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महाश्वेतादी की राजकीय अंत्येष्टि : हम अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकते क्योंकि वे पूरी तरह सत्तावर्ग के कब्जे में हैं

हिंदुत्व का पुनरूत्थान का मतलब नवजागरण की विरासत से बेदखली है।
इसी तरह टुकड़ा टुकड़ा मरते जाना नियति है क्योंकि फिजां कयामत है!
जनम से जाति धर्म नस्ल कुछ भी हो, जनप्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हुए तो आप अछूत और बहिष्कृत हैं!
पलाश विश्वास
विरासत से बेदखली का कितना ख्याल है हमें?
इसी तरह टुकड़ा टुकड़ा मरते जाना नियति है क्योंकि फिजां कयामत है।
जनम से जाति धर्म नस्ल कुछ भी हो, जनप्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हुए तो आप अछूत और बहिष्कृत हैं।
महाश्वेतादी की अंत्येष्टि राजकीय हो रही है। हम उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकते क्योंकि वे पूरी तरह सत्तावर्ग के कब्जे में हैं। मरने के बाद भी उनकी विरासत बेदखल हो गयी है। जैसा कि हमेशा होता रहा है।
कवि जयदेव, लालन फकीर से लेकर रवींद्रनाथ, विवेकानंद और नेताजी की विरासत ऐसे ही बेदखल होती रही है।
गांधी की विचारधारा भी अब सत्ताविमर्श है जैसे अंबेडकरी आंदोलन अब सत्ता संघर्ष है।
अपने मशहूर चाचा इस महादश के सर्वश्रेष्ठ फिल्मकार  ऋत्विक घटक की त्रासदी कुल मिलाकर महाश्वेतादेवी की त्रासदी है।
तमाम खबरों में, तमाम चर्चाओं में महाश्वेतादी को समाजिक कार्यकर्ता बताया जा रहा है। सही भी है। वे यह देख  पाती तो उन्हें कोई अफसोस भी नहीं होता।
प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिहाज से साहित्य में उनका कद किसी से कम नहीं है। उनका यह परिचय उनकी निरंतर सामाजिक सक्रियता के आगे बौना है।
हमने उन्हीं से सामाजिक कार्यकर्ता का विकल्प अपनाने का सबक सीखा है और मुझे भी सामाजिक कार्यकर्ता ही अंतिम तौर पर मान लिया जाये, तो यह सही ही होगा।
महाश्वेतादी तो कालजयी हैं लेकिन बिना कालजयी बने सामाजिक कार्यकर्ता होने पर लोग मुहर लगा दें, तो हम जैसों के लिए यह बहुत बड़ी बात है।
महाश्वेतादी के लिखने के मेज पर हमेशा लोधा शबर खेड़िया मुंडा संथाल आदिवासियों के रोजमर्रे की जिंदगी की समस्याओं को लेकर कागजात का ढेर लगा रहता था।
साहित्य लिखने से बढ़कर, इतिहास दर्ज करने से बढ़कर उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता यही थी कि समसामयिक इतिहास में रियल टाइम में हस्तक्षेप कर लिया जाये।
उन्होंने तमाम राष्ट्रनेताओं,  राजनेताओं,  मंत्रियों,  राजनीतिक दलों और सरकारों, सत्ता संस्थानों को जितने ज्ञापन और पत्र उन्हीं रोजमर्रे की समस्याओं से तुरंत निपटाने के लिए लिखा है, वह उनके लिखे साहित्य और इतिहास से बेहद बड़ा कृतित्व है।
महाश्वेता देवी की तस्वीर में कहीं न कहीं मेरे पिता की तस्वीर चस्पां है। वे भी तकनीक का इस्तेमाल नहीं करती थीं।
वे भी हाथ से लिखकर जनसमस्याओं को लेकर सत्ता से टकराती थीं और उनका कोई संगठन भी वैसा नहीं था। न वे कोई एनजीओ चलाती थीं।
ममता बनर्जी के बंगाल की मुख्यमंत्री बनने से पहले सत्ता का कोई समर्थन उन्हें कभी मिला नहीं था। वे विशुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थीं, साहित्यकार जो हैं, सो हैं।
बीड़ी पीने और खैनी खाने तक उनकी प्रतिबद्धता सीमाबद्ध नहीं रही है। उनकी कोई चीज निजी रह नहीं गयी थी। कंघी से लेकर साबुन तेल टूथपेस्ट, घर तक सब कुछ वे अपने अछूत आदिवासी परिजनों के साथ बांटती थीं।
यह अनिवार्य अलगाव की स्थिति थी।
मुंबई में नवभारत टाइम्स के समाचार संपादक भुवेद्र त्यागी जागरण में जब हमारे साथ थे तो सीधे इंटर पास करके डेस्क पर आये थे। उन दिनों राम पुनियानी जी के साथ बेटा टुसु काम कर रहा था। पत्रकारिता में उसकी दिलचस्पी थी तो मुंबई में नभाटा कार्यालय में मेरे साथ जब वह गया तो भुवेंद्र ने साफ-साफ कहा था कि-

