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मीडिया का “अनुपात-ज्ञान” गड़बड़ाने से पैदा होते हैं मोदी और केजरीवाल!

बिना राजनीतिक संरक्षण और मिलीभगत के आज तक न देश में कोई दंगा हुआ, न आगे होगा

 

केजरीवाल और संतोष भारतीय में क्या फ़र्क़

अभिरंजन कुमार

नरेंद्र मोदी के आज के राष्ट्रीय उभार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी या तो आडवाणी की है या फिर देश के मीडिया की। आडवाणी जी इसलिये ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने गुजरात दंगे के बाद वाजपेयी की आपत्तियों के बावजूद मोदी को अभयदान दिया और वह अभयदान पाकर मोदी धीरे-धीरे अपनी ताक़त बढ़ाते चले गये। इसीलिये जब आडवाणी जी नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने पर रूठे हुये थे, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि बबूल बोकर आम खाना चाहते हैं आडवाणी जी।

नरेंद्र मोदी के आज के उभार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी मीडिया की इसलिये है, क्योंकि जैसे आज केजरीवाल के मामले में उसका अनुपात-ज्ञान गड़बड़ा गया है, वैसे ही मोदी के मामले में भी एक दशक तक उसका अनुपात-ज्ञान गड़बड़ाया रहा। अपने को प्रोग्रेसिव और सेक्युलर दिखाने के चक्कर में मीडिया ने बात-बेबात मोदी की आलोचना की। और ज़रूरत से ज़्यादा, हद से ज़्यादा आलोचना की। इसका नतीजा यह हुआ कि मोदी के मुद्दे पर पिछले 12 साल से भीतर ही भीतर इस देश में एक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता चला गया।

यूँ तो इस देश में मोटा-मोटी दो तिहाई हिन्दू पूरी तरह सेक्युलर हैं, फिर भी करीब एक तिहाई हिन्दू ऐसे भी हैं, जो सांप्रदायिक तो नहीं हैं, लेकिन अक्सर कुछ संगठनों के सांप्रदायिकता फैलाने वाले प्रोपगंडा के शिकार हो जाते हैं। ये ऐसे हिन्दू हैं, जो कम पढ़े-लिखे हैं, जिन्होंने दुनिया कम देखी है, जिनमें दूरदृष्टि की कमी है, जो देशभक्त तो हैं, लेकिन जिन्हें यही नहीं पता कि देश की भलाई किन चीज़ों में है। उन्हें आज भी लगता है कि पाकिस्तान को भारत में मिलाया जा सकता है या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर धावा बोलकर उसे अपने हिस्से में लिया जा सकता है या भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाया जा सकता है या वैसी तमाम पुरानी मस्जिदों को तोड़कर एक बार फिर से मंदिर बनाया जा सकता है, जो कथित रूप से मंदिरों को तोड़कर बनाई गयी थीं।

दूसरी तरफ़ अल्पसंख्यक होने के नाते बड़ी संख्या में मुसलमान लगातार असुरक्षा की भावना में जीते हैं। उनकी तरफ़ भी ऐसे संगठन कम नहीं हैं, जो कभी उनकी वास्तविक तरक्की के लिये काम नहीं करते, लेकिन उनकी इस असुरक्षा की भावना को लगातार भड़काए रखना चाहते हैं। मेरा मानना है कि मुस्लिम-तुष्टीकरण इस देश में एक मिथक है। सच्चाई यह है कि हिन्दू-तुष्टीकरण की राजनीति भी समानान्तर रूप से चलती रहती है। अगर ऐसा नहीं है तो राजीव गांधी को अयोध्या में ताला खुलवाने की क्या ज़रूरत थी। ख़ुद आरएसएस और भाजपा की समूची राजनीति हिन्दू-तुष्टीकरण की राजनीति नहीं तो और क्या है? हालांकि जैसा कि मैंने ऊपर कहा, हिन्दू-तुष्टीकरण की यह राजनीति मोटा-मोटी एक तिहाई हिन्दुओं को ही अपने लपेटे में ले पाती है।

