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महिषासुर को लेकर इतना हंगामा – माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?

राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ काव्य रचनेवाले महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?
पलाश विश्वास
भारत भर के आदिवासी अपने को असुर मानते हैं और भारत भर में हिंदू अपनी आस्था और उपासना को महिषासुर वध से जोड़ते हैं जो पूर्वी भारत में अखंड दुर्गोत्सव है और मिथकीय इस दुर्गा को आदिवासी अपने राजा की हत्यारी मानते हैं।
इस विवाद से परे असुर भारतीय संविधान के मुताबिक अनुसूचित जनजातियों में शामिल हैं।
असुर वध अगर हमारा सांस्कृतिक उत्सव है तो असुरों को अपने पूर्वज महिषासुर को याद करने का लोकतांत्रिक अधिकार होना चाहिए।
धर्मसत्ता में निष्णात राजसत्ता ने मनुस्मृति के पक्ष में जेएनयू को खत्म करने के मुहिम में संसद से सड़क तक जो दुर्गा स्तुति की और जैसे महिषासुर महोत्सव का विरोध किया, उस सिलसिले में कल रांची में छह असुरों के वध के साथ झारखंड में हिंदुओं की नवरात्रि शुरु हो गयी तो बंगाल में उत्र 24 परगना में बारासात के पास बीड़ा में पुलिस ने महिषासुर महोत्सव को रोक दिया।
पूरे बंगाल में महिषासुर महोत्सव जारी है और उसे सिरे से रोक देने की कोशिशें तेज हो रही हैं। पुरुलिया में मुख्य समारोह का आयोजन भी बाधित है।
तो समझ लीजिये कि हम माइकेल मधूसूदन दत्त को क्यों याद नहीं करते।
महिसासुर को लेकर इतना हंगामा, राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ काव्य रचनेवाले महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त को हम क्यों याद करेंगे?
माइकेल मधुसूदन दत्त ने इस देश में पहली बार मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मिथक तोड़कर रावण के पक्ष में मेघनाथ काव्य लिखकर साहित्य और समाज में नवजागरण दौर में खलबली मचा दी, लेकिन नवजागरण के संदर्भ में उनकी कोई चर्चा नहीं होती। बंगाल में उन्हें शरत चंद्र और ऋत्विक घटक की तरह दारुकुट्टा और आराजक आवारा के रूप में जाना जाता है और हाल में भारत के लड़ाकू टेनिस स्टार लिएंडर पेस के पुरखे के बतौर पेस की उपलब्धियों के सिलसिले में उनकी चर्चा होती है। बाकी देश यह भी नहीं जानता।
भारत में छंद और व्याकरण तोड़कर देशज संस्कृति के समन्वय और दैवी, राजकीय पात्रों के बजाय राधा कृष्ण को आम मनुष्य के प्रेम में निष्णात करने वाले जयदेव के गीत गोविंदम् से संस्कृत काव्यधारा का अंत हो गया, लेकिन निराला से पहले तक हिंदी में वहीं छंदबद्ध काव्यधारा का सिलसिला बीसवीं सदी में आजाद भारत में भी खूब चला हालांकि बंगाल में रवींद्र नाथ के काव्यसंसार में बीसवी संदी की शुरुआत में मुक्तक छंद का प्रचलन हो गया था।
इस हिसाब से 1857 की क्रांति से पहले मेघनाद वध काव्य में भाषा, छंद औरव्याकरण के अनुशासन को तहस नहस करके रावण के समर्थन में राम के खिलाफ लिखा मेघनाद वध काव्य की प्रासंगिकता के बारे में बंगाल में भी कोई चर्चा कायदे से शुरू नहीं हुई।
