार अमरीका।

प्रचण्ड क्रान्ति का योद्धा या उग्रवादी है,

सच्चाई क्या है करेगा विचार अमरीका।

तेरे वुजूद से दुनिया को बहुत ख़तरा है,

यह बात बोल के करता है वार अमरीका।

स्वाभिमान गँवाकर उदार हाथों से,

जो एक माँगो तो देता है चार अमरीका।

हरेक देश को निर्देश रोज़ देता है,

ख़ुदा कहो या कहो थानेदार अमरीका।

बल्ली का घर मेरे घर से बमुश्किल तीसेक किमी दूर होगा उत्तराखंड की तराई में।

वे लगातार सत्तर दशक से मशालें लेकर चल रहे हैं। यह मेरे लिए निजी गौरव का मामला भी है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनके जैसे जनकवि के चुनाव मैदान में किस्मत आजमाने की कोशिश हमें अच्छी नहीं लगी। हालांकि घर में होता तो मैं वोट उन्हीं को देता। नोटा का इस्तेमाल हरगिज नहीं करता।

बल्ली भाई भी बूढ़ाने लगे हैं। जवान मरता तो कोई पाश जैसा ही है। बूढ़ा होकर मरे मुक्तिबोध तो किसी के जानने बूझने का मौका भी नहीं होता। संत रविदास सदियों से वही चर्मकार हैं।

तो लगे रहो, चीमा भाई। टेंशन लेने को नहीं है, देने को है। बेमतलब गांधीगिरि के लिए अरविंद भरोसे चुनाव मध्ये हाजत वास करके आये और देखने को कोई विश्वास भी न था।

हम सारे लोग वृद्धावस्था के लिए जन्मजात अभिशप्त हैं। लेकिन लगता तो नहीं है कि संसदीय राजनीति और आम आदमी की क्रांति से आपका मोहभंग हुआ होगा। ऐसा भ्रम पालते रहे हैं बाबा नागार्जुन भी। औगढ़ विद्वान त्रिलोचन शास्त्री भी वक्त बेवक्त डांवाडोल रहे हैं और राहुल सांकृत्यायन की छटा भी निराली है। निराला तो विक्षिप्त हुए।

इसलिए आपके मोहमय विचलन के बावजूद अब भी आप हमारे प्रिय कवि हैं। वैसे ही जैसे गिर्दा, नवारुणदा या वीरेन डंगवाल।

तालों में ताल नैनीताल, बाकी सब तलैया। लोग हमें इस दुराग्रह का दोष दें तो भी हम तो बदलने से रहे। लेकिन दिलोदिमाग और हरकतें जवान होनी चाहिए हर हाल में। कविता के लिए तो यह अनिवार्य शर्त है। चूंकि बल्ली अब भी कविता में मौजूद हैं तो मैं उन्हें अपने खेतों में हमेशा हल जोतते हुए देख सकता हूं।

मेरी मां बसंतीपुर की बसंतीदेवी मुझे कलमपिस्सू कहा करती थी। चूंकि हमारे साथ कोई कार नत्थी नहीं है, बाहैसियत पत्रकार भी मैं बेकार हूं, इसलिए मातृवचन सत्य है। गनीमत है कि बेकार होते हुए भी बल्ली कलम पिस्सू नहीं हैं।

बल्ली भाई, हमने भी कभी वर्षों तक अमेरिका से सावधान लिखा था। लेकिन अब खतरा उससे भी भयंकर है और हम समझते हैं कि कविता में भी इस आन पड़ी विपदा की दस्तक सुनायी देनी चाहिए।

मशालें फिर भी तैयार रखनी होंगी क्योंकि अभी अंधेरी रात का अंत हुआ नहीं है।

गौर करें कि अबकी दफा, हां, किंतु परंतु जापान के रोबोट से मुकाबला है अब।

कंप्यूटर तो गयो रे भाया कि रोबोट आला रे।

आला रे दिगिविजयी प्रधानमंत्री। घर आयो परदेशी।

शुकर है कि घर का बुद्ध कृष्णावतार घर लौट आये हैं।

इससे हालांकि कोई फर्क नहीं पड़ता कि जापान में विवेकानंद कल्चरल सेंटर में अनिवासी भारतीयों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब हम माउस चलाते हैं तब दुनिया चलती है। यह बात उन्होंने तब कही जब वह एक कोरियाई नागरिक के एक प्रसंग का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने बताया कि कोरियाई नागरिक ने एक बार उनसे पूछा कि क्या अब भी भारत में काला जादू और सपेरों का बोलबाला है। तब मैंने कहा कि अब हमारा डिमोशन हो गया है। अब हमारे हाथ में माउस है और जब हमारा माउस चलता है, तब दुनिया चलती है।