नासमझ हिन्दुओं और असुरक्षित मुसलमानों का यह तबका ही तमाम राजनीतिक दलों का वोट-बैंक है। इन्हीं तबकों के ध्रुवीकरण के लिये सारी सांप्रदायिक राजनीति इस देश में की जाती है। जब पिछले 12 साल से सारा अनुपात-ज्ञान भूलकर मीडिया नरेंद्र मोदी के पीछे पड़ा था, तो चाहे-अनचाहे भारत में भीतर ही भीतर सांप्रदायिक आधार पर एक ध्रुवीकरण होता जा रहा था। जब मीडिया ने बार-बार गुजरात दंगों के मुद्दे को तूल दिया तो इस एक तिहाई हिन्दू के मन में यह सवाल उठा कि मीडिया बाकी दंगों की बात क्यों नहीं करता। मीडिया, गोधरा कांड की बात क्यों नहीं करता, मीडिया उन 300 हिन्दुओं की भी बात क्यों नहीं करता, जो गुजरात के दंगों में मारे गये? साधारण लोग न यह समझ पाए, न मीडिया उन्हें समझा पाया कि चूंकि भारत में टीवी की सक्रियता का दौर शुरू होने के बाद यह पहला बड़ा दंगा था, इसलिये स्वाभाविक रूप से यह मीडिया में छा गया, वरना बिना राजनीतिक संरक्षण और मिलीभगत के आज तक न देश में कोई दंगा हुआ, न आगे होगा।

बहरहाल, मीडिया में मोदी की जितनी ज़्यादा आलोचना हो रही थी, एक तबके में उनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती जा रही थी। बहुत सारे मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों में अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन अपने राज्य से बाहर कोई उन्हें पूछता नहीं। मोदी की पूछ गुजरात के बाहर भी अगर तेज़ी से बढ़ी तो सिर्फ़ इसलिये, क्योंकि वह लगातार नेशनल मीडिया में छाए रहे और पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार बन गये या बना दिये गये। उनका नाम सुनकर 20 करोड़ हिन्दू पुलकित होने लगा और 20 करोड़ मुसलमान डरने लगा। इन 12 वर्षों में मोदी ने एक और काम बड़ी चतुराई से किया। उन्होंने अपनी सांप्रदायिक छवि पर विकास की चमकीली पन्नियाँ चढ़ाकर उसे मार्केटेबुल बनाया।

प्रधानमंत्री बनने की ख़ातिर सेक्युलर दिखने के ख्वाहिशमंद बन बैठे बूढ़े आडवाणी जी से संघ बुरी तरह निराश और नाराज़ था और ऐसे वक़्त में उसे मोदी जैसे ही हर दृष्टि से फिट एक नेता की तलाश थी।

= मोदी हिन्दू-हृदय-हार हैं

= मुसलमान उनसे डरते हैं

= पिछड़ी जाति से आते हैं, तो हिन्दुओं को सबल बनाने के कॉन्सेप्ट के लिये भी उपयुक्त हैं

= अभी मात्र 63 साल के हैं

= उन्हें लेकर 10-15-20 साल लंबी किसी योजना पर भी काम किया जा सकता है

= बड़े संघ नेताओं के पैर छूते हैं

= तथाकथित विकास-पुरुष हैं

= युवा उन्हें पसन्द करते हैं

= पूंजीपति और कारोबारी उन्हें पसन्द करते हैं

= एनआरआई उन्हें पसन्द करते हैं

= मज़बूत एडमिनिस्ट्रेटर हैं

= संघ के दिये एसाइनमेंट को मज़बूती से लागू कर सकते हैं

ख़ुद आडवाणी जी ने राम के नाम पर एक वक्त भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का चस्का लगा दिया था, इसलिये उन्हीं के नक्शेकदम पर चलते हुये आज जब संघ और भाजपा को लगा कि मोदी के नाम पर ऐसा ध्रुवीकरण हो चुका है और आगे भी हो सकता है, तो उन्होंने आडवाणी जी को खूँटी पर टाँग दिया, सुषमा स्वराज के नाम की चर्चा तक नहीं की और मोदी के हाथ में तलवार थमा दी- करो राजनीतिक शत्रुओं का सफाया।