पहले तय कर लो समाज सेवा करनी है या पत्रकारिता।

भुवेंद्र ने साफ साफ कहा था कि पुनियानी जी जैसे किसी भी व्यक्ति के साथ काम करोगे तो तुम्हारी कुछ हैसियत हो या नहो, मीडिया के नजर में तुम एक्टिविस्टबन जाओगे और कहीं भी तुम्हारे लिए कोई दरवाजा खुला नहीं रहेगा। खिड़कियां और रोशनदान भी बंद मिलेंगे।
तब मैं जनसत्ता में था। मुझे भी लोग शुरू से सामाजिक कार्यकर्ता जानते रहे हैं। मेरी जनसत्ता में नौकरी की खबर सार्वजनिक तो हाल में हुई है।
इंडियन एक्सप्रेस समूह में नौकरी करते हुए मुझे एक्टिविज्म की पूरी आजादी मिलती रही है। इसलिए भुवेंद्र के कहे का आशय तब कायदे से मैं भी समझ न सका।
सच यही है। महाश्वेता दी का  शुरुआती उपन्यास झांसीर रानी देश पत्रिका में धारावाहिक छपा लेकिन बाद में देश पत्रिका और आनंद बाजार प्रतिष्ठान के प्रकाशन से उनका कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं छपा।
उन्होंने सिनेमा पर फोकस करने वाली पत्रिकाओं प्रसाद और उल्टोरथ जैसी पत्रिकाओं में अपने तमाम महत्वपूर्ण उपन्यास छपवाये।

एकमात्र महाश्वेता देवी और उनके बेटे नवारुण भट्टाचार्य ही अपवाद है कि बंगाल के सत्तावर्ग के तमाम प्रतिष्ठानों की किसी मदद के बिना वे शिखर तक पहुंचे।
रचनाकार होने से पहले अपनी जनप्रतिबद्धता को सर्वोच्च वरीयता देना राजनीतिक तौर पर हमेशा सही भी नहीं होता। सविता कल रात घर लौटने से पहले गरिया रही हैं और कह रही हैं कि कैसा निर्मम निष्ठुर हूं मैं कि दीदी का अंतिम दर्शन भी कर नहीं रहा हूं और उनकी अंत्येष्टि में भी शामिल नहीं हूं।
यह अंतिम संस्कार दरअसल हमारा भी हो रहा है, ऐसा हम समझा नहीं सकते।
गिरदा के बाद सिलसिला शुरु हुआ है। एक एक करके अत्यंत प्रियजनों को विदाई कहते जाना  कंटकशय्या की मृत्यु यंत्रणा से कम नहीं है। वीरेनदा समूचा वजूद तोड़ कर चले गये। नवारुण दा लड़ते हुए मोर्चे पर ही खत्म हो गये।
पंकज सिंह से नीलाभ तक अनंत शोकगाथा है और महाश्वेतादी के बाद सारे प्रियजनों के चेहरे एकाकार हो गये, जिनमें मेरे माता पिता ताउ ताई चाचा चाची और बसंतीपुर गांव में मेरे पिता के दिवंगत सारे लड़ाकू साथी शामिल है।
हर बार थोड़ा थोड़ा मरता रहा हूं और हर बार नये सिरे से लहूलुहान सूरज के सामने खड़े होकर नये सिरे से लड़ाई का सौगंध खाता हूं। मौत की आहटें बहुत तेज हो गयी है और सारे कायनात पर कयामती फिजां हावी है।

इस महादेश के बहुजनों को मालूम नहीं है कि विवेकानंद ने कहा था कि भविष्य शूद्रों का है।
वे जनम से कायस्थ थे जो वर्णव्यवस्था के मुताबिक ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं है। ईश्वर को वे नरनारायण कहते थे और धम कर्म के वैदिकीकर्मकांड के बजाय वे नरनारायण की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे।
रामकृष्ण मिशन का सारा कर्मकांड विवेकानंद के इसी विचारधारा पर केंद्रित है। हिंदुत्व और हिंदुत्व के पुनरूत्थान के प्रवक्ता बतौर उन्हे जो पेश किया जा रहा है, वह वैसा ही है जैसे गौतम बुद्ध से लेकर बाबासाहेब अंबेडकर को विष्णु का अवतार बनाया जाना है या अनार्य द्रविड़ देव देवियों, अवतारों, टोटम का हिंदुत्वकरण है।
इस महादेश के बहुजनों को मालूम नहीं है कि रवींद्रनाथ अस्पृश्य थे और ब्रह्मसमाजी थे, जिसे बंगाल में म्लेच्छ समझा जाता रहा है। उनकी सामाजिक स्थिति के बारे में समूचे शरत साहित्यमें सिलसिलेवार ब्यौरे हैं।
हिंदुत्व की तमाम कुप्रथाओं का अंत इन्ही ब्रह्मसमाजियों ने किया,  जिन्हें हिदुत्व के झंडवरदार हिंदू नहीं मानते थे। इसी को हम नवजागरण कहते हैं।