नवजागरण में हिंदू धर्म सत्ता और मनुस्मृति अनुशासन की जमीन तोड़ने में मेघनाथ वध के कवि माइकेल मधुसूदन दत्त की भूमिका उसी तरह है जैसे महात्मा ज्योतिबा फूले या बाबासाहेब अंबेडकर का हिंदू धर्म ग्रंथों और मिथकों का खंडन मंडन, मनुस्मृति दहन की है। लेकिन इस देश के बहुजन समाज को माइकेल मधुसूदन दत्त का नाम भी मालूम नहीं है। रवींद्र को जानते हैं लेकिन उनकी अस्पृश्याता के बारे में, उनके भारत तीर्थ के बारे में बहुसंख्य भारतीय जनता को कुछ भी मालूम नहीं है।
धर्मसत्ता से टकराने के कारण ईश्वर चंद्र विद्यासागर लगभग सामाजिक बहिष्कार का शिकार होकर हिंदू समाज से बाहर आदिवासी गांव में शरण ली और वहां उन्होंने आखिरी सांस ली। तो राजा राममोहन राय की बहुत कारुणिक मृत्यु लंदन में हुई।
भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति के आधुनिकीकरण की उस महाक्रांति के सिलसिले में राजा राममोहन राय के बारे में समूचा देश कमोबेश जानता है और लोग शायद ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में भी कुछ कुछ जानते होंगे। लेकिन इस क्रांति में महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त की भी एक बड़ी भूमिका है जिन्होंने हिंदुत्व का अनुशासन तोड़ने के लिए ईसाई धर्म अपनाया महज अठारह साल की उम्र में।
फिर रावण के पक्ष में मेघनाद को महानायक बनाकर मेघनाद वध काव्य लिखकर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मिथक तोड़ा। उनके बारे में हम कुछ खास जनाते नहीं हैं।
आज महिषासुर उत्सव का संसद और संसद के बाहर जैसा विरोध हो रहा है, रामलीला के बजाय रावण लीला का आयोजन बहुजन करने लगे तो कितनी प्रतिक्रिया होगी, इसको समझें तो सतीदाह, विधवा उत्पीड़न,  स्त्री को गुलाम यौन दासी बनाकर रखने,  स्त्री और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखने, उन्हें नागरिकऔर मानवाधिकार से वंचित रखने,  संपत्ति, संसादन और अवसरों से वंचित रखने,  बाल विवाह,  बहुविवाह,  मरणासण्णके साथ शिशुकन्या के विवाह और पति के सात उनकी अतंरजलि यात्रा  के समर्थक हिंदू समाज में राम को खलनायक बनाने की क्या सद्गति रही होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
वही प्रेमचंद लिखित सद्गति बंगाली भद्र समाज ने माइकेल मदुसूदन दत्त की कर दी है और उनकी कोई स्मृति इस भारत देश के हिंदू राष्ट्र में बची नहीं है।
वैसे बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर ने भी हिंदू धर्मग्रंथों का खंडन किया, मिथक तोड़े, हिंदुत्व छोड़कर हिंदुओं के मुताबिक विष्णु के अवतार तथागत गौतम बुद्ध की शरण में जाकर बोधिसत्व बने, लेकिन बहुजन समाज का वोट हासिल करन के लिए अंबेडकर सत्तावर्ग की मजबूरी है।
माइकेल मधुसूदन दत्त के नाम पर वोट नहीं मिल सकते, जैसे शरतचंद्र,  प्रेमचंद, मुक्तिबोध या ऋत्विक घटक या कबीर दास के नाम पर वोट नहीं मिल सकते।
जब वोट इतना निर्णायक है तो हम वोट राजनीति के खिलाफ जाकर अपने पुरखों को याद कैसे कर सकते हैं?
