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महिला दिवस- लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष की जरूरत

संजय पराते
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का आह्वान जर्मनी की समाजवादी नेता क्लारा जेटकिन ने किया था। 19 मार्च, 1911 को यह पहली बार मनाया गया था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को काम का अधिकार देने, उन्हें समान वेतन देने, मताधिकार देने, सरकारी पद प्राप्त करने तथा लैंगिक भेदभाव के तमाम रुपों को खत्म करने की मांग की गयी थी। 19 मार्च का दिन इसीलिये चुना गया था, क्योंकि 1848 में इसी दिन पर्शिया के राजा को सिद्धांततः महिलाओं को सार्वभौम मताधिकार देने की बात मानने को बाध्य होना पड़ा था।
        वर्ष 1913 से यह 8 मार्च को मनाया जाने लगा। 1857 को इसी दिन न्यूयार्क के गारमेंट महिला मजदूरों ने हड़ताल की थी। तब यह वास्तव में कामगार महिला दिवस था। लेकिन वर्गीय संघर्ष को रुपाकार देने के लिये शुरु हुआ यह दिन शीध्र ही सामुदायिक संघर्ष को रुपाकार देने के दिन में बदल गया। समग्र महिला समुदाय की मुक्ति के लिये शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष व समाज को प्रगतिशील-समाजवादी दिशा में संगठित करने के संकल्प के दिन में बदल गया।
        महिलाएं लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं- वर्गीय और सामाजिक दोनों रूपों में। पिछले 104 सालों में दुनिया और भारत में बहुत बदलाव आया है, लेकिन यह सच्चाई अपनी जगह कायम हैं- हाँ, शोषण के रूप-रंग जरूर बदल गये हैं।
हमारे देश में अल्प शिक्षित खेतिहर मजदूर की तादाद बहुत ज्यादा है, लेकिन लैंगिक भेदभाव के चलते पुरुष मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी से काफी पीछे हैं। अप्रैल 2013 में जारी श्रम ब्यूरों के आंकड़ों के अनुसार खेत जोतने के लिये, बिजाई तथा फसल कटाई और कुआं खुदाई के लिये पुरुषों को क्रमशः 212 रुपये, 185 रुपये, 179 रुपये तथा 254 रुपये मिलते हैं, जबकि महिलाओं को इसी काम के लिये क्रमशः 123 रुपये ( 42 प्रतिशत कम), 148 रुपये (20 प्रतिशत कम), 149 रुपये (17 प्रतिशत कम) तथा 145 रुपये (43 प्रतिशत कम) प्रतिदिन मिलते हैं। अकुशल गैर कृषि कार्यों के लिये पुरुषों को 179 रुपये, तो महिलाओं को 135 रुपये (25 प्रतिशत कम) प्रतिदिन मजदूरी ही मिलती है। सरकारी ठेका मजदूरी में भी ऐसा ही लैंगिक भेदभाव आम बात है। लेकिन यह भेदभाव केवल मजदूरों के बीच ही नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त महिलायें भी इसका शिकार हैं। ‘लैंगिक वेतन अन्तर’ सम्बंधी एक रिपोर्ट के अनुसार सीए/सीएस/आईसीडब्ल्यूए या इसके समान पेशेवर योग्यता प्राप्त महिला, पुरुष के मुकाबले 44.25 प्रतिशत कम कमाती है। जिस महिला के पास 30 या ज्यादा वर्षों के काम का अनुभव है, वह पुरुष की तुलना में 78.23 प्रतिशत कम कमाती है।
        वर्गीय शोषण का शिकार होने के कारण एक समुदाय के रुप में महिलाओं का आर्थिक स्तर पुरुषों के मुकाबले निम्न है। इस कारण एक समुदाय के रूप में उनकी सामाजिक स्थिति भी निम्न है। पिछले वर्ष के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर दो तीन मिनट में एक महिला अपराध (बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण और उत्पीड़न) हो रहे हैं और हर दिन 600 से ज्यादा मामले दर्ज हो रहे हैं। हर 29 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार हो रहा है और वर्ष 1971-2012 के बीच बलात्कार के मामलों में 902 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। देश में हर 9 मिनट में एक महिला अपने पति या रिश्तेदार के हाथों क्रूरता का शिकार होती है और हर 77 मिनट में एक दहेज हत्या हो रही है। देश की कुल महिला आबादी का एक तिहाई हिस्सा यौन या शारीरिक हिंसा का शिकार है। वे न घरों में सुरक्षित हैं, न कार्यस्थलों पर और न यात्रा के दौरान। महिला उत्पीड़न के खिलाफ बने तमाम कानून या तो निष्प्रभावी हैं या उन्हें पुरुष मानसिकता के साथ लागू किया जाता है।
        वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीतियों और व्यवसायीकरण ने समाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे और पुरुषवादी सामन्ती सोच को मजबूत ही किया है, जिसके कारण लैंगिक भेदभाव और इससे पैदा हिंसा और ज्यादा बढ़ी है। महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक स्थिति में गिरावट का सीधा असर उनके राजनैतिक प्रतिनिधित्व में भी झलकता है। इसीलिये संसद व विधानसभाओं में महिला आरक्षण की मांग सामाजिक न्याय की मांग के अनुरुप ही है।
        लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्षरत हमारे देश की महिला आंदोलन की समस्त धाराओं को एकजुट होकर एक समुदाय के रुप में महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक शोषण के खिलाफ संघर्ष करना होगा तथा समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे और पुरुषवादी सामन्ती-पूँजीवादी मानसिकता पर चोट करना होगा– यही अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सार्थकता है।

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संजय पराते, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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