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महिला सशक्तिकरण के दावों के बावजूद अपने असल अधिकार से कोसों दूर हैं महिलाएँ

शैलेन्द्र चौहान
नॉएडा के कॉल सेंटर की एक महिला कर्मचारी ने अपनी कंपनी के मालिक और उसके साथी पर नशीला पदार्थ देकर बलात्कार करने का आरोप लगाया है। नोएडा पुलिस ने जिला अदालत के आदेश पर कॉल सेंटर मालिक और उसकी कम्पनी के प्रबन्धक के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया है। मेरे आश्चर्य की तब सीमा नहीं रही जब एक चैनल की वेबसाइट पर अधिकाँश लोगों ने इसे फर्जी करार देते हुये स्त्रियों के बारे में अपनी नकारात्मक और विकृत प्रतिक्रियाएं दीं। महिलाओं के विरुद्ध अपराध का एक पहलू समाज का नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण भी है। अक्‍सर लोगों में धारणा होती है कि अपराध होने में महिला का दोष है या यह उसके उकसाने के कारण हुआ होगा। विगत में ऐसी अनेकों घटनाओं के खिलाफ उग्र प्रदर्शन भी हुये, उन्हें तीव्रता से निपटने के नाटक भी हुये, लेकिन समाज की मूल मानसिकता जस की तस है। अब इसे क्या कहा जाये। हम रोज ही समाचारों में पढ़ और देख रहे हैं कि महिलाओं और युवतियों पर कहीं एसिड अटैक हो रहे हैं, निरंतर बलात्कार हो रहे और हत्याएं हो रही हैं। कभी- कभार शोर भी होता है, लोग विरोध प्रकट करते हैं, मीडिया सक्रिय होता है पर अपराध कम होने का नाम नहीं लेते क्यों। हम देख रहे हैं कि एक ओर भारतीय नेतृत्व में इच्छाशक्ति की भारी कमी है तो वहीं नागरिकों में भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को लेकर कोई बहुत आक्रोश या इस स्थिति में बदलाव की चाहत भी नहीं है। वे स्वाभाव से ही पुरुष वर्चस्व के पक्षधर और सामंती मनःस्थिति के कायल हैं। तब इस समस्या का समाधान कैसे सम्भव है? हमारे देश-समाज में स्त्रियों का यौन उत्पीड़न लगातार जारी है लेकिन यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि सरकार, प्रशासन, न्यायालय, समाज और सामजिक संस्थाओं के साथ मीडिया भी इस कुकृत्य में कमी लाने में सफल नहीं हो पाये हैं। देश के हर कोने से महिलाओं के साथ दुष्कर्म, यौन प्रताड़ना, दहेज के लिये जलाया जाना, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना और स्त्रियों की खरीद-फरोख्त के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं। साथ ही छोटे से बड़े हर स्‍तर पर असमानता और भेदभाव के कारण इसमें गिरावट के चिन्ह कभी नहीं देखे गए। ऐसे में महिला सुरक्षा कानून का क्या मतलब रह जाता है, इसे आप और हम बेहतर तरीके से सोच और जान सकते हैं। इसलिये यदि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से देखा जाये तो जिस तरह की घटनाएं आए दिन भारत में घट रही हैं, उसमें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अगर कोई रिपोर्ट आती है तो वो रिपोर्ट कहीं न कहीं महिला सुरक्षा के लिये यहाँ उठाए जा रहे कदमों पर उंगली उठाती है। समय-समय पर महिला सुरक्षा को लेकर कानून बनाये जाते हैं और कानूनों में परिवर्तन भी किए जाते रहे हैं फिर भी देश में महिलाएं असुरक्षित हैं, यह बेहद चिंता की बात है। हमारा समाज इस दुष्प्रवृत्ति के प्रति इतना संवेदनहीन और गैर जिम्मेदार क्यों है। इस बारे में कुछ तथ्यों की तरफ ध्यान दिया जाना अत्यावश्यक है।
भारतीय समाज में महिला उत्पीड़ऩ की मानसिकता आदिकाल से ही पायी जाती है। जब महिलाएं घर के भीतर थीं, तब पुरुष घर में घुसकर अपहरण करके या राह चलते उन पर आक्रमण करता था। घर के लोग भी उनपर अत्याचार करने में पीछे नहीं रहते थे। अब वे पुरुषों के साथ, घर से बाहर स़ड़क से दफ्तर तक काम कर रही हैं। अब वह कभी उन्हें लालच देता है, कभी उन पर अनुचित दबाव डालता है और समझौते करने के लिये तरह-तरह से मजबूर करने की कोशिश करता है। समय और समाज बदलने के साथ महिलाओं के शोषण के तरीके भी बदल गए हैं। महिलाओं के लिये पुरुषों के बराबर ख़डे होने के अवसर तो ख़ूब दिखते हैं, लेकिन ये अवसर आभासी हैं। अक्सर, तरक्की और विकास के नाम पर स्त्री शोषण के बहाने बनाये जाते हैं। अधिकांश कामकाजी स्त्रियों की तो सोच यह है कि पुरुष समाज हमेशा स्त्री समाज से अलग होता है। स्त्री अपने को उससे न स़िर्फ असुरक्षित पाती है, बल्कि पुरुष के रवैये से बेतरह निराश भी होती है। नई उपभोक्तावादी संस्कृति में शोषण के कई अदृश्य स्तर और न दिखने वाले औज़ार मौजूद हैं, जिनके बहाने जो शक्तिशाली है, वह कमज़ोर का शोषण करता है। लोग यह कहते हैं कि इसका समाधान पारिवारिक शिक्षा से सम्भव है। स्कूल व कॉलेज में इस विषय पर विद्यार्थियों को शिक्षित करने की ज़रूरत है। लेकिन आज भी पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता वही की वही है। यहाँ नारी उत्पीड़ऩ तथा नारी तिरस्कार जैसी विकराल समस्या की जड़ों में झांकने का प्रयास अत्यावश्यक है।