भारत के सदियों के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को श्रदांजलि तो देश बेचो अभियान निरंकुश है जो दरअसल लाल किले से प्रधान स्वयंसेवक का राष्ट्र को संबोधन है जिसका दुहराव गुरु गोलवलकर पर्व पर वृहस्पतिवार को होना आर्थिक सुधारों का अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम है।

सौ दिनों में जनसंहारक संस्कृति के सशक्तीकरण के सौ फैसलों के बाद, जापानी सम्राट को भागवत गीता का उपहार देते हुए स्वदेशी धर्मनिरपेक्षता पर कुठाराघातउपरांते शिक्षक दिवस को गुरु गोलवलकर के संकल्प दिवस में तब्दील करने का संघी कार्यभार को संपन्न करने के लिए।

सुबह होते ही वे देश भर के छात्रों को गीता का प्रवचन सुनायेंगे।

इसी बीच मोदीविरोधी जिहाद के पद्मप्रलयक्षेत्र की इस ताजा खबर पर गौर करे जो शारदा घोटाले में सीबीआई शिकंजे में फंसती जा रही ममता बनर्जी से संबंधित खबरों की आड़ में सबसे बड़ी खबर है और ऐसा लव जिहाद देश भर में हो रहा है जैसा यादवपुर विश्वविद्यालय में कैंपस से एक छात्रा को हास्टल में उठा ले जाकर उसका शीलभंग या शांतिनिकेतन में उत्तर पूर्व की एक छात्रा के विरुद्ध यौन अपराध से प्रधानमंत्री के कार्यालय में खलबली उपरांते एक और यौन अपराध शांतिनिकेतन की आश्रमकन्या के साथ, जहां कभी इंदिरा गांधी भी छात्रा रहीं है।

माफ कीजिये, यह मूल मुद्दे से विचलन नहीं है। केसरिया लवजिहाद के चरित्र पर किंचित चर्चा है जिसके लिए धर्मांतरण सबसे बड़ा अपराध है और बाकी सब कुछ जायज है।

हम पीढ़ी दर पीढ़ी इस केसरिया आतंक का नतीजा भुगत रहे हैं। धर्मांतरण के आतंक की वजह से हमारे पुरखे गृहभूमि से बेदखल होते रहे तो धर्मांतरण के बहाने फिर वही गाजापट्टियां।

लेकिन दूसरे किस्म के लव जिहाद के खिलाफ क्यों शांत हैं स्वदेशी सूरमा, यह सवाल कोई पूछेगा नहीं। मसलन पश्चिम बंगाल में किशोरी ने स्वयंभू पंचायत के थूक चाटने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया और कुछ ही घंटों बाद मंगलवार सुबह उसकी नग्न लाश घर के पास रेल की पटरियों पर पड़ी मिली।

बताया जा रहा है कि गांव की उस तथाकथित पंचायत का नेतृत्व राज्य में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस की महिला पार्षद कर रही थीं। किशोरी के परिवार ने रेप और हत्या के आरोप में दर्ज कराए केस में 13 लोगों को आरोपी बनाया है। पार्षद नमिता रॉय के पति भी आरोपियों में से एक हैं। इस मामले में पुलिस ने अब तक एक शख्स को गिरफ्तार किया है। तो दूसरी ओर, मोदी सरकार के सभी मंत्री 100 दिन की उपलब्धियां गिनाने में जुटे हैं।

यह मामला हांलांकि दीर्घकालीन स्थाई बंदोबस्त का है, लव जिहाद जैसे तात्कालिक ऐप उपकरण नहीं, बाकायदा मुकम्मल आपरेटिंग सिस्टम है क्लाउड साफ्टवेयर आवाजाही समेत।

जैसा कि दस्तूर है कि बुनियादी मसलों को स्पर्श करने की मनाही है धर्मनिरपेक्ष वाम अवाम में, लव जिहाद मोड से बाहर निकलकर चूं भी कोई कर नहीं रहा है। जबकि इसी बीच शिक्षा मंत्री ने नागपुरनिर्देशे ममतामयी आपत्ति खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि भाषण सुनना ऐच्छिक है।