माइकेल मधुसूदन दत्त जैशोर जिले के सागरदाढ़ी गांव से थे और बांग्लादेश ने उनके प्रियकवि की स्मृति सहेजकर रखी है।
जैशोर में माइकेल के नाम संग्रहालय से लिकर विश्वविद्यालय तक हैं और उन पर सारा शोध बांग्लादेश में हो रहा है।
कोलकाता में मरने के बाद उनकी सड़ती हुई लाश के लिए न ईसाइयों के कब्रगाह में कोई जगह थी और न हिंदुओं के श्मशान घाट में। चौबीस घंटे बाद उन्हें आखिरकार ईसाइयों के एक कब्रगाह में दफनाया गया। हिंदू समाज में तब से लेकर आज तक अस्वीकृत माइकेल की एकमात्र स्मृति उन्हींका बांग्ला में लिखा् एक एपिटाफ है, जिसका स्मृति फलक कोलकता के सबसे बड़े श्माशानघाट केवड़ातल्ला में है, जहां उनकी अंत्येष्टि हुई ही नहीं।
 राजसत्ता के खिलाफ बगावत से जान बच सकती है लेकिन धर्म सत्ता हारने के बावजूद विद्रोह को कुचल सकें या न सकें, विद्रोहियों का वजूद मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
भारत में बंगाल के नवजागरण के मसीहावृंद ने ब्राह्मण धर्म की सत्ता की चुनौती दी थी और वे ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं टकराये। उन्होंने बंगाल और पूर्वी भारत में जारी किसान आदिवासी विद्रोहों का समर्थन नहीं किया और न वे 1857 में क्रांति के लिए पहली गोली कोलकाता से करीब तीस किमी दूर बैरकपुर छावनी में मंगल पांडेय की बंदूक से चलने के बाद कंपनी राज के बारे में कुछ अच्छा बुरा कहा। बिरसा मुंडा के मुंडा विद्रोह और सिधु कान्हो के संथाल विद्रोह के बार में भी वे कुछ बोले नहीं।
राजसत्ता के समर्थन से धर्म सत्ता की बर्बर असभ्यता को खत्म करना उनका मिशन था।
सतीदाह प्रथा को बंद करना कितना कठिन था, आजाद भारत में भी रूपकुंवर सतीदाह प्रकरण से साफ जाहिर है। आज भी आजाद भारत में हिंदुओं में विधवा विवाह कानूनन जायज होने के बावजूद इस्लाम या ईसाई अनुयायियों की तरह आम नहीं है।
बाल विवाह अब भी धड़ल्ले से हो रहे हैं। बेमेल विवाह भी हो रहे हैं। सिर्फ बहुविवाह पर रोक पूरी तरह लग गयी है, ऐसा कहा जा सकता है।
समझा जा सकता है कि मनुस्मृति अनुशासन के मुताबिक हिंदू समाज की आंतरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप न करने की मुगलिया नीति पर चल रही कंपनी की हुकूमत को हिंदू समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए बंगाल के कट्टर ब्राह्मण समाज से टकराने के लिए कतंपनी के राज काज के खिलाप उन्हें क्यों चुप हो जाना पड़ा। क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत नवजागरण आंदोलन के वे सामाजिक सुधार कानून लागू न होते तो आज ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान के अंध राष्ट्रवाद के दौर में हम उस मध्ययुगीन बर्बर असभ्य अंधकार समय से शायद ही निकल पाते।
विद्रोह चाहे किसी धर्म के खिलाफ हो, विद्रोही के साथ कोई धर्म खड़ा नहीं होता।
उसकी स्थिति में धर्मांतरणसे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे तसलिमा नसरीन नास्तिक है और वह धर्म को दलितों,  पिछड़ों,  आदिवासियों और स्त्रियों के मौलिक अधिकारों के लिए सबसे बड़ी बाधा मानती हैं। उनका विरोध और टकराव इसल्म के मौलवीतंत्र से है। लेकिन किसी भी धर्म सत्ता से उसे कोई समर्थन मिलने वाला नहीं है और कहीं और किसी धर्म में उन्हें शरण नहीं मिलने वाली है।
