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महालया से अब दुर्गोत्सव, राजपथ पर राजकीय परेड और घर-घर स्त्री उत्पीड़न

महालया से अब दुर्गोत्सव, राजपथ पर राजकीय परेड और घर-घर स्त्री उत्पीड़न
स्त्री की चीखें किसी को सुनायी नहीं पड़ती वैदिकी मंत्रोच्चार और सत्ता पक्ष के वीभत्स ढाक ढोल नगाड़ों के शोर शराबे में।
सबिता बिश्वास
बंगाल में सत्ता और आस्था बाकी देश की तरह अब एकाकार है और पवित्र प्रतिमाओं पर सत्ता का बेशर्म चेहरा चस्पा है।
अब पंचम या षष्ठी से नहीं, अगले साल से महालय से अनंतकाल तक दुर्गोत्सव की धूम लगी रहेगी, राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड की तर्ज पर दुर्गा प्रतिमाओं की झांकी और राजकीय विसर्जन के बाद ढोल नगाड़ों के साथ सत्ता ने यह ऐलान कर दिया है। 
महिषासुर मिथक के बारे में जो विवाद है, उसका इस सिलसिले में हम कोई खुलासा नहीं कर रहे हैं।
बंगाल में मातृसत्ता के महोत्सव के बतौर हिमालय की बेटी का मायका बंगाल को मानकर मायके से बिटिया की कारुणिक जो विदाई का विजया दशमी बंगला की संस्कृति का, बंगाली राष्ट्रीयता और राजकाज राजनीति का जो महोत्सव है, उस सिलसिले में उस बिटिया के सामाजिक यथार्थ को समझने की कोशिश हमारी है।
मातृशक्ति के बोधन और आवाहन की आड़ में पितृसत्ता के निर्मम निरंकुश चेहरे का दस दिगंत आइने के मुखा्तिब हैं हम।
भारतीय दंड विधान संहिता के नानाविध कानून और बलात्कार की सजा फांसी हो जाने के बावजूद दसों दिशाओं में जो बलात्कारी कर्मकांड जारी है, उस परिदृश्य को समझने के लिए दुर्गोत्सव आयोजन के दौरान जारी स्त्री उत्पीड़न और स्त्री आखेट पर आस्तिक और नास्तिक दुर्गा भक्त और असुर वंशज बिन किसी पूर्वग्रह के तनिक ध्यान दें।
स्त्री उत्पीड़न के तमाम आंकड़े सार्वजनिक हैं।
दुर्गोत्सव से मातृसत्ता का उत्सव मनाने वाला बंगाल स्त्री उत्पीड़न में टॉप पर है और यह पीपीपी माडल का चरमोत्कर्ष है, इसका उल्लेख भी बहुत जरूरी नही है।
हर साल दुर्गोत्सव के दौरान, उसके आगे पीछे स्त्री उत्पीड़न की घटनाएं आम हैं। लेकिन इस बार विजया दशमी के मौके पर एक गृहवधु मिता मंडल का जो विसर्जन दुर्गा प्रतिमाओं के साथ हो गया, वह कुछ खास है क्योंकि यह स्त्री चेहरा बहुचर्चित यादवपुर विश्वविद्यालय के होक कलरव का चेहरा है।
मिता मंडल इस विश्वविख्यात विश्वविद्यालय में बांग्ला साहित्य की मेधावी छात्रा थी और उसका मायका दक्षिण कोलकाता के तेजी से विकसित गड़िया उपनगर में है।
इसी बीच घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के इस मामले को लेकर यादवपुर विश्वविद्यालय और बाकी विश्वविद्यालयों के छात्रों ने आंदोलन शुरु कर दिया, जिसे सिविल सोसाइटी का समर्थन भी हासिल हो गया।
खास बात यह है कि छात्रों के नेतृत्व में मिता के मायके में जुलूस निकलते न निकलते सीधे मुख्यमंत्री का ह्स्तक्षेप हो गया। नवान्न से मिता मंडल की रहस्यमय मृत्यु की जांच सीआईडी को सौंप दी गयी है और उसके मायके से किसी एक को सरकारी नौकरी देने का ऐलान हो गया है।
खास बात यह कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नवान्न में तुरत फुरत मिता के पिता सहदेव दास, चाचा रंजीत दास और दोनों भाई खोकन दास और बाप्पा दास से मुलाकात कर ली, ताकि आंदोलन को मिता के परिजनों का समर्थन न मिले।
पूजा के दौरान तपसिया में नाजिया फौजी और रिसड़ा के पायल हाजरा के मामले में कोई आंदोलन नहीं हुआ तो उनके परिजनों के नवान्न से बुलावा भी नहीं आया। दूसरे तमाम जो मामले स्त्री उत्पीड़न के दुर्गोत्सव के दौरान सामने आये, उनकी भी किसी स्तर पर सुनवाई नहीं हुई। 
गौरतलब है कि कामदुनी मामले में सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की के परिजनों से मुख्यमंत्री ने आंदोलन बेलगाम होने के बाद ही मुलाकात की थी।
मुख्यमंत्री ने मिता के मायके वालों से देर तक बात की और उन्होने उन्हें न्याय होने का भरोसा दिलाया। यह भरोसा बाकी तमाम दूसरे मामलों में न पीड़ितों को मिला है और उनके परिजनों को।
मुख्यमंत्री ने मिता के मायके वालों के सारे कर्ज सरकारी खजाने से चुकाने का वायदा भी कर दिया। यह भी अभूतपूर्व है।
इसके अलावा मुख्यमंत्री ने मिता के पिता की सेहत का हालचाल पूछते हुए उन्हें बीमार घोषित करके उनके इलाज के लिए उन्हें पीजी अस्पताल में भर्ती भी करवा दिया। यह भी अभूतपूर्व है।