हो भी सकता है। कोई सुने, न सुने, इस पर नियंत्रण के लिए तो अभी अभी जापान से लौटे हैं प्रधान स्वयंसेवक, कार्यक्रम अपलोड करने की देरी है। लेकिन गुरु पर्व अब स्थाईभाव है।

श्रम कानूनों के सफाये, भूमि अधिग्रहण, खनन अधिनियम, पर्यावरण कानून, बैंकिंग आरबीआई कानून वगैरह वगैरह को बिगाड़ने के इंतजामात के साथ साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सर्वक्षेत्रे, विनिवेश उपक्रमों और सेवाओं का, निरंकुश निजीकरण, देश बेचो अभियान, संसाधनों की खुली लूट, अबाध बेदखली के लिए लंबित निजी परियोजनाओं को हरीझंडी, सेज महासेज औद्योगिक गलियारा, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन और रोबोटिक्स, डिजिटल देश, जनधनमन से गण गायब, निराधार आधार सशक्तीकरण, सारे घोटाले कोयला नीलामी दुबारा, घोटाला विरुद्धे रक्षाकवच काला धन वापस करो रे फंडा के साथ, इत्यादिमध्ये सेनसेक्स और निफ्टी बजरिये बेलगाम सांढ़ संस्कृति के विकास कामसूत्र से जो लोग परमार्थकारणे उत्तेजित हैं, उनकी मुक्ति के लिए जापानी उद्योगपतियों को रेड कार्पेट पर आमंत्रण के बंदोबस्त का इकरार प्रधानमंत्री की जुबानी समझ में आयेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

स्मृति लुप्त अनार्यों को हड़प्पा का इतिहास भी अब आर्य सनातन सभ्यता बताया साबित किया जा रहा है जैसे यरूशलम जियानियों का धर्मस्थलदावा है,उसी तरह हर विधर्मी निर्माण अब आर्यावर्त है और ऐतिहासिक विरासत मसलन लालकिला, ताजमहल, इंडियागेट , गेट वे आफ इंडिया, सुंदरवन, अजंता ऐलोरा, सांची, नालंदा, तक्षशिला, विक्टोरिया मेमोरियल से लेकर फोर्ट विलियम और तारमीनार भी राम सेतु और राम मंदिर के नानाविध संस्करण है, बस देर सवेर साबित हो जाने का इंतजार करें।

स्वदेशी मेधा वामविकृत इतिहास संसाधन और पौराणिक वैदिक आयुर्वैदिक बागवत इतिहास के पुनरूद्धार करके उत्तर आधुनिक अखंड महाशक्ति हिंदी हिंदू और हिंदुस्तान का सपना साकार करके बनाने वाले ही हैं, जैसे सामाजिक बदलाव के केंद्र यूपी अब गाजा पट्टी है, वैसे ही भूगोल को तहस नहस करके इतिहास की नयी नींव पर समग्र एशिया अब हिंदुत्व का पद्मप्रलय है।

इस सुनामी की आहट जो सुन नहीं रहे हैं, वे बहरे हैं या इसी आहट के तेलयुद्ध में, पारमाणविक विध्वंस में तब्दील हो जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं वे। जो देख नहीं रहे हैं, दिग्विजयी बेलगाम अश्वमेधी घोड़ों को वे या तो शंबूक की तरहै मनुस्मृति अनुशासन भंग करने के अपराध में मारे जायेंगे, या घर घर सीरियल महाभारत की तरह गृहयुद्ध में कुरुक्षेत्र के महाशोक में अशोक हो जायेंगे या वे अधीर जो हैं, समाहित समावेशी सत्ताभृत्यों की तरह उनके तमाम खेत सोना उगलेंगे रक्षा, कोयला, टेलीकाम, राष्ट्रमंडल, आईपीएल, शेयर,शारदा घोटालों की तरह।

सीबीआई जांच करती रहेगी और मीडिया मुफ्त पीआर टीआरपी कारोबार करता रहेगा, बेदखल जनांदोलन बेवफा विचारधारा और बेहया पाखंडी प्रतिबद्धता के दुष्काल में निम्नदेशीय केश की तरह प्राचुर्य के बावजूद बाकी जनता अपनी लाश के लिए दो गज जमीन और कमसकम कफन का मोहताज होते रहेंगे।

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 About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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