अब ज़रा उस बात पर आइए, जहाँ से हमने बात शुरू की थी। संघ को चाहे मोदी कितना भी सूट करते हों, लेकिन मीडिया ने अगर उनकी हद से ज़्यादा निगेटिव पब्लिसिटी नहीं की होती, तो आज कोई लॉजिक नहीं था कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार होते।

= मोदी कभी संसद में नहीं रहे।

= कभी केन्द्र में एक छोटा-सा विभाग तक नहीं देखा।

= एक मध्यम आकार के राज्य के मुख्यमंत्री मात्र हैं

= गुजरात से बाहर आज तक उनका योगदान शून्य है

= जनमानस में उनके ऊपर लगा दंगों का दाग कभी नहीं छूटेगा

= व्यक्ति केन्द्रित राजनीति करते हैं और अपने सामने किसी को भी पनपने नहीं देना चाहते

= तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति माने जाते हैं

= सभी तबकों में उनकी स्वीकार्यता नहीं है

= भारत से बाहर भी उनकी स्वीकार्यता सीमित है

= न सिर्फ़ पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेताओं को, बल्कि एनडीए के दूसरे सहयोगियों को भी पसन्द नहीं थे

ऐसे में आज नरेंद्र मोदी उस गुजरात के मुखयमंत्री मात्र ही रहते, जो पहले से एक विकसित राज्य था। जिस तरह आज मध्य प्रदेश से बाहर शिवराज सिंह चौहान को, पश्चिम बंगाल से बाहर ममता बनर्जी को, बिहार से बाहर नीतीश कुमार को पूछने को कोई तैयार नहीं है, उसी तरह गुजरात से बाहर नरेंद्र मोदी को भी कोई नहीं पूछता। और ख़ुद भाजपा की तरफ़ से आज प्रधानमंत्री पद के लिये कोई अनुभवी और लंबे समय से केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय व्यक्ति सामने होता।

तो भारत के मीडिया ने मोदी के मामले में पिछले 12 साल में जिस अदूरदर्शिता का परिचय दिया है, उससे मीडिया से जुड़े वे लोग भी आज भन्नाए हुये हैं, जो पिछले 12 साल से मोदी की मिट्टी पलीद करने में लगे हुये थे, लेकिन दांव पड़ गया उल्टा। एक समय इनका बर्चस्व समूचे मीडिया में था। आज सिर्फ़ आधे मीडिया में रह गया है। इसीलिये देश का आधा मीडिया आज भी मोदी को रोकने के लिये अपना आखिरी दांव ज़रूर चल देना चाहता है। और इस काम के लिये कांग्रेस की तरह उसे भी केजरीवाल में ही ब्रह्मास्त्र नज़र आ रहा है। इसीलिये आप देखेंगे कि आज केजरीवाल के समर्थन में मीडिया के वही लोग सबसे ज़्यादा मुखर हैं, जो मोदी के विरोध में सबसे ज्यादा मुखर थे। लेकिन वे यह नहीं समझ पा रहे कि जो गलतियाँ उन्होंने पिछले 12 साल में मोदी के मामले में कीं, अब उसकी को केजरीवाल के मामले में दोहरा रहे हैं।

देश में लोकतन्त्र है। जो जितना डिज़र्व करे, उसे उतना ही फुटेज दीजिए। भ्रष्टाचार-विरोधी सामाजिक आन्दोलन को फुटेज देना और बात थी, एक राजनीतिक दल को फुटेज देना और बात है। केजरीवाल को उनकी हैसियत से कई गुना ज्यादा फुटेज दिया जा रहा है, क्यों? वही सबसे बड़े क्रान्तिवीर हैं या मीडिया को यूज़ कर बस प्रधानमंत्री बनने को अधीर हैं? मीडिया को यह बात समझनी होगी।

