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माओवादी मुखौटे को पहचानने लगे नेपाली

पवन पटेल
 

हमारा पड़ोसी नेपाल दक्षिण एशिया का ऐसा देश है जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा [कम्युनिस्ट दलों को 2008 के संविधान सभा चुनाव में 57.42% और 2013 के चुनाव में करीबन 49 % मत प्राप्त हुए थे] कम्युनिस्ट पार्टियों पर विश्वास जाहिर करती रही है. पचास के दशक के अल्पकालिक लोकतान्त्रिक अनुभव और राजा महेंद्र के 30 साल के राजनैतिक पार्टी विरोधी निरंकुश पंचायती शासन के बाद 1990 में नेपाल में संसदीय राजतंत्र के अंतर्गत बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना हुई, तब से लेकर हाल तक के चुनाव आंकड़े यही दिखाते हैं, कि लाल रंग में अंकित हंसिया और हथोड़ा वाले वामपंथी दल ही आम जनता के लिए उम्मीद की किरण रहे हैं. यह अलग बात है कि जनमत की इन उम्मीदों कोई एक भी दल ने कभी ही संबोधित किया हो.

साथ ही ये सभी दल [ पढ़ें नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और इसके टूटे-फूटे एम्-एल कुनबे की कई शाखाएं, मोटे/पतले एकता केंद्र मशाल के कुनबे के कम्युनिस्ट, माओवाद की कई शाखाएं यथा प्रचंड-बाबु-काजी के करोड़पति कैश माओवादी व उपयोगितावादी विभ्रम के शिकार नौसिखिये कामरेड किरण के डैश माओवादी और उनका कुनबा ] जनता की बुनियादी आकांक्षाओं यानि गास-बॉस-कपास [ हिंदी में गास का अर्थ रोटी, बॉस मायने मकान और कपास का मतलब कपड़ा होता है ] मुहय्या कराने और एक सम्मानजनक जीवन के लिए अवसर प्रदान करने के सवाल के साथ लगातार मुंह चुराते रहे हैं. और यहाँ तक कि 1990 के बाद जितनी भी कम्युनिस्ट दल काठमांडू के सिंह दरबार के लाल कालीनों से सजे सत्ता के गलियारों में पहुंचे हैं तब तो वे नेपाली समाज में बकौल कम्युनिस्ट पार्टियों के दस्तावेजों के अनुसार उनके मुख्य “वर्ग शत्रु” नेपाली कांग्रेस से भी गए बीते सिद्ध हुए हैं और आम जन आकांक्षा के साथ [शाब्दिक मुहावरों में कहें] ये सभी दल बलात्कार ही करते रहे हैं. और संघर्ष शील जनता की आकांक्षा को रौंद कर ‘राष्ट्रीय सहमति’ के नाम उनको निशस्त्र करते हुए गाँव से शहर की ओर वैसे ही धकेलते हुए स्वयं सपरिवार सिंह दरबार में दाखिल हो जाते हैं. इधर क्रांति के सपने से सहानभूति रखने वाली आम जनता को शहर में वैसे ही बिपन्न जीवन व्यतीत करने के लिए छोड़ देते हैं, जैसे काठमांडू के आस-पास के गांवों से निम्न माध्यम और गरीब परिवारों की जवान किशोरियों को नेपाली दलाल के रैकट एक शानदार भविष्य का सपना दिखाकर उन्हें दिल्ली-मुंबई और खाड़ी मुल्कों के जिस्म फरोशी बाज़ार में बेच देता है.

इसका एक मूल कारण यह है कि पूंजीवादी वैश्वीकरण के इस दौर में नेपाली समाज का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है. 2011 की जनगणना के अनुसार नेपाल में मात्र 17 % आबादी का शहरीकरण हुआ है, बाकि शेष 83 % अभी भी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है. माओवादी आन्दोलन के फलस्वरूप उपजे राजनीतिक समीकरण के चलते 2008 में विश्व के एकमात्र हिन्दू राजतंत्र के अवसान के पहले तक नेपाली समाज में शहरीकरण की गति बहुत कम थी और नेपाली समाज के कई अध्येताओं के अनुसार वर्ष 2000 तक यह गति 7-8 % थी. इसका मूल कारण नेपाल समाज की भू-राजनैतिक-आर्थिक संरचनाएं हैं जिसने इस देश को अभी तक दो उभरती अर्थव्यस्थाओं यानि भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट बनाये रखा है.