माइकेल मधुसूदन दत्त ने हिंदुत्व से मुक्ति के लिए ईसाई धर्म अपनाया।
ईसाई धर्म अपनाने की उनकी पहली शर्त यह थी कि उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया जाये। फोर्ट विलियम में ईस्ट इंटिया कंपनी के संरक्षण में उनका धर्मांतरण हुआ, लेकिन शर्त के मुताबिक उन्हें इंग्लैड भेजा नहीं जा सका। वे साहेब बनना चाहते थे शेक्सपीअर और मलिटन से बड़ा कवि अंग्रेजी में लिखकर बनाना चाहते थे। लेकिन धर्मांतरण के बाद आजीविका के लिए उन्हें चेन्नई भागना पड़ा।
माइकेल इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर भी बने तो वह धर्म सत्ता की मदद से नहीं, नवजागरण के मसीहा ईश्वर चंद्र की लगातार आर्थिक मदद से वे बैरिस्टर लंदन में रहकर बन पाये। भारत में कोलकाता लौट आये तो शुरुआत में ही अंग्रेजी में लिखना छोड़कर बांग्ला काव्य और नाटक के माध्यम से मिथकों को तोड़ते हुए मनुस्मृति शासन से कोलकाता को जो उन्होंने हिलाकर रख दिया, उसके नतीजतन ईसाई धर्म में भी उन्हें शरण नहीं मिली। ईसाइयों ने कोलकाता में उन्हें दफनाने के लिए दो गज जमीन भी नहीं दी। जबकि उनकी दूसरी पत्नी हेनेरिटा की तीन दिन पहले 26 जून को मौत हो गयी तो उन्हें ईसाइयों के कब्रगाह में दफना दिया गया।
माइकेल की देह सड़ने लगी तो आखिरकार ऐंगलिकन चर्च के रेवरेंड पीटर जान जार्बो कीपहल पर उन्हें हेनेरिया के बगल में मृत्यु के 24 घंयेबाद लोअर सर्कुलर रोड के कब्रिस्तान में दफनाया गया।
पिता राजनाराय़ण दत्त कोलकाता के बहुत बड़े वकील और हिंदू समाज के नेता थे।
इसलिए यह धर्मांतरण गुपचुप फोर्ट विलियम में हुआ। माइकेल ने शेक्सपीअर और मिल्टन का अनुसरण करते हुए सानेट लिखा और संस्कृत कालेज में एक ब्राह्मण विधवा के बेटे को दाखिला देने के खिलाफ कोलकता के ब्राह्मण समाज ने जो हिंदू कालेज शुरु किया, उससे बहिष्कृत होने के बाद बिशप कालेज में दाखिले के बावजूद कहीं किसी तरह की प्रतिष्ठा और आजीविका से वंचित होने की वजह से 18 जनवरी, 1848 को चेन्नई जाकर एक ईसाई अनाथ कालेज में शिक्षक की नौकरी कर ली और उसी अनाथालय की अंग्रेज किशोरी रेबेका से विवाह किया।
चेन्नई में रहते हुए मद्रास सर्कुलर पत्रिका के लिए उन्होंने अंग्रेजी में कैप्टिव लेडी शीर्षक काव्य लिखा और कर्ज लेकर इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया तो सिर्फ अठारह प्रतियां ही बिक सकीं।
कोलकाता में उनके लिखे की धज्जियां उड़ा दी गयीं। बेथून साहेब ने लिख दिया कि माइकेल को अंग्रेजी शिक्षा से उनकी रुचि और मेधा का जो परिष्कार हुआ है, उससे वे अपनी मातृभाषा को समृद्ध करें तो बेहतर।
पिता की मृत्यु के बाद पत्नी रेबेका को चेन्नई में छोड़कर प्रेमिका हेनेरिटा को लेकर कोलकता लौटे माइकेल तो साहित्य और समाज में आग लगा दी उनके मेघनाथ वध काव्य ने।
इसी दौर में महज पांच साल में उन्होंने लिखा-शर्मिष्ठा, पद्मावती, कष्णकुमारीस मायाकानन, बूढ़ों शालिकेर घाड़ेरों जैसे नाटक और तिलोत्तमा काव्य, ब्रजांगना काव्य, वीरांगना काव्य।
राजसत्ता और राष्ट्र के विरुद्ध विद्रोह का नतीजा दमन और नरसंहार है तो अक्सर अग्निपाखी की तरह किसी मृत्यु उपत्यका में बार बार स्वतंत्रता और लोकतंत्र भी उसी विद्रोह का परिणाम होता है।

विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं।