मेरे मन में इस बारे में अब कोई संशय नहीं रह गया है कि अगर मोदी वह सही व्यक्ति नहीं हैं, जो देश को नेतृत्व दे सकते हैं, तो केजरीवाल भी वह व्यक्ति कतई नहीं हैं। दूसरे राजनीतिज्ञों की तरह वे भी न सिर्फ़ अतिशय महत्वाकाँक्षी, मौकापरस्त और स्वार्थी हैं, बल्कि अराजक, तानाशाही और विचारविहीन नक्सलियों की तरह की उनकी सोच है। अपने आन्दोलन की शुरूआत से लेकर अब तक उन्होंने सबको इस्तेमाल किया है। आख़िर केजरीवाल और संतोष भारतीय में क्या फ़र्क़ रह जाता है, जबकि अन्ना के बयानों से साफ़ है कि केजरीवाल से लेकर संतोष भारतीय तक सबने उनका इस्तेमाल किया और उनके साथ धोखाधड़ी की। केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं और अड़ियल स्वभाव के कारण आन्दोलन की टीम भी बिखरती चली गयी और मैं आपको गारंटी दे सकता हूँ कि वे पार्टी में भी किसी को अपने सामने बढ़ते हुये नहीं देख पाएंगे। एक दिन कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी से लेकर योगेंद्र यादव तक- सभी उन्हें छोड़ कर जायेंगे।

केजरीवाल के पास दुनिया भर से सवाल हैं, लेकिन उनके पास किसी सवाल का जवाब नहीं है। न उनके पास किसी भी समस्या का हल है। उनके आन्दोलन की शुरूआत ही सबसे बड़े झूठ से हुई कि एक कानून से भ्रष्टाचार ख़त्म हो सकता है। आप दुनिया का महान से महान कानून बना लीजिए, यह असम्भव है। उसके बाद जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया, तब तो झूठ का अंबार ही लगा दिया। ऐसा लगता है कि जब तक रोज़ एकाध झूठ न बोल लें, एकाध बयान से पलट न जायें, उन्हें खाना ही नहीं हजम होता। झूठे वादे, झूठी शपथ, पूर्व मुख्यमंत्री कहलाने के लिये कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का उतावलापन और लोकसभा चुनाव में फायदा उठाने की मंशा से इस्तीफा दे देने का उतावलापन, दूसरों पर उंगली उठाना और अपने साथ के ग़लत लोगों का ढिठाई से बचाव करना, तनिक भी आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता न होना, मीडिया से नीतीश कुमार से भी ज़्यादा फेवर की चाह रखना और मनोनुकूल फेवर न मिलने पर उसे धमकी देने पर उतर आना- ये सारी बातें बता रही हैं कि मीडिया फिर से एक ग़लत व्यक्ति पर दांव खेल रहा है।

मीडिया को अपनी निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए। उसे किसी भी राजनीतिक दल से न तो राग होना चाहिए, न द्वेष। किसी भी नेता का वह न तो पक्ष ले, न उसकी मुख़ालफ़त करे। तथ्य रखे। संतुलित विश्लेषण दे, ख़बरों में अनुपात का ध्यान रखे, न किसी को हाइप दे, न किसी को डाउन करे। जनता को अपने विवेक से फ़ैसला लेने दे। डिबेट स्वार्थी नेताओं के बयानों, उनकी उल-जलूल हरकतों और शिगूफेबाज़ियों पर न होकर जनता के मुद्दों… देश के अहम सवालों पर हों। मीडिया को किसी की स्वार्थ-पूर्ति का औजार नहीं, बल्कि देश की जनता की आवाज़ बननी चाहिए, वरना जिसे आप पैदा करेंगे, वह भी एक दिन गालियाँ ही देगा, जैसा आज हो रहा है। भस्मासुर वाली कहानी सबको याद रखनी चाहिए।

About the author

अभिरंजन कुमार, लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं, आर्यन टीवी में कार्यकारी संपादक रहे हैं।

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