इसलिए लाल रंग के का आवरण ओढ़े कम्युनिस्ट दलों के लिए यह बहुत मुफीद रहा है, चीनी क्रांति से आयातित सूत्रों को नेपाली समाज में वैसे ही प्रयोग कर लिया जाए जैसे यह प्रयोग पडोसी देश भारत का मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी खेमा पिछले 40 साल से चीनी क्रांति के सूत्र “अर्ध-सामंती और अर्ध-औप्नेवेशिक” पर दर्जन भर से भी अधिक दुकानें लगाकर लगातार प्रयोग किये जा रहा है. भले ही इस किस्म के यांत्रिक प्रयोग से निकलने वाली चिंगारियां साल दर साल इनके बीच से नई दुकानें लगा देने का अवसर देती हों पर ये जड़ सूत्री प्रयोगों पर इन दलों के महारथी रुकने वाले नहीं हैं. इनके लिए बकौल अराजकतावादी चिन्तक बर्नस्टीन ‘आन्दोलन ही सब कुछ है, न कि इन आन्दोलनों के परिणाम’. भले ही ये प्रयोग धर्मी आन्दोलनों के केन्द्रों की बड़ी संख्या धीरे-धीरे शहर से खिसककर बड़े शहरों और अंततः महानगरों के फ्लैट में सिमट कर रह जाती है. नेपाल का जिक्र इस सन्दर्भ में इसलिए किया गया है कि नेपाल के सभी वामपंथी दल नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के समय से ही चीनी क्रांति से आयातित इस मूल सूत्र “अर्ध-सामंती और अर्ध-औप्नेवेशिक” को रटते रहे हैं, और साथ में भारतीय विस्तारवाद को हाल तक हिन्दू राजतंत्र को कायम रखने और फलतः नेपाली क्रांति का मुख्य शत्रु घोषित करते रहे हैं. हाँ पर जब-जब सत्ता में वे [यथा एमाले और माओवादी] आये हैं, इस भारतीय विस्तारवाद की मदद से ही और इस विस्तारवाद के इस शब्द विन्यास को अपने पांच-सितारा चमचमाते पार्टी कार्यालय में रखी रद्दी की टोकरी में डालते रहे हैं, और यह प्रयोग अभी तक जारी है.

एक ऐसे दौर में जब नेपाली जनता की लगभग श्रम कर गुजारा करने वाली आधी आबादी [हाल में नई संविधान सभा की एक बैठक के परिपत्र के अनुसार 13-14 साल के किशोर से लेकर 45-50 साल के अनुमानतः 60 लाख लोग] देश से बाहर हैं. यह हाल तब है जब देश की कुल आबादी मात्र 2 करोड़ 66 है. सदियों से परंपरागत रूप में इसका अधिकाश हिस्सा भारत में ‘बहादुर’ के रूप में जाना जाता है और कुक, सिक्यूरिटी गार्ड जैसे और छोटे-मोटे काम कर जिंदगी जीने पर विवश हैं. और अरबों रुपया वह हिस्सा नेपाल भेजता है. पर अब भारत की जगह खाड़ी देश पैसा कमाने का आकर्षक केंद्र बन कर उभरे हैं और कुछ आंकड़ो के अनुसार इन देशों में आज 20 लाख नेपाली मजदूर हैं जिसमें ज्यादातर अकुशल श्रमिक हैं. वर्ष 1990 के आखिरी दशक में ब्रिटिश अध्येताओं के एक दल ने अपने अध्ययन में पाया था कि उस समय के नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद (यानि जीडीपी) में इन मजदूरों द्वारा नेपाल में भेजे गए धन का 29% हिस्सा था. यह हिस्सा समय के साथ बढ़ा ही है. नेपाल के अपने अध्ययन के दौरान मैंने पाया कि पहाड़ से तराई जिले के गांवों में आप जहाँ जाईये, कोई भी ऐसा घर/परिवार नहीं मिलेगा जिसका एक या दो सदस्य खाड़ी देशों और भारत में न हो. कहीं कहीं तो यह पाया कि बाप-बेटा और बेटी तीनो ही कमाने खाड़ी गए हैं, प्रतिमाह कुछ पैसा भेजते हैं और घर में मात्र बूढ़े-बूढ़ी और बच्चे ही हैं. परंपरागत रूप में माना जाता है कि पहाड़ में छोटे-छोटे उबड़ खाबड़ जमीन की तुलना में तराई में जमीन में उत्पादक क्षमता ज्यादा है, पर जमीन का वितरण जबरदस्त रूप में असमान होने की वजह से जनता का अधिकांश हिस्सा रोजगार के लिए बाहर जाने पर विवश है. आम तौर पर ‘बिकास की खेती’ करने वाले गैर सरकारी संगठन तराई को नेपाल के धनी इलाके के रूप में चिन्हित करते हैं पर यहाँ पर भी बाहर जाने का क्रम तीव्रता से बढ़ रहा है. इस समय 74 % जनता खेती में लगी है पर देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसका हिस्सा बहुत ही न्यून है, यानि एक तिहाई भी नहीं है. देश की कुल उपजाऊ जमीन 24 % है जिसका अधिकांश हिस्सा तराई के जिलों में पड़ता है. लेकिन इस स्थिति में भी नेपाल बड़ी मात्रा में विदेशों से खाद्यान आयातित करता है. गाहे-बगाहे सुदूर पहाड़ के जिलों से भूख से हुई मौतों का जिक्र राष्ट्रिय तो नहीं पर स्थानीय अखबारों में होता रहा है. भुखमरी की इन स्थितियों के बारे में नेपाल ही नहीं भारत में भी बहुत की कम लोग जानते हैं.