लेकिन धर्मसत्ता के खिलाफ विद्रोह का नतीजा नागरिक जीवन के लिए कितना भयंकर है, उसका जीती जागती उदाहरण तसलिमा नसरीन है, जिसका किसी राष्ट्र या राष्ट्र सत्ता से कोई खास विरोध नहीं है। उन्होने धर्म सत्ता को भारी चुनौती दी है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने धर्म का अनुशासन नहीं माना है। राष्ट्र उन्हें धर्मसत्ता के खिलाफ जाकर अपनी शरण में नहीं ले सकता।
बंगाल के वाम शासन के दरम्यान प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष विचारधारा ने अंततः धर्मसत्ता के साथ खड़ा होकर बांग्लादेश की तरह बंगाल से भी तसलिमा को निर्वासित कर दिया और धार्मिक राष्ट्रवाद की सत्ता नई दिल्ली में होने के बावजूद अधार्मिक, नास्तिक , धर्मद्रोही तसलिमा को भारत सरकार नागरिकता नहीं दे सकती, वही भारत सरकार जिसके समर्थन में तसलिमा अक्सर कुछ न कुछ लिखती रहती है।

धर्मसत्ता के खिलाफ यह विद्रोह लेकिन सभ्यता, स्वतंत्रता, गणतंत्र, मनुष्यों के मौलिक नागरिक और मानवाधिकार के लिए अनिवार्य है।
यूरोप से बहुत पहले पांच हजार साल पहले सिंधु घाटी,  चीन,  मिस्र,   मेसोपोटामिया,  इंका और माया की सभ्यताएं बहुत विकसित रही है।
बौद्धमय भारत के अवसान के बाद भी समूचे यूरोप में बर्बर असभ्य अंधकार युग की निरंतरता रही है।
आम जनता दोहरे राजकाज और राजस्व वसूली के शिकंजे में थीं। राजसत्ता समूचे यूरोप में रोम की धर्मसत्ता से नियंत्रित थी। इंग्लैंड और जर्मनी के किसानों की अगुवाई में धर्मसत्ता के खिलाफ यूरोप में महाविद्रोह के बाद रेनेशां के असर में वहां पहली बार सभ्यता का विकास होने लगा और औद्योगिक क्रांति की वजह से यूरोप बाकी दुनिया के मुकाबले विकसित हुआ। अमेरिका और आस्ट्रेलिया तो बहुत बाद का किस्सा है।

मनुष्यता का बुनियादी चरित्र बाकी जीवित प्राणियों से एकदम अलग है।
बाकी प्राणी अपनी इंद्रियों की क्रिया प्रतिक्रिया की सीमा नहीं तोड़ सकते या हाथी, मधुमक्की और डाल्फिन जैसे कुछ जीव जंतु सामूहिक जीवन के अभ्यास में मनुष्य से बेहतर चेतना का परिचये तो दे सकते हैं किंतु अपनी ही इंद्रियों को काबू में करने का संयम मनुष्यता का सबसे बड़ा गुण है और वह अपने विवेक से सही गलत का चुनाव करके क्रिया प्रतिक्रिया को नियंत्रत कर सकता है और स्वभाव से वह प्रतिक्रियावादी नहीं होता।
मुक्तबाजार में लेकिन हम अनंत भोग के लिए अपनी इंद्रियों को वश में करने का संयम खो रहे हैं और विवेक या प्रज्ञा के बदले हमारी जीवन चर्या निष्क्रियता के बावजूद प्रतिक्रियाओं की घनघटा है।
सोशल मीडिया और मीडिया में पल दर पल वहीं प्रतिक्रियाएं हमारे मौजूदा समाज का आइना हैं। हमारा वह चेहरा है, जिसे हम ठीक से पहचानते भी नहीं है।
सामूहिक सामाजिक जीवन के मामले में मनुष्यों की तुलना में हाथी, मधुमक्खी, भेड़िये और डाल्फिन जैसे असंख्य जीव जंतु हमसे अब बेहतर हैं और हम सिर्फ जैविक जीवन में जंतु बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। इसीलिए यह अभूतपूर्व हिंसा, गृहयुद्ध, युद्ध और आतंकवाद का सिलसिला तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी चमत्कार के बावजूद हमें विध्वंस की कगार पर खड़ा करने लगा है और हम अब भी निष्क्रिय प्रतिक्रियावादी हैं।

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