बाकी मामलों में भी मुख्यमंत्री ऐसी ही पहल करें तो वाकई बंगाल में स्त्री बाकी देश के मुकाबले ज्यादा आजाद होंगी।
लेकिन इससे पहले होने वाली तमाम घटनाओं और इसके आगे पीछे स्त्री आखेट के तमाम वारदातों के मामलों में ऐसा हुआ नहीं है।       
हाल में मिता का विवाह हावड़ा जिले के उलुबेड़िया में हुआ था।
नवविवाहिता उस मिता मंडल को मैं नहीं जानती, लेकिन उसका खून सना चेहरा दशमी की रात से बांग्ला सोशल मीडिया का प्रोफाइल बन गया है।
सोशल मीडिया के मुताबिक यह दहेज उत्पीड़न के तहत वधु हत्या का मामला है और मिता के मायके वालों ने उसके ससुराल वालों के खिलाफ यही मुकदमा दायर किया है, जिसके तहत मिता के पति राणा मंडल समेत दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

आरोप यह है कि ससुराल वाले मिता से एक लाख का दहेज मांग रहे थे।
मृत्यु से पहले मायके आकर उसने दहेज के ये रुपये मांगे थे, जो उसके मायके वाले दे नहीं सके।
ससुराल वालों का मुंह बंद रखने के लिए कमसकम पांच हजार रुपये मांगे थे मिता ने, वे रुपये भी मायके वाले जुटा नहीं सके। जिसके खातिर मायके वालों के मुताबिक ससुराल वालों ने उसे मार डाला।
दूसरी तरफ ससुराल वालों का कहना है कि उन्होंने कोई दहेज वगैरह मांगा नहीं है। ससुराल में मिता बहुत लोकप्रिय थी, ऐसा उनका दावा है। पंडालों में घूम घूमकर दुर्गा प्रतिमाओं के दर्शन को लेकर पति पत्नी में कहासुनी की वजह से मिता ने खुदकशी करने की कोशिश की, तो उसके पति राणा ने फांसी से लड़की हुई मिता को बचा कर अस्पताल पहुंचाया।