हिंदुत्व का पुनरूत्थान का मतलब नवजागरण की विरासत से बेदखली है।
राजा राममोहन राय इंग्लैंड में अकले मरे तो ईश्वरचंदर् विद्यासागर आदिवासियों के गांव में आदिवासियों के बीच।
रवींद्र की सारी महत्वपूर्ण कविताओं की थीम अस्पृश्यता के विरोध मे है और अमोघ पंक्ति फिर वही बुद्धं शरणं गच्छामि है। चंडालिका और रुस की चिट्ठीवाले रवींद्रनाथ को हम नहीं जानते।
इसी तरह नेताजी फासीवादी नहीं थे और भारत में वे सामंतवाद और साम्राज्यवाद के साथ साथ फासीवाद के खिलाफ शुरु से आखिर तक लड़ रहे थे और भारत में  अपने अंतिम भाषण में फासीवाद के खिलाफ उन्होंने युद्धघोषणा तक कर डाली थी। हिंदी नहीं, साझा विरासत की हिंदुस्तानी उनकी राष्ट्रीयता और भाषा थी।
महाश्वेता दी को आदिवासी समाज मां का दर्जा देता है।
आदिवासियों और किसानों के संघर्षों को ही उऩ्होंने साहित्य का विषय बनाया तथाकथित सबअल्टर्न आंदोलन और दलित साहित्य आंदोलन से बहुत पहले। झांसीर रानी किसी व्यक्ति का महिमामंडन नहीं है और न कोई वीरगाथा, यह बुंदेलखंडी जनजीवन का महा आख्यान है जो घास की रोटियों पर आज भी वहां के आम लोग लिख रहे हैं।

महाश्वेतादी के मामा थे इकानामिक एंड पालिटिकल वीकली के संस्थापक संपादक शचिन चौधरी।
तो शांति निकेतन में दी के शिक्षकों में शामिल थे रवींद्रनाथ,  नंदलाल बसु और रामकिंकर। रवींद्रनाथ उन्हें बांग्ला पढ़ाते थे। इस समृद्ध संपन्न विरासत से आदिवासियों का मां बनने तक का सफर समझे बिना हम महाश्वेता दी की समाजिक सक्रियता, उनकी विचारधारा, उनका साहित्य और उनका सौदर्यबोध समझ नहीं सकते।
भाषा बंधन में मैंने बंगाल से बाहर बसे शरणार्थियों के लिए अलग से पेज मांगे थे। जो मिले नहीं। फिर 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ संघर्ष और आंदोलन में हम उन्हें साथ चाहते थे। लेकिन आदिवासी मसलों के अलावा शरणार्थी मसले से वे उलझना नहीं चाहती थीं और उन्होंने यह कार्यभार हमारे हवाले छोड़ा। नंदीग्राम सिंगुर जनविद्रोह तक हमारा सफर साथ साथ था। परिवर्तनपंथी हो जाने के बाद दीदी का हाथ और साथ छूट गया। जैसे आइलान का हाथ उसके पिता के हाथ से छूट गया। समुंदर में डूबने के बाद या तो आप लाश में तब्दील हो जाते हैं या फिर अकेले ही समुंदर की लहरों से जूझकर जीना होता है। यही हुआ है।
इसका मतलब यह नहीं है कि आदिवासी आंदोलन के साथ नत्थी हो जाने के बाद उनका दलियों या शरणार्थियों से कुछ लेना देना नहीं था।

अपने उपन्यास अग्निगर्भ में उन्होंने लिखा हैः

जाति उन्मूलन हुआ नहीं है। प्यास बुझाने के लिए पेयजल और भूख मिटाने के लिए अन्न परिकथा है। फिर भी हम सबको कामरेड कहते हैं। (मूल बांग्ला से अनूदित)।

यह दलित कथा व्यथा उनकी जीवन दृष्टि है तो विचारधारा की राजनीति का निर्मम सामाजिक यथार्थ भी, जिसका मुकाबला उन्होंने जीवन और साहित्य से बिल्कुल यथार्थ जमीन पर खड़े होकर किया।
पहले हकीकत की  उस जमीन पर खड़े होने की जरुरत है। सच का सामना जरूरी है। सामाजिक होना जरूरी है। तभी थाने में बलात्कार की शिकार आदिवासी औरत द्रोपदी मेझेन या स्तनदायिनी यशोदा की दलित या बहुजन अस्मिता और उसके संघर्ष को गाय बनाम भैंस राजनीतिक आख्यान के बरक्स समझने की दृष्टि मिलेगी।
वरना हम जल जंगल जमीन से बेदखल तो हैं ही, नागरिक और मानवाधिकार और आजीविका रोजगार से लेकर लोकतंत्र संविधान कानून के राज समता न्याय और मनुष्यता सभ्यता प्रकृति से बेदखली के साथ-साथ विरासत और इतिहास से बेदखल होने का यह अनंत सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है।
Mahashvetadi’s state funeral -We can not even last respects because she is in complete possession of power class

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