दरअसल नारी उत्पीड़ऩ, नारी तिरस्कार तथा नारी को निचले व निम्न दर्जे का समझने की जड़ें हमारे प्राचीन धर्मशास्त्रों, हमारे रीति-रिवाजों,संस्कारों तथा धार्मिक ग्रंथों व धर्म सम्बंधी कथाओं में पायी जाती हैं। नारी को नीचा दिखाने की परम्परा भारतीय समाज को धर्मशास्त्रों के माध्यम से विरासत में मिली है। ज़ाहिर है कि सहस्त्राब्दियों से हम जिन धर्मशास्त्रों, धार्मिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का अनुसरण करते आ रहे हैं उनसे मुक्ति पाना इतना आसान नहीं है।
नारी को छोटा व नीच समझने की मानसिकता भारतीय समाज की रग-रग में समा चुकी है। असल प्रश्न इसी मानसिकता को बदलने का है। अतीतमोह का संकट सबसे ज्यादा रूढ़ियों एवम् परम्परागत मूल्यों के सम्बंध में है। ये मूल्य चाहे नैतिक हों, या सामाजिक या फिर हमारे अपने-अपने घरों के सांस्कृतिक तौर-तरीके ही क्यों न हों। जहां कुछ बुजुर्ग अपने समय की मुश्किलों से तुलना करते हुये आज की जीवनशैली में आयी आसानी की तारीफ भी करते हैं, वहीं कुछ प्रौढ और यहाँ तक कि युवा भी मौजूदा दौर के सिर्फ नकारात्मक तत्वों पर ही ध्यान देते हैं। आज चमक-दमक, पैसे का गलत उपयोग, कमाई के काले धंधे और भोग-उपभोग व मनोरंजन के अनेकों उत्पाद उन्हें आकर्षित करते हैं। यहाँ जो छिपा तथ्य है कि विकास के माध्यम और इनके विज्ञापन तथा मीडिया द्वारा अमीर लोगों के विलासी जीवन के समाचार इन्हें स्त्रियों के प्रति सिर्फ भोगवादी दृष्टि से वागत करते हैं। आज के समाज में स्त्री स्वातंत्र्य पर व्यंग्य करने वालों से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वे लगभग दो शताब्दी पहले छोड़ी जा चुकी सती प्रथा को जारी रखना चाहते हैं? जैसे कि दो-चार पीढ़ी पहले की रूढियाँ टूटी हैं, वैसे ही आपके समय के कुछ विचार या परम्पराएं या तौर-तरीके अगर टूटते हैं तो उन्हें बिगड़ने के बजाय नए निर्माण के अर्थ में देखें। उससे परहेज करना ठीक नहीं हो सकता। समय के साथ समाज में कुछ जागरूकता अवश्य आयी है लेकिन अब भी बड़ा हिस्सा महिलाओं के प्रति न केवल अनुदार है बल्कि अवसर पाकर हैवानियत का व्यवहार करने से नहीं चूकता है। बलात्कार को लेकर समाज में एक क्रूर एवम् विकृत क़िस्म की मानसिकता है जिसकी वजह से पीड़ित को पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर अदालत में जाने तक हर जगह शर्म का एहसास करवाया जाता है, उसे बेहद अपमानित किया जाता है। इतना ही नहीं लोग ऐसे मामलों में घृणित रूप से रस लेते हैं। पीड़िता के साथ उसके परिजनों और सम्बन्धियों तथा सहानुभूति रखने वालों को भी अपमानित किया जाता है। यद्दपि इन वर्षों में अपराध को छुपाने और अपराधी से डरने की प्रवृत्ति खत्‍म होने लगी है। इसिलए ऐसे अपराध पूरे न सही लेकिन फिर भी काफी सामने आने लगे हैं। अन्यायी तब तक अन्‍याय करता है, जब तक कि उसे सहा जाये। महिलाओं में इस धारणा को पैदा करने के लिये न्‍याय प्रणाली और मानसिकता में मौलिक बदलाव की भी जरूरत है। देश में लोगों को महिलाओं के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और इसका पालन पूरी गंभीरता और इच्‍छाशक्‍ति से नहीं होता है। महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बाद भी महिलाएँ अपने असल अधिकार से कोसों दूर हैं। उन्‍हें इस बात को समझना होगा कि दुर्घटना व्‍यक्‍ति और वक्‍त का चुनाव नहीं करती है और यह सब कुछ होने में उनका कोई दोष नहीं है।

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शैलेन्द्र चौहान, साहित्यकार व स्तंभकार हैं।

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