नेपाल में वर्ष 2000 के बाद का हुआ शहरीकरण का कारण ग्रामीण इलाको में हुए खेती से बढे हुए उत्पादन पर बिलकुल भी निर्भर नहीं था, क्यूंकि राज्य ने कभी भी किसान के प्रति सहानभूति रखते हुए कोई योजना कार्यान्वित की हो बल्कि 1996 से शुरू सामन्तवाद-साम्राज्यवादी विरोधी आन्दोलन के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में जड़े जमाकर बैठे हुए सामंत-सूदखोर जैसे तत्वों का शहर में पनाह लेने से बढ़ा. इन सामंती वर्गों के शहर में पलायन से जमींदारी प्रथा तो ख़त्म नहीं हुई. पहले वाली स्थिति अब नहीं है, क्यूंकि जमीन में सामंतवादी ढांचा अभी तक बरकरार है. शहरीकरण की इस तरह की प्रक्रिया माओवादी आन्दोलन के बिना किसी निष्कर्ष के 2006 में समाप्त हो जाने के बाद और ज्यादा बढ़ रही है, जिसके मूल कारण में भारत से इतर बाहर के खाड़ी देशों में हाड़-तोड़ श्रम कर जीवन की बुनियादी आवश्यकता जुटाने के लिए गए नेपाली बहादुर हैं. नेपाल में आज के दौर में 55 लाख लोग भूमिहीन है, 47 % आबादी के पास आधा हेक्टयर या उससे भी कम जमीन है, जिसके स्वामित्व में देश कुल जमीन का 15 है. दलित समुदाय (खासकर तराई में और भी) जो नेपाल की कुल आबादी का करीबन 20 % हिस्सा है, उसके स्वामित्व में मात्र 1% जमीन है. आज के गणतंत्र नेपाल से रोजगार की तलाश में प्रतिदिन 1800 युवा विदेश जाते हैं.

इन परिस्थितियों में सदियों के शोषण के अनुभवों से सीख लेकर ये नेपाली बहादुर गणतंत्र के आने के बाद में जारी प्रतिक्रियावादी राज्य सत्ता के मतलब को समझने लगे हैं, तभी तो 50 डिग्री में तपते खाड़ी देशों के मरुस्थल से इन नेपाली मजदूरों के हर महीने भेजे जाने वाले पैसे से किसी तरह घर चलाने वाले उनके परिजनों ने इस शोषण की वर्गीय समझदारी के तहत 2013 के चुनाव का बहिष्कार किया है. यह परिघटना दिखाती है कि अब वे धीरे-धीरे जाग रहे हैं, और मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी मुखौटे को पहचान करने लगे हैं.

इसलिए यदि नेपाल मे समाजवाद के सपने को जिंदा रखना है तो लोकतान्त्रिक-प्रगतिशील समुदाय को इन तथाकथित वैचारिक मुखौटे के पीछे के रहस्य और कम्युनिस्ट-माओवादी आन्दोलन की निर्मम समीक्षा कर इन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फ़ेंक देना होगा. और यह बिना नेपाली समाज की वर्तमान आर्थिक-राजनैतिक परिदृश्य की समीक्षा के बिना संभव नहीं है कि नेपाली समाज क्या अभी भी “अर्ध-सामंती और अर्ध-उपनिवेशिक” स्थिति में है? या नहीं? क्यूंकि नेपाल से सामंती हिन्दू राजतंत्र के प्रतीक राजा भले ही इतिहास में चला गया हो पर आज के गणतंत्र नेपाल में एक दर्जन से ज्यादा राजा बिद्यमान हैं. हर एक कम्युनिस्ट दल में आज एक राजा है जिसे श्रद्धेय अध्यक्ष  कहकर पुकारा जाता है, जैसे बिगत में नेपाल में राजा को संबोधन के लिए श्री पांच  कहा जाता था. और इन कम्युनिस्ट राजाओं [पढ़े श्रद्धेय अध्यक्ष ] को खतम किये बिना नेपाल में जनता की मुक्ति संभव नहीं है.

About the author

पवन के पटेल, लेखक समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में ‘नेपाली माओवाद का समाजशात्र’ विषय में शोध कर रहे हैं, पवन का शोध कार्य नेपाल में 1996 से 2006 तक चले माओवादी जनयुद्ध के उद्गम स्थल थबांग गाँव में माओवादी द्वारा संचालित गाउँ जनसत्ता तथा जनयुद्ध के अंतरसम्बन्ध पर आधारित है। लेखक नेपाल में भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ गठित भारत-नेपाल जनएकता मंच के पूर्व महासचिव भी रह चुके हैं।

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