मायके वालों के मुताबिक मिता को मारकर फांसी पर लटका दिया गया था और फिर उसकी लाश इला

ज के लिए अस्पताल ले जायी गयी।
मिता के खून सने चेहरे को लेकर सुसराल वालों की सफाई है कि उसे बचाने में जो शीशे टूट गये, उन्हीं से मिता जख्मी हो गयी थी।
मिता मंडल की तरह बाकी स्त्रियां जो दुर्गोत्सव के दौरान, उसके आगे-पीछे इस तरह घरेलू हिंसा की शिरकार होती रहती हैं, उनके मामलों में जाहिर है कि न छात्रों ने कोई आंदोलन किया और न सिविल सोसाइटी ने सड़क पर उतरने की जरुरत समझी और न उन मामलों में मुख्यमंत्री या नवान्न से हस्तक्षेप हुआ। उन तमाम मामलों का ब्यौरा भी अखबारों और टीवी के जरिये सार्वजनिक हैं, जिनसे न आंदोलनकारी छात्र और न सिविल सोसाइटी अनजान है।
जहां तक मुख्यमंत्री और नवान्न और राजकाज और राजनीति की संवेदनाओं का सवाल है, वह काकद्वीप से लेकर कामदुनी तक बहुचर्चित तमाम मामलो में बेनकाब होती रही हैं, जहां राष्ट्रपति भवन से लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बावजूद न्याय अभी नहीं मिला है। जिन मामलों में आंदोलन जैसा कुछ शोर शराबा हुआ, वहां मुआवजा और सरकारी नौकरी की घोषणा हो गयी। इस बारे में भी काफी कुछ लिखा जा चुका है।
दुर्गा के मिथक की तरह यह भी कोई कम बड़ा मिथक नहीं है कि बंगाल में स्त्री बाकी देश की स्त्रियों की तुलना में ज्यादा आजाद है और परिवार में मातृसत्ता है।

बंगाल में विवाह के लिए कोई अंकुश किसी कन्या पर है नहीं और घरेलू हिंसा या दहेज उत्पीड़न के मामले भी बंगाल में कम हैं।
रोजमर्रे की जिंदगी में स्त्री की जीवन यंत्रणा बाकी देश की तरह लहूलुहान है, यह सामाजिक यथार्थ हम सिरे से नजरअंदाज करते हैं।
रोज-रोज तमाम बलात्कार कांड और कुटीर उद्योग की तरह फलते-फूलते स्त्री देह के कारोबार से इस प्रगतिशील पखंड का रंगा पुता चेहरा बेनकाब है, जिसे महालया से लेकर दशमी के बाद अनंतकाल के दुर्गोत्सव की चकाचौंध में छुपा लिया जाता है।
हिमालय की बेटी को अपनी बेटी बनाकर दुर्गोत्सव की संस्कृति से स्त्री की स्थिति बदली नहीं है, भद्र समाज इस सामाजिक यथार्थ के मुखातिब होना ही नहीं चाहता।
रोज-रोज राजकीय दुर्गोत्सव के मध्य घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न या बलात्कार कांड में जो स्त्री आखेट के भयंकर दृश्य हैं, मिता मंडल जैसे खास कुछेक मामले में वह बेपर्दा जरुर होता है, लेकिन बाकी हजारों मामले दर्ज ही नहीं होते।
स्त्री की चीखें किसी को सुनायी नहीं पड़ती वैदिकी मंत्रोच्चार और सत्ता पक्ष के वीभत्स ढाक ढोल नगाड़ों के शोर शराबे में।
छात्रों ने बाकी दूसरे मामलों में भी आंदोलन जारी ऱखने का ऐलान किया है और 22 अक्तूबर को वे गंगापार रिसड़ा थाना के सामने के समाने प्रदर्शन करेंगे।

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